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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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आनंद शक्ति की चमत्कार स्वरूपा इच्छाशक्ति को द्योतित करने वाला वर्ण। (तन्त्र सार , पृ. 6)। इच्छाशक्ति का आद्य स्पंद। विश्व सृष्टि के प्रति केवल शुद्धतम एवं सूक्ष्मतम इच्छा को ही द्योतित करने वाला वर्ण। (तं. आत्मविलास, 2, नृ. 84)। परमेश्वर की स्वभावभूत परमेश्वरता को अर्थात् उसकी सृष्टि, संहार आदि करने की सामर्थ्य और नैसर्गिक प्रवृत्ति को द्योतित करने वाला मातृका का तीसरा वर्ण। देखिए इच्छाशक्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

इच्छा – उपाय / इच्छा योग

देखिए शाम्भव-उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

इच्छाशक्‍ति

देखिए ‘शक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

इच्छाशक्ति

परमशिव की आनंदशक्ति का चमत्कार। परिपूर्ण स्वातंत्र्य स्वरूप आनंदशक्ति में ही जब बाहर प्रकट होने के प्रति एक सूक्ष्मतर तरंग सी उभरती है तो उसे उसका चमत्कार कहते हैं और यही चमत्कार इच्छाशक्ति कहलाता है। (तन्त्र सार , पृ.6)। परमशिव की पाँच अंतरण शक्तियों में से यह तीसरी शक्ति है। इसकी अभिव्यक्ति शक्ति तत्त्व में मानी गई है। ज्ञान तथा क्रिया शक्तियाँ इसमें अनभिव्यक्त रूप में ही रहती हैं। (शिवदृष्टिवृत्ति, पृ. 24)। साधना क्रम में सदाशिव तत्त्व में इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति मानी गई है, क्योंकि इच्छाशक्ति का ही बहिर्मुख विकास सदाशिव तत्त्व के रूप में प्रकट होता है। (चं. सा., 14)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

इज्यज्ञान

ब्रह्म का यजनीय रूप में ज्ञान होना इज्यज्ञान है। ब्रह्म यज्ञ में ब्रह्म ही यजनीय (जिसको उद्देश्य कर यज्ञ किया जाए) देवता है और यजनीय ब्रह्म का ज्ञान उस ब्रह्म यज्ञ का पूर्ववर्ती अंग है। ऐसी स्थिति में ब्रह्म उस यज्ञ का शेषभूत अंग होगा। जिसका ज्ञान जिस यागका पूर्वांग होता है, वह उस भाग का शेष कहा जाता है, यह नियम है। अतः ब्रह्म ब्रह्मयज्ञ का शेष होगा। किन्तु सिद्धांत पक्ष में ब्रह्म किसी का भी शेष (अङ्ग) नहीं है (अ.भा.पृ. 1180)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

इडा नाडी

नाडी शब्द के विवरण में बताया गया है कि शरीर स्थित अनन्त नाडियों में से तीन नाडियाँ मुख्य हैं – इडा, पिंगला और सुषुम्ना। इनमें से इडा नाडी शरीर के वाम भाग में स्थित है, जो कि सोमात्मक मानी जाती है। इडा नाडी वाम मुष्क से उठ कर धनुष की तरह तिरछे आकार में बायें गुर्दे और हंसुली में से होती हुई वाम नासिका तक गतिशील रहती है। इडा नाडी शंख और कुन्द के समान श्वेत वर्ण की है। इसमें चन्द्रमा का संचार होता है। यह ऊर्ध्वगामिनी नाडी है। ज्ञानसंकलिनी (11-12 श्लो.) में इडा नाडी को गंगा बताया गया है। सकाम कर्मों का अनुष्ठान करने वाले जीवों को यह नाडी धूम मार्ग, अर्थात् पितृयाण मार्ग से पितृलोक में ले जाती है, जो कि पुनर्जन्म का कारण बनता है। इन नाडियों का शोधन किये बिना साधक कभी भी स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं हो सकता। पूरक प्राणायाम करते समय इडा नाडी से ही वायु को ऊपर उठाया जाता है। जब इडा नाडी से स्वर चलता है, तब प्रत्येक शुभ कार्य करने में सफलता मिलती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

इतरेतर संबंध

जिस गुरु शिष्य संबंध में शास्त्र तत्वों का उपदेश ऋषियों से योगियों को, उनसे आचार्यो को, उनसे व्याख्याकारों को पहुँचता हुआ आगे आगे चलता रहता है, इस संबंध को इतरेतर संबंध कहते हैं। इस संबंध में परंपराएँ प्रायः बहुत लम्बी होती है। अनेकों आचार्यो ने अपनी अपनी उन परम्पराओं को अपने ग्रंथों में लिखकर रखा है। संसार में यह इतरेतर संबंध ही प्रचुर मात्रा में चला करता है। इसमें भी मूलतः पर संबंध ही चमकता है। उसी का विस्तार पाँचों अपर संबंधों में वस्तुतः चलता रहता है। (पटलत्री. वि., टि. पृ. 12)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

इदम् अहम्

ईश्वर तत्त्व में ठहरे हुए मंत्रेश्वर नामक प्राणियों का इदन्ता के अर्थात् प्रमेयता के प्रति, और अहंता के अर्थात् प्रमातृता के प्रति परस्पर भेदाभेदात्मक दृष्टिकोण। इस दृष्टिकोण को शुद्ध विद्या भी कहा जाता है। इस दृष्टिकोण में प्रकाशरूपता की अपेक्षा विमर्शरूपता की ही प्रधानता रहती है। मंत्रेश्वर प्राणी (देखिए) ‘इदम् अहम्’ अर्थात् यह समस्त प्रमेय पदार्थ मैं ही हूँ, मेरी ही संविद्रूपता का यह विस्तार है, ऐसी भेदाभेदी दृष्टि को लेकर ही चलते हैं। इस ‘इदमहम्’ विमर्श में इदम् अंश प्रधानतया अभिव्यक्त होता है और अहम् अंश उसका विशेषण जैसा प्रकट होता है। इदम् उद्देश्य बनता है और अह्म विधेय। (ई, प्र. वि., खं. 2, पृ. 196-197)। देखिए अहमिदम्।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

इंदु

देखिए चंद्र।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

इन्द्रिय

बाह्य एवं आन्तरविषयों से व्यवहार करने के लिए बुद्धि को जिन साधनों (कारणों) की आवश्यकता होती है, वे इन्द्रिय कहलाते हैं। विषय के द्वैविध्य के कारण इन्द्रिय भी द्विविध हैं – आन्तर इन्द्रिय (अर्थात् मन) और बाह्य इन्द्रिय जो ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय के नाम से द्विधा विभक्त हैं। ज्ञानेन्द्रिय का व्यापार है – विषयप्रकाशन और कर्मेन्द्रिय का व्यापार है – विषयों का स्वेच्छया चालन। (द्र. ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय शब्द)। स्वरूपतः इन्दियाँ भौतिक (भूत द्वारा निर्मित, अर्थात् शारीरिक यन्त्र रूप) नहीं हैं – ये अभौतिक हैं – अहंकार से उत्पन्न होने के कारण आहंकारिक कहलाती हैं। स्थल अंग-विशेष इन्द्रियों के अधिष्ठानमात्र हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

इन्द्रिय-प्रवृत्ति

आन्तर इन्द्रिय तथा बाह्य इन्द्रियों की जो प्रवृत्ति (अपने-अपने विषयों में) होती हैं, वह क्रमशः भी होती है, युगपद् भी (द्र. सांख्यकारिका 30; सांख्यसूत्र 2/32)। तात्पर्य यह है कि ज्ञानेन्द्रिय की वृत्ति में इन्द्रिय के साथ-साथ मन, अहंकार एवं बुद्धि के भी व्यापार होते हैं। उदाहरणार्थ रूप के ज्ञान में चक्षुरूप ज्ञानेन्द्रिय के साथ उपर्युक्त तीन अंतःकरण के संकल्प, अभिमान एवं अध्यवसाय रूप व्यापार भी होते हैं। ये चार कभी-कभी युगपद् होते हैं (जैसा कि व्याघ्रदर्शनमात्र से पलायन करना) और कभी-कभी क्रमशः (जैसा कि मन्द आलोक में किसी पदार्थ को यह समझकर कि यह चोर है, अतः यह हत्या करेगा, यह समझकर पलायन करना)। ज्ञानेन्द्रिय के साथ विषय का साक्षात् योग होता है, अतः दृष्ट विषय में यह द्विविधता होती है, यह माना जाता है। टीकाकारों ने कहा है कि यह युगपद्वृति भी वस्तुतः युगपद् नहीं है, युगपद् की तरह प्रतीत होती है – वृत्तियों का क्रम लक्षित नहीं होता।
स्मृति, चिन्तन आदि अन्तःकरण के व्यापार हैं; ये परोक्ष विषय में प्रवृत्त होते हैं, क्योंकि स्मृति आदि के लिए विषय को विद्यमान (इन्द्रिय संबंध मुक्त) रहना आवश्यक नहीं है। परोक्ष विषय में केवल आन्तर इन्द्रियों की वृत्ति होती है। यह वृत्ति युगपद् भी होती है, क्रमशः भी, यद्यपि यह वृत्ति पूर्वदृष्ट विषय को लेकर ही उठती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

इन्द्रियजय

योगशास्त्र में इन्द्रियों (बाह्य एवं आन्तर) की जय का प्रसंग दो स्थलों में किया गया है – प्रत्याहार के प्रसंग में तथा विभूति के प्रसंग में। दोनों प्रकार की जयों का फल भिन्न है। प्रत्याहार का अभ्यास करने पर जो इन्द्रियजय होती है, वह इन्द्रिय -वश्यता (इन्द्रिय को वश में रखता) है। श्रेष्ठ इन्द्रिय वश्यता वह है जिसमें चित्त की एकाग्रता के कारण इन्द्रियाँ विषयसंपर्क से शून्य हो जाती हैं – विषयाकारा इन्द्रियवृत्ति नहीं होती है। कई प्रकार के गौण इन्द्रियजय भी हैं, जैसे शास्त्र द्वारा विहित विषयमात्र का ग्रहण करना। गौण इन्द्रियजय सदोष हैं क्योंकि इनमें प्रवृत्ति रहती है (द्र. योगसूत्र 2/54 -55)।
इन्द्रियों के पाँच रूपों (ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय एवं अर्थतत्त्व) पर संयम करने पर भी इन्द्रियजय होता है (द्र. योगसू. 3/47)। इस जय से मनोजवित्व, विकरणभाव एवं प्रधानजय नाम की तीन सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं (इन सिद्धियों का पारिभाषिक नाम ‘मधुप्रतीक’ है (द्र. योगसू. 3/48)। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि इस इन्द्रियजय में इन्द्रिय का अर्थ महत् तत्त्व एवं अहंकार भी है (द्र. योगवार्त्तिक 3/48)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

इन्द्रियवध

सांख्य शास्त्र में जो चार प्रकार का प्रत्ययसर्ग माना गया है, उसमें अशक्ति नामक सर्ग के साथ इन्द्रियवध का सम्बन्ध है। सांख्य-कारिका (का. 46, 49) में कहा गया है कि यह अशक्ति 28 प्रकार की है जिसमें 11 इन्द्रियवध हैं, और 17 बुद्धिवध हैं। वध वह दोष है जिससे इन्द्रिय -व्यापार की अपटुता होती है। इन्द्रियाँ 11 हैं (5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ तथा 1 मन); अतः वध भी 11 प्रकार का है। पूर्वाचार्यों ने 11 वधों के नाम इस प्रकार दिखाए हैं – वाधिर्य = वधिरता (कर्ण की अशक्ति, शब्द श्रवण में), कुष्ठिता (स्पर्शग्रहण में त्वक् की अशक्ति), अन्धत्व (चक्षु की अशक्ति), जड़ता (रसना की अशक्ति), अजिघ्रता (नासिका की अशक्ति), मूकता (वाक् की अशक्ति), कोण्यता -कुणिता (पाणि की अशक्ति), पंगुत्व (पाद की अशक्ति), उदावर्त (वायु की अशक्ति), क्लैव्य (उपस्थ की अशक्ति), मन्दता या विक्षिप्तता अथवा मुग्धता (मन की अशक्ति)। वस्तुतः ये अशक्तियाँ बुद्धि की हैं; बुद्धि का अध्यवसाय इन इन्द्रियदोषों के कारण कुंठित हो जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

इष्ट देवता

स्वाध्याय अर्थात् जप से इष्ट देवता का संप्रयोग होता है – ऐसा योगसूत्र (2/44) में कहा गया है। देवता के साथ योग अर्थात् देवता सत्ता की प्रत्यक्ष उपलब्धि होना ही संप्रयोग है। जिस देवता के प्रति एकाग्र होकर मन्त्र जप किया जाता है, वह इष्ट देवता है। मुख्यतया ये इष्ट देवता वे हैं, जो भूतों, तन्मात्रों एवं इन्द्रियों के अभिभावी (भूत आदि को आत्मभाव के अंगरूप से उपासना करने के कारण) कहलाते हैं। ये अभिभावी देव योगसाधक को उच्चतर साधना मार्ग की सूचना भी दे सकते हैं। इन देवों से पृथक् जो प्रजापति हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्मांडाधीश हैं, वे भी उच्च साधकों के इष्ट देवता हो सकते हैं और उनसे भी आत्मविद्या का उपदेश प्राप्त होता है। यह उपदेश भाषाश्रित नहीं है। योगसूत्रोक्त अनादिमुक्त ईश्वर भी इष्ट देवता हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

इष्‍टलिंग

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत – लिंग’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

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