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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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मठिका

शैव दर्शन की भिन्न भिन्न शाखाओं को मठिका कहते हैं। वर्तमान युग में शैव दर्शन को तीन गुरुओं ने अभिनवतया चालू कर दिया। वे तीन गुरु भगवान श्रीकंठनाथ की प्रेरणा से ऊर्ध्व लोकों से इस भूलोक पर अवतार बनकर प्रकट हो गए। उनमें से अमर्दक नामक सिद्ध ने द्वैतदृष्टि से शैवदर्शन का उपदेश किया। उसकी मठिका को आमर्द मठिका या आमर्द संतति कहा गया है। दूसरी मठिका का प्रवर्तन श्रीनाथ ने किया। वह मठिका भेदाभेद प्रधान शैव मठिका थी। तीसरे गुरु त्र्यंबक ने अभेद दृष्टि प्रधान दो मठिकाओं को चलाया। उनमें से एक मठिका काश्मीर शैव दर्शन की त्रिक आगम प्रधान अद्वैत मठिका है, जिसे त्र्यंबक मठिका कहा गया है। इसे त्र्यंबक ने अपने पुत्र के द्वारा चलाया। चौथी मठिका को उसने अपनी कन्या के द्वारा चलाया। उसका अर्धत्र्यंबक मठिका नाम पड़ा। इन्हें शैव शास्त्र में साढ़े तीन मठिकाएँ कहा जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मणिपूर चक्र

स्वाधिष्ठान चक्र के ऊपर नाभि के मूल भाग में मेघ के समान श्याम वर्ण दस दलों से शोभित मणिपूर चक्र की स्थिति मानी जाती है। इन दलों में अर्धचन्द्र और बिन्दु से भूषित ड से लेकर फ पर्यन्त दस वर्ण सुशोभित हैं। इसके बीच में प्रातःकाल के अरुण वर्ण से सूर्य के समान कान्ति वाले त्रिकोणात्मक वैश्वानर मण्डल में रँ बीज का ध्यान किया जाता है। यह मण्डल तीन स्वस्तिक द्वारों से अलंकृत हैं। रँ बीज का वाहन मेष है, वर्ण रक्त है और इसका शरीर चतुर्भुज है। इस वह्नि बीज के देवता रुद्र है। इनका वर्ण सिन्दूर के समान है और इसकी अधिष्ठात्री योगिनी का नाम लकिनी है। (श्रीतत्वचिन्तामणि, षट्चक्रनिरूपण 6 प्र.)।
Darshana : शाक्त दर्शन

मण्टन / मन्दन

पाशुपत योग का एक अंग।

पाशुपत योग में मण्टन या मन्दन भी एक योग क्रिया है, जहाँ साधक को लंगड़ाकर चलने का अभिनय करना होता है, जैसे पैर में विरुपता हो। इस तरह के अभिनय से लोग उसका अपमान करेंगे और ऐसे अपमानित व निन्दित होते रहने पर वह उन निन्दकों के पुण्यों को प्राप्‍त करता रहेगा और उसके पाप उनमें संक्रमित होंगे। (पा.सू.कौ.भा.पृ.85)। अपमान से उसका वैराग्य बढ़ता है और लोक के प्रति राग बढ़ता नहीं, उससे चित निर्मल हो जाता है। (अपहतपादेन्द्रियस्येव गमन मन्दनम् – ग.का.टी.पृ.19)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मताचार

कुलचार से उत्कृष्ट और त्रिक आचार से एक सीढ़ी नीचे वाले योग मार्ग को काश्मीर शैव दर्शन में मताचार कहा गया है। इस आचार की साधना सर्वथा अभेद दृष्टि को अपनाकर ही की जाती थी। इसमें भी त्रिक आचार की तरह विधि निषेधों के लिए कोई मान्य स्थान नहीं। इस समय इस आचार के न तो कोई अनुयायी ही कहीं मिलते हैं और नही इसका कोई वाङ्मय ही मिलता है। काश्मीर शैव दर्शन के त्रिकाचार के ग्रंथों में इसके सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है। तंत्रालोक की टीका में जयरथ ने चौसठ भैरव आगमों को गिनते हुए जो श्रीकंठी संहिता के श्लोक उद्धृत किए हैं उन्में मताष्टक नाम के आठ भैरव आगमों के नाम दिए गए हैं। बहुत संभव है कि इन्हीं आठ आगमों द्वारा प्रतिपादित साधना मार्ग मताचार कहलाता है। (तं.आ.4-261 से 263; त. आत्मविलास खं. 1 पृ. 47)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मतिप्रसाद

बल का एक प्रकार।

पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार बुद्‍धि की पूर्ण अकलुषता (शुद्‍धता) मतिप्रसाद नामक बल होता है। यह बल का द्‍वितीय प्रकार है। बुद्‍धि का अकालुष्य दो तरह का कहा गया है- पर अकालुष्य तथा अपर अकालुष्य। पर अकालुष्य में कलुषता का सबीज उच्छेद होता है अर्थात् जहाँ भविष्य में भी कलुषता के उत्पन्‍न होने की संभावना भी नहीं रहती है। वहाँ पर अकलुषत्व होता है। परंतु जहाँ कालुष्य का बीज तो रहता है लेकिन वर्तमान में उत्‍पन्‍न कालुष्य का निरोध होता है वहाँ बीज उपस्थित होने के कारण कभी भी कलुषता का समावेश हो सकता, अतः वह अपर अकालुष्य कहलाता है। (ग.की.टी.पृ.6)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मंत्र

देखिए ‘अष्‍टावरण’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मंत्र

1. मनन और त्राण स्वभाव वाला वर्ण समुदाय। (स्वं.तं.उ.पटल 2, पृ. 39)। अर्थात् मनन करने वाले का त्राण करने वाला तथा मनन स्वभाव और त्राणकारी तत्त्व।
2. पारमेश्वरी शक्ति स्वरूप वर्ण समूह। (स्व.तं., पटल 2-63)।
3. चित् शक्ति का स्वभावस्वरूप वर्ण समूह जिसके सतत अभ्यास से साधक अपने शिवभाव में प्रवेश करता है। (शि.सू.वा.पृ. 31)।
4. चित् ही निरूपाधिक एवं अकालकलित शिव है। इस प्रकार के शिव को अपनी शक्तिस्वरूप आनंदरूपता का सतत परामर्श करते रहने के कारण या ऐसा स्वभाव होने के कारण मंत्र कहते हैं। (वही.पृ. 30)
5. आराध्य देवता को अपने ही शुद्ध स्वरूप में अनुभव करने के लिए तथा अभ्यास से अपनी उत्कृष्ट शुद्ध स्वरूपता में प्रवेश के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला वर्ण समुदाय। (स्व.वि.पृ. 80, 82, स्व. 26, 27)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंत्र (पंच)

देखिएपंच मंत्र।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंत्र प्राणी

देखिए विद्येश्वर प्राणी।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंत्र महश्वेर

सदाशिव तत्त्व में ठहरने वाले भेदाभेद दृष्टिकोण से युक्त प्रमाता। अकल (देखिए) प्रमाता की तरह ही मंत्र महेश्वर भी शुद्ध संवित् को ही अपना स्वरूप समझते हैं, परंतु इनमें प्रमेय भाव का अत्यंत धीमा सा आभास उभरने को होता है। इसी कारण ये प्राणी ‘अहम् इदम्’ अर्थात् मैं ही यह प्रमेय पदार्थ हूँ, मुझ से भिन्न कुछ नहीं – इस प्रकार का विमर्श करते हैं। इस विमर्श में ‘अहं’ अंश की ही प्रधानता रहती है तथा ‘इदं’ अंश का अत्यधिक धीमा सा आभास उन्मीलित होने को होता है। इस दशा में ‘इदं’ अंश का आभास अस्फुट रूप में ही चमकता रहता है। इस प्रकार का भेदाभेद दृष्टिकोण होने के कारण इन्हें शुद्धाशुद्ध प्राणी (देखिए) भी कहा जाता है। इन प्राणियों में अभी अंतःकरण, शरीर आदि का उदय नहीं हुआ होता है। इनका स्वरूप शुद्ध संवित् ही होता है। (ई.प्र.वि. 2 पृ. 192-3)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंत्र-अध्वन्

आणवोपाय की कालाध्वा नामक धारणा में आलंबन बनने वाला दूसरा तथा मध्यम उपाय। पद के सूक्ष्म रूप को मंत्र कहते हैं। मंत्र वर्णो के संयोग से बनता है। काल गणना ज्ञान क्षणों के आधार पर की जाती है। जितनी देर में एक क्षणिक ज्ञान ठहरता है उतने काल को क्षण कहते हैं। ज्ञान विमर्शात्मक होता है। विमर्श अभिलापात्मक होता है। अभिलाप शब्दों द्वारा होता है। शब्द तत्त्व के तीन प्रकार होते हैं। सूक्ष्मतर, (या पर), सूक्ष्म और स्थूल। उन्हीं को क्रम से वर्ण, यंत्र और पद कहते हैं। इस तरह से सूक्ष्म अभिलापमय शब्द ही जिस साधना में चित्त का आलंबन बनता है उस साधना को मंत्राध्वा कहते हैं। प्रमाणात्मक पदाध्वा परस्थिति हो जाने के पश्चात् क्षोभ को प्राप्त हुई प्रमाण स्वरूपता को शांत करने के लिए मंत्र अध्वा की धारणा का अभ्यास किया जाता है। साधक मंत्रात्मक समस्त प्रपंच को भावना के द्वारा अपने एक एक श्वास प्रश्वास में विलीन करता हुआ भावना द्वारा ही उसे व्याप्त कर लेता है। इससे उसे अपने परिपूर्ण और असीम शिवभाव का आणव समावेश भी हो जाता है तथा वह वर्णाध्वा के योग्य भी बन जाता है। (तं.सा., पृ. 47, 61, 112)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंत्रदीक्षा

देखिए ‘दीक्षा’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मंत्रवीर्य

महामंत्रवीर्य। पूर्ण अहंता परामर्श। (स्व.तं.उ. 1, पृ. 37)। परावाक् परामर्श। मंत्र अर्थात् अ से लेकर क्ष पर्यंत संपूर्ण शब्द राशि को स्फुटतया अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली शुद्ध संविद्रूपता के विमर्श से प्रादुर्भूत वीर्य अर्थात् सामर्थ्य या अपने शुद्ध स्वरूप का परामर्श। किसी आराध्य देवता को अपने स्वरूप में आत्मसात् करने के लिए प्रयुक्त किए गए बीज मंत्रों के सतत अभ्यास से देवता से समरसता प्राप्त कर लेने पर अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है, जिसे स्वरूप परामर्श कहते हैं। यही स्वरूप परामर्श मंत्रवीर्य कहलाता है। (शि.सू.वि.पृ. 21; शि.सू.वा.पृ. 27)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंत्रेश्वर

ईश्वर तत्त्व में रहने वाले भेदाभेद दृष्टि युक्त प्रमाता। मंत्रेश्वरों में सदासिव तत्त्व में रहने वाले मंत्रमहेश्वरों (देखिए) की अपेक्षा ‘इदं’ का अंश स्फुटतया चमकने लगता है। इसी कारण मंत्रेश्वरों का दृष्टिकोण ‘इदम् अहम्’ अर्थात् ‘यह प्रमेय पदार्थ मैं हूँ’ – इस प्रकार का हो जाता है। ये प्राणी अपने आपको शुद्ध संवित्स्वरूप ही समझते हैं। स्फुटतया आभासमान प्रमेय तत्त्व के प्रति उनका दृष्टिकोण अभेद का ही बना रहता है। इसमें आणवय आदि तीनों मल नहीं होते हैं परंतु इस दशा में प्रमेयता के आभास के स्फुट होने से इन्हें पूर्णतया शुद्ध भी नहीं कहा जा सकता है। इस कारण इन्हें भेदाभेद दृष्टिकोण वाले शुद्धाशुध प्राणी (देखिए) कहा जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2 पृ. 192, 197)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मत्स्योदरी

देखिए स्पंद।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंद-तीव्र शक्तिपात

परमेश्वर द्वारा की जाने वाली अग्रहात्मक अंतःप्रेरणा (देखिएशक्तिपात) का वह प्रकार, जिसके प्रभाव से प्राणी में अपने शुद्ध आत्मस्वरूप के प्रति उत्पन्न हुए संशयों का सर्वथा उच्छेद करने के लिए सर्वतत्त्ववेत्ता किसी उत्कृष्ट गुरू के पास जाने की तीव्र इच्छा उत्पन्न होती है। गुरु इस शक्तिपात के पात्र मुमुक्षु के सभी संशयों को केवल दृष्टि द्वारा ही या स्पर्श द्वारा या कुछ संवादों द्वारा तथा इस प्रकार के भिन्न-भिन्न दीक्षा क्रमों द्वारा शांत कर देता है। संशयों के दूर हो जाने पर ऐसा मुमुक्षु जीवन्मुक्त हो जाता है तथा देह त्याग देने पर अपनी शिवस्वरूपता को पुनः प्राप्त कर लेता है। (तं.सा.पृ. 122, 123; तन्त्रालोक 13-216 से 220, 225, 226)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंद-मंद शक्तिपात

परमेश्वर द्वारा की जाने वाली अनुग्रहात्मक अंतःप्रेरणा (देखिएशक्तिपात) का वह प्रकार, जिसके प्रभाव से प्राणी में अपनी शुद्ध प्रकाश स्वरूपता को पहचानने की अपेक्षा भिन्न भिन्न प्रकार के भोगों को भोगने की तीव्रतर इच्छा होती है। इस कारण ऐसा प्राणी देहपात के पश्चात् अपने अभिमत लोक में क्रम से सालोक्य, सामीप्य एवं सायुज्य नामक भिन्न भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त करके स्वेच्छित भिन्न भिन्न भोगों को बहुत समय तक भोगता रहता है। अंत में वहीं पर पुनः दीक्षा प्राप्त करके बार बार के अभ्यास से अपने आपको शुद्ध संवित् मानता हुआ शिवता को प्राप्त कर लेता है। (तं.आ. 13-245, 246; तन्त्रालोकवि. 8 पृ. 152-153)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मंद-मध्य शक्तिपात

परमेश्वर द्वारा की जाने वाली अग्रहात्मक अंतःप्रेरणा (देखिएशक्तिपात) का वह प्रकार, जिसके प्रभाव से प्राणी में अपने शिवभाव के प्रति सभी संशयों का ‘उच्छेद’ करके अपनी शिवता को प्राप्त करने की इच्छा तो बनी रहती है परंतु भोगों को भोगने की इच्छा अपेक्षाकृत तीव्र होती है। अतः इस जन्म में सद्गरु द्वारा बताए हुए योगाभ्यास के बल से किसी अन्य उत्कृष्ट तत्त्व या लोक में उपयुक्त देह धारण करके इच्छित भोगों का भोग करता है और अंत में वहाँ के उस दिव्य देह को भी त्याग देने पर अपनी शिवस्वरूपता को प्राप्त कर लेता है। (तं.सा.पृ. 123; तन्त्रालोक 13-243, 244)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मधुप्रतीक

इन्द्रिय-जय से होने वाली मनोजवित्व, विकरणभाव एवं प्रधानजप नामक तीन सिद्धियों का नाम मधुप्रतीक है (योगसू. 3/48)। वाचस्पति के अनुसार एक प्रकार की चित्तभूमि भी मधुप्रतीक कहलाती है (तत्त्ववैशारदी में ‘मधुमती’, मधुप्रतीका, विशोक और संस्कारशेष नामक चार चित्तभूमियाँ कही गई हैं; 1/1)। विज्ञानभिक्षु ने इस मत का खण्डन किया है (योगवार्त्तिक 3/48)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मधुभूमिक

चार प्रकार के योगियों में मधुभूमिक (मधु = मधुमती नामक भूमि है जिसकी, वह द्वितीय है), (द्र. व्यासभाष्य 3/51)। ये योगी ऋतंभरा नामक प्रज्ञा (द्र. योगसू. 1/48) से युक्त होते हैं। ऋतंभरा प्रज्ञा रूप भूमि ही मधुमती भूमि कहलाती है (द्र. विवरण टीका)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन
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