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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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प्रथम स्पंद, उन्मेष, शुद्ध एवं परिपूर्ण प्रकाश की विमर्श स्वरूपा ज्ञानशक्ति को द्योतित करने वाला वर्ण। (तन्त्र सार , पृ. 6; तन्त्रालोक, 3-73, 74)। मातृका (देखिए) का पंचम वर्ण। परमेश्वर के भीतर विश्वमयी सृष्टि संहार आदि की लीला के विकास के प्रति होने वाली उन्मुखता को अभिव्यक्त करने वाला मातृका का वर्ण। यदि परमेश्वर में यह स्वभावभूत उन्मेष नहीं होता तो जगत् सृष्टि ही नहीं होती। (तन्त्रालोकवि., खं. 3, पृ. 87-88)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उच्चार योग

आणव उपाय की प्राण-वृत्ति पर की जाने वाली धारणा का योग। जीवन क्रिया रूपी प्राण की वृत्तियों को ही धारणा का आलम्बन बनाए जाने के कारण इसे प्राण योग भी कहते हैं। इस योग में प्राण, अपान आदि प्राण की पाँच वृत्तियों का आश्रय लेते हुए अपने शुद्ध संवित् रूप में प्रवेश किया जाता है। इस धारणा में निजानंद, निरानंद, परानंद आदि आनंद की छः भूमिकाओं की अनुभूति होती है और अंततः साधक को शुद्ध एवं परिपूर्ण स्वात्मानंद रूपी जगदानंद की अनुभूति होती है। इसी साधना को उच्चार योग कहते हैं। (तन्त्र सार , पृ. 38, 39)। आनंद, प्लुति, कंप, निद्रा और घूर्णि नाम के योग सिद्धि के बाह्य लक्षण उच्चार योग में बहुलतया अनुभव में आते हैं। (तन्त्रालोक, 5-101 से 105)। यथास्थान देखिए।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उच्छलत्ता / अच्छलन्

देखिए समुच्छलन।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उच्छूनता

जिस प्रकार आक्सीजन आदि गैस जलरूप बनकर अधिक शैत्य के प्रभाव से हिमशिलात्मक रूप में प्रकट होकर अतीव घन रूप को धारण करते हैं, कुछ इस प्रकार की ही जैसी प्रक्रिया से परमेश्वर की सूक्ष्मातिसूक्ष्म विमर्श शक्ति ही क्रम से शुद्ध तत्त्वों, सूक्ष्मतर मापीय तत्त्वों, सूक्ष्म प्राकृत तत्त्वों और स्थूल, स्थूलतर तथा स्थूलतम भूत तत्त्वों के रूप में दर्पणनगर न्याय से प्रकट होती रहती है। उस सूक्ष्मतम शक्ति की इस स्थूलतामयी अभिव्यक्ति को उसकी उच्छूनता की अवस्था कहते हैं। यह उस शुद्ध चेतनामयी पराशक्ति का घनीभाव जैसा है, परंतु इस घनीभाव में भी पराशक्ति किसी विकार या परिणाम का पात्र नहीं बनती है, क्योंकि ऐसा आभास केवल प्रतिबिम्ब न्याय से ही होता है, परिणाम न्याय से नहीं। (शिव दृष्टि, 1-13 से 16)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उत्क्रमण

मृत्यु के उपरांत इस लोक का परित्याग कर जीव का अपने कर्म के अनुसार चन्द्रलोक, सूर्यलोक या ब्रह्मलोक आदि में जाना श्रुतियों में उत्क्रमण शब्द से कहा गया हैं। उत्क्रांति भी यही है। उत्क्रमण करता हुआ जीव पूर्व से प्राप्त प्राण इन्द्रिय आदि के साथ ही उत्क्रमण करता है। इसमें श्रुति प्रमाण है (अ.भा.पृ. 471)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

उत्क्रांति

मरणकाल में अर्चिरादिमार्ग से गमन उत्क्रान्ति कहलाता है (उद् = ऊर्ध्व; क्रान्ति = गमन)। उदान नामक प्राण को वश में करने वाले योगी की ही ऐसी उत्क्रान्ति होती है (द्र. 3/39 योगसूत्रभाष्य)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

उत्सृष्‍ट

वृत्‍ति का एक प्रकार।

साधक के जीवन निर्वाह के उपाय को वृत्‍ति कहते हैं। उत्सृष्‍ट वृत्‍ति का एक प्रकार है। पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार देवता या मातृका आदि के उद्‍देश्य से जो अन्‍न भेंट चढ़ाकर कहीं रखा गया हो अथवा कहीं छोड़ा गया हो वह अन्‍न उत्सृष्‍ट कहलाता है। पाशुपत साधक को साधना के मध्यम स्तर पर वही उत्सृष्‍ट अन्‍न खाना होता है, भिक्षा नहीं मांगनी होती है। उत्सृष्‍ट के रूप में जो भी मिले उसी पर निर्वाह करना होता है। यह उत्सृष्‍ट वृत्‍ति का द्‍वितीय भेद है। (ग. का. टी. पृ. 5)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

उदान

उदान वायु के पाँच प्रकारों में से एक है (योगसू. भाष्य 3.39)। उन्नयन करने के कारण यह उदान कहलाता है। उन्नयन का सरल अर्थ है – रस आदि पदार्थों को ऊर्ध्वगामी करना, पर यह अस्पष्ट कथन है। योगग्रन्थों में उदानसंबंधी वचनों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि (1) उदान मेरुदण्ड के अभ्यन्तरस्थ बोधवाही स्रोतों में प्रधानतः स्थित है, (2) उदान तेज अर्थात् शरीर ऊष्मा का नियन्त्रक है, (3) उदान मरणव्यापार का साधक है, (4) स्वस्थता बोध और पीड़ा बोध उदान पर आश्रित है। शरीरधातुगत सभी नाड़ियाँ उदान के स्थान हैं, यद्यपि हृदय, कण्ठ, तालु और भ्रूमध्य में इसका व्यापार विशेष रूप से लक्षित होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

उदान

प्राण का एक उत्कृष्ट प्रकार। उदान उस प्राणवृत्ति को कहते हैं जिसमें साधक को अपने निर्विकल्प आत्म स्वरूप का दर्शन उत्तरोत्तर स्फुट होता जाता है और विकल्पनात्मक चित्तवृत्ति का क्रम से क्षय होता जाता है। उदान प्राण की अनुभूति साधक को तब होती है जब उसकी प्राणशक्ति सुषुम्ना के बीच में से उत्तरोत्तर ऊर्ध्व गति से संचरण करती है। उदान नामक प्राण का व्यापार तुर्यादशा में अभिव्यक्त होता है। उदान प्राण के द्वारा ही समस्त जीवन व्यवहार को निभाने वाले प्राणी विज्ञानाकल, मंत्र, मंत्रेश्वर और मंत्रमहेश्वर होते हैं। इनमें क्रम से अधिक अधिक शुद्ध उदान वृत्ति की अभिव्यक्ति हुआ करती है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, खं, 2, पृ. 247)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उदार

अविद्या से उत्पन्न अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक जो चार क्लेश हैं, उनकी चार अवस्थाएँ हैं – प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार। उदार वह अवस्था है जो विषय में लब्धवृत्ति (अर्थात् स्वभावतः विषय -व्यवहार के साथ संयुक्त) है। क्लेश की सर्वाधिक स्फुट अभिव्यक्ति इस अवस्था में होती है। सहकारी का सान्निध्य पाकर ये क्लेश प्रबल रूप से अपने-अपने कार्य को निष्पन्न करते हैं। व्युत्थान-दशा में ही इस अवस्था का उदाहरण देखा जा सकता है। उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है कि क्रोध रूप वृत्ति के काल में द्वेष रूप क्लेश उदार अवस्था में रहता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

उद्गाता

गान द्वारा वागिन्द्रिय निमित्तक भोग (सुख विशेष) को देवों तक प्राप्त कराने वाला तथा शास्त्रानुसारी कल्याण को गान द्वारा अपने में प्राप्त कराने वाला उद्गाता कहा जाता है एवं गान द्वारा देवों को सुख तथा अपने को कल्याण प्राप्त कराना उद्गान है (अ.भा.पृ. 680)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

उद्बुभूषा

आद्यकोटि या प्राक्कोटि। परमशिव की परिपूर्ण आनंदात्मक संविद्रूपता में, अपने ही स्वातंत्र्य से, अपने ही आनंद के विलास के रूप में अपने वास्तविक स्वरूप से तनिक भी विचलित हुए बिना ही, संपूर्ण विश्व को अभिव्यक्त करने के प्रति अतीव सूक्ष्म इच्छा या उमंग। इस प्रकार की अति सूक्ष्म उमंग को आद्यकोटि इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह समस्त शुद्ध तथा अशुद्ध सृष्टि के सर्वप्रथम उन्मेष का कारण बनती है। (शिवसूत्रवार्तिक (भास्कर), पृ. 8)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उद्भव

उच्चार योग की प्राण धारणा में छः में से किसी भी आनंद की भूमिका में पूरी तरह से प्रवेश करने से पूर्व स्फुट रूप से बाहर लक्षित होने वाले पाँच लक्षणों में से दूसरा लक्षण। किसी भी प्रकार की उच्चार योग की धारणा पर विश्रांति होने के प्रथम चरण में आनंद की अनुभूति होती है। तदनंतर साधक देह विषयक अहं भाव के अभाव की दशा पर आरुढ़ हो जाता है। इस दशा पर आरुढ़ होने पर ही वह परधाम में प्रवेश कर पाता है। यहाँ उस परधाम का मानो उदय होता है। इस कारण इस लक्षण के उद्भव हैं। एकदम बिजली की तरह चमकते हुए देह आदि से शून्य, शुद्ध संवित् स्वरूप परधाम में प्रवेश करते समय साधक का शरीर उछलने लगता है, उसे मानो अकस्मात झटके से लग जाते हैं। अतः इसे प्लुति भी कहते हैं। यह लक्षण पाँचों लक्षणों में से विशेष स्फुटतया प्रकट होता है। (तन्त्र सार , पृ. 4.; तन्त्रालोक, 5-102)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उद्यम / उद्योग

उन्मेष (देखिए), भाव, स्पंद (देखिए) आदि। परमशिव परिपूर्ण, असीम एवं शुद्ध संवित् तत्त्व है। उसकी इसी परिपूर्ण आनंदात्मक संविद्रूपता में ही विश्व सृष्टि के प्रति अतिसूक्ष्म सा जो स्पंदन होता रहता है या उमंग सी उठती रहती है उसे ही उद्यम, उद्योग आदि शब्दों से अभिव्यक्त किया जाता है। विश्व की सृष्टि आदि का कारण बनने के कारण परमशिव के इसी उद्यम को शार्व तत्त्व, भैरव (देखिए) आदि नामों से भी कहा जाता है। (शिवसूत्रवार्तिक (भास्कर), पृ. 8)। साधक को भी शैव योग के अभ्यास से इस पारमेश्वरी स्पंदशक्ति की अनुभूति अपने में हुआ करती है और उससे वह अपने आप को भैरवात्मक परमेश्वर ही के रूप में पहचान लेता है। (शि.सू. 1-5)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उद्वाप-आवाप

उद्वाप और आवाप एक प्रकार का पदसंबंधी विधान है। उद्वाप वह विधि है जिसमें प्रकरणगत अर्थ में प्रतीयमान पद को उससे भिन्न अन्यार्थपरक रूप में आपादित किया जाए तथा आवाप वह विधि है जिसमें अन्य अर्थ में प्रतीत हो रहे पद को प्रकृत अर्थ परक रूप में आपादित किया जाए। अर्थात् प्रकृत अर्थ का परित्याग कर देना उद्वाप है और अप्रकृत अर्थ का समावेश कर लेना आवाप है। सामान्यतः किसी समूह, किसी अंश को निकाल देना उद्वाप क्रिया है और उस समूह में किसी अन्य का प्रक्षेप कर देना आवाप है (अ.भा.पृ. 274)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

उन्मत्‍तवद् विचरण

पागल की भाँति विचरण।

पाशुपत साधक को पाशुपत योग करते करते भिन्‍न भिन्‍न आचारों का आचरण करना होता है। उनमें से साधना की उत्कृष्‍ट भूमिका में एक उन्मत्‍तवद्‍ विचरण नामक आचार है। इसमें साधक को उन्मत्‍त की तरह घूमना और व्यवहार करना होता है। उसको अपने अंतःकरणों और बाह्यकरणों में वृत्‍ति विभ्रम का अभिनय करना होता है। ऐसे उन्मत्‍त की तरह घूमते रहने से लोग उसको मूढ़ उन्मत्‍त कहकर निंदित करते हैं जिससे उसके पुण्य बढ़ते हैं तथा पाप घटते हैं क्योंकि साधक की प्रशंसा करने वाला उसके पापों को ले लेता है और फलत: साधक के सभी संचित कर्म दूसरों के लेखे में चले जाते हैं। साधक को कर्मों से छुटकारा मिलता है। यह बात मनुस्मृति में भी कही गई है। (मनु स्मृति 6-79)। संभवत: पाशुपत साधकों ने भी इसी सिद्‍धांत का अनुसरण करते हुए इस बात पर अत्यधिक बल दिया है। (पा. सू. कौ. मा. पृ. 96, 97)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

उन्मना / उन्मनस्

सूक्ष्मतर अकल्यकाल के स्पर्श से भी रहित ऐसी अवस्था, जहाँ किसी भी प्रकार की काल कलना हो ही नहीं सकती है तथा जहाँ मन के संस्कारों का भी पूर्णतया क्षय हो जाता है। ऐसी अवस्था जहाँ समना (देखिए) भी विलीन हो जाती है तथा जहाँ अपने सभी संकुचित संवेदनात्मक भावों से उत्क्रमण करता हुआ चित्तपूर्ण उत्कर्ष को प्राप्त हो जाता है। (स्व.तं. 3, व. उ., पृ. 163; वही खं. 2, पृ. 149, 249)। देखिए औन्मनस् धाम।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

उन्मानव्यपदेश

परिमाणमूलक साम्य का प्रतिपादन उन्मानव्यपदेश है। “यावान् वा अयमाकाशस्तावनिष अन्तर्हृदय आकाशः”। इस श्रुति में बाह्य आकाश के समान ही हृदयवर्ती दहराकाश को परिच्छिन्न (सीमित) बताते हुए दोनों की समता बतायी गयी है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

उन्मेष

उन्मेष का शब्दार्थ है खिलना, विकास। यह शैव और शाक्त तन्त्रों में प्रयुक्त एक पारिभाषिक शब्द है। स्पन्दकारिक (श्लो. 41) में इसका लक्षण दिया गया है। उसका अभिप्राय यह है कि मनुष्य जब किसी एक चिन्ता में पड़ा रहता है, तभी उसके मन में दूसरी चिन्ता (विचार) का आविर्भाव हो जाता है। जिस क्षण में एक चिन्ता से दूसरी चिन्ता में चित्त प्रविष्ट होता है, संवेदन का यही सन्धि-बिन्दु ‘उन्मेष’ कहलाता है। साधक को चाहिये कि वह इस उन्मेष दशा का साक्षात्कार करे। चित्त का स्वभाव है कि वह एक विचार से दूसरे विचार की ओर दौड़ता रहता है। यदि कोई साधक एक विचार के समाप्त होते ही दूसरे विचार के उदय होने से ठीक पहले चित्त की वृत्ति को शान्त कर दे, तो वह इस उन्मेष दशा में प्रविष्ट हो सकता है। क्योंकि ऐसा करने से आगे की चिन्ता का उत्थान ही नहीं होगा और पहली चिन्ता के विलीन हो जाने से चित्त उस क्षण में वृत्ति-शून्य हो जायेगा। इस उन्मेष दशा में चित्त को स्थिर कर देने से सारी इच्छाएँ जहाँ से उत्पन्न होती हैं, वहीं विलीन हो जाती है अर्थात् जिस उन्मेष स्वरूप स्पंद तत्त्व से ये इच्छाएँ पैदा होती हैं, उसी में ये विलीन भी हो जाती हैं और इस प्रकार साधक योगी स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

उन्मेष

1. प्रथम स्पंद (देखिए)। संपूर्ण सूक्ष्म एवं स्थूल प्रपंच की सृष्टि से पूर्व अनुत्तर तत्व परिपूर्ण आनंद में ही रहता है। उसके अपने नैसर्गिक स्वभाव से ही उसी के भीतर सृष्टि के प्रति अतिसूक्ष्म सी जो उमंग उठती है, उसके प्रथम परिस्पंद को उन्मेष कहते हैं। (तं. आत्मविलास, खं. 2, पृ. 86)।
2. अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा का प्रथम क्षण अर्थात् जिस अवस्था में अपने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार होता है उसके प्रथम स्पंद को भी उन्मेष कहते हैं। (स्पंदकारिका वृ., पृ. 115)।
3. दो विचारों के बीच की अवस्था अर्थात् वह शुद्ध चेतना जिसमें एक विचार विलीन हो जाता है तथा जहाँ से दूसरे विचार का उदय होता है तथा जो प्रत्येक विचार का मूलभूत कारण बनती है। इसी कारण उन्मेष को विशुद्ध चिन्मात्र स्वरूप वाला भी कहते हैं। (स्पंदकारिका, 41; स्पंदकारिका वृ., पृ. 117)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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