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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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बटुक

शक्तिसंगम तन्त्र के प्रथम खण्ड के बारहवें पटल में बताया गया है कि भूत, प्रेत, वेताल आदि जप, पूजा आदि में विघ्न उपस्थित कर दिया करते हैं। भक्तों के कल्याण के लिये देवी ने बटुक का प्रादुर्भाव किया, जो कि इन विघ्नों को दूर भगा देते हैं। योगिनी, विद्या, भैरव तथा अनन्तकोटि मन्त्रों के तेजःपुंज से बटुक का आविर्भाव हुआ। साक्षात् भगवान् शिव ही बटुक का रूप धारण कर वेताल प्रभृति के उपद्रवों को शान्त कर भक्तों की रक्षा करते हैं। बटुक के प्रसाद से ही सारी विद्याएँ और शाबर प्रभृति मन्त्र फलद होते हैं। इनकी कृपा के बिना कोई भी विद्या अथवा मन्त्र सिद्ध नहीं होते। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी बटुक की तिथि मानी जाती है। इसी दिन इनका प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये बटुक की जयन्ती के रूप में इसको मान्यता प्राप्त है। हेतु, त्रिपुरान्तक वह्नि वेताल, अग्निजिह्व, काल, कराल, एकपाद, भीम, त्रैलोक्यसिद्ध और बटुक के भेद से यह दशविध माने गये हैं। शक्ति की उपासना में गणपति, बटुक, योगिनी और क्षेत्रपाल की पूजा अनिवार्य है।
Darshana : शाक्त दर्शन

बंधन

अपने स्वरूप तथा स्वभाव को क्रमशः शुद्ध प्रकाश रूप तथा शुद्ध विमर्श रूप न समझकर केवल शून्य, प्राण, बुद्धि, देह आदि जड़ पदार्थों को ही अपना वास्तविक स्वरूप तथा अल्पज्ञता आदि को अपना स्वभाव समझना बंधन कहलाता है। (ई.प्र.वि. 2 पृ.252-3)। वस्तुतः बंधन और मोक्ष में कोई भी अंतर नहीं है। दोनों का आधार केवल अभिमनन मात्र ही है। ये दोनों पारमेश्वरी लीला के मात्र दो प्रकार हैं। इसमें शिवभाव का अभिमनन मोक्ष तथा जीव भाव का अभिमनन बंधन कहलाता है। (वही पृ. 129-30, बो.पं.द. 14)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बन्ध

जीव की बद्ध अवस्था (संसारयुक्तता) को बन्ध कहा जाता है। सांख्ययोग की दृष्टि में बन्ध वस्तुतः चित्त की ही अवस्था है – चित्त ही बद्ध होता है, चित्त ही मुक्त होता है। पुरुष (तत्त्व) में बन्ध-मोक्ष का व्यवहार औपचारिक (गौण) है, अर्थात् चित्त की अवस्थाओं का गौण व्यवहार चित्तसाक्षी कूटस्थ पुरुष में किया जाता है। यह बद्धावस्था सहेतुक है; हेतु है अविद्या। अविद्या अनादि है, अतः यह सिद्ध होता है कि बद्धावस्था का भी आदि नहीं है, अर्थात् बद्ध पुरुष अनादि काल से बद्ध है (‘अनादिकाल से’ – ऐसा कहना न्याय की दृष्टि से सदोष है, पर इस विकल्पवृत्तिजात व्यवहार को करने के लिए हम बाध्य हो जाते हैं – यह ज्ञातव्य है)। जब तक भोग और अपवर्ग रूप दो पुरुषार्थ समाप्त नहीं होते, तब तक यह बद्धावस्था भी रहती है। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि बन्ध का अभाव ही मुक्ति है। यह मुक्ति अविद्या का पूर्णतः नाश होने पर ही होती है। अविद्यानाश विद्या (= विवेकख्याति) द्वारा ही साध्य है, जो योगांगों के अभ्यास से ही प्रकट होता है।
बन्ध शब्द का एक विशिष्ट अर्थ में प्रयोग योगसूत्र 3/38 में है। शरीर में मन की (कर्माशयवशता के कारण) जो स्थिति होती है, वह भी बन्ध कहलाता है। (धारणा के प्रसंग में भी ‘बन्ध’ शब्द का प्रयोग होता है, जिसके लिए द्रष्टव्य है ‘देशबन्ध’ शब्द)।
सांख्यशास्त्र में तीन प्रकार का बन्ध स्वीकृत हुआ है – प्राकृतिक, वैकृतिक (या वैकारिक) तथा दाक्षिण। अष्ट प्रकृति से सम्बन्धित जो बन्धन हैं, वह प्राकृतिक है। इस बन्धन से युक्त व्यक्ति भ्रमवश इन प्रकृतियों को आत्मा समझते हैं। सोलह विकारों (विकृतियों) से सम्बन्धित जो बन्धन है वह वैकृतिक है। इस बंधन से युक्त व्यक्ति भ्रमवश इन विकारों को आत्मा समझते हैं। दक्षिणासाध्य यज्ञादिकर्मों से संबंधित जो बन्ध है वह दाक्षिण बन्ध या दक्षिणाबन्ध है (दाक्षिणक शब्द भी प्रयुक्त होता है)। विभिन्न लोकों से संबंधित बन्धन वैकारिक बन्धन है – यह किसी-किसी का मत है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

बन्ध-मोक्ष

अद्वैतवादी तान्त्रिक दार्शनिकों के मत में बन्ध और मोक्ष की कोई वास्तविक स्थिति नहीं है। ये मात्र विकल्प के व्यापार हैं। विकल्प शब्द की व्याख्या अलग से की गई है। इस दर्शन में वस्तुतः जब बन्ध की ही कोई स्थिति नहीं है, तब मोक्ष की चर्चा कहाँ से उठेगी और मोक्ष प्राप्ति की इच्छा का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। चिदानन्दात्मक स्वरूप का परामर्श ही आत्मा का स्वभाव है। इसी को मोक्ष भी कहा जाता है। यह स्वभाव अपूर्णता ख्याति रूप आणव मल से जब आवृत हो जाता है, तो इसी को बन्ध कह देते हैं। ज्ञानदान और पापक्षपण लक्षण दीक्षा से जब मल अपसारित हो जाता है, तो गुरु के कृपा-कटाक्ष से शिष्य पुनः स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। इसी को मोक्ष कहते हैं। इस दर्शन में वेदान्त आदि दर्शनों के समान ऐहिक और आमुष्मिक भोगों से विरक्ति को आवश्यक नहीं माना गया है। इस दर्शन की विशेषता यह है कि इसमें भोग और मोक्ष की समरसता प्रतिपादित है। इसकी अनुभूति जीवन्मुक्ति दशा में होती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

बयलु

देखिए ‘शून्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

बल

शक्‍तियाँ

पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार जिन शक्‍तियों के द्‍वारा साधक मुक्‍ति को प्राप्‍त कर सकता है, वे शक्‍तियाँ बल कहलाती हैं। बल पाँच प्रकार के होते हैं- गुरुभक्‍ति, प्रसाद, द्‍वन्द्‍वजय, धर्म तथा अप्रमाद (ग.का.इ)। ये पाँच विषय भी पाशुपत दर्शन के प्रतिपाद्‍य विषयों में महत्वपूर्ण विषय हैं। तभी गणकारिका में इन्हें गिनाया गया है और टीका में इन पर प्रकाश डाला गया है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

बलप्रमथन

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत में ईश्‍वर को बलप्रमथन कहा गया है क्योंकि उसमें बलों (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्‍वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्‍वर्य, इच्छा, द्‍वेष तथा प्रयत्‍न) की प्रवृत्‍ति का मन्थन अथवा निरोध करने की शक्‍ति होती है। तात्पर्य यह है कि इन बुद्‍धि धर्मों में अपना बल कोई नहीं है, इन्हें ईश्‍वर ही बल प्रदान करता है। उसी के द्‍वारा स्थापित नियति के आधार पर इनमें बल ठहराया जाता है। तो बल केवल शक्‍तिमान ईश्‍वर में ही है। वही किसी को बल दे सकता है और किसी के बल को विरुद्‍ध कर सकता है। अतः उसे बलप्रमथन कहते हैं। (पा.सू.कौ.भा.पृ.75)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

बहिरंगयोग

धारणा, ध्यान और समाधि संप्रज्ञातयोग (द्र. योगसू. 1/17) के अंतरंग साधन माने जाते हैं (क्योंकि इस समाधि में आलम्बन रहता है)। संप्रज्ञात समाधि की दृष्टि में यम, नियम, आसन, प्राणायाम एवं प्रत्याहार ये पाँच योगाङ्ग बहिर्ङ्ग हैं। ये मुख्यतः शरीर आदि को मलहीन करते हैं, जिससे स्थैर्य उत्पन्न होता है। इसी प्रकार असंप्रज्ञात समाधि की दृष्टि में धारणा-ध्यान-समाधि बहिरङ्ग साधन हैं, क्योंकि असंप्रज्ञात समाधि निरालम्बन है। इस समाधि का अन्तरङ्ग साधन परवैराग्य है (परवैराग्य का स्वरूप योगसू. 1/16 में द्र.)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

बहुरुपी

रूद्र के विविध रूपों संबंधी जप।

बहुरुपी रौद्री का ही नामांतर है तथा बहुरूप अघोर रूद्र का नामांतर है। रुद्र संबंधी जप में जब रुद्र के बहुत से रूपों का गायन होता है तो वही रौद्री बहुरूपी कहलाती है। अथवा यह जप-विशेष उस बहुरूप की प्राप्ति करवाता है (पा.सू.कौ.भा.पृ. 124)। इस बहुरूपी मंत्र का विस्तार बहुरूपगर्भस्तोत्र में मिलता है। पाशुपतसूत्र के तृतीय अध्याय के इक्‍कीसवें सूत्र से लेकर छब्बीसवें सूत्र तक बहुरूपी ऋचा का उपदेश किया गया है तदनुसार वह ऋचा यह है- अघोरेम्योടथ घोरेभ्य: घोरघोरतरेभ्यश्‍च सवेभ्य: शर्वसर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररुपेभ्य:। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 81-91)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

बाह्य द्वादशांत।

देखिए द्वादशांत।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बाह्य/बाह्यता

जो जो वस्तु संविद्रूपी अहं के साथ अभिन्नतया आलासित होती है उसे आंतर कहते हैं और जो जो उससे भिन्नतया प्रकट होती है उसे बाह्य कहते हैं। ईश्वर प्रत्यभिज्ञा में स्पष्टतया कहा गया है कि प्रमाता के साथ अभेद ही आंतरता है और उससे भेद ही बाह्यता है। (ई.प्र0 1-8-8)।
अज्ञानवश शरीर आदि को प्राणी अहं रूपतया जानता है। इसी कारण आणवयोग की स्थानकल्पना में बुद्धि को, प्राण को, शरीर को बाह्य न कहकर केवल ग्राह्य कहा गया है और देशरूप तथा कालरूप छः अध्वारूप आलंबनों को ही बाह्य कहा गया है। बुद्धि आदि केवल ग्राह्य ही हैं, परंतु देश और काल ग्राह्य होते हुए साथ ही बाह्य भी हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बिंदु

1. भ्रूमध्य में ध्यान लगाने से अभिव्यक्त होने वाली ज्योति। (स्वच्छन्द तंत्र खं. 2, पृ. 163)।
2. बिंदु – ईश्वर। यह पद भिदिर अवयवों से बनता है। ईश्वर भट्टारक ही प्रमातृता और प्रमेयता का स्रष्ट्टता और स्रक्ष्यमाणता का भेदमयता या विमर्शन करता है। इस तरह से अवयवन अर्थात् विश्लेषण का श्रीगणेश उसी से होता है। अतः वह बिंदु कहलाता है और शुद्ध विद्या को उसका नाद कहा जाता है। उससे ऊपर शिवभट्टारक को विंदु कहते हैं। विंदु का अर्थ होता है इच्छु : अर्थात् इच्छा शक्ति से आविष्ट। सदाशिव दशा को इसीलिए उस विंदु का नाद कहते हैं। विंदु , पर-प्रकाश, परमेश्वर, शिव। अमा कला। पराजीव कला। (वही पृ. 168)। देखिए विंदु।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बिन्दु

प्रपंचसार, शारदातिलक, रत्नत्रय प्रभृति ग्रन्थों में नाद और बिन्दु को शिव और शक्ति से उसी तरह से अभिन्न माना गया है, जैसे कि प्रकाश और विमर्शात्मक शिव तथा शक्ति से शब्द और अर्थ को अभिन्न माना गया है। प्रणव की 12 कलाओं में भी बिन्दु और नाद की स्थिति है। आगम और तन्त्र की विभिन्न शाखाओं में नाद और बिन्दु की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हैं।
त्रिपुरा दर्शन (योगिनीहृदय 1/27-28) में भगवती त्रिपुरसुन्दरी के निष्कल स्वरूप की स्थिति महाबिन्दु में मानी गई है। कामकला विलास में बताया गया है कि विमर्श (शक्ति) रूपी दर्पण में परमशिव रूपी प्रकाश प्रतिबिम्बित होता है, तो वह चित्तमय कुड्य (भित्ति) में महाबिन्दु के रूप में प्रतिफलित होता है। इसको कामबिन्दु भी कहा जाता है। आगे चलकर शिव और शक्ति के प्रतीक शुक्ल और रक्त बिन्दु का उन्मेष होता है, जो कि शब्दमयी और अर्थमयी सृष्टि के जनक हैं। दो होने से इन बिन्दुओं को विसर्ग कहा जाता है। कालक्रम से उक्त दोनों बिन्दु मिलकर समस्त हो जाते हैं और उससे मिश्रि बिन्दु का आविर्भाव होता है। यह हार्दकला के नाम से प्रसिद्ध है। काम बिन्दु, विसर्ग और हार्दकला मिल कर कामकला नामक पदार्थ की रचना करते हैं। इसी से सारे जगत की सृष्टि होती है।
बिन्दु शब्द की व्याख्या अक्षरबिन्दु, कारण बिन्दु, कार्य बिन्दु शब्दों की परिभाषा के अन्तर्गत भी देखी जा सकती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

बीज

1. संपूर्ण विश्व की मूलभूता शुद्ध एवं परिपूर्ण संवित्। (शि.द1. वा. पृ. 57,61)।
2. अ से लेकर विसर्ग पर्यंत संवित्स्वरूप सोलह स्वरों का समूह। इन स्वरों में आगे के समस्त वर्ण बीज रूप में स्थित रहते हैं। इस प्रकार सारा वाचक-वाच्य आदि योनि वर्ग (देखिए) इन स्वरों में संवित्स्वरूप में ही रहता है। सभी व्यंजनों आदि की सृष्टि इन्हीं स्वरों से होती है। स्वरों के वर्ण को साक्षात् परसंवित्स्वरूप भैरव भी कहा जाता है। (स्व.तं.अ. 1 पृ. 27, 28)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बीजत्रय

गायन्त्री मन्त्र में जैसे तीन पाद हैं, उसी तरह से श्रीविद्या में तीन कूट अथवा बीज हैं। इनमें नाम हैं – वाग्भव, कामराज और शक्ति। प्रत्येक कूट या बीज के अन्त में स्थित हृल्लेखा में कामकला की स्थिति मानी जाती है। योगिनीहृदय (3/172-176) में इसकी 12 कलाओं का वर्णन किया गया है। उक्त तीन कूटों या बीजों में क्रमशः आधार, हृदय और भ्रूमध्य स्थित वह्नि, सूर्य और सोम नामक कुण्डलिनियों में से प्रत्येक में श्रीचक्र के तीन-तीन चक्रों की भावना की जाती है। प्रथम बीज की हृल्लेखा में विद्यमान कामकला की अंगभूत सपरार्ध (हार्ध) कला वह्निकुण्डलिनी, द्वितीय बीज की हार्धकला सूर्यकुण्डलिनी और तृतीय बीज की सपरार्ध कला सोमकुण्डलिनी कहलाती है। वाग्भव बीज का हृदय तक और कामराज बीज का भ्रूमध्य तक उच्चारण होता है। शक्ति बीज से सभी 12 कलाओं का उच्चारण हो सकता है। वाग्भव सृष्टिबीज और कामराज स्थितिबीज, अतः इनका उच्चारण विश्वातीत उन्मनी पर्यन्त नहीं हो सकता। नित्याषोडशिकार्णव, योगिनीहृदय प्रभृति ग्रन्थों में और उनकी टीकाओं में यह विषय विस्तार से वर्णित है।
(क) वाग्भव बीज
ऋजुविमर्शिनीकार (पृ. 97-99) ने बिन्दु सहित अनुत्तर अकार को भी वाग्भव बीज बताया है। यह सारा विश्व अनुत्तर तत्त्व का ही प्रसार है। यह त्रिपुरा विद्या का प्रथम बीज है। वाग्भव बीज का समुद्धार नित्याषोडशिकार्णव (1/111-112) में मिलता है। अर्थरत्नावलीकार (पृ. 194) वाग्भव बीज को बैखरी वाण का विलास मानते हैं। यह ज्ञान शक्ति का प्रतीक है और इसकी उपासना से मोक्ष की प्राप्ति होती है (पृ. 216)। इसका समुद्धार जिह्वा के अग्रभाग में किया जाता है, अर्थात् इसकी आराधना से जिह्वा में सरस्वती का सतत निवास रहता है। नित्याषोडशिकार्णव (4/21-33) में वाग्भव बीज की साधनविधि, ध्यान का प्रकार और उसका फल वर्णित है। अर्थरत्नावली (पृ. 230-231) में बताया है कि वाग्भव बीज की उत्पत्ति मूलाधार में होती है, मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त इसकी व्याप्ति रहती है और जिह्वा के अग्रभाग में इसकी विश्रान्ति का स्थान है। यहीं (पृ. 271) वाग्भव बीज के साधन के प्रसंग में होम और उसके लिये उपयुक्त सामग्री का वर्णन मिलता है। सौभाग्यसुधोदय (2/8) में इसे पूर्वाम्नाय का प्रतीक कहा है। तन्त्रशास्त्र में एकादश स्वर एकार को भी वाग्भव बीज कहा जाता है।
(ख) कामराज बीज
यह त्रिपुरा विद्या का द्वितीय बीज है। इस बीज का भी समुद्धार नित्याषोडशिकार्णव (1/113-116) में मिलता है। अर्थरत्नावलीकार (पृ. 194) कामराज बीज को मध्यमा वाणी का विलास मानते हैं। यह क्रिया शक्ति का प्रतीक है और इसकी उपासना से काम नामक पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। (पृ. 216)। नित्याषोडशिकार्णव (4/34-46) में ही कामराज बीज की साधनविधि, ध्यान का प्रकार और उसका फल भी वर्णित है। अर्थरत्नावली (पृ. 247) में इस बीज की उत्पत्ति मूलाधार में, व्याप्ति भ्रूमध्यान्त तक तथा विश्रान्ति ब्रह्मरन्ध्र में मानी गई है। ऋजुविमर्शिनीकार (पृ.97-99) ने बिन्दु सहित आनन्दात्मक आकार को भी कामराज बीज माना है। धर्माचार्य ने लघुस्तव में कामराज बीज के निष्फल और सकल दो रूपों का वर्णन किया है। सानुस्वार चतुर्थ वर्ण को ही मूलतः निष्कल बीज कहा है। वही सकल भी बन जाता है। दोनों रूपों में उसकी उपासना की जाती है।
(ग) शक्ति बीज
यह त्रिपुरा विद्या का तृतीय बीज है। इस बीज का समुद्धार नित्याषोडशिकार्णव (1/116-118) में मिलता है। अर्थरत्नावलीकार (पृ. 194) शक्ति बीज को पश्यन्ती वाणी का विलास मानते हैं। यह इच्छा शक्ति का प्रतीक है और इसकी सहायता से साधक परम शिव के साथ सामरस्य लाभ कर सकता है (पृ. 216-217)। नित्याषोडशिकार्णव (4/47-57) में ही शक्ति बीज की साधनविधि, ध्यान का प्रकार और उसका फल वर्णित है। अर्थरत्नावलीकार (पृ. 217) ने बताया है कि इसकी उपासना से सभी प्रकार के विषयों से भी मुक्ति मिल जाती है। उक्त तीनों बीजों की व्यस्त रूप में और समस्त रूप में भी उपासना की जा सकती है। इस बीज के स्वरूप का स्पष्ट वर्णन परात्रीशिका शास्त्र के ‘तृतीयं ब्रह्म सुश्रोत्रि’ इस पद्य में किया गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

बुद्ध

सामान्य ज्ञान को धारण करने वाला प्राणी। ऐसे प्राणी में अपने स्वरूप के साक्षात्कार के लिए किसी भी प्रकार की तीव्र उत्कंठा नहीं होती जैसा कि प्रबुद्ध (देखिए) में हुआ करती है परंतु अबुद्ध (देखिए) की तरह इनका ज्ञान अतीव संकुचित भी नहीं होता है। इनमें इतना सा सामान्य ज्ञान होता है कि भक्ति और ज्ञान के माध्यम से वे अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकते हैं। प्रयास करने पर ये प्रबुद्ध की स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। जाग्रत् अवस्था में ठहरे जीवों का यह द्वितीय प्रकार होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बुद्धि

सांख्ययोग में बुद्धि शब्द दो अर्थों में प्रचलित है – (1) ज्ञान अर्थात् वृत्तिरूप ज्ञान तथा (2) बुद्धितत्व अर्थात् महत्तत्त्व (द्र. महत्तत्त्व)। यह ज्ञान निश्चयरूप (प्रमारूप) ज्ञान है। यह बुद्धि विषय-इन्द्रिय-संयोग से प्रकटित होती है। वाचस्पति ने बुद्धिरूपवृत्ति के आविर्भाव की प्रक्रिया के विषय में ऐसा कहा है – ‘विषय के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष होने पर बुद्धिस्थ आवरक तमोगुण का अभिभव होता है। इस अभिभव के कारण जो सत्वसमुद्रेक होता है वह ज्ञानरूप बुद्धि है’ (तत्त्वकौमुदी 5)। यह ज्ञान इन्द्रिय का धर्म नहीं है, किन्तु बुद्धि का धर्म है।
सांख्ययोग में कुछ ऐसे स्थल हैं, जहाँ महत्तत्त्व या चित्त आदि शब्दों का प्रयोग न कर बहुधा बुद्धि शब्द का ही प्रयोग किया जाता है, जैसे ‘पुरुष बुद्धि का प्रतिसंवेदी है’, ‘काल बुद्धिनिर्माण है’, ‘बुद्धिनिवृत्ति ही मोक्ष है’, ‘भोगापवर्ग बुद्धिकृत है’, ‘पुरुष बुद्धिबोधात्मा है’ आदि। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि जो बुद्धि पुरुष की विषयभूत होती है, वह बुद्धिमात्र नहीं; बल्कि पुरुषार्थवती बुद्धि है (पुरुषार्थ = विवेकख्याति एवं विषय-भोग)। महत्तत्त्वरूप बुद्धि प्रकृति का प्रथम विकार है। द्र. महान् शब्द।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

बुद्धि तत्त्व

सत्त्वगुण प्रधान महत्-तत्त्व। मूल प्रकृति में स्थित गुणों में विषमता के आ जाने पर सर्वप्रथम प्रकट होने वाला प्रमुख अंतःकरण। करण, ज्ञान तथा क्रिया के साधन को कहते हैं। बुद्धि तत्त्व प्रमेय को प्रकाशित करने के कारण तथा नाम रूप की कल्पना करने के कारण पुरुष के लिए क्रमशः ज्ञान और क्रिया का साधन बनता है। सुख, दुःख तथा मोह का सामान्य रूप से निश्चय करने वाला तत्त्व। (ई.प्र.वि.2, पृ. 205, 212; शिवसूत्रविमर्शिनी पृ. 44)। व्यवहार में समस्त आंतर और बाह्य विषयों का निश्चयात्मक अध्यवसाय कराने वाला पुरुष का मुख्य अंतःकरण बुद्धि तत्त्व कहलाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बुद्धि धारणा

देखिए ध्यान योग।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

बुद्धि प्रमाता

बुद्धि को ही अपना स्वरूप समझने वाला प्राणी। स्वप्न अवस्था में शरीर और बाह्य इंद्रियाँ सभी निष्क्रिय पड़े रहते हैं। फिर भी सारे उपादान, परित्याग आदि व्यापार तीव्रतर गति से चलते रहते हैं। उनको चलाने वाला तथा उनके चलाने के अभिमान को करने वाला सूक्ष्म शरीर रूपी प्राणी ही बुद्धिप्रमाता कहलाता है। यह प्रमाता अन्य सभी करणों के सूक्ष्म रूपों का उपयोग तो करता रहता है और प्राणवृत्तियों का भी उपयोग करता रहता है। फिर भी बुद्धिकृत संकल्प विकल्प आदि की ही इसमें प्रधानता रहती है, अतः इसे बुद्धि-प्रमाता कहते हैं। देहांतरों को यही प्रमाता धारण करता है और स्वर्ग नरक आदि लोकों की गति इसी की हुआ करती है। देवगण सभी बुद्धि प्रमाता ही होते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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