भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

अ या आ अर्थात् अनुत्तरशक्ति या आनंदशक्ति के अभिमुख इ या ई अर्थात् इच्छाशक्ति या ईशना के आने पर उनके संघट्ट से अभिव्यक्त होने वाली अवस्था को द्योतित करने वाला वर्ण। (तंत्रसा., पृ.12)। अनुत्तर परमशिव अ या आनंदमय शिव आ अपनी विश्व-सिसृक्षात्मिका शक्ति इ या विश्व-ईशनाशक्ति ई के प्रति अभिमुख होकर जब अपना विमर्शन करता है तो उसकी परमेश्वरता के एक विशेष रूप की अभिव्यक्ति होती है। उसी का मातृकात्मक नाम ए है। (तन्त्रालोक, 3-94, 95; वही. वि., नृ. 103, 104)। मातृका का अभ्यास करने वाले साधक को भी एकार की उपासना से परमेश्वरता के उसी भाव की अभिव्यक्ति अपने भीतर होती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

एक

युक्‍त साधक का लक्षण।

पाशुपत योग के अनुसार युक्‍त योगी विषयों से असंपृक्‍त होकर रुद्र में चित्‍त को पूरी तरह से संलग्‍न करके निष्कल रूप धारण करता है अर्थात् इंद्रियाँ और सांसारिक विषय उस साधक की चित्‍तवृत्‍ति से स्वयमेव छूट जाते हैं और वह रुद्र के साथ ऐकात्म्य प्राप्‍ति करके एक बन जाता हे। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 139)। शरीर तथा इंद्रियों से असंपृक्‍त हो जाने के अनंतर महेश्‍वर में तादात्म्य ही ‘एकत्व’ कहलाता है। (शरीरादि वियुक्‍तत्वम् एकत्वम् – ग. का. टी. पृ. 16)। यहाँ ऐकात्मका या ऐक्य से सायुज्य ही अभिप्रेत है, अद्‍वैत नहीं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

एकतत्त्वाभ्यास

यह एक अभ्यास-विशेष है। योगसूत्र (1/32) का कहना है कि विक्षेपों के प्रतिषेध के लिए एकतत्त्व का अभ्यास करना चाहिए। यह ‘एकतत्त्व’ क्या है – यह अस्पष्ट है। भाष्यकार ने “एकतत्त्वावलम्बन चित्त का अभ्यास करना चाहिए”, इतना ही कहा है। वाचस्पति और रामानन्द यति कहते हैं कि एकतत्त्व का अर्थ ईश्वर है। यह अर्थ सांशयिक है, क्योंकि ईश्वराभ्यास “ईश्वरप्रणिधान” से पृथक् कुछ नहीं हो सकता। चूंकि ईश्वरप्रणिधान को पहले ही एक उपाय कहा जा चुका है (1/23 सूत्र में), अतः एकतत्त्वाभ्यास को पृथक् रूप से कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती। अन्य टीकाकारों ने एकतत्त्व का अर्थ “कोई भी एक अर्थ” ऐसा किया है, जो सर्वथा अस्पष्ट है। अवश्य ही इस अभ्यास का स्वरूप संप्रदाय में विज्ञात रहा होगा। स्वामी हरिहरानन्द आरण्य ने योगसूत्र की हिन्दी टीका में तथा संस्कृत टीका ‘भास्वती’ में इस अभ्यास के स्वरूप को स्पष्ट किया है : जिस आलम्बन की भावना की जाए (ध्येय के रूप में) उसके किसी एक गुण या अंश पर ही चित्त को स्थिर रखने का अभ्यास ‘एकतत्त्वाभ्यास’ है। दूसरे शब्दों में एक विषय के अन्तर्गत अवान्तर विषयों से चित्त को हटाकर एक ही तत्त्व के रूप में आलम्बन को देखने का अभ्यास एकतत्त्वाभ्यास है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

एकतत्व धारणा

शुद्ध एवं परिपूर्ण परमशिव को ही आलंबन बनाकर की जाने वाली आणवोपाय की तत्वाध्वा नामक धारणा। परमशिव सभी तत्त्वों से उत्तीर्ण है। उसमें छत्तीस तत्त्व उसी की संवित्स्वरूपता के रूप में रहते हैं। पंचदश तत्त्व धारणा आदि सात प्रकार की तत्त्व-धारणाओं में स्थिति प्राप्त कर लेने के पश्चात् साधक एकतत्त्व धारणा के अभ्यास को करता हुआ अपने को ही दृढ़तर भावना द्वारा परिपूर्ण परमशिव स्वरूप समझने लगता है। इससे उसे पूर्ण परमेश्वरता का आणव समावेश हो जाता है। (तन्त्रालोक, 10-5; वही, वि. पृ. 6; मा. वि. तं., 2-7)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

एकलिंग

शक्ति संगम (1/6) प्रभृति शाक्त तंत्रों में दीक्षा के लिये उपयुक्त स्थानों में पर्वत, शून्यगृह, मंदिर अथवा अरण्य, श्मशान, नदी-समुद्र संगम, चक्रपाणि (कुम्हार) गृह, एकलिंग आदि का समावेश है। इनमें से एकलिंग का लक्षण शक्तिसंगमतन्त्र (1/8/110-111) में इस प्रकार दिया है – जिस मंदिर में पश्चिमाभिमुख पुरातन शिवलिंग हो, उसके सामने नन्दी की मूर्ति न हो तथा जिसके चार-पाँच कोस के घेरे में अन्य कोई लिंग न दिखाई पड़े, उस स्थान को एकलिंग कहते हैं। यहाँ इष्ट की आराधना करने से अनुत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। राजस्थान राज्य में उदयपुर से नाथद्वारा जाते समय बीच में एकलिंग जी का मंदिर पड़ता है। किन्तु यह लिंग पाशुपत मत के अनुसार पंचमुख शिव का है। कौलज्ञान निर्णय मे संगृहीत ज्ञानकारिका (3/7-9) में कौलिक लिंग अर्थात् देहज लिंग को एकलिंग बताया गया है। तन्त्रालोक (15/82-96) में बताया गया है कि कामरूप, पूर्णगिरि और उड्डियान पीठ से पर्वताग्र, नदीतीर और एकलिंग का प्रादुर्भाव होता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

एकवासा

एक वस्‍त्र को पहनने वाला।

पाशुपत संन्यासी को संन्यास की प्रथम अवस्था में केवल एक वस्‍त्र पहनना होता है। वह वस्‍त्र बैल की खाल या कोशों से निर्मित अथवा भूर्ज निर्मित वल्कल अथवा चर्म से निर्मित होता है। पाशुपत सूत्र के कौडिन्य भाष्य के अनुसार एक वस्‍त्र कौपीन रूप में केवल लज्‍जा के प्रतीकार के लिए पहनना होता है और इस वस्‍त्र को भिक्षा में ही प्राप्‍त करना होता है। इस सब का यही तात्पर्य निकलता है कि साधक किसी भी तरह से वस्तु संग्रह न करे और सांसारिक बंधनों में न फँसे। जितना उससे हो सकता है, वह उतनी मात्रा में अपरिग्रही बने। किसी भी वस्तु के स्वामी होने का अभिमान उसमें न रहे। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 34)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

एकवीरक

परिपूर्ण सामरस्यात्मक स्थिति का परामर्श। विश्वसृष्टि के प्रति स्फुट इच्छा के अभिव्यक्त होने पर जो पारमैश्वर्यात्मक क्षोभ की स्थिति उत्पन्न होती है उस स्थिति से पूर्व होने वाला द्वैत परामर्श से रहित अपनी शुद्ध एवं परिपूर्ण प्रकाशरूपता का परामर्श। (तं.आ.वि., 2, पृ. 86)। केवल परमेश्वरात्मकता के कारण इसे ‘एक’ शब्द से कहा गया है। परंतु सृष्टि संहारादि सामर्थ्य के कारण और उस सामर्थ्य की बहिर अभिव्यक्ति का एकमात्र कारण होने के कारण इस दुर्घट कार्य को भी सुघट बना सकने के विचार से उसे ‘वीर’ शब्द से भी कहा गया है, अन्यथा वह शून्य तुल्य ही सिद्ध हो जाता। (वही, पृ. 86, 87)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

एकाग्रता

एकाग्र का अर्थ है – एक ही अग्र (= अवलम्बन) है जिसका। चित्त जब एक ही आलम्बन को जानता रहता है तब उस चित्त को एकाग्र कहा जाता है। यह प्रयत्नपूर्वक साध्य है, क्योंकि स्वभावतः प्राणी का चित्त प्रतिक्षण नाना आलम्बनों में विचरण करता रहता है। पिछले क्षण में जो प्रत्यय (= आलम्बन प्रतिष्ठ वृत्ति) होता है, यदि उसके सदृश प्रत्यय अगले क्षण में भी हो, तो वह एकाग्रता का उदाहरण है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

एकाग्रभूमि

जिस चित्त की भूमि एकाग्र है, वह एकाग्रभूमि है। चित्त सहज रूप से जिस अवस्था में रह सकता है, वह भूमि कहलाती है। जब चित्त अनायास से सदैव एकाग्र रह सकता है तब वह चित्त एकाग्रभूमि कहलाता है। एकाग्रभूमि चित्त में यदि समाधि होती है तो उसे संप्रज्ञात समाधि कहा जाता है। क्षिप्त, मूढ एवं विक्षिप्त भूमि में भी कदाचित् समाधि हो सकती है, पर उसमें योग (अर्थात् संप्रज्ञात या असंप्रज्ञात नामक योग) का सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि इस प्रकार की समाधि विक्षेप के द्वारा आसानी से नष्ट हो जाती है। क्षिप्त आदि भूमियों में उत्पन्न समाधि से विभूति उत्पन्न नहीं होती। एकाग्रभूमि में आलम्बन (=अग्र) रहता है, अतः एकाग्रभूमि में उत्पन्न समाधि चाहे कितनी ही उत्कृष्ठ क्यों न हो, वह सबीज ही होती है। यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि एकाग्रभूमि में चित्त प्रतिष्ठित होने पर कभी-कभी विक्षेप (आत्मज्ञान का अभिभवकारी) उत्पन्न नहीं होता। निद्रा आदि अवस्थाओं में भी ऐसे चित्त में आत्मज्ञान अविलुप्त ही रहता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

एकादशतत्त्व धारणा

पाँच प्रमातृ तत्त्वों तथा इनकी पाँच शक्तियों को आलंबन बनाकर की जाने वाली आणवोपाय की तत्त्वाध्वा नामक धारणा। साधक प्रलयाकल प्राणी को धारणा का आलंबन बनाकर उसी को भावना के द्वारा अकल से लेकर विज्ञानाकल तक के पाँच प्रमाताओं के रूप में और उनकी पाँच शक्तियों के रूप में व्यापक भाव से ठहरा हुआ देखता देखता उसी को परिपूर्ण परमेश्वर के रूप में पहचानता हुआ स्वयं उसी में समा जाता है और अपने भीतर उसी आणवी परमेश्वरता के आवेश का अनुभव करता है। इस धारणा को एकादशी विद्या भी कहते हैं। (तन्त्रालोक, 10-107 से 113, 125, 126)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

एकायन

लय का एकमात्र आधार ब्रह्म एकायन है। जैसे, जलादि रूप अंशों का एकायन जलाशय समुद्रादि होता है, वैसे ही सदात्मक समस्त कार्यों का लयाधार सदात्मक ब्रह्म है। इससे सब पदार्थ शुद्ध ब्रह्म रूप सिद्ध होता है अथवा जिसका एकमात्र प्रकृति या अक्षर आश्रय है, ऐसा संसार वृक्ष भी एकायन है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

एष

ईश्‍वर का नामांतर।

ईश्‍वर के सदा व सर्वदा अविचलित पर स्वभाव में रहने के कारण ‘एष’ नाम से उसे अभिहित किया गया है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 127; ग. का. टी. पृ. 11)। एष शब्द की ऐसी व्याख्या यद्‍यपि निरुक्‍त या व्याकरण के आधार पर ठहराई नहीं गई है, फिर भी कौडिन्य आदि ने एष शब्द का ऐसा अर्थ माना है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

Search Dictionaries

Loading Results

Follow Us :   
  Download Bharatavani App
  Bharatavani Windows App