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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अंग -लिंग-ऐक्य-

देखिए ‘लिंगांग-सामरस्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अंगमेजयत्व

अंगमेजयत्व का अर्थ है – अंगकंपनकारी का भाव अर्थात् अंग का कंपन। जब तक विक्षेप रहता है तब तक यह अंगकंपन विद्यमान रहता है (द्र. योगसूत्र 1/30)। एकाग्र होकर परिदर्शन करने पर यह कंपन सभी को अनुभूत होगा। यह अंगमेजयत्व अथवा अंगमेजय आसन-प्राणायाम का अभ्यास करने के काल में विशेषतः दिखाई देता है। यह कंपन शरीरगत राजस-तामस भाव के प्राधान्य का ज्ञापक है और धीरे-धीरे इसका दूरीकरण होता रहता है। अंगमेजय के नष्ट हुए बिना आसन की सिद्धि नहीं होती। ‘प्रयत्नशैथिल्य’ के अभ्यास से इस कंपन -रूप अस्थैर्य का नाश होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अग्निषोमात्मिका

परमेश्वर की, सृष्टि, स्थिति, संहार आदि करने वाली पराशक्ति। परमेश्वर की वह अभिन्न शक्ति जिसमें सदाशिव, ईश्वर आदि से लेकर पृथ्वीपर्यंत सभी तत्त्वों को अपने में संहृत करने की अपूर्व सामर्थ्य है तथा जो संहार किए हुए सभी तत्त्वों को स्वेच्छा से पुनः सृष्ट करने के सामर्थ्य से युक्त भी है। समस्त प्रपंच को भस्मीभूत करने की तथा भस्मीभूत हुए समस्त प्रपंच को पुनः चित्र विचित्र रूपों में प्रकट करने की अलौकिक सामर्थ्य के ही कारण पराशक्ति को अग्निषोमात्मिका कहा जाता है। (शि.सू.वि., पृ. 19)। इसमें अग्नि संहार का तथा सोम सृष्टि का द्योतक है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अघाश्लेष विनाश

नये पाप का उत्पन्न न होना और पूर्व में उत्पन्न हुए पाप का विनाश हो जाना अघाश्लेष विनाश है। मर्यादा भक्तिमार्ग में भक्त को ब्रह्म ज्ञान हो जाने पर भविष्य में पाप का अश्लेष (अनुत्पाद) होता है, तथा पूर्वार्जित पाप का विनाश हो जाता है। इसी प्रकार नये पुण्य का उत्पन्न न होना तथा पूर्व पुण्य का विनाश होना पुण्याश्लेष विनाश है (भा.सु.चौ.पृ. 1285)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अघोर

ईश्‍वर का नामांतर।
पाशुपत दर्शन में भगवान महेश्‍वर को कई रूपों वाला कहा गया है। उसके विलक्षण व नाना रूपों में एक रूप अघोर है। अघोर, जो घोर अर्थात् भयंकर नहीं है, अपितु जो शांत, शिवमय एवं अनुग्रह कारक रूप है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 89)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अघोर

स्वच्छंदनाथ (देखिए) के पाँच मंत्रात्मक स्वरूपों में से पाँचवाँ स्वरूप। इस रूप में अवतरित होकर शिव भेदात्मक शैव शास्त्र का उपदेश करता है। प्रक्रिया की दृष्टि से साधना के क्रम में विद्या तत्त्व को परमेश्वर की क्रिया शक्ति की अभिव्यक्ति माना गया है। इसके अनुसार अघोर को विद्या तत्त्व तथा क्रिया शक्ति का सशरीर रूप माना गया है। (तं. आत्मविलास, 7-18)। स्वच्छंदनाथ के पाँच मुखों में से दक्षिणाभिमुख चेहरे का नाम भी अघोर है। अघोर मुख का वर्ण कृष्ण माना गया है। यह क्रिया शक्ति प्रधान तथा ब्रह्मस्थानीय जाग्रत अवस्था है। (मा. वि. वा., 1-347 से 352, 358 से 368)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अघोर शक्तियाँ

ज्येष्ठा शक्ति के व्यूहात्मक अनंत शक्ति समूहों को अघोर शक्तियाँ कहा जाता है। संसार के जीवों की संख्या के अनुसार ही ज्येष्ठा शक्ति भी असंख्य रूपों को धारण करती है। यह शक्ति समूह जीवों को शिवभाव पर पहुँचाने के लिए उन्हें मोक्षमार्ग के प्रति प्रवृत्त करता रहता है। इसी शक्ति समूह के प्रभाव से जीवों में सद्गुरू के पास जाने की तथा मोक्ष शास्त्रों को पढ़ने की इच्छा होती है। इन्हें परा शक्तियाँ भी कहा जाता है। (मा.वि.तं., 3-33)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अघोरत्व

अघोर रूप भगवान शिव का अपने कल्याणकारी नाना विश्‍वमय रूपों पर अधिष्‍ठातृत्व ही उसका अघोरत्व है, अर्थात् ईश्‍वर जिस शक्‍ति से भिन्‍न – भिन्‍न शिवमय रूपों में प्रकट होकर विश्‍व का कल्याण करता है, उसकी शक्‍ति का वह रूप अघोरत्व कहलाता है। (ग. का. टी. पृ. 11)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अघोरेश

देखिए अनंतनाथ।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अज

पाशुपत योगी का लक्षण।
पाशुपत दर्शन के अनुसार असंग योगी अथवा युक्‍त साधक अज (अजन्मा) होता है। यहाँ पर अज से मातृगर्भ से जन्म न लेने से तात्पर्य नहीं है। वह तो साधक क्या असाधक सभी ने लिया ही होता है; अपितु जैसा कि ‘गणकारिका टीका’ में कहा गया है कि युक्‍त साधक की चित्‍तवृत्‍तियों का प्रादुर्भाव किसी भी विषय के प्रति नहीं होता है। उसके चित्‍त में विषयोन्मुखी वृत्‍ति का जन्म नहीं होता है, अर्थात् उसका चित्‍त समस्त बाह्य वृत्‍तियों से शून्य हो जाता है। (ग. का. टी. पृ. 16)। ऐसी चित्‍तवृत्‍तियों से शून्य साधक अज कहलाता है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अजत्व

युक्‍त साधक की अज की अवस्था में पहुँचने की स्थिति अजत्व कहलाती है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अजपा जप

प्राण की उच्छ्वास दशा में स्वाभाविक रूप से ‘हं’ का तथा निश्वास दशा में ‘सः’ का उच्चारण होता है। इस प्रकार प्राण की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया में ‘हंसः सो हं’ इस अजपा गायत्री का स्वाभाविक रूप से दिन-रात अनवरत जप चलता रहता है। इसी को अजपा जप कहा जाता है। इसको अजपा इसलिये कहा जाता है कि यद्यपि अपरा अवस्था में इसके वाच्य वर्ण हकार और सकार का उच्चारण स्पष्ट होता है, किन्तु जब परा देवी इसको अपने में समेटे हुए अपने बाह्य स्वरूप का संवरण करती है, उस समय हकार के मस्तक पर स्थित बिन्दु रूप अनुस्वार का केवल बिन्दु के रूप में जप नहीं किया जा सकता। इस तरह से यह प्राण वृत्ति जब बाहर निकलती है, तब सकार के आगे विसर्ग के रूप में स्थित दो बिंदुओं का बिना अकार के उच्चारण नहीं हो सकता। इसीलिये ‘हंसः’ इस मंत्र की अजपा गायत्री के रूप में ख्याति है।
तन्त्रालोक (3/170) के व्याख्याकार जयरथ ने सकार और हकार के उच्चारण से उत्पन्न जप को सहज, अर्थात् अकृत्रिम (स्वाभाविक) बताया है। यहाँ क्षपा (रात्रि) और दिन से क्रमशः अपान और प्राण का निर्देश किया गया है। वीरावली तंत्र में भी क्षपा और दिन शब्द से इन्हीं का ग्रहण किया गया है। श्रृति और स्मृति ग्रंथों में दिन और रात्रि का, प्राण और अपान का यमराज के कुत्तों के रूप में वर्ण है। यमराज के ये दूत पकड़ने न पायें, इसीलिये साधक योगी अजपा के अभ्यास के द्वारा प्राण और अपान की गति पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है और मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।
दिन-रात, प्राण और अपान की इस निरंतर गतिशीलता के कारण हंस मंत्र का एक अहोरात्र में 21600 बार जप पूरा हो जाता है। शरीर से प्राण की बहिर्मुखी गति के पूरा होने के बाद और अपान के पुनः शरीर में प्रवेश न करने तक इस जप की विधि पूरी हो जाती है। प्राण जब निकलते हैं, उस समय भी इस अजपा जप के साथ अपनी तन्मयता को बनाये रखना अनेक जन्मों में अर्जित अतिशय तत्त्वशुद्धि के कारण ही संभव हो सकता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अजपागायत्री

यह माना जाता है कि दिन-रात में जीव 21600 बार श्वास-प्रश्वास लेता है। प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में जप करने पर 21600 बार जप होता है। प्रश्वास में ‘हं’ और श्वास में स: – इस प्रकार दो अक्षरों का जप अजपा-गायत्री जप कहलाता है। यह ‘हंसमन्त्र’ कहलाता है। विपरीतक्रम से ‘सः हम्’ रूप दो अक्षरों का जप भी श्वास-प्रश्वास से करने की परम्परा है। यह ‘सोहम्’ मन्त्र (अर्थात् सः+अहम्=सोहम् -मैं वही हूँ) कहलाता है। अहोरात्र इस जपक्रिया में मन को संलग्न रखने से चित्त निरोधाभिमुख हो जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अजर

पाशुपत साधक का लक्षण।
पाशुपत दर्शन के अनुसार युक्‍त योगी को जरा अर्थात् वृद्‍धावस्था स्पर्श नहीं करती है। वृद्‍धावस्था के साथ – साथ होने वाले शारीरिक परिवर्तन (जैसे इंद्रियों की शक्‍तिहीनता आदि) पाशुपत योगी को नहीं होते हैं; क्योंकि उसने इंद्रियों पर विजय प्राप्‍त कर ली होती है। वह इंद्रियों की सहायता के बिना ही अपनी स्वतंत्र इच्छा के अनुसार भिन्‍न – भिन्‍न रूपों को धारण करने में समर्थ होता है। अत : इंद्रियों के अधिष्‍ठानों की शिथिलता या आयु का क्रमिक क्षय उस योगी के लिए बाधक नहीं बनते हैं। अतएव पाशुपत योगी को अजर कहा गया है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अजरत्व

पाशुपत सिद्‍धि का लक्षण।
शरीर व इंद्रियों के परिवर्तन से प्रभावित न होना अर्थात् जराभाव के प्रभाव से पूर्णरूपेण मुक्‍तता की अवस्था अजरत्व कहलाती है। (ग. का. टी. 10)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अज्ञान

संकुचित ज्ञान। अपने आपको शुद्ध संवित् रूप की अपेक्षा शून्य, प्राण, बुद्धि, देह आदि जड़ पदार्थ तथा अपने में सर्वशक्तिमत्त्व की अपेक्षा अपने आपको अल्पज्ञता एवं अल्पकर्तृत्व वाला समझना अज्ञान कहलाता है। इस प्रकार से अज्ञान ज्ञान के अभाव को नहीं, अपितु ज्ञान के संकोच को कहते हैं। अज्ञान दो प्रकार का होता है :- पौरुष एवं बौद्ध (देखिए)। (तन्त्रालोक, 1-25, 26, 36)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अज्ञान हानि

विशुद्‍धि का एक प्रकार।
पाशुपत साधक के सभी मलों की हानि अर्थात् समाप्‍ति जब होती है तब वह अज्ञान हानि नामक विशुद्‍धि को प्राप्‍त कर लेता है। योग साधना से पूर्व वह अपने आप को अनीश्‍वर अर्थात् अल्पशक्‍ति, अल्पज्ञ, अल्पकर्ता आदि समझता रहता है। यही उसका अज्ञान कहलाता है। परंतु योग के परिपक्‍व हो जाने पर वह अपने को दिव्याति दिव्य ऐश्‍वर्य से युक्‍त जब समझने लगता है तो उसके पूर्वोक्‍त अज्ञान का नाश हो जाता है। यही उसकी अज्ञान हानि कहलाती है। (ग. का. टी. पृ. 7)
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अंड

पृथ्वी इत्यादि पाँच भूतों से मंडित शक्ति तत्त्व से नीचे अनंत वैचित्र्य युक्त समस्त प्रपंच को ही अंड कहते हैं। एक एक व्यक्ति को पिंड कहते हैं। वस्तुतः अंड और पिंड में कोई भेद नहीं माना गया है। (महार्थमंजरी परिमल, पृ. 80)। काश्मीर शैव में अंड को भिन्न भिन्न तत्त्वों एवं भुवनों के विभाग का कारण माना गया है। सभी तत्त्वों और भुवनों को चार अंडों में विभक्त किया गया है। इस तरह से चार अंड प्रपंच के चार क्षेत्र हैं। चार अंड इस प्रकार हैं – पार्थिव, प्राकृत, मायीय तथा शाक्त। शक्ति अपने पूर्ण विश्वमय रूप में जब विकसित होती है तो उसका विश्वोत्तीर्ण रूप छिप जाता है। इस प्रकार से चार स्तरों में बँटा हुआ यह प्रपंच पराशक्ति का आवरण है। आवरण रूप होते हुए प्रपंच के चार स्तरों को चार अंड कहते हैं। चार अंडों का समीकरण प्रतिष्ठा आदि चार कलाओं से किया जाता है। ठोस पृथ्वी स्थूलतम अंड है। जल से मूल प्रकृति तक का आवरण सूक्ष्म अंड है। माया और कंचुक सूक्ष्मतर अंड है और सूक्ष्मतम अंड उससे ऊपर सदाशिवांत शुद्ध तत्त्वों वाला अंड है। इसलिए अंड को आवरण भी कहा गया है। (तन्त्र सार , पृ. 110)।
चतुष्टय → पार्थिव अंड, प्राकृत अंड, मायीय अंड तथा शाक्त अंड।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अणु

योगसूत्र-व्यासभाष्य (1/45) में ‘पार्थिव अणु’ शब्द आया है। व्याख्याकारों ने अणु को परमाणु कहा है जो पार्थिव, जलीय, आग्नेय, वायवीय एवं आकाशीय भेद से पाँच प्रकार का है; द्र. परमाणु शब्द। इसी प्रकार 1/43 भाष्य में ‘अणुप्रचय’ शब्द है, जहाँ अणु का अर्थ परमाणु है (द्र. टीकाएँ)।
‘अत्यन्त अल्प परिमाण से युक्त’ अर्थ में भी अणु शब्द विशेषण के रूप में योगग्रन्थों में प्रयुक्त हुआ है। ब्रह्माण्ड को प्रधान का ‘अणु-अवयव’ कहा गया है (व्यासभाष्य 3/26)। यहाँ अणु उपर्युक्त अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। इसी प्रकार सूक्ष्म या परम सूक्ष्म या दुरधिगम के अर्थ में भी विशेषण अणु शब्द का प्रयोग मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अणु

मायीय प्रमाता। संकुचित प्रमाता। अपने शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण अहंभाव का सतत् परामर्श करने में असमर्थ होने के कारण अपने आप को सदैव संकुचित ही समझने वाला जीव। जीव अपने आप को सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान् न समझता हुआ अपने को सीमित ही समझता रहता है, इसी कारण इसे अणु कहा जाता है। (महार्थमंजरी परिमल, पृ. 31, तन्त्र सार , पृ. 6)। इसके अन्य नाम हैं – पशु युमान्, पुरुष इत्यादि।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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