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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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रक्षा

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत ‘विभूति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

रजोगुण

सांख्योक्त प्रसिद्ध त्रिगुण में यह एक है – (अन्य दो हैं – सत्त्व और तमस्)। रजोगुण के लक्षण, स्वभाव आदि के विषय में गुण शब्द के अंतर्गत देखिए।
शब्दादि पाँच गुणों में रूप रजःप्रधान है; पृथ्वी आदि पाँच भूतों में तेजस्, पाँच तन्मात्रों में रूपतन्मात्र, पाँच ज्ञानेन्द्रियों में चक्षु, पाँच कर्मेन्द्रियों में पाद, तीन अन्तःकरणों में अहंकार रजःप्रधान हैं। जाग्रत् आदि अवस्थाओं में स्वप्नावस्था रजःप्रधान है, देवादि प्राणियों में मनुष्य रजःप्रधान है। इसी प्रकार विवेक-वैराग्य-निरोध में वैराग्य रजःप्रधान है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

रजोगुण

परमेश्वर की क्रियाशक्ति ही जब माया तत्त्व तथा उससे विकसित पाँच कंचुकों से अत्यधिक संकोच को प्राप्त करके जीव में प्रकट होती है तो उसे ही जीव का रजोगुण कहते हैं। संकुचित प्रमाता की चंचलता और अशांति ही उसका रजोगुण है। अपने स्वरूप की सत्ता के आनंद का अंशतः आभास होना तथा साथ ही अंशतः उसका आभास न होना जीव के लिए दुःख का कारण बनता है। यही दुःखात्मक स्वभाव उसका रजोगुण कहलाता है। (ई.प्र.वि., 4-1-4, 6)। इस तत्त्व के सामान्य स्वभाव सांख्य दर्शन के अनुसार ही माने गए हैं। परंतु इसे मुख्यतया पुरुष का स्वभाव माना गया है और इसके बीज की खोज परमेश्वर की क्रियाशक्ति के भीतर ढूँढ निकाली है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

रश्मिचक्र

देखिए शक्ति चक्र, योनि वर्ग।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

राग

पाँच क्लेशों में राग एक है (द्र. योगसू. 2/3,7)। सुखसाधक पदार्थ में (उसके स्मृत या दृश्यमान होने पर) या सुख में सुख के अनुभवकारी प्राणी का सुखानुस्मृति-पूर्वक जो गर्ध (= आकांक्षा, सदैव चाहते रहना), तृष्णा (अप्राप्त विषय को पाने की इच्छा) या लोभ (= लोलुपता = विषयप्राप्ति होने पर भी पाने की इच्छा) होता है, वह राग है। दूसरे शब्दों में, सुखवासना का अनुस्मरणपूर्वक तदनुकूल जो प्रवृत्ति या चित्तावस्था होती है, वह राग है। यह ज्ञातव्य है कि सुख आदि स्मर्यमाण है तो राग सुखानुस्मृतिपूर्वक होता है; सुख यदि अनुभूयमान है तो सुखानुस्मृति की आवश्यकता नहीं होती।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

राग-तत्त्व

माया तत्त्व से विकास को प्राप्त हुए पाँच कंचुक तत्त्वों में से तीसरा कंचुक तत्त्व। परिपूर्ण ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का संकोच हो जाने पर जब जीव अल्पज्ञ और अल्पकर्ता बन जाता है तो वह किसी किसी विशेष वस्तु को ही गुणाढ्य समझता है, सभी को नहीं। उस बहुतर गुणयुक्त माने गए वस्तु में ही उसे जानने और करने की प्रवृत्ति हो जाती है, अन्य वस्तुओं में नहीं। इसे अभिष्वंग कहा गया है। इसका लक्षण ‘गुणारोपणमयो रागः’ ऐसा कहा गया है। वैराग्य का विरोधी भाव जो राग होता है, वह बुद्धि का एक धर्म होता है। जबकि यह अभिष्वंग रूपी रागतत्त्व पुरुष का एक अंतरंग स्वभाव होता है। किसी प्राणी को वैराग्य ही के प्रति राग होता है, क्योंकि ऐसा प्राणी वैराग्य को ही अतिगुणवान मानता है। इस तरह से राग, द्वेष, वैराग्य, अवैराग्य आदि और सभी इष्ट या अनिष्ट भावों या वस्तुओं के प्रति आसक्ति या अनासक्ति के मूल में जो तत्त्व कार्य करता है उसे राग तत्त्व कहते हैं। (शि.सू.वा.पृ. 44, ई.प्र.वि. 2, पृ. 209, तं.सा.पृ. 82)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

राजयोग

यद्यपि प्राचीन योगग्रन्थों में राजयोग शब्द नहीं मिलता, तथापि अर्वाचीन ग्रन्थों में (हठयोग, नाथयोग आदि के ग्रन्थों में) यह शब्द योगविशेष के लिए बहुशः प्रयुक्त हुआ है। केवल राजयोगपरक कोई ग्रन्थ प्रचलित नहीं है। राजयोगपरक कुछ ग्रन्थों के उद्धरण मिलते हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि कभी इस योग पर स्वतन्त्र ग्रन्थ भी लिखे गए थे। शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध एक राजयोगभाष्य नामक ग्रन्थ प्रचलित है, जो न शंकराचार्यकृत है और न ही किसी ग्रन्थ में यह ग्रन्थ स्मृत या उद्धृत हुआ है।
विभिन्न ग्रन्थों में राजयोग के स्वरूप एवं साधन पर जो कहा गया है, वह इस प्रकार है – राजयोग का अर्थ है – योगों का राजा (अर्थात् श्रेष्ठयोग)। इस शब्द की अन्य व्याख्या भी हैं। योग चार हैं – मन्त्र, हठ, लय एवं राजा (द्र. मन्त्रयोग आदि शब्द)। ये चार उत्तरोत्तर बढ़कर हैं अर्थात् राजयोग सर्वोच्च योग है। हठयोग के ग्रन्थों में स्पष्टतया हठयोग को राजयोग का साधन ही माना गया है।
यह राजयोग योगसूत्रोक्त निर्जीवसमाधि अथवा असंप्रज्ञात योग है – यह स्पष्ट रूप से योगचिन्तामणि तथा हठयोगप्रदीपिका की ज्योत्स्नाटीका में कहा गया है। एक मत यह भी है कि रजः (अर्थात् शक्ति) तथा रेतः (अर्थात् शिव) का योग इस मार्ग से होता है। इसी प्रकार यह भी कहीं-कहीं कहा गया है कि राजयोग के अभ्यास से जीवात्मा सब उपाधियों का त्याग करके परमात्मा के साथ एकीभूत हो जाता है। राजयोग के साधन शंकराचार्य कृत अपरोक्षानुभूति, योगतारावली तथा वाक्यसुधावली में विशेषतः बताए गए हैं। उन्मनीमुद्रा, भ्रूमध्यदृष्टि, नादानुसन्धान आदि इस मार्ग के प्रधान साधन हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

रुद्र

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपतसूत्र के कौडिन्यभाष्य के अनुसार ईश्‍वर इस उत्पन्‍न जगत को भयमुक्‍त कर देता है अतः रुद्र कहलाता है। रुद्र शब्द ‘रूत’ (भय) तथा ‘द्रावण’ (संयोजन) शब्दों से बना है। अतः जो इस स्थूल जगत में विचित्र भयों का संयोजन करता है, उसे रुद्र नाम से अभिहित किया गया है। सांसारिक भय की सृष्‍टि भी तो रुद्र ही करता है। वैसे द्रावण का अर्थ विनाश करना भी होता है। रुद्र साधकों को भयमुक्‍त करता हुआ उनके भय को नष्‍ट कर देता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.57)।

भासर्वज्ञ ने रूद्र को देश का एक प्रकार भी माना है। पाशुपत साधक का साधना की अन्तिम पंचमावस्था में रूद्र में निवास होता है। अर्थात् योग की पर दशा में इस स्थूल शरीर के छूट जाने पर योगी का रुद्र के साथ ऐकात्म्य होता है। अतः रूद्र ही उसका देश होता है। (ग.का.टी.पृ. 17)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

रुद्र

1. प्रमेय जगत को प्रमाता के साथ अभेद भाव के द्वारा उसी में उसे विलीन करने वाला परमेश्वर का कारण शरीर।
2. निचले कार्य तत्त्वों को ऊपर वाले कारण तत्त्वों में विलीन करने वाले संहार कारक उत्कृष्टतर देवगण।
3. जीव के अपनी शुद्ध चैतन्य स्वरूपता में प्रवेश करने के लिए उसके मन की सभी पाशविक वृत्तियों को शांत करने वाला और इस प्रकार स्वरूप साक्षात्कार में उसका सहायक बनने वाला परमशिव का पर रूप (स्व.तं.उ.पटल 1, पृ. 36)।
4. नीलकंठ शिव। (वही, पटल 2 – 79, 80)।
5. पशुपति। (स्व.तं.पटल 10-902)।
रुद्र (अनेक)
ज्येष्ठा, रौद्री तथा वामा नामक तीन शक्तियों के वैभव से युक्त विविध रुद्र। ये रुद्र माया तत्त्व से लेकर पृथ्वी तत्त्व तक के सभी तत्त्वों में इन तीन शक्तियों सहित शासन करते हैं तथा इन तत्त्वों में जीवों के स्वरूप दर्शनविषयासक्ति तथा अधःपतन के व्यवहारों को चलाते हुए इन तत्त्वों का संहार भी करते रहते हैं। (वि.पं. 4 पृ. 57, 63)।
रुद्र (कालाग्नि)
पृथ्वी तत्त्व को पूर्णतया व्याप्त करके उसी के मल में ठहरने वाला तथा यहाँ के सभी भुवनों का संहार करने वाला रुद्र। (वही पटल 10, पृ. 2, 4)।
रुद्र (प्रमाता)
सभी मुक्तशिव।
रुद्र (शास्त्र प्रवक्ता)
भेदाभेद प्रधान अठारह शैव आगमों का उपदेश देने वाले। (मा.वि.वा. 1-391, 392)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

रुद्रशक्ति समावेश

जिस प्राणी पर परमेश्वर मध्य तीव्र प्रकार का शक्तिपात करता है उसके भीतर रुद्र शक्ति का समावेश हो जाता है। उस समावेश के पाँच लक्षण माने गए हैं। –
1. उसमें शिव के प्रति अविचल भक्ति उमड़ आती है।
2. उसे मंत्र सिद्धि हो जाती है।
3. उसे सभी तत्त्वों का वशीकार हो जाता है।
4. उसके समस्त प्रारब्ध कार्य पूरे हो जाते हैं।
5. उसे समस्त शास्त्रों के तत्त्व के ज्ञान का उदय हो जाता है और उसके मुख से सालंकार तथा सुमनोहर कविता का प्रवाह चल पड़ता है। (मा.वि.तं. 2-13 से 16)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

रुद्रसामीप्य

रुद्र की समीपता।

पाशुपत दर्शन के अनुसार जीवन का एक परम लक्ष्य रुद्र की समीपता प्राप्‍त करना है और पाशुपत साधक को विविध प्रकार की विधियों का आचरण करते हुए रुद्र सामीप्य अर्थात् रुद्र की सन्‍निधि प्राप्‍त करनी होती है। यह मोक्ष की एक दशा होती है। इस सामीप्यमोक्ष से उत्कृष्‍टतर दशा सायुज्यमोक्ष की होती है। सामीप्य मोक्ष में युक्‍त साधक परमेश्‍वर की सन्‍निधि का अनुभव प्रतिक्षण करता रहता है और उससे उसे अपूर्व आनन्द की अनुभूति हुआ करती है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

रुद्रसायुज्य

मुक्‍ति की एक ऊँची अवस्था।

पाशुपत दर्शन में मुक्‍ति का परमस्वरूप रुद्रसायुज्य है। जहाँ जीवात्मा परमात्मा में तन्मय हो जाता है। जीवात्मा का रूद्र के साथ साक्षात् योग हो जाता है। परंतु जीवात्मा का पूर्ण विलोप नहीं होता है। वह अपनी सत्‍ता को बनाए रखते हुए अपने आपको रुद्र से अभिन्‍न मानता है। यह भेदाभेद की उत्कृष्‍ट अवस्था होती है। पाशुपत मत में मुक्‍त आत्मा रूद्र के साथ ऐकात्म्य प्राप्‍त करने के बाद भी अपनी व्यक्‍तिगत सत्‍ता को बनाए रखता है। क्योंकि पाशुपत मत में मोक्ष केवल ऐसा दुःखांत नहीं है जहाँ केवल दुःखों की निवृत्‍ति हो या जहाँ पर जीवात्मा की सत्‍ता ही विलुप्‍त हो जाए, अपितु दुःखांत के उपरांत मुक्‍तात्मा में सिद्‍धियों का समावेश हो जाता है, वह शिवतुल्य बन जाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 131)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

रुद्रस्मृति

रुद्र का बारम्बार स्मरण करना।

पाशुपत योग के अनुसार साधक को सदा अर्थात् बिना किसी बाधा के रुद्र (परमकारणभूत ईश्‍वर) का स्मरण करना होता है, जिससे वह रुद्र सामीप्य, रुद्रसायुज्य आदि की प्राप्‍ति कर लेता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.122)। सदारुद्रस्मृति पाशुपत साधना के उपायों का एक प्रकार है। यह रुद्रस्मृति पाशुपत योग का एक मुख्य प्रकार होता है। (ग.का.टी.पृ.21)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

रुद्राक्ष

देखिए ‘अष्‍टावरण’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

रूप

मालिनीविजय (2/36-45) तथा तन्त्रालोक (10/227-287) में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत अवस्थाओं का निरूपण पिण्ड, पद, रूप, रूपातीत तथा महाप्रचय अथवा सततोदित अवस्था के रूप में किया गया है। यहाँ मन्त्रेश को रूपस्थ बताया गया है और उसके उदित, विपुल, शान्त और सुप्रसन्न नामक चार भेद किये गये हैं। मालिनीविजय में कुलचक्र की व्याप्ति (19/30-48) और शिवज्ञान के प्रसंग (20/1-7, 18-26) में इस विषय का विवरण मिलता है। जैन तन्त्र ग्रन्थ ज्ञानार्णव के 36वें प्रकरण में रूपस्थ ध्यान वर्णित है। इसमें सर्वज्ञ वीतराग के ध्यान की विधि का निरूपण है। योगिनीहृदय (1/42) में वर्णित है कि रूप में जालन्धर पीठ का निवास है। दीपिकाकार ने रूप का अर्थ बिन्दु किया है और इसकी स्थिति भ्रूमध्य में बताई है। वहीं अन्यत्र (3/94) इसको विध्नरूप माना है। इसीलिये 3/137 की व्याख्या में अमृतानन्द द्वारा उद्धृत एक प्रामाणिक वचन में बताया गया है कि रूप से मुक्त होने पर ही वास्तविक मुक्ति मिलती है। कौलज्ञाननिर्णय में एक स्थान पर (पृ. 4 ) रूप का अर्थ वर्ण तथा अन्यत्र (पृ. 90) कलाविष्ट जीव किया है। यहीं (पृ. 53) यह भी बताया है कि इसके आठ भेद होते हैं। आणव उपाय के प्रसंग में भी इस शब्द की चर्चा आ चुकी है।
Darshana : शाक्त दर्शन

रूपस्थ

1. सुषुप्ति दशा में स्थित प्रमाता। योगियों की परंपरा में सुषुप्ति को भी रूपस्थ ही कहते हैं।
2. प्रमाता की सौषुप्तम दशा। संसार की प्रत्येक वस्तु को उसका नील, पीत आदि रूप स्वयं प्रमाता ही अपनी कल्पना के द्वारा देता है। अतः प्रमाता को रूप कहते हैं। सुषुप्ति में प्रमाता अपने आपको प्रमेय एवं प्रमाण से खींचकर अपने ही स्वरूप में ठहराता है। अतः सौषुप्त प्रमाता को रूपस्थ कहते हैं। (तं.आ. 10-261)। इससे योगी सर्वव्यापकता को प्राप्त करता है। (मा.वि.तं. 2-37)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

रूपातीत

मालिनीविजय (2/36-45) तथा तन्त्रालोक (10/227-287) में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत अवस्थाओं का निरूपण पिण्ड, पद, रूप, रूपातीत तथा महाप्रचय अथवा सततोदित अवस्था के रूप में किया गया है। यहाँ परा शक्ति को रूपातीत बताया है, जो कि क्रियाशील होते हुए भी निर्विकार मानी गई है। मालिनीविजय में कुलचक्र की व्याप्ति (19/30-48) और शिवज्ञान के प्रसंग (20/1-7, 18-26) में भी इस विषय का विवरण मिलता है। जैन तन्त्र ग्रन्थ ज्ञानार्णव के 37वें प्रकरण में रूपातीत ध्यानविधि वर्णित है। इसको वहाँ निष्कल ध्यान बताया गया है। योगिनीहृदय (1/42) में वर्णित है कि रूपातीत में ओड्याण पीठ की स्थिति है। दीपिकाकार ने रूपातीत का अर्थ चिन्मय दशा किया है और इसकी स्थिति ब्रह्मरन्ध्र में बताई है। वहीं अन्यत्र (3/94) में ग्रन्थि रूप होने से इसको भी विघ्नरूप ही माना है। इसीलिये 3/137 की व्याख्या में अमृतानन्द द्वारा उद्धृत एक प्रामाणिक वचन में बताया गया है कि इससे मुक्त होने पर ही वास्तविक मुक्ति मिलती है। कौलज्ञाननिर्णय में एक स्थान पर (पृ. 4) रूपातीत का अर्थ लक्ष्य तथा अन्यत्र (पृ. 90) काष्ठ योगी किया है। वहीं (पृ. 53) यह भी बताया है कि इसके आठ भेद होते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

रूपातीत

तुर्यदशा। सभी बाह्य रूपों से उत्तीर्ण तथा परिपूर्ण स्वरूप की ओर उन्मुखता को प्राप्त हुई स्थिति। रूपस्थ (देखिए) योगी सर्वव्यापकता को तो प्राप्त कर लेता है परंतु अभी भी वह विश्वोन्मुख होने के कारण परिपूर्णता को प्राप्त नहीं हुआ होता है। जब वह विश्वोन्मुखता को छोड़कर केवल अपनी परिपूर्ण संवित् में ही स्थिति प्राप्त करने के प्रति उन्मुख होता है तो उसकी उस स्थिति को रूपातीत कहते हैं। इस अवस्था में पहुँचने पर योगी संपूर्ण विश्व को अपनी शुद्ध संवित् के ही रूप में देखने लगता है। (तं.आ., 10-273, 274) तुर्या दशा को भी योगियों की परंपरा में रूपातीत कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

रौद्र आगम

भेदाभेद दृष्टि को लेकर के शैवी सिद्धांतों और शैवयोग की प्रक्रियाओं को प्रतिपादित करने के लिए रुद्रों द्वारा कहे गए भेदाभेद प्रधान अठारह शैव आगम। (मा.वि.वा. 1-390 से 92)। ये आगम दक्षिण भारत में काफी प्रचलित हैं। इनमें से अनेकों आगम अभी तक मिल रहे हैं। दक्षिण भारत में एक शिलालेख में इनके नाम खुदे हुए हैं। तंत्रालोक की टीका में जयरथ ने श्रीकंठी संहिता के वाक्यों को उद्धृत करते हुए इनके नाम गिनाए हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

रौद्री

जप में उपयुक्‍त होने वाली रुद्र संबंधी ऋचा रौद्री कहलाती है। यह मंत्र जप रुद्र-सान्‍निध्य की प्राप्‍ति कर लेने में सहायक बनता है। इस जप में रुद्र का ध्यान किया जाता है। अतः जप की यह ऋचा रौद्री कहलाती है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 39,124)। इस ऋचा का छंद गायत्र होता है। अतः इसे रौद्री गायत्री कहते हैं। वह रौद्री गायत्री यह है-
(तत् पुरुषाय विद्‍महे।
महादेवाय धीमहि।
तन्‍नो रूद्र: प्रचोदयात्)
(पा.सू. 4 22, 23, 24)
सायं संध्या को रौद्री सन्ध्या कहते हैं (ग.का.टी.पृ. 18)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन
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