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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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1. ऊनता (देखिए), ऊर्मि (देखिए)। उ अर्थात् उन्मेष पर ही पूर्ण विश्रांति से अभिव्यक्त हुई ऊनता या ज्ञेयांश के आधिक्य को द्योतित करने वाला वर्ण। (तन्त्र सार , पृ. 13)। परमेश्वर के नैसर्गिक स्वभाव से ही उसी के भीतर विश्वसृष्टि को करने के प्रति इच्छा और उस सृष्टि पर ऐश्वर्यात्मक प्रशासन करने की ईशना के उदित होते ही उसी के भीतर स्रष्टव्य विश्व का उन्मेष भी हो जाता है। ऐसा होने पर परमेश्वर स्वयमेव स्रष्टा और स्रष्टव्य के रूप में जब अपना विमर्शन करता है तो उसका वैसा स्वरूप मानो शुद्ध चैतन्य जैसा नहीं रहता है। इस तरह से स्रष्टव्य विश्व से सम्भिन्न जैसी चमकने वाली पारमेश्वरी संवित् को प्रकट करने वाला ऊ वर्ण इस प्रकार की ऊनता की कलना को अभिव्यक्त करता है। (तन्त्रालोक, 3-75, 76)।
2. रुद्रबीज। (स्व.तं.उ., 1, पृ. 56)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ऊनता

ऊ परामर्श। ज्ञानशक्ति का दूसरा रूप जिसमें ज्ञान अंश में ज्ञेय अंश का आधिक्य होता है। शुद्ध ज्ञान प्रधान उन्मेष (देखिए) का उल्लास होता है। ऐसा होने पर सूक्ष्मतम रूप से ज्ञेयता का आभास स्फुट होने की स्थिति में परमशिव की शुद्ध एवं परिपूर्ण संविद्रूपता में जो संकोच का धीमा सा आभास जैसा आने लगता है, या आ सा जाता है, उसे ऊनता कहते हैं। यहीं से संकोच के आभास का प्रारंभ हो जाता है और अपूर्णता का आभास स्फुटतया उभरने लगता है। (तन्त्रालोक, 3-75, 76; वही, पृ. 87)। देखिए ऊ।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ऊर्ध्वरेता

शारीरिक शुक्र (वीर्य) की अधोगति जिस योगी में चिरकाल के लिए रूद्ध हो जाती है – कभी भी किसी भी प्रकार से जब शुक्र का स्खलन नहीं होता तब वह योगी ऊर्ध्वरेता कहलाता है। वीर्य या रेतस् ऊर्ध्वगामी होकर ओजस् रूप से परिणत हो जाता है – इस दृष्टि से ‘ऊर्ध्व’ शब्द का प्रयोग किया गया है। ऊर्ध्वरेता के लिए ऊर्ध्वस्रोता शब्द भी प्रयुक्त होता है। (कदाचित् ‘आयमितरेता’ शब्द भी प्रयुक्त होता है)। योगियों की तरह देवजाति-विशेष भी ऊर्ध्वरेता होती है, यह व्यासभाष्य (3/26) में कहा गया है। जिस प्रकार केवल ज्ञानयोग मार्ग का अवलम्ब करके कोई ध्यानबल से ही ऊर्ध्वरेता हो सकता है, उसी प्रकार हठयोगीय प्रक्रिया विशेष से भी ऊर्ध्वरेता हुआ जा सकता है। हठयोगीय प्रक्रिया का विशद ज्ञान परम्परागम्य है। ऊर्ध्वरेता के शरीर में सुगन्ध की उत्पत्ति होती है, इत्यादि बातें हठयोगीय ग्रन्थों में कही गई हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ऊर्ध्वसर्ग

ऊर्ध्वसर्ग सत्त्व विशाल (= सत्त्वप्रचुर) है – यह सांख्य का मत है (सांख्यका. 54)। इसमें ऊर्ध्व स्वः, मह, जन, तपः और सत्य लोक आते हैं। किसी-किसी के अनुसार भुवः लोक भी ऊर्ध्व में आता है। इन लोकों में सत्त्वगुण का क्रमिक उत्कर्ष है और चित्तगत सत्त्वोत्कर्ष के अनुसार प्राणी इन लोकों में जा सकते हैं। ये सूक्ष्म लोक हैं अतः दैशिक परिमाण के अनुसार इन लोकों की दूरी है, ऐसा नहीं समझना चाहिए। ऊर्ध्वसर्ग देवसर्ग भी कहलाता है। देवयोनि के आठ अवान्तर भेद माने जाते हैं। आठों प्रकार के देवों का निवास-स्थान इन ऊर्ध्व लोकों में है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ऊर्ध्वाग्नाय

स्वच्छंदनाथ (देखिए) के ऊर्ध्वमुख ईशान (देखिए) से प्रकट हुआ शास्त्र। दस शिव आगमों में से दो आगम ईशान के मुख से आविर्भूत हुए हैं। इस कारण इन आगमों को ऊर्ध्व-आग्नाय या ऊर्ध्व-आगम कहते हैं। एक आगम ईशान आदि तीनों के द्वारा कहा गया और दो और आगम ईशान तथा तत्पुरुष और ईशान तथा सद्योजात के द्वारा मिलकर कहे गए। ये सभी आगम शास्त्र ऊर्ध्व आग्नाय कहलाते हैं। वैसे शैव सिद्धांत के समस्त शिव आगमकों का और समस्त भैरव आगमकों का ऊर्ध्व आग्नाय नाम पड़ा है। (मा.वि.वा., टि., पृ. 36)। ऊर्ध्वता से यहाँ गुणों का उत्कर्ष ही अभीष्ट है, दिशा का विचार नहीं। (मा.वि.वा., 1-212)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ऊर्मि

स्पंद। परिपूर्ण एवं अचल परमशिव में अतिसूक्ष्म गतिशीलता की सी अवस्था। (पटलत्री.वि.पृ. 207)। देखिए स्पंद। परमशिव चित्शक्तिस्वरूप है। उस चित् का स्वभाव आनंद है। चिदानंद अपने अत्यंत अतिशय से लहरें जैसे मारता रहता है। उस आनंद की प्रथम लहर को ऊर्मि कहते हैं। यही इच्छाशक्ति के रूप को धारण करती है और इस लहर के प्रभाव से विश्वसृष्टि का विकास होने लगता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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