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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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नकुलीश

पाशुमत मत का संस्थापक।

नकुलीश पाशुपत मत के संस्थापक लकुलीश का ही नामांतर है। शिव पुराण वायवीय संहिता के नौवे अध्याय में तथा कूर्म पुराण के तिरपनवें (53वें) अध्याय में नकुलीश को कलियुग में पाशुपत मत का आदि गुरु बताया गया है। माधवाचार्य ने सर्वदर्शन संग्रह में पाशुपत मत को नकुलीश – मत कहा है। परंतु काशमीर के शैव आगमों के इस मत के संस्थापक को लकुलीश या लाकुल कहा गया है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

नमस्कार

पाशुपत धर्म की विधि का एक अंग।

पाशुपत धर्म के अनुसार नमस्कार महेश्‍वर के प्रति मानसिक नमस्करण होता है। यह नमस्कार मुह से, शब्द विशेष से या शरीर की किसी मुद्रा से नहीं किया जाता है, अपितु पाशुपत योगी को मन ही मन महेश्‍वर के प्रति नमस्करण करके नमस्कार नामक विधि के इस अंग का पालन करना होता हे। ऐसा नमस्कार ही सर्वोत्‍तम नमस्कार होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 14)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

नर तत्त्व

त्रिकशास्त्र की त्रितत्त्व कल्पना में जड़ तत्त्व को नर तत्त्व कहते हैं। नर का अर्थ है मायीय प्रमाता। मायीय प्रमाता या तो स्थूल शरीर को, या प्राण को, या बुद्धि को या शून्य को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में अपना आप समझता है। ये सभी पदार्थ जड़ हैं। अतः इस मायीय प्रमाता को जड़ तत्त्व में गिनते हुए नर तत्त्व कहा जाता है। यह सारा जड़ जगत् भी नर तत्त्व में ही गिना जाता है। इस तरह से जीव और उसका जगत् नर तत्त्व कहलाता है। (पटलत्री.वि.पृ. 73, 74)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नरोपाय

आणवोपाय का एक और नाम। जीव के समेत सभी जड़ तत्वों को त्रिक प्रक्रिया में नर तत्त्व कहते हैं। आणव उपाय में इन तत्त्वों को ही धारणा का आलंबन बनाया जाता है, इस कारण इस उपया को नरोपाय भी कहते हैं। नर तत्त्व का स्फुट आभास इस भूमिका में होता है। आणव योग को भी प्रारंभ में भेद का आश्रय लेकर ही अभ्यास का विषय बनाया जाता है। इस कारण से भी इसे नरोपाय भी कहते हैं। भेदोपाय भी इसका एक और नाम है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नवतत्त्वधारणा

1. आणवोपाय की तत्त्व-अध्वा नामक धारणा में नौ तत्त्वों को आलम्बन बनाकर की जाने वाली साधना। इस धारणा में विज्ञानाकल को आलंबन बनाकर उसी को अकल, मंत्रमहेश्वर, मंत्रेश्वर तथा मंत्र (विधेश्वर) नामक चार प्रमातृ तत्त्वों के रूप में तथा इनकी चार शक्तियों के रूप में देखना होता है। उससे ये आठ तथा आलंबन का स्वरूप सभी एकमात्र शिवरूपतया चमक उठते हैं। उससे साधक को शिवभाव का आणव समावेश हो जाता है। इस धारणा को नवमी विद्या भी कहते हैं। (तं.आ. 10-110 से 113, 125, 126)।
2. आणवोपाय की तत्त्व अध्वा नामक धारणा का ही एक और प्रकार, जिसमें प्रकृति, पुरुष, नियति, काल, माया, विद्या, ईश्वर, सदाशिव तथा शिव नामक नौ तत्त्वों को क्रम से साधना का आलंबन बनाते हुए साधक अपने शिवभाव के समावेश में प्रवेश पाता है। (तं.सा.टि.पृ. 111)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नवमुण्डी आसन

कुशासन, कम्बल, गलीचा, अजिन (मृगचर्म), व्याघ्रचर्म आदि आसनों से सभी परिचित हैं, सुखदायक आसन पर बैठकर योगांग आसन का अनायास अभ्यास किया जा सकता है एवं उससे प्राणायाम और चित्त की एकाग्रता सहज सिद्ध हो सकती है। शक्तिसंगमतन्त्र के द्वितीय ताराखण्ड (4/27) में 32 प्रकार के आसनों का उल्लेख है। उनमें से मृदु, समारूढ़, कोमल, अचूलक, योनित्वक्, विष्टर, अस्थिमूमि, कुश, सुरत, मुण्ड, पंचमुण्ड, त्रिमुण्ड, एकमुण्ड, चिता, श्मशान, शव, मृत महाशव, वीर, महावीर और योनि नामक आसनों का वहाँ (2/9/2-6) नामोल्लेख किया गया है। नवम और दशम पटल में मुण्डरहस्य तथा कालिका परिशिष्ट के आधार पर कुछ विशिष्ट आसनों का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है। इसी तरह से 20, 27, 47-50, 60, 67-68, 71 पटलों में इन्ही में से कुछ आसनों का विस्तृत परिचय मिलता है। अन्त में बताया गया है कि इन आसनों की भी संख्या 84 होती है।
यहाँ यह अवश्य जान लेना चाहिये कि योगशास्त्र में वर्णित आसनों से ये सर्वथा भिन्न हैं। योगासनों से शरीर की विभिन्न स्थितियों में सुविधाजनक स्थिरता प्राप्त की जाती है, जब कि प्रस्तुत आसनों का उपयोग साधना में बैठते समय स्थिर और सुखदायक आधार के रूप में किया जाता है। बंगदेश में एकमुण्डी, त्रिमुण्डी और पंचमुण्डी आसन तन्त्रसाधना में प्रसिद्ध हैं। परमहंस रामकृष्ण, साधक रामप्रसाद, कमलाकान्त आदि ने पंचमुण्डी आसन पर बैठकर ही सिद्धि प्राप्त की थी। इस समय भी बंगदेश तथा काशी प्रभृति स्थानों में भी किसी न किसी साधक का पंचमुण्डी आसन प्रसिद्ध है।
नवमुण्डी आसन का रहस्य अब तक रहस्य ही बना हुआ था। परमाराध्यपाद श्री श्री विशुद्धानन्द परमहंस द्वारा श्री काशीधाम स्थित अपने आश्रम में श्री श्री नवमुण्डी आसन की स्थापना होने के अनन्तर आध्यात्मिक मात्रा में इस आसन का रहस्य कुछ-कुछ उन्मीलित हुआ। इस नवमुण्डी आसन के आध्यात्मिक रहस्य को समझाने का प्रयत्न स्वयं श्रद्धैयचरण गुरुप्रवर श्री श्री गोपीनाथ कविराज महोदय ने अपने ग्रन्थ ‘तान्त्रिकवाङ्मय में शाक्तदृष्टि’ के ‘श्री श्री नवमुण्डी महासन’ शीर्वक निबन्ध (पृ. 261-278) में किया है। जिज्ञासु जनों को इस रहस्य को वहीं समझने का प्रयत्न करना चाहिये।
Darshana : शाक्त दर्शन

नाडी

तोडलतन्त्र (8/1) में बताया गया है कि मानव देह में साढ़े तीन करोड़ नाडियाँ हैं। शारदातिलककार (1/39-43) इस देह को अग्नीषोमात्मक मानते हैं, क्योंकि देह का कारणभूत शुक्लबिन्दु अग्निस्वरूप और रक्त बिन्दु सोमात्मक है। इसका दक्षिण भाग सूर्यात्मक और वाम भाग सोमात्मक है। इसमें अनन्त नाडियों का निवास है। इनमें दस नाडियाँ मुख्य हैं और उनमें भी तीन नाड़ियाँ प्रधान हैं। शरीर के वाम भाग में इडा, मध्य में सुषुम्णा और दक्षिण में पिंगला नाडी स्थित है। इन तीन नाडियों में भी मध्य नाडी सुषुम्णा मुख्य हैं। यह अग्निषोमात्मक है। इनके अतिरिक्त गान्धारी, हस्त-जिह्वा, पूषा, अलम्बुषा, यशस्विनी, शंखिनी और कुहू ये सात नाडियाँ और हैं। इस तरह से इनकी संख्या दस हो जाती है। नैत्रतन्त्र (7/1-5) की टीका में क्षेमराज ने भी इन्हीं दस नाडियों की नामावली दी है। अन्तर केवल इतना है कि वहाँ यशस्विनी को यशा कहा गया है। ज्ञानसंकलिनी तन्त्र (76 श्लो.) में भी इसका यश ही नाम है।
शारदातिलक के टीकाकार राघवभट्ट शरीर के विभिन्न संस्थानों में इनकी स्थिति और स्वरूप का वर्णन करते हैं। वह यह भी कहते हैं कि अन्य आचार्य इनके अतिरिक्त पयस्विनी, वारणा, विश्वोदरी और सरस्वती इन चार नाडियों को भी प्रधान मान कर इनकी संख्या 14 बताते हैं। तोडलतन्त्र (8/5-6) में 11 नाडियाँ प्रदर्शित हैं। उनके नाम हैं – इडा, पिंगला, सुषुम्ना, चित्रिणी, ब्रह्मनाडी, कुहू, शंखिनी, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, नर्दिनी और निद्रा। इनमें से चित्रिणी, ब्रह्मनाडी, नर्दिनी और निद्रा को छोड़कर बाकी नाम पूर्वोक्त ही हैं। संगीतदर्पण में सुषुम्णा, इडा, पिंगला, कुहू, पयस्विनी, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, वारणा और यशस्विनी नाडियाँ वर्णित हैं। इनमें पयस्विनी और वारणा नाडियों के नाम 14 नाडियों में समाविष्ट हैं।
पांचरात्र आगम की पारमेश्वर संहिता (3/90-106) में नाडी चक्र का वर्णन करते हुए बताया गया है कि शरीर में 72 हजार नाडियाँ विद्यमान हैं। ये सब आग्नेय, सौम्य और सौम्याग्नेय वर्ण में विभक्त हैं। आग्नेय नाडियाँ ऊर्ध्वमुख, सौम्य नाडियाँ अधोमुख और सौम्याग्नेय नाडियाँ तिरछी हैं। इन नाडियों में दस नाडियाँ प्रधान हैं। इनके नाम हैं – इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और कोशिनी। इनमें से कोशिनी नाम अन्यत्र नहीं आया है। इडा, पिंगला और सुषम्ना नामक प्रमुख नाड़ियों का विवरण अलग से दिया गया है। सुषुम्ना नाडी के अग्र भाग में गान्धारी और हस्तिजिह्वा नाडियाँ कन्द देश के वाम और दक्षिण भाग से उठकर नेत्रपर्यन्त तथा पूषा और यशस्विनी नाडियाँ सुषुम्ना नाडी के पृष्ठ भाग से कन्द देश से उठकर वाम और दक्षिण कर्णपर्यन्त स्थित हैं, अलम्बुषा नाडी कन्द से पादमूल, पर्यन्त, कुहू मेढ़ के अन्तिम भाग में और कोशिनी पैर के अंगूठे में स्थित है। गान्धारी का वर्णपीत, हस्तिजिह्वा का कृष्ण, पूषा का कृष्णपीत, यशस्विनी का श्याम, अलम्बुषा का चितकबरा, कुहू का अरुण और कोशिनी का वर्ण अंजन के समान है। इन दस नाडियों में यहाँ दस प्राणों की भी स्थिति बताई गई है। इडा नाडी प्राण की, गान्धारी अपान की, अलम्बुषा समान की, कुहू व्यान की, सुषुम्ना उदान की, पिंगला नाग की, पूषा कूर्म की, यशस्विनी कृकर को, हस्तिजिह्वा देवदत्त की और कोशिनी धनंजय नामक पवन की वाहिका है। इस संहिता में इस तरह से दशविध प्राणों का और साथ ही इनके वर्णों का भी वर्णन किया गया है।
पारमेश्वर संहिता के ही समान नेत्रतन्त्र (7/1-5) के व्याख्याकार क्षेमराज भी दस नाडियों का उक्त दशविध प्राणों से संबंध बताते हैं। पारमेश्वर संहिता के ही समान शारदातिलक के टीकाकार ने भी योगार्णव नामक ग्रन्थ के प्रमाण पर इन दशविध नाडियों के स्थान और वर्ण का वर्णन किया है, किन्तु इनमें कोई समानता नहीं है। यहाँ गान्धारी की स्थिति इडा के पृष्ठ भाग में पाद से नेत्र पर्यन्त मानी गई है और इसका वर्ण मयूर के कण्ठ के समान चितकबरा है। इडा के अग्र भाग में उत्पल वर्ण हस्तिजिह्वा नाडी वाम भाग में सिर से पादांगुष्ठ पर्यन्त है। नीलमेघ सदृश पूषा नाडी पिंगला के पृष्ठ भाग में दक्षिण भाग के नेत्रान्त से पादतल पर्यन्त स्थित है। पीत वर्ण अलम्बुषा कण्ठ के मध्य में और शंख वर्ण यशस्विनी पिंगला के पूर्व देश में है। शंखिनी सुवर्ण वर्ण की है और इसकी स्थिति गान्धारी और सरस्वती के मध्य भाग में है। शरीर के वाम भाग में पैर से लेकर कर्ण पर्यन्त और दक्षिण भाग में पादांगुष्ठ से लेकर शिरोभाग पर्यन्त कुहू नाडी स्थित है।
श्रीतत्त्वचिन्तामणि (6/1-4) में षट्चक्र का निरूपण करते समय नाडियों के संबंध में बताया है कि मेरुदण्ड के बाहर वाम भाग में चन्द्रात्मक इडा और दक्षिण भाग में सूर्यात्मक पिंगला नाडी अवस्थित है तथा मेरुदण्ड के मध्य भाग में वज्रा और चित्रिणी नाडी से मिली हुई त्रिगुणात्मिका सुषुम्ना नाडी का निवास है। इनमें सत्वगुणात्मिका चित्रिणी चन्द्र रूपा, रजोगुणात्मिका वज्रा सूर्य रूपा और तमोगुणात्मिका सुषुम्ना नाडी अग्नि रूपा मानी गई है। यह त्रिगुणात्मिका नाडी कन्द के मध्य भाग से सहस्त्रार पर्यन्त विस्तृत है। इसका आकार खिले हुए धतूरे के पुष्प के सदृश है। इस सुषुम्ना नाडी के मध्य भाग में लिंग से सिर तक दीपशिखा के समान प्रकाशमान वज्रा नाडी स्थित है। इस वज्रा नाडी के मध्य में चित्रिणी नाडी का निवास है। यह प्रणव से विभूषित है और मकड़ी के जाले के समान अत्यन्त सूक्ष्म आकार की है। योगीगण ही इसको अपने योगज ज्ञान से देख सकते हैं। मेरु दण्ड के मध्य में स्थित सुषुम्ना और ब्रह्मनाडी के बीच में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञा चक्रों को भेदकर यह नाडी सहस्त्रार चक्र में प्रकाशमान होती है। इस चित्रिणी नाडी के बीच में शुद्ध ज्ञान को प्रकाशित करने वाली ब्रह्म नाडी स्थिति है। यह नाडी मूलाधार स्थित स्वयंभू लिंग के छिद्र से सस्त्रार में विलास करने वाले परम शिव पर्यन्त व्याप्त है। यह नाडी विद्युत् के समान प्रकाशमान है। मुनिगण इसके कमलनाल स्थित तन्तुओं के समान अत्यन्त सूक्ष्म आकार का मानस प्रत्यक्ष ही कर सकते हैं। इस नाडी के मुख में ही ब्रह्म द्वार स्थित है और इसी को योगी गण सुषुम्ना नाडी का भी प्रवेश द्वार मानते हैं।
इनके अतिरिक्त शास्त्रों में प्राणवहा, मनोवहा, अश्विनी, गुह्यिनी, चित्रा, वारुणी, शूरा, नैरात्म्ययोगिनी प्रभृति नाडियों का भी वर्णन मिलता है। इनका विवरण “तान्त्रिक साधना और संस्कृति” नामक ग्रन्थ के द्वितीय खण्ड में 17, 139, 263, 291-292 पृष्ठों पर देखना चाहिये। वहाँ (पृ. 263) बताया गया है कि सहजियों की सांकेतिक भाषा में सभी नाड़ियों को ‘योगिनी’ कहा जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

नाडी संधान

अपनी शुद्ध स्वरूपता का आवेश प्राप्त करने के लिए साधक जब अपनी द्वैतपरक भिन्न भिन्न मनोवृत्तियों को इडा आदि नाडीत्रय (देखिए) में शांत करने से पूर्व जो अभ्यास करता है उसे नाडी संधान कहते हैं। रेचक द्वारा बाह्य द्वाद्वशांत (देखिए) में स्थिति होने के पश्चात् कुंभक द्वारा आंतर द्वाद्वशांत (देखिए) में स्थिति प्राप्त करके साधक जब अपने हृदय में ही विश्रांति प्राप्त करता है तो उसे नाड़ी संधान कहते हैं। इस अभ्यास से वह नाडीत्रय में प्रवेश पाने के योग्य बन जाता है। (स्वत्रतं. पटल 3-52,53; वही उ.पटल3 पृ. 180)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नाड़ीत्रय

मेरुदंड में स्थित सुषुम्ना, पिंगला तथा इड़ा नामक तीन नाड़ी स्वरूप मार्ग जिन्हें क्रमशः इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया प्रधान माना गया है। इन्हें क्रमशः वह्नि, सूर्य तथा सोमात्मक भी माना जाता है। सुषुम्ना मेरुदंड के मध्य में, पिंगला दाईं ओर तथा इड़ा बाईं ओर स्थित होती है। (स्व.तं. पटल 2.250; स्व.तं.उ.प 2. पृ. 133, 134)। परंतु स्वच्छंद तंत्र में ही पिंगला को मध्यमा नाड़ी भी माना गया है। (स्व.तं.पटल 3-22, 149)। धारणा भेद के कारण ऐसा कहा गया है। ये नाडियाँ भी तो धारणा का विषय बनती ही हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नाड़ीशुद्धि

प्राणायाम विशेष के अभ्यास से नाडियों में जो शुद्धि होती है, वह नाडीशुद्धि कहलाती है। मल के कारण शरीर योगाभ्यास के लिए समर्थ नहीं होता या अत्यल्प योगाभ्यास से ही कातर हो जाता है। शीत, ग्रीष्म, जल, हवा आदि से अत्यधिक पीड़ित होते रहना भी नाडीगत मल के कारण होता है। विभिन्न प्रकार के प्राणायामों द्वारा नाडीशुद्धि होने पर शरीर रोगहीन, उज्जवलकान्तिमय, लघुतायुक्त, सौम्यदर्शन होता है। नाडी शुद्धिकारक प्राणायामों का विशद विवरण हठयोग के ग्रन्थों में (हठयोगप्रदीपिका, घेरण्डसंहिता आदि में) मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

नाडीसंहार

इडा, पिंगला एवं सुषुम्ना नामक तीन नाडियों का आधार प्राण, अपान नामक प्राणवायु को माना गया है तथा इस प्राणवायु के आधार को चिद्विभु कहते हैं। इस प्रकार चिदाकाश को तीनों नाडियों का मुख कहा जाता है। साधक भिन्न भिन्न अभ्यासों द्वारा प्राणवायु से उद्भूत सभी वृत्तियों को इन नाडियों में लीन करता है। इस अभ्यास में स्थिति हो जाने पर तीनों नाडियों को शांत हुई वृत्तियों समेत चिदाकाश में विलीन कर देने को नाडी संहार कहते हैं। (शि.सू.वा.पृ. 48)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नाद

प्रपंचसार, शारदातिलक, रत्नत्रय प्रभृति ग्रन्थों में नाद और बिन्दु को शिव और शक्ति से उसी तरह से अभिन्न माना गया है, जैसे कि प्रकाश और विमर्शात्मक शिव तथा शक्ति से शब्द और अर्थ को अभिन्न माना गया है। प्रणव की 12 कलाओं में भी बिन्दु और नाद की स्थिति है। आगम और तन्त्र की विभिन्न शाखाओं में नाद और बिन्दु की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हैं। विज्ञानभैरवोद्द्योत (पृ. 3) और स्वच्छन्दोद्द्योत (1/3; पृ. 6 ) में ‘अदृष्टविग्रहात’ प्रभृतिश्लोक उद्धृत है। कुछ पाठ भेदों के साथ यह स्वच्छन्दतंत्र (8/27-28), श्रीकण्ठीसंहिता (स्वच्छन्दोद्द्योत, वहीं, पृ. 19) और पौष्करागम (श.र.सं., पृ. 7) में उपलब्ध होता है। इस श्लोक के प्रमाण पर इन सभी स्थलों में शास्त्रों की नादरूपता का प्रतिपादन किया गया है।
नादकारिका (श.र.सं., पृ. 40) में नाद को मालिनी, महामाया, समना, अनाहत बिन्दु, अघोषा वाक् और ब्रह्मकुण्डलिनी बताया है। नादभट्टारक और प्राणशक्ति के नदन व्यापार को भी नाद कहा जाता है। ‘हकारस्तु स्मृतः प्राणः स्वप्रवृत्तो हलाकृतिः’ (4/257) स्वच्छन्दतन्त्र के इस वचन के अनुसार स्वाभाविक रूप से निरन्तर नदन करने वाले हलाकृति प्राण को ही हकार कहा गया है। अनच्क हकार की आकृति वाले प्राण का यह नदन व्यापार ही हंसोच्चार कहलाता है। इसी को अनाहत ध्वनि अथवा नादभट्टारक भी कहा जाता है। भट्टारक शब्द अतिशय आदर का सूचक है। यह नादभट्टारक शब्द ब्रह्म का ही व्यापार है। यह दस प्रकार का होता है।
तन्त्रालोक (5/59) में ब्रह्मयामल के प्रमाण पर दस प्रकार के राव का प्रतिपादन किया गया है। टीकाकार जयरथ ने (खं. 3 पृ. 410) राव शब्द को नाद का पर्यायवाची मानकार दस प्रकार के नाद का परिचय दिया है। स्वच्छन्दतन्त्र (11/6-7) में इसके आठ भेद माने गये हैं। क्षेमराज ने अपनी टीका में धर्मशिवाचार्य की पद्धति को उद्धृत कर इनका विवरण दिया है। अर्थरत्नावली (पृ. 36) में उद्धृत संकेत पद्धति में भी अनाहत नाद के आठ ही भेद माने गये हैं। स्वच्छन्दतन्त्र (11/7) में महाशब्द के नाम से नवम नाद भी माना गया है। अर्थरत्नावली (पृ. 36) में उद्धृत हंसनिर्णय में नवम नाद को निर्विशेष विशेषण दिया गया है।
दस प्रकार के नाद में धारणा, ध्यान और समाधि का अभ्यास करने पर योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भली-भांति समझ लेता है। वह यह जान लेता है कि शब्दब्रह्म से ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी – इन चार प्रकार की वाणियों का विकास होता है। यह नाद तत्त्व परा और पश्यन्ती के क्रम से विकसित होता हुआ मध्यमा में आकर योगाभ्यास द्वारा श्रवणेन्द्रिय के अन्तर्मुख होने पर सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखता की ओर बढ़ते-बढ़ते, अर्थात् इस नाद के सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम स्वरूप का अन्वेषण करते-करते योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भली-भांति समझने में समर्थ हो जाता है, निष्णात हो जाता है। शब्द ब्रह्म के स्वरूप को ठीक से पहचान लेने पर साधक अनायास परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् इस निरन्तर नदन करती अनाहत ध्वनि में चित्त को एकाग्र कर लेने पर योगी का परमाकाश स्वभाव, चिदाकाशमय प्रकाशात्मक स्वरूप प्रकट हो जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

नाद

1. अव्यक्त ध्वनि। हकारात्मक अवाहत ध्वनि। पर बीज। भ्रूमध्य में अभिव्यक्त होने वाला हंस स्वरूप बीज। (स्व.तं.उ.खं. 2, पृ. 161, 164; तन्त्रालोकविवेक2 पृ. 193)।
2. अपने शुद्ध संवित् स्वरूप में ही अभेद रूप से होने वाले समस्त प्रपंच के परामर्श को भी नाद कहते हैं।
3. परिपूर्ण स्वातंत्र्य से युक्त तथा परिपूर्ण कर्तृत्व लक्षणों वाले शुद्ध विमर्श को भी नाद कहते हैं। (तं.आ.वि. 5 पृ. 194)।
4. नाद वाणी का निर्विकल्पक रूप होता है। (स्व.तं.पटल 4 पृ. 162)।
5. हकारात्मक शक्ति को भी नाद कहते हैं। (तं.आ.वि. 2, पृ. 193)।
6. सदाशिव दशा से भी परे रहने वाले स्वात्म विमर्श को भी नाद कहते हैं।
7. प्रणव उपासनारूपी योग की सातवीं कला को भी नाद कहा जाता है। इस प्रकार से नाद शब्द का प्रयोग शैव शास्त्र में अनेकों अर्थो में हुआ है। नाद का विशेष अर्थ स्वात्म विमर्श है। उसी को इस शास्त्र में शब्द तत्त्व कहा गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नाद (प्रणव कला)

त्रिकयोगमयी प्रणव की उपासना में अकार, उकार, मकार, बिंदु, अर्धचंद्र के अनंतर योगियों के साक्षात्कार में अभिव्यक्त होने वाली (प्रणव की) सातवीं कला का नाम भी नाद है। बिंदु का उच्चारण काल आधी मात्रा, अर्धचंद्र का एक चौथाई मात्रा, निरोधी का 1/8 मात्रा और नाद का 1/16 मात्रा होता है। शिवयोगियों की अवधानमयी दृष्टि इतनी पैनी बन जाती है कि प्रणव की ध्वनि की गूंज का इतना सूक्ष्म विश्लेषण कर पाती है। (स्व.तं.पटल 4-258, 259)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नादानुसन्धान

लययोग के प्रसंग में बताया गया है कि लय नाद पर आश्रित है, अतः लययोग की सिद्धि के लिये नाद का अनुसंधान आवश्यक है। आदिनाथ ने चित्त के लय के सवा करोड़ उपाय बताये हैं, उनमें नादानुसन्धान ही प्रमुख है। इसके लिये साधक को चाहिये कि वह सुखपूर्वक आसन पर बैठकर शारीरिक शाम्भवी मुद्रा के माध्यम से अन्तर्मुख होकर दाहिने कान से अन्तःस्थ नाद का श्रवण करे। ऐसा करते समय उसको कान, आँख, नाक और मुँह को अंगूठे और अंगुलियों की सहायता से बन्द कर लेना चाहिये। इस अभ्यास के सिद्ध हो जाने पर उसको सुषुम्ना मार्ग में नदन करता हुआ नाद सुनाई पड़ने लगता है। इसकी आरम्भ, घट, परिचय और निष्पत्ति नामक चार अवस्थाएँ होती हैं। निष्पत्ति अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते योगी अखण्ड आनन्द का अनुभव करने लगता है। मुक्ति होती हो अथवा न होती हो, किन्तु नादानुसन्धान प्रयत्न की निष्पत्ति दशा तक पहुँच जाने पर योगी को इसी शरीर में अखण्ड आनन्द की अनुभूति होने लगती है।
योगी को चाहिये कि कान बन्द कर वह जिस नाद को सुनता है, उसमें अपने चित्त को स्थिर करने का अभ्यास करे। ऐसा करने से उसकी चित्त-वृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है, वह बाहरी कोलाहल को नहीं सुनता। नादानुसन्धान की प्रारंभिक दशा में उसे नाना प्रकार की समुद्र, बादल, मर्दल, शंख, घंटा, किंकिणी, वंश, वीणा, भ्रमर आदि की ध्वनि सुनाई पड़ती है और उसकी चित्त-वृत्ति सूक्ष्म से सूक्ष्मतर नाद की ओर उन्मुख होती जाती है। नाद की जिस किसी अवस्था में योगी का मन रमता हो, उसी का वह अभ्यास करे। इस नादानुसन्धान की प्रक्रिया के अन्त में उसी नाद के साथ साधक का चित्त लीन हो जाता है। मकरन्द का पान करने वाला भ्रमर जैसे गन्ध की अपेक्षा नहीं रखता, उसी तरह से नाद में लीन हुआ चित्त फिर विषयों की ओर नहीं लौटता। इस नादानुसन्धान की प्रक्रिया का वर्णन हठयोगप्रदीपिका प्रभृति ग्रन्थों में मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

नामलीला

नामरूपात्मक भगवान् की दो लीलाओं में एक लीला नामलीला है। इस नामलीला के अंतर्गत ही वेद सहित संपूर्ण शब्दात्मक लीलायें समाविष्ट हैं। रूपलीला के समान ही नामलीला भी प्रपञ्च के अंतर्गत ही है और भगवान् द्वारा की गयी है (अ.भा.पृ. 63)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

नारायण

नार अर्थात् जीव समूह को प्रेरित करने वाला या जीव समूह में प्रविष्ट हुआ परमात्मा नारायण है। अथवा सब कुछ जिसमें प्रविष्ट हो, ऐसा जो जगत का आधार है, वह नारायण है।
“नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः।
तस्य तान्ययनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।। अथवा
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
तस्य ता अयनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।। (भ.सु.11 टी. पृ. 218/480)
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

नासा

अंतर्द्वाद्वशांत। नासिका के द्वार के बारह अंगुल भीतर अपान का विश्रांति स्थान। (शि.सू.वा.पृ. 86)। देखिए द्वाद्वशांत (आंतर)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नि:शून्य-वस्तु

देखिए ‘सर्वशून्य-निरालंब’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

निग्रह कृत्य

विधान कृत्य। शुद्ध स्वरूप को छिपा लेने की पारमेश्वरी लीला। देखिए विधान कृत्य।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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