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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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पंच कला

देखिए कला (पंचक)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंच कारण

देखिए कारण पंचक।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंच कृत्य

परमेश्वर की पारमेश्वरी लीला के पाँच अंग। वे हैं – सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान (निग्रह) और अनुग्रह। इन्हीं कृत्यों की लीला को करते रहने से वह परमेश्वर है। ये कृत्य ही उसकी परमेश्वरता की अभिव्यक्ति के पाँच अंग हैं। मूलतः ये पाँचों कृत्य उसी के हैं। उसी की इच्छा के अनुसार इन कृत्यों को इस स्थूल जगत् में क्रम से ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव नामक पाँच कारण आगे आगे निभाते रहते हैं। (देखिएना.वि. 4-81; शि.स्तो. 1-3)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंच तत्त्व धारणा

पाँच तत्त्वों को आलंबन बनाकर की जाने वाली आणवोपाय के तत्त्वाध्वा में एक विशेष धारणा। इसे पंचमी विद्या भी कहते हैं। इस धारणा में अकल तथा मंत्र महेश्वर नामक दो प्रमातृ तत्त्वों तथा इनकी दो शक्तियों को मिलाकर सभी चार तत्त्वों को धारणा का आलंबन बनाते हुए उन्हें मंत्रेश्वर के स्वरूप में देखते हुए और इन्हें उसी के शुद्ध रूप का विस्तार समझते हुए भावना द्वारा व्याप्त किया जाता है। इस अभ्यास से मंत्रेश्वर परिपूर्ण परम शिवरूप में ही अभिव्यक्त हो जाता है और उसकी ऐसी अभिव्यक्ति के अभ्यास से परिपूर्ण शिवभाव का आणव समावेश साधक को हो जाता है। (तन्त्रालोक 10-112, 113, 125 से 127)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंच मंत्र

स्वच्छंदनाथ के ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव तथा अघोर (यथास्थान देखिए) नामक पाँच मंत्रात्मक शरीरों को पंचमंत्र कहते हैं। (देखिएपंच वक्त्र)। स्वच्छंदनाथ के ये पाँच शरीर मंत्र अर्थात् विद्येश्वर स्तर के देवता होते हैं। उनके इन शरीरों में प्रकट होकर संसार का कल्याण करने के स्वभाव को ही उनके पाँच मुख अभिव्यक्त करते हैं। सभी शिव आगमों, रुद्र आगमों और भैरव आगमों का उपदेश इन्हीं पंचमंत्रों ने विविध रूपों में ठहर कर किया है। (मा.वि.वा. 0 1-251-257)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंच वक्त्र

परमेश्वर के पर स्वरूप को अभिव्यक्त करने वाली तथा संसार का त्राण करने वाली उसकी चित्, निर्वृत्ति (आनंद), इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया नामक पाँच अंतरंग शक्तियाँ ही उसके पाँच मुख कहे जाते हैं। (स्व.तं.उ. प 2, पृ. 54)। उसकी ये पाँच शक्तियाँ या मुख जब अभेदात्मक, भेदाभेदात्मक तथा भेदात्मक शैवशास्त्र का उपदेश करने के लिए क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव तथा अघोर नामक पाँच मुख वाले स्वच्छंदनाथ के रूप में प्रकट हो जाती हैं तब स्वच्छंदनाथ के उस पाँच मुखों वाले शरीर को भी पंचवक्त्र कहते हैं। इन सशरीर पाँच रूपों को पंचमंत्र भी कहते हैं। (तं.आ.वि. 1-18)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंच शक्ति

परमशिव की चित्, निर्वृत्ति (आनन्द), इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया (यथास्थान देखिए) नामक पाँच मूलभूत अंतरंग शक्तियाँ। इन्हीं पाँच शक्तियों से परमेश्वर अपनी परमेश्वरता को निभाता रहता है। ये शक्तियाँ उसका स्वभाव हैं। इन्हीं के बल से वह परमेश्वर है। परमशिव के इस पाँच शक्तियों की अभिव्यक्ति से युक्त रूप को पंच वक्त्र (देखिए) भी कहा जाता है। (स्व.तं.उ. 92, पृ. 54, तं.सा. पृ.6)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंचकंचुक

सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबौधः (12/33) प्रभृति वायपुराण के श्लोक में शिव के सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतन्त्रता, अलुप्तशक्तिता और अनन्तशक्तिता ये छः गुण गिनाये गये हैं। अद्वैत सिद्धान्त के अनुसार जीव शिव से अभिन्न हैं, किन्तु माया के कारण उसका स्वरूप संकुचित हो जाता है और इसके बाद कला, विद्या, राग, काल और नियति तत्त्वों के कारण क्रमशः उसकी सर्वकर्तृता, सर्वज्ञता, नित्यपरिपूर्णतृप्तिता, नित्यता और स्वतन्त्रता – ये पाँच शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं (द्रष्टव्य-सौ.सु., 1/32-39)। अतः इन पाँचों तत्त्वों को पंचकंचुक कहा जाता है। माया का भी इसमें समावेश कर कुछ आचार्य कंचुकों की संख्या छः मानते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

पंचकला विधि/धारणा

आणवोपाय की कलाध्वा नामक धारणा में छत्तीस तत्त्वों को व्याप्त करने वाले पंच कला वर्ग को आलंबन बनाकर की जाने वाली साधना को पंचकला विधि या धारणा कहते हैं। इस धारणा में निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शांता तथा शांत्यातीता नामक पाँच कलाओं को क्रम से धारणा का आलंबन बनाते हुए उन्हें अपने ही स्वरूप से भावना द्वारा व्याप्त करके अपने शिवभाव के समावेश में प्रवेश किया जाता है। (तं.सा.पृ. 110-111)। एक एक कला को भावना द्वारा परिपूर्ण स्वात्म-रूपतया पुनः पुनः देखते रहने से भी कलाविधि का अभ्यास त्रिकयोग में किया जाता है। उससे भी साधक को आणव समावेश हो जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंचकृत्य

शैव और शाक्त दर्शन में शिव को पंचकृत्यकारी बताया गया है। सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान, और अनुग्रह ये शिव के पाँच कार्य हैं। शिव की तिरोधान शक्ति के कारण जीव अपने परमार्थ स्वरूप को भूल बैठता है और उसका अनुग्रह होने पर, जिसको कि आगम की भाषा में शक्तिपात कहा जाता है, वह अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। शिव के इन दो व्यापारों की तुलना वेदान्त दर्शन के अध्यारोप और अपवाद शब्दों से की जा सकती है। आभासन, रक्ति, विमर्शन, बीजावस्थापन और विलापन नामक पंचकृत्यों का प्रतिपादन प्रत्यभिज्ञाहृदय (सू. 11) में किया गया है। शक्तिपात दशा में परिच्छिन्न प्रमाता में भी इन कृत्यों की अभिव्यक्ति मानी गई है। इनके अतिरिक्त क्रम दर्शन में सृष्टि, स्थिति, संहार, अनाख्या और भासा नामक पंचकृत्य प्रतिपादित हैं। इनकी व्याख्या अलग से की है।
Darshana : शाक्त दर्शन

पंचदश तत्त्व धारणा (पाँच दशी विद्या)

पृथ्वी तत्त्व को साधना का आलंबन बनाकर सातों प्रमातृ वर्गो और उनकी सात शक्तियों का उसी के भीतर भावना से देखने के अभ्यास को पंचदश तत्त्वधारणा या पाँचदशी विद्या कहते हैं। पृथ्वी के स्वरूप में ही शेष चौदह तत्त्वों को विलीन करने वाली यह आणवोपाय के तत्त्वाध्वा की एक विशेष धारणा है। इसमें अकल, मंत्रमहेश्वर, मंत्रेश्वर, मंत्र (विद्येश्वर), विज्ञानाकल, प्रलयाकल तथा सकल नामक सात प्रमाताओं को और उनकी सात शक्तियों को भी साधनाकाय आलंबन बनाया जाता है। इस अभ्यास की दृढ़ता पर साधक अपनी शिवता के आणव समावेश में प्रवेश करता है। (तं.आ.10-6 से 17; वही वि.वृ. 79, 80; मा.वि.तं. 2-2)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पंचपर्वा विद्या

विद्या के पाँच पर्व हैं – वैराग्य, सांख्य, योग, तप और केशव में भक्ति। वैराग्य के बिना विद्या का अंकुरण भी संभव नहीं है। सांख्यशास्त्र भी विद्या का स्थान है। योग साधना और तप भी विद्या के पर्व हैं। केशव में भक्ति तो विद्या का सर्वोत्तम साधन है (त.दी.नि.पृ. 144)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पंचम

भगवान् शिव के ईशानमुख से पंचवक्‍त्र गणाधीश्‍वर का प्रादुर्भाव बताया जाता है। इस गणाधीश्‍वर के पाँचों मुखों से एक-एक महापुरुष प्रकट हुये। उनके नाम हैं- ‘मखारि’, ‘कालारि’, ‘पुरारि’, ‘स्मरारि’ और ‘वेदारि’। इन्हीं को ‘पंचम’ कहते हैं। इनमें प्रत्येक पंचम से बाहर-बारह उपपंचमों की उत्पत्‍ति बतायी जाती है।

वीरशैव संप्रदाय में ‘पंचम’ नाम की एक जाति भी है। बताया जाता है कि इस जाति के सभी व्यक्‍ति उन मूल पंचमों और उपपंचमों के वंश में उत्पन्‍न हुये हैं। मूल पुरुष के नाम से ही इनकी जाति का नाम भी पंचम है। इनको व्यवहार में ‘पंचमशाली’ कहा जाता है। वीरशैव धर्म के जो प्रमुख पाँच आचार्य हैं, जिन्हें पंचाचार्य’ कहते हैं, वे यही इन पंचमों के गुरु होते हैं। पंचम जाति में उत्पन्‍न प्रत्येक व्यक्‍ति के गोत्र, सूत्र, प्रवर, शाखा आदि अपने-अपने गुरु के अनुसार होते हैं। इन पंचमों का वैवाहिक संबंध समान गोत्र वालों में न होकर अपने से भिन्‍न गोत्र-सूत्र वालों के साथ किया जाता है (वी.स.सं. 5/4-55)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचमंत्र

शिव के पाँच स्वरूप।

पाशुपत शास्‍त्र में शिव के मुख्य पाँच स्वरूप माने गए हैं। वे हैं- सद्योजात, कामदेव, अघोर, तत्पुरुष तथा ईशान। (देखिए पा.सू. तथा ग.का.)। इस ‘मंत्र’ पद की व्याख्या पाशुपत शास्‍त्रों में भी नहीं मिलती है और सिद्‍धांत शैव शास्‍त्रों में भी नहीं। काश्मीर शैव शास्‍त्र के अनुसार भेदभूमिका पर उतरे हुए शिव के पाँच दिव्य रूपों को पञ्‍चमंत्र कहा जाता है। इन पाँच रूपों के समष्‍टि स्वरूप शिव को स्वच्छनाद कहते हैं, जो पंचमुख हैं और जिसके उन मुखों के नाम ईशान, तत्पुरुष आदि हैं। मंत्र शब्द का तात्पर्य है भेद भूमिका पर उतरा हुआ शुद्‍ध प्रमाता।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

पंचमावस्था

पाशुपत साधक की एक उत्कृष्‍टतर अवस्था।

पाशुपत साधना की इस अवस्था में साधक साधना पूर्ण कर चुका होता है तथा उसका स्थूल शरीर शेष नहीं रहता है, अतः जीविका के लिए उसे किसी भी वृत्‍ति की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। यह साधना की अंतिम अवस्था पंचमावस्था कहलाती है। (ग.का.टी.पृ.5)। ऐसा भासर्वज्ञ का विचार है। यह तो मुक्‍त योगी की स्थिति होती है सांसारिक साधक की नहीं।
पाशुपत सूत्र के कौडिन्य भाष्य में भी योग की पाँचवी भूमिका का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। (पा.सू.कौ.भा. अध्याय 5)। संसार में ही रहते हुए योगी की उसी दशा को पञ्‍चमावस्था माना जाए तो अधिक उपयुक्‍त होगा।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

पंचवाह

क्रम दर्शन में श्रीपीठ, पंचवाह, नेत्रत्रय, वृन्दचक्र, गुरुपंक्ति और पाँच शक्तियों की उपासना विहित है। अपने शरीर को ही यहाँ श्रीपीठ बताया गया है। इस शरीर में भी परमेश्वर पाँच प्रकार से स्फुरित होता है। परमेश्वर के स्फुरण की यह धारा ही वाह के नाम से अभिहित है। इनके नाम हैं – व्योमवामेश्वरी, खेचरी, दिक्चरी, गोचरी और भूचरी। कुछ आचार्य गोचरी, दिक्चरी और भूचरी अथवा भूचरी, द्क्चिरी और गोचरी के क्रम से इनकी स्थिति बताते हैं। ये ही पाँचों शक्तियाँ क्रमशः चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति के रूप में तथा परा, सूक्ष्मा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के रूप में अनुभूत होती है। सृष्टि प्रभृति जितने भी पाँच संख्या वाले पदार्थ हैं, उन सबका समन्वय इन्हीं से होता है। प्रणव की पाँच कला तथा अन्य भी ऊपर बताए गए व्योम (पाँच) संख्या वाले पदार्थों का वमन करने वाली शक्ति का नाम व्योमवामेश्वरी है। यह परमेश्वर की अविकल्प भूमि में अनुप्रविष्ट विच्छवित का ही विलास है (महार्थमंजरी, पृ. 83-87)।
क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञाहृदय (12 सू.) में इसका वामेश्वरी के नाम से वर्णन किया है। वहाँ अन्य चार शक्तियों का क्रम यह है – खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी। प्रत्यभिज्ञाहृदय में प्रदर्शित क्रम के अनुसार यहाँ क्रमशः इन पाँचों का वर्णन किया जा रहा है।
1. वामेश्वरी
संवित् क्रम में चितिस्वरूपा महाशक्ति वामेश्वरी नाम धारण कर खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी- इन चार स्वरूपों में परिस्फुरित होती है। अविभक्त दशा में प्रमाता, आन्तर प्रमाण और प्रमेय विभाग नहीं रहता। परन्तु स्फुरण की अवस्था में प्रमाता, आन्तर प्रमाण या अन्तःकरण, बहिःकरण या बाह्य इन्द्रियाँ और प्रमेय ये चार विभाग अलग-अलग प्रकाशित होते हैं। ये अपरिमित प्रमाता को परिच्छिन्न (परिसीमित) बना देते हैं। ये सब पशुओं को विमोहित करते हैं। परन्तु आत्मा जब शिवभूमि में प्रविष्ट होती है, तब ये शक्तियाँ शिवहृदय को विकसित करती हैं। उस समय में खेचरी आदि शक्तियाँ ही आत्मा के पूर्णकर्तृत्व आदि की प्रकाशक चिद्गगनचरी, अभेदविश्चय गोचरी, अभेदालोचनात्मक दिक्चरी तथा स्वांगकल्प अद्वयप्रथामय प्रमेयात्मक भूचरी के रूप में प्रकाशमान होती हैं।
वाम शब्द वम् धातु से संबद्ध है, जिसका अर्थ होता है- वमन करना, बाहर फेंकना। यह शक्ति वामेश्वरी इसलिये कहलाती है कि यह विश्व को परमशिव से बाहर फेंकती है। वाम शब्द का अर्थ बायाँ और विपरीत भी है। यह शक्ति वामेश्वरी इसलिए भी कहलाती है कि यद्यपि शिव में अभेद, अर्थात् पूर्णता की चेतना है, किन्तु संसार दशा में इस शक्ति के कारण उसमें भेद और अपूर्णता की भावना घर कर जाती है। इसके कारण प्रत्येक जीव शरीर, प्राण इत्यादि को ही अपना स्वरूप समझने लगता है।
वाम शब्द का अर्थ सुन्दर भी होता है। परब्रह्म का सौन्दर्य इसी बात में निहित है कि वह विश्व का वमन करता हुआ पारमेश्वरी लीला के चमत्कार को चमका देता है, अन्यथा वह शून्य गननवत् जड़ और इसीलिए भावात्मक सौन्दर्य से रहित होता है।
2. खेचरी
खेचरी शक्ति का संबन्ध प्रमाता से है। इसके कारण चेतन आत्मा अपरिमित प्रमाता से परिमित प्रमाता बन जाती है। ‘खे (आकाशे) चरतीति खेचरी’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार ख शब्द का अर्थ आकाश है। खे सप्तमी विभक्ति है। इसका अर्थ है ‘आकाश में’। यहाँ ख या आकाश चित् का प्रतीक है। इस शक्ति का नाम खेचरी इसलिए है कि इसका क्षेत्र चिद्गगन है। चिद्गगन के पारमार्थिक स्वभाव को छिपा कर यह प्रमाता को परिमित प्रमाता बना देती है। वह अब पशु बन जाता है। माया से उद्भूत कला आदि पंचकंचुक समष्टि रूप से खेचरी चक्र के नाम से अभिहित होते हैं। इनका नाम आत्मा के स्वरूपभूत पाँच नित्य धर्मों को संकुचित करना है। सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, नित्यत्व, विभुत्व और आप्तकामत्व- ये पाँच आत्मा के स्वाभाविक धर्म हैं। शिव रूपी आत्मा चिदाकाश में संचरण में समर्थ होने पर भी पशु दशा में इस खेचरी चक्र से आक्रान्त होकर परिमित प्रमाता बन जाता है। उस समय वह अल्पकर्ता, अल्पक्ष, अनित्य, नियतदेशवृत्ति और भोग की आकांक्षा से लिप्त हो जाता है।
3. गोचरी
गोचरी का संबन्ध अन्तःकरण से है। इस चक्र से चेतन आत्मा अन्तःकरण से परिच्छिन्न हो जाता है। गौ शब्द गमन या चलन का द्योतक है। किरण, गौ, इन्द्रियाँ- ये सभी पदार्थ ‘गौ’ शब्द से अभिहित होते हैं, क्योंकि इस सब में गमन का भाव निहित है। अन्तःकरण इन्द्रियों का आश्रय है। वही इन्द्रियों को परिचालित करता है। इसलिये वह गोचरी शक्ति का क्षेत्र है। इसके कारण आत्मा का स्वभावसिद्ध अभेदनिश्चय, अभेदाभिमान तथा अभेद विकल्पमय पारमार्थिक स्वरूप तिरोहित हो जाता है। भेदनिश्चय, भेदाभिमान तथा भेदविकल्प प्रधान अन्तःकरण रूप देवियाँ ही गोचरी शक्ति के नाम से प्रसिद्ध हैं।
4. दिक्चरी
दिक्चरी का संबन्ध बहिःकरण (बाह्य इन्द्रिय) से है। दिक्चरी चक्र के द्वारा चेतन आत्मा बहिःकरणों से परिच्छिन्न हो जाता है। दिक्चरी वह शक्ति है, जो दिक् (दिशाओं) में चलती रहती हैं बहिःकरण या बाह्य इन्द्रियों का संबंध दिक् या देश से है। इसलिये दिक्चरी शक्ति का क्षेत्र बाह्य इन्द्रियाँ हैं। इस शक्ति के कारण पारमार्थिक अभेद प्रथा (अभेद ज्ञान) आच्छादित हो जाती है तथा भेदविचारमय भेद प्रथा का प्राकट्य हो जाता है। यह बाह्य कारण रूप दैवीचक्र ही दिक्चरी शक्ति के नाम से प्रसिद्ध है।
5. भूचरी
भूचरी शक्ति का संबन्ध भावों (पदार्थों) से है। इसके कारण चेतन आत्मा भावों (पदार्थों = प्रमेयों) में ही अटका रह जाता है। ‘भूचरी’ में विद्यमान ‘भू’ का अर्थ ‘होना’ है। जो कुछ हो गया है, वह ‘भू’ के अन्तर्गत है। अतः यह शक्ति सभी भाव, अर्थात् पदार्थ अथवा प्रमेयों (विषयों) का बोध कराती है। सभी पदार्थ या प्रमेय भूचरी के क्षेत्र में आते हैं। भूचरी शक्ति के कारण पारमार्थिक सर्वात्मकता आवृत हो जाती है और परिच्छिन्न आभासमय प्रमेयवर्ग प्रकाशित हो उठता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

पंचसूतक

धर्मशास्‍त्रों में जनन, मरण, रज, उच्छिष्‍ठ तथा जाति से पाँच प्रकार के सूतक माने गये हैं, अर्थात् घर में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर, घर की किसी स्‍त्री के रजस्वला होने पर सूतक की प्राप्‍ति होती है। अतः इस सूतक के समय उस घर में पूजा आदि वैदिक कर्मो का निषेध किया गया है। उसी प्रकार उच्छिष्‍ठ का ग्रहण तथा कुछ विशिष्‍ट जाति के लोगों के साथ संपर्क न करने का भी विधान है। किंतु वीरशैव आचार्य एवं संतों ने विशेष परिस्थितियों में उपर्युक्‍त सूतकों को स्वीकार नहीं किया है, जैसे कि इष्‍टलिंग का धारण तथा उसकी पूजा के लिये जनन, मरण और रज इन तीन प्रकार के सूतकों की प्रवृत्‍ति नहीं होती। इसी प्रकार पादोदक और प्रसाद के सेवन के प्रसंग में ‘उच्छिष्‍ठ-सूतक’ को भी नहीं माना जाता। इसका तात्पर्य यह है कि वीरशैव-धर्म में दीक्षा के समय गुरु अपने शिष्य को इष्‍टलिंग देता है और उसे आमरण शरीर पर धारण करने का आदेश करता है। यह दीक्षा स्‍त्री तथा पुरुषों के लिये समान रूप से होती है। दीक्षा-संपन्‍न स्‍त्री यदि रजस्वला अथवा प्रसूता होती है, तो उस समय उस स्‍त्री को इष्‍टलिंग की पूजा करने का अधिकार है या नहीं ? यह शंका होने पर वीरशैव आचार्ये ने इष्‍टलिंग धारण करने वाली स्‍त्री को इष्‍टलिंग की पूजा का अधिकार प्रदान किया है। जैसे पौण्डरीक आदि दीर्घकालीन सत्रों का संकल्प करके त्याग करते समय यजमान की पत्‍नी यदि रजस्वला हो जाती है, तो भी वह स्‍नान करके गीला वस्‍त्र पहनकर पुन: याग में सम्मिलित होती है, उसी प्रकार वीरशैव धर्म में दीक्षित स्‍त्री रजस्वला या प्रसूता होने पर भी उसी दिन स्‍नान एवं गुरु के चरणोदक का प्रोक्षण करके शुद्‍ध होकर अपने नित्यकर्म इष्‍टलिंग की पूजा करने के लिये अधिकारी होती है। इष्‍टलिंग की पूजा के अतिरिक्‍त पाक आदि अन्य कार्यों के लिए वीरशैव धर्म में भी सूतक माना जाता है। जैसे हस्तस्पर्श के अयोग्य होने पर भी जिह्वा मंत्रोच्‍चारण के लिये योग्य है, उसी प्रकार रजस्वला या प्रसूता स्‍त्री पाक आदि अन्य लौकिक कर्म करने के लिये अयोग्य और अपवित्र होने पर भी इष्‍टलिंग के धारण एवं उसकी पूजा के लिये वह अग्‍नि, रवि तथा वायु के समान सदा पवित्र रहती है। घर में किसी की मृत्यु होती है, तो उस घर के लोग भी शव संस्कार के बाद स्‍नान एवं गुरु के चरणोदक के प्रोक्षण से घर को शुद्‍ध करके अपने अपने इष्‍टलिंग पूजा रूप नित्यकर्म को बिना किसी बाधा के यथावत् अवश्‍य पूरा करते हैं। अतः वीरशैवों को इष्‍टलिंग की पूजा में मरणसूतक भी नहीं लगता (सि.शि. 9/43-45 पृष्‍ठ 150-151; वी.मा.सं. 47/25-26; ब्र.सू. 1-1-1) श्रीकर.भा.पृष्‍ठ 11-12; सि.शि.वी.भा.पृष्‍ठ 41-56)।

वीरशैव संप्रदाय में प्रतिदिन गुरु या जंगम की पादपूजा करके एक पात्र में पादोदक (चरणमृत) तैयार किया जाता है और उस पादपूजा में सम्मिलित सभी शिवभक्‍त उसी एक पात्र में से पादोदक का सेवन करते हैं। यहाँ प्रथम व्यक्‍ति के ग्रहण करने के बाद वह पादोदक उच्छिष्‍ठ हो जाता है, तो दूसरा उसका ग्रहण करें या नहीं ? यह शंका होती है। वीरशैव आचार्यो ने इस प्रसंग में भी उच्छिष्‍ठ सूतक को नहीं माना है। जैसे सोमयाग में हविःशेषभूत सोमरस को चमस नामक पात्र में संग्रह करके यज्ञशाला के सभी ऋत्विज उस चमस पात्र से सोमरस का सेवन करते हैं, तो भी वहाँ उच्छिष्‍ठ-सूतक नहीं माना जाता, उसी प्रकार वीरशैव धर्म में भी एक पात्र से अनेक लोगों के द्‍वारा पादोदक स्वीकार करने पर भी उच्छिष्‍ठ-सूतक नहीं होता। गुरु या जंगम के भोजन से अवशिष्‍ट अन्‍न को प्रसाद कहते हैं। इस प्रसाद के स्वीकार करने में भी उच्छिष्‍ठ सूतक नहीं है (वी.आ.चं. पृष्‍ठ 119; सि.शि.वी.भा. पृष्‍ठ 56-57)।

बारहवीं शताब्दी के वीरशैव संतों ने जाति-सूतक का भी निषेध किया है। उन्होंने शिवदीक्षा-संपन्‍न व्यक्‍ति किसी भी जाति का हो, उनके साथ समता का व्यवहार करने को कहा है- (व.शा.सा. भाग 1 पृष्‍ठ 380-381)।

इस प्रकार धर्मशास्‍त्र-सम्मत पाँच प्रकार के सूतकों को वीरशैव धर्म में सीमित रूप में ही मान्यता दी गयी है। तब भी लोकव्यवहार में इनका पालन आवश्यक है।

Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचसूत्रलिंग

पंचसूत्र’ स्थूल लिंग के निर्माण की एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से निर्मित सामान्य शिला या स्फटिक के लिंग को ‘पंचसूत्र लिंग’ कहा जाता है। उसका विधान यह है- सामान्यत: लिंग में ‘बाण’, ‘पीठ’ और ‘गोमुख’ ये तीन भाग होते हैं। ऊपर के गोलाकार को ‘बाण’, उस बाण के आश्रयभूत नीचे के भाग को ‘पीठ’ और जलहरी को ‘गोमुख’ कहा जाता है। शिलामय लिंग का निर्माण करते समय पहले ‘बाण’ तैयार करके उस बाण के वर्तुल परिमाण सदृश पीठ की लंबाई और पीठ के ऊपर की तथा नीचे की चौड़ाई होनी चाहिये। बाण के वर्तुल के आधे माप का गोमुख तैयार करना चाहिये। इस प्रकार बाण का वर्तुल, पीठ की लंबाई, पीठ के नीचे की चौड़ाई इन चारों का माप समान होना चाहिये और गोमुख का माप मात्र बाण के वर्तुल का आधा रहना चाहिये। यही ‘पंचसूत्र’ प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से निर्मित लिंग को ही ‘पंचसूत्र लिंग’ कहा जाता है।

इस परिणाम में न्यनाधिक्य होने पर, अर्थात् यदि बाण अधिक परिमाण का हो तो, उस लिंग की पूजा से अपमृत्यु और पीठ का परिमाण अधिक होने पर धन का क्षय बताया गया है। बाण और पीठ का परिमाण समान होने पर ही उस लिंग से भोग तथा मोक्ष की प्राप्‍ति होती है (वी.आ.प्र. 1-94-95; क्रि.सा.भाग.3 पृष्‍ठ 41)।

इस प्रकार से निर्मित ‘पंचसूत्रलिंग’ ही वीरशैवों को क्रियादीक्षा के समय संस्कार करके आचार्य के द्‍वारा दिया जाता है।

Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार

लिंगाचार, सदाचार, शिवाचार, गणाचार और भृत्याचार इन पाँच प्रकार के आचारों को ‘पंचाचार’ कहते हैं। यहाँ पर ‘आचार’ का अर्थ है- वेद और शास्‍त्र के प्रवर्तक एवं निवर्तक आदेशों को क्रियान्वित करना, अर्थात् शास्‍त्रविहित कर्मों को करना और निषिद्‍ध कर्मो को छोड़ना ही ‘आचार’ है। वेद कहता है ‘सत्यं वद’ (सत्य बोलो) और ‘सुरां न पिवेत्’ (मद्‍यपान मत करो)। इन प्रवर्तक और निवर्तक आदेशों के अनुसार ‘सत्य बोलना’ तथा मद्‍यपान छोड़ देना’ ये आचार हैं। इस प्रकार के आचार अनंत हैं। उन सबको पाँच भागों में विभक्‍त करके वीरशैव धर्म में ‘पंचाचारों’ का प्रतिपादन किया गया है। ये पाँच प्रकार के आचार साधकों को दुर्मार्ग से रोककर उनके अंतःकरण की शुद्‍धि में कारण बनते हैं। अतः प्रत्येक वीरशैव को अपने जीवन में इनका पालन करना आवश्यक है। (चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद 9/4; श. वि. द. पृष्‍ठ 210)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार

क. लिंगाचार
अंग (जीव) को लिंगस्वरूप की प्राप्‍ति के लिये बताये गये आचार को ‘लिंगाचार’ कहते हैं, अर्थात् जिस आचार के पालन से अंग लिंगस्वरूप हो जाता है, वही ‘लिंगाचार’ है। शरीर, मन तथा भावना से क्रमशः लिंग की पूजा, लिंग का चिंतन एवं लिंग का निदिध्यासन करना ही लिंगाचार का स्वरूप है।

वीरशैव संप्रदाय में गुरु अपने शिष्य को क्रियादीक्षा के द्‍वारा ‘इष्‍टलिंग’ प्रदान करता है, मंत्रदीक्षा के द्‍वारा ‘प्राणलिंग’ के स्वरूप को समझाता है और वेध-दीक्षा के माध्यम से ‘भावलिंग’ का बोध कराता है। इस प्रकार त्रिविध दीक्षा से प्राप्‍त इष्‍ट, प्राण तथा भावलिंग की गुरु के उपदेश के अनुसार क्रमशः शरीर से अर्चन, मन से चिंतन और भावना से निदिध्यासन करना ही लिंगाचार कहलाता है। इस संप्रदाय में दीक्षा-संपन्‍न जीव को अपने इष्‍ट, प्राण तथा भावलिंग के अतिरिक्‍त अन्य देवी-देवताओ की अर्चना आदि का निषेध हैं। यह निषेध उनके प्रति घृणा की भावना से नहीं, किंतु इष्‍टलिंग आदि में निष्‍ठा बढ़ाने के लिये है। अतः गुरुदीक्षा से प्राप्‍त उन लिंगों को ही अपना आराध्य समझ कर उन्हीं की अर्चना आदि में तत्पर रहना लिंगाचार है। इस लिंगाचार के निष्‍ठापूर्वक पालन करने से अंग (जीव) लिंग स्वरूप हो जाता है (चं.ज्ञा.आ.क्रिया पाद. 9/5,11; सि.शि. 9-31-33 पृष्‍ठ 147)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

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