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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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तत्त्व

सामान्य भाव। भिन्न भिन्न पदार्थों में सामान्य रूप से रहने वाला तथा इस कारण उन्हें एक ही वर्ग में लाने वाला तथा उन सभी में व्याप्त होकर ठहरने वाला रूप। भुवन का अनुगामी सूक्ष्म रूप। (तं.सा.पृ. 109; ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, खं. 2, पृ. 192)।
तत्त्व (एक)
सभी तत्त्वों से उत्तीर्ण तथा उन सभी का एकाकार सामरस्यात्मक परमशिव तत्त्व।
तत्त्व (छत्तीस)
शैव दर्शन के रहस्य को समझाने के लिए तथा इस दर्शन के आणवोपाय की तत्त्वाध्वा नामक धारणा में उपयोग में लाने के लिए छत्तीस तत्त्वों की कल्पना की गई है, जो इस प्रकार हैं – शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर, शुद्ध विद्या, माया, कला, विद्या, राग, काल, नियति तथा पुरुष से लेकर पृथ्वीपर्यंत पच्चीस तत्त्व जो सांख्य दर्शन के अनुसार ही हैं। (शि.सू.वा.पृ. 44-45)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तत्त्व-अध्वन्

आणवोपाय की देशाध्वा नामक धारणा में आलम्बन बनने वाला दूसरा तथा मध्यम मार्ग। भुवन अध्वा की भाँति तत्त्व अध्वा भी प्रमेय अंशप्रधान ही है परंतु अपेक्षाकृत सूक्ष्म रूप वाला है। इस धारणा में छत्तीस तत्त्वों को क्रम से अपने शुद्ध स्वरूप से भावना द्वारा व्याप्त करेत हुए अपने शिवभाव का समावेश प्राप्त किया जाता है। (तं.सा.पृ. 109-111)। एक एक तत्त्व को लेकर के उसे ही भावना के द्वारा सर्वभावमय समझने का पुनः पुनः अभ्यास किया जाता है। उससे सर्वव्यापक परिपूर्ण परमेश्वर भाव का आणव समावेश अपने में हो जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तत्त्वत्रय

काश्मीर शैव दर्शन में तत्त्वों का वर्गीकरण केवल वास्तविक वस्तुस्थिति को समझाने के लिए और तत्त्व-अध्वा नामक आणव योग की साधना के लिए किया जाता है। सूक्ष्मतर विश्लेषण से तत्त्वों की संख्या में वृद्धि होती है और एकीकरण की प्रक्रियाओं से या अतिस्थूल विश्लेषण से तत्त्वों की संख्या घट भी सकती है। तदनुसार त्रितत्त्व धारणा के अनुसार भी तत्त्व कल्पना निम्नलिखित प्रकारों से की जा सकती है।
1. नर तत्त्व शक्ति तत्त्व और शिव तत्त्व। (पटलत्री.वि.पृ. 1)।
2. आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व। (मा.वि.तं.2-4)। यथास्थान दे।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तत्त्वशुद्धि

गुरु दीक्षा द्वारा शिष्य को पाशों से छुटकारा देता हुआ जब उनका शोधन करता है तो पहले पृथ्वी तत्त्व से लेकर माया तत्त्व तक सभी का शोधन करता हुआ उन इकत्तीस तत्त्वों के पाशों से उसे छुड़ाता है। तदनंतर विद्या स्तर के तीनों तत्त्वों से उसे पार ले जाकर शक्ति तत्त्व पर पहुँचाकर शिव तत्त्व के साथ उसका एकीकरण कर देता है। क्रियामयी दीक्षा की इस प्रक्रिया को तत्त्वशुद्धि कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तत्त्वसर्ग

सांख्य में तीन प्रकार का सर्ग माना गया है – तत्त्वसर्ग, भूतसर्ग एवं भावसर्ग। तत्त्वसर्ग = तत्त्वों का सर्ग = सृष्टि। तत्त्व = महत – अहंकार – तन्मात्र – इन्द्रिय – मन – भूत। इन तत्त्वों के मूल उपादान अव्यक्त (साम्यावस्था प्राप्त त्रिगुण) हैं और मूल निमित्त अपरिणामी चेतन पुरुष है। इन तत्त्वों की सृष्टि का क्रम नियत है। क्रम यह है – प्रकृति से महत्तत्त्व, महत् से अहंकार, अहंकार के सात्त्विक भाग से दस इन्द्रियाँ तथा मन एवं उसके तामस भाग से पाँच तन्मात्र; पाँच तन्मात्रों से पाँच भूत। कहीं-कहीं क्रम का यथावत् निर्देश न करते हुए भी तत्त्वों का उद्भव कहा गया है, जैसे महत्तत्त्व से ही तन्मात्र हुए हैं – ऐसा भी कहा गया है पर इससे व्यवस्थित क्रम अप्रामाणिक नहीं हो जाता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तत्पुरुष

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत शास्‍त्रों में ईश्‍वर को तत्पुरुष नाम से भी अभिहित किया गया है। क्योंकि वह आदि पुरुष है, जो समस्त जगत का कारणभूत तत्व है तथा जो समस्त विश्‍व के कण कण में व्याप्त होते हुए विविध रूपों में चमकता है (पा. सू.कौ.भा. पृ. 107)।

पाशुपत साधना में वेदोक्‍त तत्पुरुष के मंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है। (तत् पुरुषाय विद्‍महे, महादेवाय धीमहि, तन्‍नो रुद्र: प्रचोदयात्) – पा. सू. 4-22, 23,24)। ऐसे मंत्र शैवी साधना में प्रयुक्‍त होते हैं। नारायणीय उपनिषद में भी ऐसे बहुत सारे शिवमंत्र दिए गए हैं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

तत्पुरुष

स्वच्छंदनाथ (देखिए) के पाँच मंत्रात्मक रूपों में से दूसरा रूप। प्रक्रिया मार्ग की दृष्टि से साधना के क्रम में शक्ति तत्त्व को आनंद शक्ति की अभिव्यक्ति का स्थान माना गया है। उस दृष्टि के अनुसार तत्पुरुष को शक्ति तत्त्व तथा उसकी आनंद शक्ति का स्फुट रूप माना गया है। (तं.आ.वि. 1 पृ. 36-39)। पंचमुख स्वच्छंदनाथ के पूर्वाभिमुख रक्तवर्णमुख को तत्पुरुष मुख कहा जाता है। यह परमेश्वर का ईश्वर भट्टारक स्थानीय मंत्रात्मक रूप होता है। इस अवस्था को सौषुप्तवत् माना गया है। इसके उपासक साधक श्मशान में वास करने वाले विरक्त कापालिक होते हैं। (मा.वि.वा. 1-206 से 211, 213 से 2176, 230 से 233, 251)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तनु

अस्मिता आदि क्लेशों की चतुर्विध अवस्थाओं में यह एक है। तनु (=क्षीण) – अवस्था वह है जिसमें क्लेशों की कार्य करने की शक्ति प्रतिपक्ष-भावना के कारण शिथिल हो गई हो। इस अवस्था में स्थित क्लेश तभी सान्द्रिय हो सकते हैं (अर्थात् अपने अनुरूप वृत्ति को उत्पन्न कर सकते हैं) जब उद्बोधक सामग्री अधिक शक्तिशाली हो। क्रिया-योग (द्र. योगसू. 2/1) के द्वारा यह अवस्था उत्पन्न होती है। योगाभ्यास के बिना जो तनुत्व देखा जाता है, वह कृत्रिम है। तनु -अवस्था में स्थित क्लेश विवेक का सर्वथा अभिभव नहीं कर सकता। तनु-अवस्था को कभी-कभी सूक्ष्म-अवस्था भी कहा जाता है, यद्यपि ‘सूक्ष्मावस्था’ शब्द का प्रायः दग्धबीज अवस्था के लिए ही प्रयोग होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तन्मात्र

तन्मात्र अकारान्त शब्द है। आकारान्त तन्मात्रा शब्द आधुनिक लेखकों के द्वारा भ्रमवश प्रयुक्त होता है; ‘तस्य मात्रा’ इस विग्रह में तन्मात्रा शब्द निष्पन्न हो सकता है, पर इसका अर्थ तन्मात्र रूप द्रव्यविशेष नहीं होगा। सांख्य में तन्मात्र नित्य नपुंसकलिङ्ग है – तद्एव तन्मात्रम्; यही कारण है कि शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र आदि शब्दों की तरह शब्दमात्र, स्पर्शमात्र आदि शब्द भी प्रचलित हैं। शब्द-स्पर्शादि भेद से तन्मात्र पाँच हैं। तन्मात्र के लिए भूत शब्द का प्रयोग भी कुछ प्राचीन आचार्यों ने किया है; वे भूत के लिए महाभूत शब्द का प्रयोग करते हैं। तन्मात्र को कदाचित् परमाणु भी कहा गया है, यद्यपि परमाणु शब्द तन्मात्र से स्थूल पदार्थ के लिए भी प्रयुक्त होता है। तन्मात्र के कई पर्याय शब्द (अविशेष आदि) टीकाग्रन्थों में दिए गए हैं।
तन्मात्र का उपादान भूतादि (अर्थात् अहंकार का तामस भाग) है। इस अहंकार से तन्मात्र का प्रादुर्भाव कैसे होता है, यह योगीपरम्परा से ज्ञातव्य है। प्रतिजीवगत अहंकार से तन्मात्र नहीं होता; महाशक्तिशाली पुरुष विशेष के अहंकार से तन्मात्र प्रकटित होता है। तन्मात्र ही ब्रह्माण्ड की बाह्यदृष्टि से अन्तिम उपादान है। तन्मात्र का स्थूल रूप भूत है। भूतों में शब्दादि अपनी चरम सूक्ष्मता में नहीं होते (द्र. भूत शब्द)।
यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि तन्मात्र छोटे -छोटे कण रूप वस्तु नहीं है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध जब चरम सूक्ष्म अवस्था में पहुँच जाते हैं, तब वे शब्द आदि तन्मात्र कहलाते हैं (शब्दादि गुणों से उनके गुणी द्रव्य ग्राह्य होते हैं – सांख्यीय दृष्टि के अनुसार)। योगी कहते हैं कि क्षणमात्रव्यापी एक-एक क्रिया से जो शब्द, स्पर्श, रूप आदि उद्भूत होते हैं, वे तन्मात्र हैं। तन्मात्र से सूक्ष्मतर भाव बाह्य रूप से प्रत्यक्ष नहीं होता। तन्मात्र का विचारानुगत संप्रज्ञात समाधि द्वारा ही साक्षात्करण संभव है; किसी भी मन्त्रादि की सहायता से तन्मात्रों का साक्षात्कार नहीं होता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तन्मात्र

शुद्ध प्रकाशरूप प्रमातृ अंश के पारमेश्वरी मायाशक्ति के द्वारा आच्छादित हो जाने पर तमः प्रधान अहंकार से प्रमेयात्मक अति सूक्ष्म पाँच विषयों की सृष्टि हो जाती है। वे शब्द, स्पर्श आदि पाँच सूक्ष्म विषय पाँच तन्मात्र कहलाते हैं। तन्मात्र का शब्दार्थ है ‘केवल उतना ही’ अर्थात् सर्वथा विभागरहित सामान्याकार सूक्ष्मतर विषय मात्र। जब ये ही सूक्ष्मतर विषय क्षोभ के कारण स्थूलता को प्राप्त करते हैं तो क्रमशः आकाश, वायु आदि पाँच महाभूतों के रूपों में प्रकट हो जाते हैं। (तं.सा.पृ. 89-90)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तप

लाभ का एक प्रकार।

तप लाभ का दूसरा प्रकार है। पाशुपत साधक की भस्मस्‍नान, भस्मशयन आदि क्रियाओं से उसमें जो धर्म उद्‍बुद्‍ध होता है, वह तप कहलाता है। इस तप के कई चिह्न होते हैं जैसे गति, प्रीति, प्राप्‍ति, धर्मशक्‍ति तथा अतिगति। (ग.का.टी.पृ. 15)। जैसे कोतवाल नगर की सम्पत्‍ति की रक्षा करता है, उसी तरह से तप धर्म की रक्षा करता है। अधर्म रूपी चोर से साधक को तप ही बचाए रखता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

तप

पंचविध नियमों में तप अन्यतम है। योगसू. 2/1 में क्रियायोग का भी यह एक अंग माना गया है। योगियों का कहना है कि विषय -व्यासभाष्य (2/32) में तप का लक्षण है – द्वन्द्वों (=विरूद्ध भावों, जैसे शीत -ऊष्ण अथवा क्षुधा -पिपासा) का सहन करना (अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए)। योग में तप का विधान वृत्तिनिरोधार्थ के लिए ही है। योगी को यह देखना आवश्यक होता है कि तप शरीर को अनावश्यक रूप से पीड़ित न करे – शरीरधातु का क्षयकारक न हो। एकाग्रता-प्रसन्नता की वृद्धि तप के साथ होना आवश्यक है। क्लेशों को क्षीण करने में तप की असाधारण शक्ति है। तप से इन्द्रियसिद्धि (दूरश्रवण, दूरदर्शन आदि) तथा कायसिद्धि (अणिमा आदि) होती है (योगसू. 2/43)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तमोगुण

सांख्योक्त तीन प्रसिद्ध गुणों में से यह एक है। अन्य दो हैं – सत्त्व और रजस्। तमोगुण के लक्षणादि के विषय में ‘गुण’ शब्द के अंतर्गत देखें। तमोगुण के कारण सत्त्व की प्रकाशन-क्रिया एवं रजस् की उद्घाटन-क्रिया नियमित होती है।
बाह्य-आभ्यन्तर पदार्थों में तमोगुण किस रूप में रहता है (प्रधान भाव से), इसका एक लघु विवरण यहाँ दिया जा रहा है। शब्दादि पाँच गुणों (साधारण अर्थ में) में गन्ध तामस है। उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों में नासिका, कर्मेन्द्रियों में पायु, पंच प्राणों में अपान, अवस्थात्रय में सुषुप्ति, देवादिप्राणियों में तिर्यक्प्राणी तामस हैं। यह तमोगुण स्वभावतः अदृश्य अवस्था में रहता है; यही कारण है कि कभी-कभी तमस् शब्द का त्रिगुण के लिए भी प्रयोग होता है, क्योंकि यह अवस्था भी अदृश्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तमोगुण

परमेश्वर में भेदावभासन के प्रति जो स्वभावभूत उन्मुखता रहती है उसे उनकी परामायाशक्ति कहते हैं। जब वही मायाशक्ति मायातत्त्व तथा उससे विकसित पाँच कंचुकों के प्रभाव से अत्यधिक संकुचित बने हुए भेदमय दृष्टिकोण वाले संकुचित प्रमाता में आकर प्रकट हो जाती है तो उस अवस्था में उसे तमोगुण कहते हैं। शक्ति और शक्तिमान् ऐसा शब्द-प्रयोग अभेद दृष्टि से किया जाता है। मायीय प्रमाता भेद दृष्टि ही रखता है; अतः यहाँ गुण और गुणी इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग होता है। मूर्च्छा, निद्रा आदि अवस्थाओं में संकुचित जीव में जब कभी अपने स्वरूप की सत्ता के आनंद के आभास का भी अभाव बना रहता है, तो उस अवस्था में उसका ऐसा मोह रूपी स्वभाव ही तमोगुण कहलाता है। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञावि. 4-1-4,6)। इस गुण के शेष स्वभाव सांख्य दर्शन के अनुसार ही माने गए हैं। परंतु सांख्य में इसे एक मात्र प्रकृति का गुण माना गया है। जबकि काश्मीर शैव में यह मूलतः परुष का ही गुण है और वही इसे प्रकृति पर संक्रांत कर देता है, जब गुणमय दृष्टिकोण से उसका विमर्शन करता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तान्त्रिक साधना

तन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति और इसकी ऐतिहासिक प्रवृत्ति के संबंध में इस विषय के प्रायः सभी ग्रंथों में विस्तार अथवा संक्षेप में लिखा गया है। यह शब्द आजकल भारतीय वाङ्मय की एक शाखा-विशेष में रूढ़ है, जो पहले आगम और बाद में तन्त्र शब्द से अभिहित हुई। प्रो. विण्टरनित्ज के अनुसार संहिताएँ वैष्णवों के, आगम शैवों के तथा तन्त्र शाक्तों के पवित्र ग्रन्थ हैं, किन्तु आगम शब्द से जैसे आजकल शैव और वैष्णव दोनों प्रकार के आगम ग्रंथों की अभिव्यक्ति होती है, वैसे ही संहिता शब्द से केवल वैष्णवागमों का बोध नहीं होता। वैदिक संहिताओं के अतिरिक्त आयुर्वेद, ज्योतिष, पुराण में भी संहिता ग्रन्थ विद्यमान हैं। अतः आगम अथवा तन्त्र शब्द ही इस पूरे वाङ्मय का प्रतिनिधित्व करता है। इन सारे ग्रन्थों की कुछ समान विशेषताएँ हैं। ये पवित्र ग्रन्थ द्विजाति के लिये ही नहीं, बल्कि शूद्रों और स्त्रियों के लिये भी हैं।
आगम अथवा तन्त्र शास्त्र के ग्रन्थों में प्रतिपाद्य विषय को चार भागों में बाँटा गया है – ज्ञान, क्रिया, चर्या और योग। बौद्ध तन्त्रों में ज्ञान के स्थान पर अनुत्तर नाम मिलता है। यह सही है कि केवल शैवागम और कुछ पाँचरात्र संहिताएँ ही उक्त नाम के चार पादों में विभक्त हैं, किन्तु बिना पाद विभाग के ये सभी विषय प्रायः सभी तन्त्र ग्रन्थों में प्रतिपादित हैं। इस प्रकार आगम अथवा तन्त्र शब्द से समान प्रकृति वाले एक विशाल भारतीय वाङ्मय का बोध होता है।
भागवतों (पाँचरात्र) और पाशुपतों ने एक ऐसी साधना पद्धति का आविष्कार किया था, जिसमें आराधक आराध्य के साथ आन्तर और बाह्य वरिवस्या (पूजा) के द्वारा तादात्म्य स्थापित करने के उद्देश्य से भूतशुद्धि, प्राणप्रतिष्ठा, न्यास और मुद्रा की सहायता से स्वयं देवस्वरूप हो जाता है। स्वयं देवस्वरूप होकर वह अपने आराध्य को भी इसी विधि से मूर्ति, पट, मन्त्र, मण्डल, यन्त्र आदि में प्रतिष्ठित करता है और इस प्रकार अपने इष्टदेव की बाह्य वरिवस्या सम्पादित करता है। बाह्य वरिवस्या की पूर्णता के लिये यहाँ व्रत, उपवास, उत्सव, पर्व आदि का विधान है और आन्तर वरिवस्या के लिये वह कुण्डलिनी योग का सहारा लेता है। वैदिक कर्मकाण्ड से विलक्षण इस कर्मकाण्ड की निष्पत्ति के लिये जिस शास्त्र का आविर्भाव हुआ, वही आज आगम अथवा तन्त्रशास्त्र के नाम से अभिहित है। अपने आराध्य की आन्तर वरिवस्या के लिये इसका अपना दर्शन है, योग पद्धति है और बाह्य वरिवस्या के लिये मंदिरों और मूर्तियों का निर्माण तथा उनकी आराधना की विशिष्ट पद्धति इसमें वर्णित है। उक्त विषयों के प्रतिपादन के लिये ही प्रत्येक ग्रन्थ में विद्या (ज्ञान), योग, क्रिया और चर्या नामक चार पादों का विधान किया गया था। शिव, विष्णु, बुद्ध और महावीर के अतिरिक्त शक्ति, सूर्य, गणेश और स्कन्द प्रभृति देवताओं की आराधना इसी पद्धति से होने लगी थी। इन पूर्ववर्ती शैव और वैष्णव आगमों की तथा परवर्ती शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन तन्त्रों की साधना पद्धति में कोई अन्तर नहीं है।
आगम अथवा तन्त्रशास्त्र पूरी मानव जाति के उद्धार के लिये प्रवृत्त हैं। इसकी साधना पद्धति की दीक्षा प्राप्त कर लेने के बाद गुरु की सहायता से समझा जा सकता है। तान्त्रिक साधना अधिकतर रहस्यात्मक अथवा संस्कारयुक्त मातृकाओं और वर्णों के, मन्त्रों और संकेतों के यथार्थ प्रयोग पर आधृत है। इसका मूल लक्ष्य यह है कि भगवान् के पास पहुँचने की अपेक्षा भगवान् को ही पूजक के पास लाने का प्रयत्न किया जाए। तान्त्रिक साधना का दूसरा लक्ष्य है- भक्तों को भगवान् के साथ संयुक्त करना और वास्तव में उनको रूपांतरित कर भगवान् बना देना। मनुष्य विश्वातीत के साथ संबंध रखते हुए विश्व के साथ भी संबद्ध रहता है। तान्त्रिक दर्शन में इस स्थिति को विश्वाहन्ता नाम दिया गया है। यह मानव शरीर विश्व की व्यापक और स्पन्दात्मक शक्तियों का छोटा प्रतिरूप है। इस विश्व के छोटे-बड़े सभी अंशों में ये शक्तियाँ समान रूप से कार्यरत हैं।
आगम और तन्त्रशास्त्र के नाम से अभिहित होने वाले पूरे वाङ्मय में उक्त विषयों का समान रूप से प्रतिपादन किया गया है। केवल इतना ही कहा जा सकता है कि आगम नाम से जानी जाने वाली धारा का प्रादुर्भाव पहले और तन्त्र के नाम से अभिहित होने वाली धारा का प्रादुर्भाव बाद में हुआ। आश्चर्य की बात है कि भारतीय विद्या के प्रायः सभी विद्वानों ने तन्त्रशास्त्र के अध्ययन के प्रसंग में आगम शास्त्र की एकदम उपेक्षा कर दी है। इसीलिये वे अनेक असंगतियों के शिकार हो गये हैं। वस्तुतः कहा जा सकता है कि न केवल तन्त्र शास्त्र ने, अपितु इनसे पहले आगम शास्त्र ने पुराणों पर गहरा प्रभाव डाला और प्रत्यक्ष रूप से तथा पुराणों के द्वारा भी न केवल मध्यकालीन, अपितु बुद्धोत्तरकालीन भारतीय धार्मिक रीतियों तथा व्यवहारों (आचारों) को भी प्रभावित किया। आज के हिन्दू धर्म पर वैदिक धारा की अपेक्षा इस तान्त्रिक साधना पद्धति का अधिक गहरा प्रभाव है।
वैदिक उपासना अभी लुप्तप्राय हो गई है। वैदिक मन्त्रों का अर्थ समझना तो दूर रहा, उनका ठीक तरीके से उच्चारण कर पाना भी कठिन हो गया है। यही स्थिति वैदिक यज्ञ-याग आदि की भी है। उनको जानने वाले अब विरल ही लोग बचे हैं। अभी सर्वत्र तान्त्रिक और पौराणिक साधना पद्धति का ही प्रचार है। पौराणिक पद्धति पर भी तांत्रिक प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है, यह अभी बताया जा चुका है।
इस वाङ्मय की विशालता का कुछ परिचय पर्यायसप्तक शब्द की व्याख्या के अन्तर्गत दिखाये गये विभागों और उपविभागों से मिलता है। साधना पद्धति की विचित्रताओं का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि अकेले शक्तिसंगम तन्त्र में मत, क्रम और मार्ग के भेद से 160 से ऊपर मत-मतान्तरों का उल्लेख मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

तापदुःखता

दार्शनिक दुःखवाद को सिद्ध करने के लिए 2/15 योगसूत्र में जो आधारभूत तथ्य उल्लिखित हैं, ‘तापदुःख’ (= तापहेतुक या तापजनि दुःख) उनमें से एक है : “तापदुःख के कारण सभी दुःख ही हैं”। द्वेषनामक क्लेश (जो दुःख का अनुशयी होता है) द्वारा अभिभूत होकर जो कर्म किया जाता है, वह जिसे कर्माशय को निष्पन्न करता है, वह परपीड़ाकारक कर्मों को करने के लिए प्राणी को प्रेरित करता है। इन कर्मों से बाद में प्राणी को दुःख ही प्राप्त होता है तथा दुःखभोग के समय रागमूलक एवं मोहमूलक कर्म भी अनुष्ठित होते रहते हैं, जो दुःख के कारण होते हैं। यह तापदुःख पूर्व-उत्तर दोनों कालों में दुःख देने वाला होता है। कोई-कोई व्याख्याकार कहते हैं कि तापदुःख का संबंध वर्तमान काल से ही है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तारक ज्ञान

3/33 योगसूत्र में प्रातिभ नामक ज्ञान को सभी सिद्धियों की प्राप्ति कराने वाला कहा गया है। यही ज्ञान ‘तारक’ है, क्योंकि यह संसार से तरने का हेतु है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तीव्र-तीव्र शक्तिपात

परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला अनुग्रहात्मक अंतःप्रेरणा का सर्वोत्कृष्ट प्रकार (देखिएशक्तिपात)। इस उत्कृष्ट शक्तिपात के माध्यम से जीव को सहजता में ही अपने शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण नैसर्गिक स्वभाव का ज्ञान हो जाता है और वह अपने भौतिक शरीर को तत्काल छोड़ देता है और अपनी परिपूर्ण परमेश्वरता को प्राप्त कर लेता है। (तं.आ. 13-920; त. सा. तृ. 120)। इस अत्युत्कृष्ट शक्तिपात का पात्र बना हुआ साधक क्षणभर के लिए भी अपने जीवभाव के आभा समान संकोच को सहन न करता हुआ तत्क्षण सर्वथा मुक्त हो जाता है। (तन्त्रालोक 13-200)। कभी कभी कोई कोई साधक इस प्रकार के शक्तिपात का पात्र बनकर अपने शिवभाव को पूरी तरह पहचानकर कुछ समय के लिए जीवन्मुक्त दशा में भी ठहरा रहता है। कोई चिरकाल तक भी उस अवस्था में ठहरा रहता है। इस तरह से इस शक्तिपात के भी तीन प्रकार माने गए हैं। (तं.आ.13-131; तन्त्र सार पृ. 120)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तीव्र-मंद शक्तिपात

यह मंद शक्तिपात का सर्वोत्कृष्ट प्रकार है। यह परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला अनुग्रहात्मक अंतःप्रेरणा (देखिए शक्तिपात) का वह प्रकार है, जिसके प्रभाव से प्राणी में अपनी शिवरूपता को प्राप्त करने की अपेक्षा ऐश्वर्यमय भोगों को भोगने की इच्छा अधिक प्रबल होती है। ऐसा प्राणी किसी उत्कृष्ट गुरु द्वारा दी गई दीक्षा के सामर्थ्य से ही इस देह का त्याग करने के पश्चात् अपने अभिमत भोगों को भोगने के लिए तदनुकूल लोक को उत्क्रमण कर जाता है। वहाँ इच्छित भोगों को भोग लेने के पश्चात् अपनी शिवरूपता को क्रम से पूर्णतया पहचान लेता है। (तं.सा.पृ. 123, 124; तन्त्रालोक 13-245, 246; तन्त्रालोकविवेक8, पृ. 152)। तीव्र मंद शक्तिपात वाले साधक को भोगों की इच्छा बहुत अधिक नहीं होती है। अतः थोड़े समय में ही उस इच्छा को सफल बनाकर वह मोक्ष के प्रति अग्रसर हो जाता है। उसे इस लोक के गुरु के अनुग्रह से ही मुक्तिलाभ होता है। पुनः किसी अनय गुरु के अनुग्रह की आवश्यकता उसे नहीं पड़ती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तीव्र-मध्य शक्तिपात

यह मध्य शक्तिपात का उत्कृष्ट प्रकार है। इससे साधक को अपने शुद्ध आत्मस्वरूप के प्रति उत्पन्न हुए संशयों को सर्वथा शांत करने के लिए किसी उत्कृष्ट गुरु के पास जाने की उत्कंठा तो होती है परंतु दीक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् भी उसमें इतनी शीघ्रता से अपने शिवभाव का दृढ़ता से निश्चय नहीं हो पाता है। जब उसे बार बार के अभ्यास से अपने शिवभाव का दृढ़तया निश्चय हो भी जाता है तो फिर भी उसे शिवभाव की साक्षात् अनुभूति तब तक नहीं हो पाती जब तक प्रारब्ध कर्मवशात् उसका शरीर टिका रहता है। वह स्फुट अनुभूति उसे देह को त्याग देने पर ही प्राप्त होती है और तभी वह सर्वथा मुक्त हो जाता है। ऐसा साधक पुत्रक दीक्षा का पात्र बनता है। (तं.आ.वि; 8, पृ. 151; तन्त्र सार पृ. 123; तन्त्रालोक 13-240, 241)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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