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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अणु सदाशिव

अधिकार अवस्थापन्न शिव सकल है। वे बिन्दु से अवतीर्ण और अणु सदाशिवों से आवृत हैं। यह सब सदाशिव वस्तुतः पशु आत्मा हैं, शिवात्मा नहीं हैं। इनमें कुछ आणव मल शेष रहता है। इससे उस समय इनकी ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति का कुछ संकोच रहता है। ये शिव के समान पूर्ण रूप से अनावृत शक्ति संपन्न नहीं होते। यद्यपि ये भी मुक्त पुरुष हैं, तथापि सर्वथा मलहीन न होने से अभी तक इन्हें परा मुक्ति या शिवसाम्य प्राप्त नहीं हुआ है। सदाशिव भुवन के अधिष्ठाता होने से परमेश्वर को भी सदाशिव कहा जाता है। वे स्वयं शिव हैं और पूर्वोक्त अणु सदाशिवों को अपने-अपने भुवन के भोग में नियोजित करते हैं। मृगेन्द्र तंत्र प्रभुति शैवागम के ग्रंथों के आधार पर इस विषय का वर्णन ‘भारतीय संस्कृति और साधना’ नामक ग्रंथ के प्रथम भाग (पृ. 28) में मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अणुप्रचय

अणुओं का प्रचय अर्थात् संगृहीत या एकत्रित होना। सांख्ययोगीय दृष्टि के अनुसार बाह्य विषय अणुप्रचय-विशेषात्मा (अणुओं के एक प्रकार का प्रचय ही जिसका स्वरूप है, वह अणुप्रचय विशेषात्मा) है। अणुओं के प्रचयविशेष के होने के कारण ही घट आदि स्थूल पदार्थ पार्थिव आदि परमाणुओं से परमार्थतः अभिन्न होने पर भी व्यवहारतः भिन्न होते हैं (वाचस्पति टीका 1/43)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अण्डघट

अण्डघट’ इस पद से ब्रह्माण्ड गृहित होता है। यह अण्डघट प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन आठ आवरणों से ढँका है। घट शब्द शरीर का भी बोधक होता है। इस प्रकार यह ब्रह्माण्ड ब्रह्म का शरीर रूप है, जो उक्त आठ आवरणों से आवृत है (भा.सु. 10/14/11 वृंदावन प्रकाशन)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अंतःकरण

करण (इन्द्रियाँ) दो प्रकार का माना जाता है – बाह्यकरण तथा आन्तर करण (या अंतःकरण)। जिसका विषय बाह्य वस्तु नहीं है, वह अंतःकरण है। (बाह्य विषय रूपादियुक्त एवं विस्तारयुक्त होते हैं)। बाह्य विषय से संबंधित स्मृति-कल्पना-चिंतनादि करना अंतःकरण का व्यापार है। सांख्य, योग तथा अन्यान्य कई शास्त्रों में अंतःकरण त्रिविध माना गया है – मन, अहंकार तथा बुद्धि (किसी-किसी संप्रदाय में चित्त को भी अंतःकरण माना जाता है; किसी-किसी का यह भी मत है कि अंतःकरण एक है, व्यापार-भेद से उनके तीन या चार भेद होते हैं)। (द्र. मन, बुद्धि तथा अहंकार शब्द)। बाह्य करणों को अंतःकरण का विषय भी माना जाता है (द्र. सांख्यकारिका 33), क्योंकि इन करणों के विषयों का उपभोग आन्तर करण ही करते हैं। किंतु बाह्य करण आन्तर द्वारा अधिष्ठित होकर ही स्व-स्व विषय के ग्रहण में समर्थ होता है। सर्वोच्च अंतःकरण बुद्धि है। सभी बाह्यकरण तथा मन एवं अहंकार बुद्धि को विषय-समर्पण करते हैं (सांख्यकारिका 36)। त्रिविध आन्तर करण त्रिकालव्यापी विषयों से संबंधित होते हैं – यह भी बाह्य करण से उनका भेद है।
अंतःकरण की चिंतन-प्रक्रिया को छः भागों में बाँटा गया है, जो इस प्रकार है – ग्रहण=वस्तु-स्वरूप-ग्रहण मात्र; धारण=वस्तु-विषयक स्मृति या चिंतन; ऊह=वस्तुगत विशेषों को जानना; अपोह=समारोपित गुणों का अपनय या विचारपूर्वक कुछ गुणों का निराकरण; तत्त्वज्ञान=ऊहापोह द्वारा विषय-स्वरूप-विचार; अभिनिवेश=विषय की उपादेयता-हेयता से संबंधित विचार या तदाकारता-प्रतिपत्ति (मतान्तर में)। (स्वामी हरिहरानंद-कृत योगदर्शन व्याख्या में इनका स्वरूप कहीं-कहीं पृथक् रूप से दिखाया गया है)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अंतरंग योग

संप्रज्ञात योग के साधन यद्यपि आठ योगांग ही हैं, तथापि अंतिम तीन योगांग (धारणा, ध्यान एवं समाधि) ही इसके अंतरंग साधन माने जाते हैं। यम आदि पाँच अंग – मुख्यतया शरीर, मन आदि को मलहीन करते हैं, अतः वे संप्रज्ञातयोग के बहिरंग साधन ही होते हैं। व्याख्याकारों का कहना है कि समान विषय होकर जो जिसका साधन होता है, वह साक्षात् उपकारक होने के कारण उसका अंतरंग साधन है। धारणादि-त्रय के साथ संप्रज्ञात का विषयसाम्य रहता है, अतः ये अंतरंग साधन होते हैं। ये तीन असंप्रज्ञात योग के अंतरंग नहीं हो सकते, क्योंकि धारणा-ध्यान-समाधि-समुदाय रूप जो संयम है, उसका अपगम होने पर ही असंप्रज्ञात समाधि का आविर्भाव होता है। चूंकि असंप्रज्ञात समाधि निर्विषय (=निरालंबन) है, अतः आलंबन -प्रतिष्ठ धारणा-ध्यान-समाधि असंप्रज्ञात योग का बहिरंग साधन ही हो सकते हैं। चूंकि संप्रज्ञात का अधिगम करने के बाद उसका अतिक्रमण करके ही कोई असंप्रज्ञात समाधि को सिद्ध कर सकता है, अतः धारणादि को असंप्रज्ञात का बहिरंग साधन मानना ही संगत है। (द्र. योग सू. 3/7 -8)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अंतराय

चित्त को विक्षिप्त करने वाले विघ्न ‘अंतराय’ कहे जाते हैं। व्याधि आदि नौ अंतरायों की गणना 1/30 योगसूत्र में मिलती है। अन्यान्य योगग्रंथों में तथा पुराणादि में भी अंतरायों की चर्चा मिलती है। इनमें कहीं-कहीं योगसूत्रानुसारी विवरण मिलता है और कहीं-कहीं किंचित् पृथक विवरण भी मिलता है। योगसूत्र में जिन नौ अंतरायों की गणना है, उनसे अतिरिक्त कुछ अंतरायों के नाम इस प्रकार हैं – (कहीं-कहीं ‘विघ्न्’ शब्द भी प्रयुक्त हुआ है) – दूरदर्शन, दूरश्रवण, सिद्धियाँ, काम, क्रोध, भय, स्वप्न, स्नेह, अतिभोजन, अस्थैर्य, लौल्य, अश्रद्धा।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अंतर्धान

यह सिद्धिविशेष का नाम है। योगी संयम के बल पर स्वशरीर-गत रूप, स्पर्श, शब्द, रस एवं गंध को इस रूप में स्तंभित कर सकते हैं कि वे किसी के द्वारा ग्राह्य न हो सके। योगसूत्र (3/21) में शरीरगत रूप के स्तंभन से अदृश्य हो जाने का विवरण दिया गया है। यह उपलक्षणमात्र है। रूप की तरह शरीरगत रसादि गुणों को भी स्तंभित कर उनको अन्य व्यक्तियों की इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य किया जा सकता है – यह व्याख्याकारों ने कहा है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अतिक्रान्तभावनीय

योगांग-अभ्यास द्वारा जब वृत्तिनिरोघ वस्तुतः होता रहता है तथा योगज प्रज्ञा प्रकटित होती रहती है, तब साधक योगी कहलाता है। योगियों के चार भेद (उत्कर्षक्रम के अनुसार) योगपरम्परा में स्वीकृत हुए हैं – कल्पिक, मधुभूमिक, प्रज्ञाज्योतिः तथा अतिक्रान्तभावनीय (द्र. व्यासभाष्य 3/51)। अतिक्रान्तभावनीय सर्वोच्च स्तर के योगी को कहते हैं। ऐसे योगी में कुछ भी भावनीय (अर्थात् विचारणीय एवं संपादनीय) नहीं रह जाता। यह छिन्नसंशय, एवं हृदयग्रन्थिभेदकारी होता है। इसमें प्रान्तभूमि प्रज्ञा पूर्णतः रहती है, अतः इसका कर्म निवृत्त हो जाता है। स्वचित्त को चिरकाल के लिए प्रलीन करना (अर्थात् पुनरुत्थानशून्य करना) ही इनका अवशिष्ट कार्य रहता है। यही जीवन्मुक्त अवस्था है। अतः ऐसे योगी का वर्तमान देह ही अन्तिम देह होता है। (द्र. योगसूत्र 3/51 की भाष्य टीकायें)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अतिगति

श्रेष्‍ठ अवस्था।
अतिगति परिपक्‍व पाशुपत योगी का एक लक्षण है। यह पाशुपत योग से प्राप्‍त होनेवाली वह श्रेष्‍ठ अवस्था होती है जिसे शिव तुल्यता कहते हैं। पाशुपत मत के अनुसार सिद्‍ध साधक अतितप या तप के द्‍वारा अतिगति अथवा परदशा को प्राप्‍त कर लेता है अर्थात् मुक्‍ति की अवस्था को प्राप्‍त करता है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 69)। स्वर्गादि प्राप्‍ति या देवयान आदि गतियाँ सब गतियाँ कहलाती हैं। कौडिन्य ने तो सांख्य की कैवल्य अवस्था को भी गतियों में ही गिना है, क्योंकि सांख्य साधक उस अवस्था में प्रवेश करता है। पाशुपत योगी तो इस संसार में रहता हुआ ही अपने दिव्यातिदिव्य ऐश्‍वर्य को जब हृदयंगम कर लेता है तो वह इसी संसार में रहते हुए ही शिवतुल्य बन जाता है। अतः उसकी ऐसी अवस्था सभी गतियों से अतिक्रांत होती हुई अति गति कहलाती है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अतितप

श्रेष्‍ठ तप का एक लक्षण।
पाशुपत योग के अनुसार साधक को अतितप करना होता है। यह अतितप असाधारण अवस्थाओं की प्राप्‍ति में होता है। जैसे साधक का समस्त सुख, दुःख, दान, यज्ञ आदि से परे पहुँचना ही अतितप होता है। अर्थात् साधक को उस अवस्था में पहुँचना होता है जहाँ उसे सुख – दुःख आदि द्‍वंद्‍व स्पर्श नहीं करते हैं तथा उसे किसी यज्ञ या दानादि कृत्य करने की आवश्यकता नहीं रहती है। (पा. सूत्र कौ. भा. पृ. 69)।
गणकारिका में अतितप को ताप कहा गया है और इसे चर्या का एक प्रकार माना गया है। समस्त द्‍वंद्‍वों का कोई प्रतीकार न करते हुए, उनको अति सहिष्णु होकर सहना ही ताप या अतितप होता है। (ग. का. टी. पृ 17)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अतिदत्‍तम्

पर्याप्‍त से अधिक मात्रा में दान देना।
अतिदत्‍तम् पाशुपत साधक के लिए सिद्‍धि का एक सोपान है, परंतु दान शब्द से यहाँ पर गोओं, भूमि, धन आदि के दान से तात्पर्य नहीं है; अपितु अपनी आत्मा का दान ही पाशुपत मत में सर्वश्रेष्‍ठ दान है। यह दान अन्य सभी दानों से अतिक्रांत होता हुआ अतिदत्‍तम् कहलाता है। यह दान चर्या का एक प्राकर है, जहाँ साधक को अपने आप को ही ईश्‍वर के प्रति दान करना होता है। साधक अपने अशक्‍त और संकुचित जीवभाव को सर्वशक्‍तिमान् परिपूर्ण ऐश्‍वर्यभाव में विलीन कर देता है। इस तरह से मानो वह अपने आपका ही दान करता है। भूमि, धन आदि के दान से तो अस्थायी पुण्यफल की प्राप्‍ति होती है, लेकिन आत्मदान में स्थायी फल अर्थात् सद्‍सायुज्य की प्राप्‍ति होती है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 58)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अतीतानागतज्ञान

यह एक सिद्धि है। किसी त्रैगुणिक वस्तु की अतीत अवस्था एवं अनागत अवस्था का जो ज्ञान (प्रत्यक्षज्ञान) होता है, वह अतीतानागतज्ञान कहलाता है। परिणामत्रय (धर्म, लक्षण और अवस्था नामक तीन परिणाम) में संयम करने से यह ज्ञान होता है, यह योगसूत्र 3/16 में कहा गया है। कई व्याख्याकारों का कहना है कि इस सिद्धि के कारण वस्तु पर योगी की दृढ़ अनित्यताबुद्धि होती है, जिससे वे वैराग्य में सुप्रतिष्ठित होते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अतीष्‍टम्

श्रेष्‍ठ यज्ञ।
पाशुपत मत के अनुसार शिवमंदिर में भस्मस्‍नान या क्राथन, स्पंदन आदि कृत्य अतीष्‍ट अर्थात् अतियजन हैं। वैदिक प्रक्रिया के अनुसार होने वाले अग्‍निष्‍टोम आदि यज्ञों में तो हिंसा के अनुस्यूत रहने से उनसे मिलने वाला फल संकीर्ण तथा अस्थायी होता है जो शीघ्र ही क्षीण होनेवाला होता है, परंतु पाशुपत मत के अनुसार अपने आपके साथ ही क्राथन, मंदन आदि के द्‍वारा किया जाने वाला साधक का हिंसा आदि से रहित यज्ञ श्रेष्‍ठ यज्ञ है जिसे अतीष्‍टम् अर्थात् साधारण यज्ञों को अतिक्रमण करनेवाला याग कहते हैं। यह याग भी चर्या का एक प्रकार है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 68)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अदृष्टजन्मवेदनीय

कर्माशय (जाति-आयु-भोग का हेतु भूत संस्कार-विशेष) दो प्रकार का होता है दृष्टजन्मवेदनीय तथा अदृष्टजन्मवेदनीय। वर्तमान जन्म (शरीरधारणकाल) में जिसका फल अनुभूत नहीं होता, पर आगामी जन्म में अनुभूत होता है वह अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय है। जाति, आयु और भोग विपाक (फल) कहलाते हैं।
अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय (जो जाति आदि तीन फल देते हैं) की तीन गतियाँ हो सकती हैं, (1) फल न देकर ही कर्मों का नाश हो जाना (यह नाश विरुद्ध कर्म से या ज्ञान से होता है), (2) प्रधान कर्म (जो स्वतन्त्र रूप से फलप्रसू होता है, वह) के साथ ही अप्रधान कर्मों का फलीभूत होना (इससे फल क्षीणबल हो जाता है) तथा (3) अधिकबलशाली कर्म द्वारा अभिभूत होने के कारण दीर्घकाल पर्यन्त (अर्थात् दो -तीन जन्म -पर्यन्त) फल देने में समर्थ न होना।
अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय जीवन्मुक्तों का नहीं रहता, क्योंकि सभी प्रकार के क्लेशों की शक्ति (फलोत्पादनयोग्यता) नष्ट हो जाने के कारण उनको पुनः देहधारण नहीं करना पड़ता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अद्वय / अद्वैत

जहाँ द्वैत तथा द्वैताद्वैत एकरस रूप में चमकते हैं। जहाँ व्यावहारिक सत्ता एवं पारमार्थिक सत्ता अपने समस्त वैविध्य सहित, द्वैत रहित संवित् रूप में ही आभासित होती हैं। द्वय एवं द्वय के भाव से भी रहित शुद्ध तथा परिपूर्ण प्रकाश रूप अवस्था। किसी भी प्रकार के भेद से रहित अवस्था को ही अद्वय या अद्वैत कहते हैं। (मा.वि.वा., 1-621 से 629)। अद्वय और अद्वैत में मूलतः कोई अंतर नहीं है। केवल शब्दार्थ को ही दृष्टि में रखते हुए इन्हें क्रमशः दो के अभाव की अवस्था कहा जा सकता है। अभिनवगुप्त ने दोनों शब्दों का प्रयोग एक ही अवस्था को द्योतित करने के लिए किया है। (वही)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अधर्म

मल का एक प्रकार।
भासर्वज्ञ के अनुसार पाप का बीज किंवा पाप ही अधर्म कहलाता है (ग. का. टी. पृ. 22)। अधर्म मल का दूसरा प्रकार है। इसके प्रभाव से प्राणी को नरकवास आदि सहन करना पड़ता है और जीवन के दुखों को झेलना पड़ता है। ये सभी अवस्थाएँ शोधनीय होने के कारण मलों में गिनी गईं हैं।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अधर्महानि

विशुद्‍धि का द्‍वितीय प्रकार।
पाशुपत योगी में जब योग साधना के बल से समस्त अधर्मों का नाश होता है तो उसकी वह शुद्‍धि अधर्महानि कहलाती है। (ग. का .टी . पृ. 7)। साधक के संचित पापकर्मों के भंडारों के होते हुए भी वे उसे प्रभावित नहीं कर सकते हैं, न ही उसे पुन: संसृति में उलझा सकते हैं। उसकी ऐसी महिमा अधर्महानि कहलाती है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अधिकार

व्यासभाष्य (2/23) में अधिकार का अर्थ हैं – ‘गुणों का कार्यारंभ-सामर्थ्य’। ‘स्वकार्यजननक्षमता’ के अर्थ में अधिकार शब्द व्यासभाष्य के कई स्थलों में प्रयुक्त हुआ है (1/50 आदि)। महत्तत्त्व आदि परिणाम गुणों के कार्य हैं – इस दृष्टि से ‘परिणामविशेष’ के अर्थ में भी ‘अधिकार’ शब्द का प्रयोग होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अधिपति

परमेश्‍वर का एक नामान्तर।
ब्रह्मा आदि सभी देवगण अपने – अपने अधिकार क्षेत्र के पति हुआ करते हैं। भगवान शिव ब्रह्माण्ड के संचालक ब्रह्मा आदि देवाधिदेवों तथा इन्द्र आदि देवताओं के ऊपर भी शासन करता हुआ अपनी इच्छा से ठहराई हुई नियति के नियमों के अनुसार उन्हें चलाता रहता है, तथा उन पर भी निग्रह अनुग्रह आदि करता हुआ उन पतियों पर भी अपने उत्कृष्‍टतम आधिपत्य को निभाता हुआ सभी का अधिपति कहलाता है। (पा. सू. कौ. भा. प. 12)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अधिष्ठान कर्तृत्व

शुद्ध ब्रह्म स्वतः कर्त्ता न होकर अधिष्ठाता के रूप में ही संपूर्ण कार्यजगत् का कर्ता होता है तथा ब्रह्म से अधिष्ठित होकर ही माया जगत् का उपादान कारण बनती है क्योंकि स्वयं अचेतन होने से माया स्वतः क्रियाशील नहीं हो सकती है। जैसे, सारथि से अधिष्ठित ही रथ क्रियाशील होता है। यही जगत् के प्रति ब्रह्म का अधिष्ठान कर्तृत्व है (भा,सु,वे,प्रे,पृ. 140)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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