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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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खेचरी

1. हठयोग की एक प्रक्रिया जिसके अभ्यास के सिद्ध हो जाने पर योगी आकाशचारी बन सकता है।
2. प्रबुद्ध साधक में जागी हुई शिव की परा शक्ति। यह शुद्ध बोध गगन में ही विचरण करती रहती है। शिवसूत्र वार्तिक में खेचरी अवस्था को शिवावस्था कहा गया है क्योंकि सिद्ध साधक इस अवस्था को प्राप्त करने पर शुद्ध चिदाकाश में विचरण करता रहता है (खे स्वचिद्गगनाभोगे चरणात्खेच रीति सा-शि.स.वा.पृ. 34) अर्थात् शुद्ध संवित् रूपता के ऐश्वर्य में ही विचरण करता रहता है अतः शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार करवाने वाली अवस्था होने के कारण खेचरी अवस्था शिवावस्था कहलाती है। (वही)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

खेचरी मुद्रा

ऋजुविमर्शिनीकार शिवानन्द ने (पृ. 184-185) खेचरी मुद्रा के तीन भेद बताये हैं – अंगुलिविरचनात्मा, बोधगगनरूपा और संस्थानविशेष-रूपा। प्रथम प्रकार की खेचरी मुद्रा में अंगुलियों का उपयोग किया जाता है। तन्त्रसार (वाचस्पत्य, पृ. 2478) में इसकी विधि यह बताई गई है – बायें हाथ को दाहिनी ओर तथा दाहिने हाथ को बाईं ओर कर लें। फिर अनामिका को मिलाकर तर्जनी से लगायें और बीच की अंगुली को सटाकर अंगूठे पर जमायें। इसी से मिलती-जुलती विधि नित्याषोडशिकार्णव (3/15-17) में भी वर्णित हैं। इसको संहार मुद्रा या समय मुद्रा भी कहा जाता है। विसर्जन के समय इसका उपयोग किया जाता है।
बोधगगन में विचारण करने वाली खेचरी को शिवानन्द ने अख्याख्येय माना है, किन्तु क्षेमराज ने शिवसूत्रविमर्शिनी (2/5) में इसकी व्याख्या की है कि यह स्वात्मस्वरूप में उछलती हुई आनन्द की लहरी है। तन्त्रसद्भाव (शि. वि. 2/5) में इसका परसंवित्ति के रूप में वर्णन किया गया है।
तृतीय प्रकार की खेचरी का वर्णन यहाँ भिन्न-भिन्न ग्रन्थों के वचनों के आधार पर किया गया है। यह वर्णन विज्ञानभैरव, विवेकमार्तण्ड, स्कन्दपुराण काशीखण्ड तथा हठयोगप्रदीपिका प्रभृति ग्रन्थों में वर्णित क्रम से मिलता-जुलता है। तदनुसार जीभ को उलट कर कपाल के कुहर में तथा दृष्टि को ऊपर उठाकर भौंहों के बीच में लगाने का नाम खेचरी मुद्रा है। इसके अभ्यास से सभी रोग और कर्म फल नष्ट हो जाते हैं। चित्त और जिह्वा दोनों के आकाश में अवस्थान करने से ही इसको खेचरी मुद्रा कहते हैं। इस मुद्रा के अभ्यास से बिन्दु स्थिर हो जाता है। अतः इसका अभ्यास करने वाले योगी को मृत्यु का भय नहीं रहता। वह सदा अमर वारुणी का पान करता रहता है। यह साधक को उन्मना अवस्था में प्रतिष्ठित कर देती है। आकाश में गमन का सामर्थ्य भी उसको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार इसकी यह अन्वर्थक (सार्थक) संज्ञा है।
Darshana : शाक्त दर्शन

खेचरी शक्तियाँ (अपरा)

माया द्वारा मोहित साधकों के आनंद का व्यपोहन करते हुए उन्हें शून्यप्रमातृ भूमि में ही टिकाए रखने वाली शिव की शक्तियाँ। ये शक्तियाँ ख तुल्य अर्थात् आकाशतुल्य शून्य प्रमाताओं को घेर कर रखती हैं। इनका स्थान तथा कार्य क्षेत्र शून्य जीव तत्त्व ही है। उसी में ये विचारण करती हैं अतः खेचरी कहलाती हैं। (स्पंदकारिकासं.पृ. 20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

खेचरी शक्तियाँ (परा)

परमेश्वर की शक्तियों का एक वर्ग। खे अर्थात् आकाशतुल्य शुद्ध बोधस्वरूप प्रमातृतत्त्व में विचरण करने वाली शिव की विशेष शक्तियाँ। ये शक्तियाँ सदैव जीव की संवित् रूपता में ही विचरण करती रहती हैं तथा तीव्र शक्तिपात से पवित्र बने हुए सुप्रबुद्ध साधकों को उनके सर्वकर्तृत्व तथा सर्वज्ञत्व से युक्त शुद्ध संवित्स्वरूपता का बोध करवाती रहती हैं। (स्पंदकारिकासं.पृ.20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ख्याति

साधारणतया ‘ख्याति’ का अर्थ प्रकाश या ज्ञान है। इस अर्थ में ‘ख्याति’ शब्द शब्दान्तर के साथ योगशास्त्र में बहुधा प्रयुक्त होता है। ‘सत्वपुरुषान्यता ख्याति’ अथवा ‘विवेकख्याति’ शब्द इसका प्रमुख उदाहरण हैं। [विवेक (= पृथग्भाव) की ख्याति (= ज्ञान)]। विवेकख्याति के लिए भी केवल ख्याति शब्द प्रयुक्त होता है जो ‘प्रत्युदितख्याति’ (व्यासभाष्य 4/33) आदि शब्दों में देखा जाता है। चित्त की उदयव्ययधर्मिणी वृत्ति ख्याति है, ऐसा प्राचीन सांख्याचार्य पंचशिख के ‘एकमेव दर्शन ख्यातिरेव दर्शनम्’ वाक्य (व्यासभाष्य 1/4 में उद्धृत) से जाना जाता है। सत्वगुण का धर्म जो प्रकाश है, उसके लिए भी ख्याति शब्द प्रयुक्त होता है (ख्याति क्रियास्थितिशीला गुणाः; व्यासभाष्य 3/44)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ख्याति

दर्शन शास्त्र में ख्याति शब्द प्रतीति या ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त होता है। अभेद ख्याति का अर्थ है अद्वय बोध। सब कुछ शिवमय है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है, इस तरह की एकाकार निःशङ्क प्रतीति ही यहाँ अभेद ख्याति कही गई है। भ्रान्त ज्ञान के अर्थ में भी ख्याति शब्द प्रयुक्त होता है। अपूर्णता ख्याति का अर्थ है भ्रमवश अपने पूर्ण स्वरूप का ज्ञान न होना। भारतीय दर्शन में छः प्रकार की ख्याति मानी गई है। विज्ञानाद्वैतवादी योगाचार बौद्ध आत्मख्याति को और शून्यवादी माध्यमिक असत् ख्याति को मानते हैं। प्रभाकर मीमांसक अख्यातिवादी है और नैयायिक अन्यथाख्याति को मानते हैं। ब्रह्माद्वैतवादी शांकर वेदान्त के अनुयायी अनिर्वचनीय ख्याति और रामानुज प्रभृति आचार्य सत्ख्याति को स्वीकार करते हैं। अभिनवगुप्त प्रभृति सभी तान्त्रिक आचार्य अपूर्णख्याति के पोषक हैं उनके अनुसार परिमित प्रमाता को अपने अपरिमित स्वरूप का बोध नहीं होने पाता।
Darshana : शाक्त दर्शन

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