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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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जगदानंद

आणव उपाय के उच्चार योग में प्राण की भिन्न भिन्न धारणाओं पर विश्रांति प्राप्त करने पर अनुभव में आने वाली आनंद की छः भूमिकाओं से उत्तीर्ण अपने परमार्थ स्वरूप का सर्वथा असीम और अनवच्छिन्न आनंद। जगदानंद परमेश्वर की उस अनुपम विशेषता को कहते हैं जिसकी महिमा से वह सदैव सृष्टि आदि पंचकृत्यों की लीला के अवभासन के प्रति उन्मुख बना रहता है। स्वात्म स्वरूप में सर्वथा पूर्ण विश्रांति को ही जगदानंद कहा जाता है। निजानंद, निरानंद आदि आनंद की छहों भूमिकाओं में ओतप्रोत भाव से स्थित, उदय और लय से विहीन, व्यवच्छेद रहित, सर्वव्यापक, शुद्ध, असीम एवं परम अमृत से परिपूर्ण अंतः विश्रांति का परमार्थ रूप ही जगदानंद कहलाता है।। (तन्त्र सार पृ. 38, 39; तन्त्रालोक आ. 5, 50 से 52)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

जंगम

देखिए ‘अष्‍टावरण’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

जन

देश का एख प्रकार।

भासर्वज्ञ ने जन को देश का एक प्रकार माना है। पाशुपत साधक को साधना की द्‍वितीयावस्था में जन अर्थात् लोक में निवास करना होता है। जहाँ वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले जन (लोग) रहते हों वही जन साधक का देश होता है। तात्पर्य यह है कि साधना के द्‍वितीय सोपान पर साधक प्राय: ग्राम में रहता है जहाँ लोग उसकी भिन्‍न भिन्‍न प्रकार की साधनाओं को देखते हुए उसकी निंदा अवहेलना आदि करते रहते हैं। उससे साधक में त्यागवृत्‍ति का वर्धन होता है और वह योग में परिपक्‍व बनता जाता है। (ग. का. टी. पृ. 16)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

जप

पाशुपत धर्म की विधि का एक अंग।

सद्‍योजातादि मंत्रों के अक्षरों से युक्‍त पंक्‍तियों पर मन का समस्त ध्यान लगाना जप कहलाता है। (पा.सू.कौ. भा.पृ. 14)। यह जप दो तरह का कहा गया है – प्रत्याहार फल जप तथा समाधि फल जप। प्रत्याहार फल जप में साधक का ध्यान विषयों से खिंचकर परतत्व की साधना में लग जाता है। समाधि फल जप प्रत्याहार फल जप की निष्पत्‍ति के बाद ही संपन्‍न होता है। उसमें साधक परतत्व पर समाधिस्थ हो जाता है, अथात् जिस जप का परम फल समाधि है। (ग.का.टी.पृ. 20)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

जप

पवित्र मन्त्र (अक्षरमय या ध्वनिमय) का बार-बार उच्चारण करना जप-शब्द का अर्थ है। मन्त्रों में प्रणव (= ओंकार) मुख्य है। कठ आदि उपनिषदों में भी ओंकार-जप की श्रेष्ठता कही गई है। योगाङ्गभूत जप के लिए आवृत्ति अर्थात् बार-बार उच्चारण करना ही पर्याप्त नहीं है। मन्त्रार्थ (मन्त्रप्रतिपाद्य अर्थ) की भावना यदि न हो तो वह योगाङ्गभूत जप नहीं होगा। यह मन्त्रार्थ गुरुपरम्परा के माध्यम से ही विज्ञेय होता है। जपरूप स्वाध्याय के द्वारा इष्ट देवता के साथ सम्प्रयोग (अर्थात् देवता का साक्षात्कार तथा देवता से उपदेश की प्राप्ति) होता है (योगसू. 2/44)।
जप के तीन भेद कहे गए हैं – (1) वाचिक या वाचनिक, (2) उपांशु तथा (3) मानस। वाचिक जप वह है जिसमें वाक्यों का स्पष्ट उच्चारण होता है – यह परश्रवणयोग्य उच्चारण है; उपांशुजप वह है जिसमें ओष्ठ आदि का कम्पनमात्र होता है – उच्चारित ध्वनि अन्यों को सुनाई नहीं पड़ती; मानस जप मन में अर्थस्मरण रूप जप है। मानस जप की पराकाष्ठा मन्त्रचैतन्य में है; इस अवस्था में अर्थ स्मरण निरन्तर अनायास रूप से चलता रहता है। ये तीन प्रकार क्रमशः अधम, मध्यम और उत्तम है। जप्यमन्त्र के उच्चारण में नाना प्रकार का विभाग करके विभक्त अंशों के द्वारा अभीष्ट तत्त्व का स्मरण करके की नाना प्रकार की पद्धतियाँ विभिन्न योगग्रन्थों में मिलती हैं। जप-क्रिया से संबन्धित अनेक विषयों का विशद विवरण (जपमाला, जपसंख्या, जपकाल में वर्जनीय, जपकाल में विहित आसन आदि) तन्त्र ग्रन्थों में द्रष्टव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

जप

मन्त्र की पुनः पुनः आवृत्ति, उसका बार-बार उच्चारण जप कहलाता है। मन्त्र का जप करते समय उसके अर्थ की भी भावना करनी चाहिये। ऐसा करने से मन्त्रवीर्य, मन्त्रचैतन्य का आविर्भाव शीघ्र होता है। जप तीन प्रकार का होता है – मानस, उपांशु और वाचिक (भाष्य)। मन्त्रार्थ का विचार करते हुए उसकी मन ही मन आवृत्ति करना मानस जप है। देवता का चिन्तन करते हुए जिह्वा और दोनों होठों को थोड़ा हिलाते हुए किंचित् श्रवण योग्य जप उपांशु कहलाता है। जो दूसरे व्यक्ति को भी स्पष्ट सुनाई पड़े, ऐसा उच्च स्वर से किया गया जप वाचिक (भाष्य) कहलाता है। वाचिक से उपांशु दस गुना और मानस जप सहस्त्र गुना फल देने वाला है। उत्तम सिद्धि के लिये मानस, मध्यम सिद्धि के लिये उपांशु और क्षुद्र सिद्धि के लिये वाचिक जप किया जाता है। उत्तम मन्त्रों का जप मानस, मध्यम मन्त्रों का उपांशु और अधम मन्त्रों का जप वाचिक विधि से किया जाना चाहिये। इसीलिये कुलार्णव तन्त्र में मानस को उत्तम, उपांशु को मध्यम तथा वाचिक जप को अधम बताया है। जप की सिद्धि हो जाने पर मन्त्र में चैतन्य का आविर्भाव होता है और ऐसा होने पर साधक उसकी सहायता से अनायास सिद्धि लाभ कर सकता है। जप के लिये पद्म, स्वस्तिक आदि आसनों का, पुण्य क्षेत्र, नदीतीर प्रभृति स्थलों का, ग्रहण प्रभृति कालों का भी शास्त्रों में विधान है। गुरुमुख से प्राप्त मन्त्र का जप ही फलदायक होता है। पुस्तक में लिखे मन्त्र का जप करने से कोई सिद्धि नहीं मिलता। स्वप्नलब्ध मन्त्र का जप भी सिद्धिकर माना गया है।
योगिनी हृदय (3/176-189) में शून्यषट्क, अवस्थापंचक और विषुवसप्तक की भावना के साथ मानस जप की विधि विस्तार से वर्णित है। स्थान, ध्यान और वर्ण की कल्पना के साथ मानसिक जप का विधान नित्याशोडशिकार्णव की व्याख्या ऋजुविमर्शिनी और अर्थरत्नावली (पृ. 268) में उद्धृत सिद्धनाथ पाद के एक वचन में मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

जप

अपने इष्टदेव से तादात्म्य स्थापित करने के लिए मंत्र के बारबार दोहराए जाने को जप कहते हैं। यह तीन प्रकार से किया जाता है – उपांशु, मानस तथा सशब्द।
जप उपांशु
वह जप, जो जप करने वाले को ही सुनाई देता है, पास बैठा कोई व्यक्ति ऐसे जप को सुन नहीं पाता है। यह जप मुख के भीतर ही किया जाता है। (स्वच्छन्द तंत्र पटल 2-146)।
जप मानस्
ऐसा जप जो जप करने वाले को भी नहीं सुनाई देता है। केवल मन में मानस विचार के द्वारा ही किया जाने वाला जप। (वही)।
जप सशब्द
मुख से बाहर प्रसार करने वाले स्वर में किया जाने वाला जप, जिसे पास बैठे दूसरे व्यक्ति भी सुन सकते हैं। (वही 147)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

जप (ज्ञानयोग)

शैवी साधना के त्रिक आचार के ज्ञानयोग की वह साधना, जिसमें साधक को यह विमर्श करना होता है कि ‘समस्त विश्व में मैं ही व्याप्त हूँ, मैं ही यह सब कुछ हूँ तथा यह सभी कुछ मुझ में ही स्थित है।’ इसी प्रकार अपने आपको शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संविद्रपू मानने तथा शुद्ध संविद्रूपता को अपना ही वास्तविक स्वरूप मानने के पुनः पुनः परामर्श को जप कहते हैं। (तं.सा.पृ. 26)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

जपपूर्वक ध्यान

पाशुपत योगी के ध्यान की एक अवस्था।

इस अवस्था में साधक मंत्र जप से रुद्र तत्व में ही अपनी समस्त चिंतन शक्‍ति को लगाता है। अर्थात् भगवान – रुद्र का ध्यान करते हुए तत्पुरुष आदि से संबधित मंत्रों का तन्मयतापूर्वक सतत निर्बाध रूप से जप करता रहता है। ऐसे सतत जप की अवस्था जपपूर्वक ध्यान रूप अवस्था कहलाती है। (ग. का. टी. पृ. 20)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

जपमाला

जप की परिभाषा अलग से की गई है। जप की संख्या को जानने के लिये माला का उपयोग किया जाता है। इसी को जपमाला कहते हैं। यह तीन प्रकार की होती है – करमाला, वर्णमाला और अक्षमाला। तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा तथा इनके पर्वों को ही माला के रूप में कल्पित कर उन पर जप किया जाता है। विभिन्न सम्प्रदायों और विभिन्न मन्त्रों के लिये इसके विभिन्न प्रकार शास्त्रों में निर्दिष्ट हैं। शक्तिसंगम, सनत्कुमार, विश्वसार प्रभृति तन्त्रों में इनका वर्णन मिलता है। अकार से क्षकार पर्यन्त वणों की माला के रूप में कल्पना ही वर्णमाला है। ककार का भी इसमें समावेश करने पर इनकी संख्या 51 हो जाती है। यह ऋग्वेद के अग्निमीले आदि मन्त्रों में प्रयुक्त होने वाला अक्षर है। मराठी में यह अक्षर अब भी प्रचलित है। रुद्राक्ष, स्फटिक, तुलसी, कमलगट्टा तथा विभिन्न धातुओं और रत्नों के मनकों से बनी माला को अक्षमाला कहते हैं। विभिन्न प्रकार के मनकों की मालाओं पर जप करने से विभिन्न काम्य कर्मों की सिद्धि होती है। शास्त्रों में बताया गया है कि रुद्राक्ष की माला से जप करने पर अनन्तगुण फल मिलता है। त्रिपुरा के जप में रक्त चन्दन की, गणेश के जप में गजदन्त की, वैष्णव जप में तुलसी की, छिन्नमस्ता आदि के जप में रुद्राक्ष की, नीलसरस्वती, काली तारा आदि के जप में महाशंख की माला विहित है। अक्षमाला के ग्रथन के उपयोग में आने वाले सूत्रों के लिए भी विभिन्न काम्य क्रमों में विभिन्न द्रव्यों और वर्णों का विधान है। माला के संस्कार की भी विभिन्न विधियाँ हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि इन पर कब जप करना चाहिये और कब नहीं। सभी धर्मों में जपमाला का विधान है। यह भी आवश्यक माना गया है कि माला को वस्त्र आदि से ढँककर ही जप किया जाए। शक्तिसंगमतन्त्र के द्वितीय तारा खण्ड में इस विषय का अवलोकन करना चाहिये।
Darshana : शाक्त दर्शन

जयावस्था

अवस्था का एक प्रकार।

पाशुपत योगी की साधना की तृतीय अवस्था जयावस्था कहलाती है। जब साधक अपनी समस्त इंद्रियों पर विजय पा लेता है तथा उसका ध्यान सदैव विषयों से पूर्णत: खिंचकर केवल रुद्र में ही लगा रहता है। उसकी वह अवस्था जयावस्था कहलाती है। यह अवस्था उसे रुद्र सायुज्य की प्राप्‍ति के प्रति अग्रसर बना देती है। (ग. का. टी. पृ. 8)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

जाग्रत् अवस्था

वह अवस्था, जिसमें प्राणी स्थूल शरीरों के द्वारा बाह्य इंद्रियों और अंतःकरणों से स्थूल विषयों के साथ व्यवहार करते हैं। इस अवस्था में पुरुष अपनी श्रोत्रादि इंद्रियों के द्वारा शब्दादि इंद्रिय-विषयों के प्रति प्रसृत होता हुआ अर्थात् उन्हीं से समस्त व्यवहार को करता हुआ परिस्पंदित होता रहता है। (स्पंदकारिकावि.पृ. 20)। इस प्रकार समस्त दृश्यमान प्रपंच जाग्रत् संसार है। शैवशास्त्र में जाग्रत् अवस्था को मेयभूमि कहा गया है। (तन्त्रालोक 10-240)। योगी जनों ने इसे पिंडस्थ नाम दिया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

जातिविपाक

प्राणी का कर्माशय जब तक प्रबल क्लेशों के अधीन रहता है, तब तक उससे तीन प्रकार के फल उत्पन्न होते रहते हैं, जिनका नाम है, जाति, आयु और भोग। ये फल विपाक कहलाते हैं। जाति का अर्थ है जन्म; किसी जाति की देह का धारण करना ही जातिरूप विपाक है। सांख्यशास्त्र में प्राणी की जातियाँ मुख्यतः 14 मानी गई हैं – आठ प्रकार की देवयोनियाँ, पाँच प्रकार की तिर्यग्योनियाँ तथा एक प्रकार की मनुष्ययोनि। दृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय का जाति रूप विपाक अवश्य होता है। किसी एक शरीर में जिस प्रकार का कर्म अधिक परिमाण में रुचि के साथ किया जायेगा, वह कर्म जिस जाति के शरीर के लिए सहज है, उस जाति में वह प्राणी (मृत्यु के बाद) जन्म ग्रहण करेगा।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

जाल प्रयोग दीक्षा

त्रिक साधना की एक विशेष प्रकार की दीक्षा, जिसके द्वारा सामर्थ्यवान् गुरु किसी मरे हुए शिष्य को परलोक में ढूँढ निकालकर स्वयं यहाँ बैठा हुआ ही उसके पाशों का क्षय करता हुआ उसे मोक्ष मार्ग के प्रति प्रवृत्त करता हुआ अंततोगत्वा उसे पाशविमुक्त कर ही देता है। इस दीक्षा से आकृष्ट जीव याग स्थान पर रखी हुई कुशामयी प्रतिमा में या फल में प्रवेश करता है। इस प्रतिमा में स्पंदन भी होता है। उसी में शिष्य को ठहराकर गुरू उसके सभी पाशों को धो डालता है। तदनंतर पूर्णाहुति में उस प्रतिमा का जब होम कर देता है तो शिष्य मुक्त हो जाता है। (तन्त्र सार पृ. 168)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

जितेंद्रित

इंद्रिय विजयी।

पाशुपत दर्शन के अनुसार सिद्‍ध साधक इंद्रियों पर पूर्ण विजय पा लेता है। उसकी इंद्रियाँ किसी भी विषय के प्रति आसक्‍त नहीं होती हैं। बुद्‍धि आदि करणगण जब अपनी तीव्र इच्छा के बल से दोषों से निवृत्‍त करके धर्म वृत्‍ति में लगाए जाते हैं तो वे दर्वीकर सर्प की तरह विषविहीन हो जाते हैं और साधक निरंतर महेश्‍वर ध्यान में स्थित रहता है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 117)।

गणकारिका व्याख्या में जितेंद्रिय को इंद्रियजयी कहा गया है। तथा इंद्रियजयत्व पाशुपत साधक के लक्षण के रूप में आया है। (लक्षण भेदादिन्द्रियोत्सर्ग ग्रह्यो: प्रभुत्वभिन्द्रिय जय: – ग.का.टी.पृ. 22)। योग की उच्‍च भूमिका पर पहुँचने के उपरांत साधक इंद्रियों के द्‍वारा ग्रहण व उत्सर्ग अपनी स्वतंत्र इच्छानुसार कर सकता है, अर्थात् वह इंद्रियों का स्वामी बन जाता है और अपनी इच्छानुसार सभी विषयों को इंद्रियों के द्‍वारा जान सकता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

जीव

अपने को सीमित और अल्पज्ञ तथा अल्पशक्ति माननेवाला मायीय प्रमाता। अपनी प्रकाश रूपता से भिन्न प्रमेय पदार्थ को अर्थात् शून्य, प्राण, बुद्धि, स्थूल शरीर आदि में से ही किसी एक को अपना वास्तविक स्वरूप माननेवाला प्राणी। आणव, कार्म तथा मायीय नामक तीनों मलों से पूर्णतया आवेष्टित सातवीं एवं सबसे निचली भूमिका का सकल प्राणी। (ई.प्र.वि., 2, पृ. 228, 234-37)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

जीवघन

मुक्त जीवों के पिण्डी भाव का अर्थात् पिण्डी भूत मुक्त जीवों का आधारभूत ब्रह्मलोक ही जीवघन है (अ.भा.पृ. 390)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

जीवन्मुक्त

धर्ममेघसमाधि के द्वारा क्लेश और कर्मों की निवृत्ति होने पर ही कोई व्यक्ति जीवन्मुक्त होता है। इस अवस्था में क्लेश की स्थिति ‘दग्धबीजवत्’ हो जाती है, अर्थात् जीवन्मुक्त क्लेश के अधीन होकर कोई कर्म नहीं करते। नूतन विपाक को उत्पन्न करने में कर्माशय असमर्थ हो जाता है, केवल प्रारब्ध कर्म का भोग होता रहता है और योगी अनासक्त होकर इस भोग का अनुभव करते रहते हैं (द्र. योगसू. 4/30)। जीवन्मुक्त का स्वेच्छासाध्य मुख्य कर्म है – मोक्ष विद्या का उपदेश जिसको वे निर्माणचित्त का आश्रय करके करते हैं। किसी-किसी का मत है कि जीवन्मुक्त अवस्था में जाति-आयु-भोग रूप त्रिविध विपाकों में केवल आयुविपाक ही सक्रिय रहता है। जीवन्मुक्त अवस्था कैवल्यप्राप्ति की पूर्वावस्था है। जीवन्मुक्ति के बाद पुनः संसारबन्धन नहीं हो सकता। इस अवस्था के बाद विदेहमुक्ति (शरीरत्यागपूर्वक कैवल्यप्राप्ति) होने में कुछ काल लगता है जो अवश्यंभावी है। इस काल की उपमा कुम्भकार -चक्र का भ्रमण है। नूतन वेग-कारक क्रिया न करने पर भी प्राक्तन वेग के संस्कार से जिस प्रकार चक्र कुछ काल तक घूमता रहता है, उसी प्रकार देहधारण -संस्कार के कारण नूतन कर्म संकल्प से शून्य जीवन्मुक्त का शरीर कुछ काल के लिए जीवित रहता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

जीवन्मुक्त

1. अपनी शुद्ध, असीम एवं शिवरूपता का सतत विमर्श करने के कारण नियत देह आदि धारण करता हुआ ही सभी बंधनों से मुक्त रहने वाला प्राणी। वह समस्त विश्व को तथा इसके समस्त व्यवहार को एक नाट्य के दृश्य के तुल्य मानता है, अथवा इसे अपनी ही परिपूर्ण शक्ति का विलास समझता है। इस प्रकार वह समस्त सांसारिक व्यवहारों को करता हुआ भी उनसे मुक्त ही बना रहता है। (स्पन्दविवृति पृ. 86)। यह ज्ञानी की जीवन्मुक्ति होती है।
2. शिवभाव के परिपूर्ण समावेश के अभ्यास से उत्कृष्ट शिवयोगी शरीर में ठहरते हुए ही मुक्त हो जाने पर अपनी परिपूर्ण परमेश्वरता को भी प्राप्त कर लेता है। ऐसी अवस्था में पहुँचने पर उसमें किसी किसी विषय के सृष्टि संहार आदि को कर सकने की शक्ति भी उदित हो जाती है। उससे वह अपनी परमेश्वरता का आनंद लेता रहता है। यह जीवन्मुक्ति ऐश्वर्यमयी होती है और योगसिद्ध ज्ञानी को प्राप्त होती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

जीवन्मुक्ति

अद्वैतवादी शाक्त दर्शन में बन्ध और मोक्ष को भी विकल्प का व्यापार माना गया है। भोग और मोक्ष की समरसता का यहाँ प्रतिपादन किया गया है। इसकी अनुभूति जीवन्मुक्ति दसा में होती है। प्रत्यभिज्ञा हृदय (सू. 16) में बताया गया है कि चिदानन्दात्मक स्वस्वरूप की अनुभूति हो जाने पर शरीर, इन्द्रिय प्रभृति की चेष्टाओं के चलते रहने पर भी साधक योगी चिदेकात्मस्वभाव से विचलित नहीं होता। इसी स्थिति को जीवन्मुक्ति दशा कहते हैं। अपनी विश्वात्मकता का अनुसंधान करने वाले साधकों का यह स्वभाव है। यह कोई आगन्तुक विशेषता नहीं है। रत्नमाला शास्त्र में बताया गया है कि जिस क्षण गुरु निर्विकल्प स्वरूप को प्रकाशित कर देते हैं, तभी शिष्य मुक्त हो जाता है। क्रम दर्शन की दृष्टि से यह स्थिति क्रमपरामर्श की पद्धति से उन्मीलित होती है। योगवासिष्ठ में अनेक कथानकों के माध्यम से इस स्थिति को समझाया गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन
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