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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अभिमान

विभिन्न विषयों के साथ संपर्क होने के कारण ‘अहम्’ (महत्तत्त्व) का जो विकारी रूप होता है, वह ‘अहंकार’ कहलाता है और इस अहंकार का धर्म अभिमान है। यह अभिमान मुख्यतः दो प्रकार का है। अहन्ता (शरीरादि में) और ममता (धनादि में) ही ये दो प्रकार हैं। यह अहंकार रजः प्रधान है। (द्र. अहंकारशब्द)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अभिमानिव्यपदेश

अभिमानी देवता का व्यवहार अभिमानिव्यपदेश है। “मृदब्रवीत् आपोЅब्रुवन्” इत्यादि श्रुतियों में अचेतन मिट्टी या जल में बोलने का व्यवहार नहीं बताया गया है अपितु मिट्टी या जल के अभिमानी देवता के लिए बोलने का व्यवहार प्रतिपादित हुआ है (अ.भा.पृ. 555)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अभिषेक

पवित्र जल छिड़क कर अथवा उससे स्नान कराकर किसी योग्य व्यक्ति को योग्य पद पर प्रतिष्ठित करना ही अभिषेक पद का साधारण अर्थ है। शास्त्रीय विधि से देवता अथवा राजा को कराया जाने वाला स्नान भी अभिषेक ही कहलाता है। तन्त्रशास्त्र में दीक्षा के उपरान्त दीक्षित व्यक्ति को अभिषेक नामक संस्कार से संस्कृत किया जाता है। दीक्षा के प्रसंग में प्रायः सभी तंत्र ग्रन्थों में बताया गया हे कि समयी, प्रत्रक, साधक और आचार्य के भेद से दीक्षित व्यक्तियों की चार कोटियाँ होती हैं। इनमें से समयी का सेनापति के समान, पुत्रक का महामंत्री के समान, साधक का युवराज के समान और आचार्य का अभिषेक राजा के समान किया जाता है। अन्य आचार्यों का कथन है कि अभिषेक केवल आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होते समय ही किया जाता है। यह अभिषेक विविध औषधि, मृत्तिका, रत्न आदि से मिश्रित नदी, समुद्र आदि के पवित्र जल से भरे कलशों से संपादित होता है। इन कलशों की पूजा करके मण्डल निर्माण पूर्वक, जिसका अभिषेक करना हो उसको भद्र पीठ पर ईशानाभिमुख बैठाकर सकलीकरण क्रिया द्वारा संस्कृत किया जाता है और उक्त कलशों के अभिमन्त्रित जल से उसको स्नान कराया जाता है। इसी का नाम अभिषेक है। अभिषेक हो जाने के उपरान्त उसको अन्य व्यक्तियों को दीक्षा देने का अधिकार मिल जाता है। वह आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हो जाता है। विविध सम्प्रदायों में इसकी भी विभिन्न विधियाँ हैं। शाक्त तन्त्रों में पूर्णाभिषेक अथवा पट्टाभिषेक के नाम से तथा बौद्ध तन्त्रों में सेक के नाम से इसकी विधि विस्तार से वर्णित है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अभीत

भयरहित।
पाशुपत मत में सिद्‍ध साधक को अतीव उत्कृष्‍ट कोटि का माना गया है। उसके लिए भूत, वर्तमान अथवा भविष्य में कभी भी कोई भय नहीं होता है। संसार तथा प्रकृति के नियमों के अनुसार इस जगत् का ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यंत क्षय होता है, अतः यहाँ पर यह प्रश्‍न उठता है कि पाशुपत साधक का भी अंततोगत्वा क्षय तो होना ही है; तो क्या उसे उस क्षय का भय नहीं होता है? पाशुपात शास्‍त्र का उत्‍तर है, नहीं। पाशुपत साधक को विनाश का भय नहीं होता है; क्योंकि वह अक्षय होता है। अतः उसे मृत्युभीति नहीं होती है। यहाँ पर अक्षय से यह तात्पर्य नहीं है कि पाशुपत साधक के स्थूल शरीर का क्षय नहीं होता है। स्थूल शरीर तो किसी दिन जीर्ण शीर्ण होकर समाप्‍त होता ही है, परंतु मुक्‍त साधक को जब वास्तविक ज्ञान हो जाता है तो वह अपनी आत्मा को तत्वत: जानकर अक्षयी समझने लगता है। वह मृत्यु से भी अभीत बनकर रहता है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 49)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अभेदोपाय

देखिए शाम्भव-उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अभ्यास

वह यत्न या चेष्टा जो ‘स्थिति’ के लिए की जाती है। अभ्यास को चित्तवृत्तिनिरोध का एक उपाय माना गया है (योगसू. 1/12)। योग के संदर्भ में ‘स्थिति’ का अर्थ है – चित्त की प्रशान्तवाहिता (योगसू. 1/13)। सात्विक एकाग्रता प्रशान्तवाहिता है; हर्ष-शोक आदि तरंग के न रहने के कारण ही ‘प्रशान्तवाहिता’ शब्द का प्रयोग किया गया है। वृत्तिरहित चित्त का जो स्वरूपनिष्ठ परिणाम है, वह स्थिति है – ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं। यह वस्तुतः पूर्वोक्त सत्त्वप्रधान एकाग्रता का चरम रूप है और इस दृष्टि से चित्त-निरोघ का सभंग-प्रवाह (निरोध का बारबार उदित होते रहना) ही प्रशान्तवाहिता है। यह अभ्यास क्रमशः दृढ़ होता रहता है। दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक निरन्तर चेष्टा करते रहने का अभ्यास दृढ़ हो जाता है। इस प्रकार का अभ्यास ‘दृढ़भूमि’ कहलाता है (योगसू. 1/14)। अभ्यास का क्षेत्र बहुत बड़ा है। योगसूत्रोक्त सभी परिकर्म (मैत्र्यादिभावना) तथा एकतत्त्वाम्यास (1/32) अभ्यास के ही अन्तर्गत हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अमनस्क योग

अमनस्क योग का निरूपण करने वाला इसी नाम का एक छोटा-सा ग्रन्थ उपलब्ध होता है। यह पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभक्त है। पूर्वार्ध में तारक योग का तथा उत्तरार्ध में अमनस्क योग का प्रतिपादन है। इस ग्रन्थ के अनुसार योग के दो प्रकार हैं – पूर्व और उत्तर। पूर्व योग, अर्थात् तारक योग में मन विद्यमान रहता है, परन्तु उत्तर योग, अर्थात् अमनस्क योग में मन बिल्कुल नहीं रहता। इनकी तुलना पातंजल योग की संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात समाधि से की जा सकती है। किन्तु वस्तुतः यह अपने में एक स्वतंत्र योग पद्धति है। प्राण और मन का लय ही वस्तुतः अमनस्क योग का मुख्य लक्षण है। ग्रन्थ में बताया गया है कि जल में छोड़ा हुआ नमक का ढेला धीरे-धीरे जल में लीन हो जाता है, वैसे ही अमनस्क योग के अभ्यास से मन भी परब्रह्म में लीन हो जाता है। जैसे नमक जल के संपर्क से जलमय हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म के संपर्क से मन भी ब्रह्ममय हो जाता है। अमनस्क योग के अभ्यास से इसी स्थिति को प्राप्त किया जाता है। इस लक्ष्य के प्राप्त हो जाने पर मन की कोई स्थिति नहीं रहती। इसीलिये इसको अमनस्क योग कहा जाता है। इस योग की विशेषता यह है कि यहाँ मन पर नियंत्रण स्थापित करने की अपेक्षा उसके लय पर जोर दिया जाता है। मन का लय हो जाने पर प्राण का लय अपने आप हो जाता है। शैव और शाक्त तन्त्रों में वर्णित उन्मनी स्थिति की हम इस योग से तुलना कर सकते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये दोनों स्थितियाँ अभिन्न हैं, क्योंकि उस प्रक्रिया के अनुसार समना पर्यन्त ही मन की स्थिति है। उन्मना में जाकर मन लीन हो जाता है। किन्तु तान्त्रिक प्रक्रिया में इसी को चरम लक्ष्य नहीं माना गया है। उन्मनी दशा में मन के लीन हो जाने पर भी उसकी किसी न किसी रूप में स्थिति रह जाती है। अतः वहाँ इस उन्मनी दशा से भी परे निष्कल महाबिंदु में प्रतिष्ठा ही योगी का परम और चरम लक्ष्य माना जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अमर

सिद्‍ध साधक का एक लक्षण।
पाशुपत मतानुसार सिद्‍ध साधक अमर होता है, अर्थात् उसकी मृत्यु नहीं होती है। इस स्थूल शरीर का प्राणों से वियोग तो अवश्यंभावी है, परंतु पाशुपत साधक को प्राण वियोग का भय नहीं होता है, अर्थात् प्राणों के वियोग से जन्य दुःख का संस्पर्श उसे नहीं होता है। उसका वास्तविक स्वरूप चमकता ही रहता है, अर्थात् उसकी शुद्‍ध आत्मा न कभी जन्मता है न कभी मरता है और उसे इस बात का ज्ञान होता है। अतएव उसे अमर कहा गया है। उसका वास्तविक स्वरूप में चमकते रहना ही अमरत्व होता है। (ग. का. टी. प. 10)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अमरत्व

पाशुपत सिद्‍धि का एक लक्षण।
पाशुपत साधक अमरत्व को प्राप्‍त करता है क्योंकि वह अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्‍ति के बल से भिन्‍न भिन्‍न रूपों को धारण कर सकता है तथा उनका संहार भी कर सकता है। अतः ये स्थूल रूप उसके लिए कुछ अर्थ नहीं रखते। इनकी सृष्‍टि – संहार तो प्रकृति का नियम है। साधक की वास्तविक आत्मा अमर (मृत्यु रहित) होती है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 50)।
जैसा कि गणकारिका में कहा गया है कि साधक को प्राणादि के वियोग से उत्पन्‍न दुःख स्पर्श नहीं करता है; अर्थात् स्थूल शरीर की मृत्यु तो प्रकृति के नियम के अनुसार अपने निश्‍चित समय पर हो जाती है परंतु युक्‍त साधक को प्राण त्यागते समय साधारण मनुष्य के समान दुःख नहीं होता है। वह इस प्रकार से अमरत्व को प्राप्‍त करता है। (प्राणादिवियोगज दुःखासंस्पर्शित्ममरत्वम् ग.का.टी.पृ. 10)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अमर्दक

द्वैत शैवदर्शन के प्रवर्तक। श्रीकंठनाथ की आज्ञा से भेदमय दृष्टिकोण से शैवी साधना और शैवी सिद्धांतों के प्रचार प्रसार के लिए अवतरित सिद्ध पुरुष। (तन्त्रालोक, 36-13)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अमर्दक मठिका

वर्तमान काल में इस मठिका की न किसी गुरु-शिष्य परंपरा का ही पता लग रहा है और न ही इस शाखा के किसी ग्रंथ की ही उपलब्धि हो रही है। अभिनवगुप्त ने अपने तंत्रालोक के अंतिम आह्मिवक में रस मठिका के तात्कालिक गुरु के नाम का उल्लेख किया है; इसलिए यह मठिका ग्यारहवीं शताब्दी तक किसी न किसी रूप में अवश्य प्रचलित थी। (तन्त्रालोक, 36-13)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अमा कला

स्कन्द पुराण के प्रभास खण्ड के एक वचन में, जो कि शब्दकल्पद्रुम (भास्करी 01, पृ. 83) में उद्धृत है, बताया गया है कि चन्द्रमा की सोलहवीं कला को अमा कला कहा जाता है। आचार्य रघुनंदन ने (शब्दकल्पद्रुम, भास्करी 01, पृ. 83 पर उद्धृत) अमा कला की व्याख्या करते हुए कहा है कि यह कला नित्य है, क्षय और उदय से रहित है। चन्द्रमा की अन्य कलाओं में यह उसी तरह से अनुस्यूत है, जैसे की पुष्पमाला के प्रत्येक पुष्प में सूत्र अनुस्यूत रहता है। यह आधार शक्ति का ही परम स्वरूप है। तन्त्रशास्त्र (तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्तदृष्टि पृ. 309) में बिन्दु को पूर्णिमा कहा जाता है, किन्तु वह ठीक पूर्णिमा नहीं है। यथार्थ पूर्णिमा षोडशी है। बिंदु में 15 कलाएँ हैं, एक कला नहीं है अर्थात् अमृतकला अथवा षोडशी का वहाँ अभाव है। षोडशकला पुरुष में अमृत कला एक है। यही वास्तविक अमा कला है। योग की प्रक्रिया (भारतीय संस्कृति और साधना, भास्करी 1, पृ. 319) में उन्मना के उन्मीलन को ही अमाकला कहा गया है। मातृका के क्रम में अमा कला की एक दूसरी ही व्याख्या मिलती है। इस मत में अनुत्तर तत्त्व अकार को सप्तदशी या अमा कला के नाम से जाना जाता है। यह नित्योदित है, अर्थात् इसका कभी तिरोधान नहीं होता। यही अमृत कला है। अन्तःकरण आदि षोडश कलाओं का उद्भव इसी से होता है। यह अन्तरुन्मुख है। श्रीतत्त्वचिंतामणि (6/47) में बताया गया है कि सहस्त्रार चक्र के मध्य विराजमान त्रिकोण स्थान में अमा कला का निवास है, जो कि चन्द्रमा की सोलहवीं नित्य कला मानी जाती है। यह बाल सूर्य के समान प्रकाशमान है। यह कला नित्योदित है, अर्थात् क्षय और उदय से रहित है। सहस्त्रार के ही समान यह भी अधोमुख है और इससे निरन्तर अमृत की वर्षा होती रहती है। इस अमृत कला के भीतर निर्वाण कला का भी निवास है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अमानव पुरुष

जो व्यक्ति सद्योमुक्ति का अधिकारी नहीं है, किन्तु क्रममुक्ति का ही अधिकारी है, वह व्यक्ति इस लोक में अपने प्रारब्ध कर्म का भोग कर चुकने के बाद अमानव पुरुष द्वारा पहले ब्रह्मलोक तक पहुँचाया जाता है। तदनन्तर वह मुक्ति को प्राप्त कर जाता है। इस प्रकार अमानव पुरुष मुमुक्षु के लिए ब्रह्मलोक तक पहुँचाने का एक माध्यम है। किन्तु सद्योमुक्ति में अमानव पुरुष की अपेक्षा नहीं होती है। (अ.भा.प्र. 1372)
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अमूर्त – सादाख्य

देखिए ‘सादाख्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अमृत शरीर

सामान्य जन का शरीर मरणशील होने से मृत्य कहा जाता है। किन्तु भगवान् की पुष्टि लीला में प्रवेश के अनन्तर भक्त को अमृत शरीर प्राप्त हो जाता है और वह भगवान् के नित्य लीला रस का अनुभव करता है (अ.भा.पृ. 1303)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अमृतद्रव

श्रीमद्भागवत का अमृत द्रव शब्द श्री वल्लभाचार्य के अनुसार भक्ति रस का प्रतिपादक है क्योंकि उनके मतानुसार भक्तिरस अमृतपदवाच्य मोक्ष को भी द्रवित कर देने वाला है। अर्थात् भक्ति रस की तुलना में मोक्ष भी महत्त्वहीन है (भा.सु. 11टी. पृ. 48)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अमृतपाद

चतुष्पाद ब्रह्म के तीन अमृतपाद हैं – पृथ्वी, शरीर और हृदय-अथवा भू: -भुवः और स्वः में सभी भूत समाविष्ट हैं, यह ब्रह्म का एक पाद है “पादोSस्य विश्वा भूतानि” तथा महर्लोक से ऊपर जन, तप और सत्य लोक अमृत, क्षेम और अभय नामक त्रिविध सुखरूप हैं। इस दृष्टि से यहाँ क्रमानुसार अमृत रूप होने से केवल जनलोक ही अमृतपाद होना चाहिए। किन्तु अमृतत्त्व गुण उक्त त्रिविध सुखों में अनुस्यूत है, अतः यहाँ अमृत शब्द उक्त तीनों सुखों का उपलक्षक है। इसलिए जन, तपः और सत्य ये तीनों ही लोक ब्रह्म के अमृतपाद हैं “त्रिपादस्याभृतं दिवि” (अ.भा.पृ. 254)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अमृतबीज

1. स। सोम, अमृतनाथ, सुधासार, सुधानिधि, षड्रसाधार आदि नामों से अभिहित परामृत धाम स्वरूपक सकार। (तन्त्रालोकविवेक2, पृ. 164)।
2. ऋ, ऋ, लृ, लृ – इन चार बीजों को भी अमृत वर्ण कहते हैं, क्योंकि ये आगे सृष्टि न करते हुए अपने ही चमत्कार में स्पंदमान होते रहते हैं। (तन्त्र सार त्र पृं. 16)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अमृतवर्ण

देखिए अमृतबीज।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अमोक्ष

सुषुप्ति अवस्था की वह अवांतरदशाएँ जिन्हें कोई कोई दर्शन गुरु मोक्ष की अवस्था मानते हैं। शैवशास्त्र में कहा गया है कि इन संकोच युक्त शास्त्रों पर निष्ठा रखने वालों को माया भ्रम में डाल कर उनके द्वारा उन दशाओं पर मोक्ष का अभिमान कराती है जो जो दशाएँ वस्तुतः मोक्ष की दशाएँ हैं ही नहीं। उन दशाओं में ‘कुतश्चिन्मुक्ति’ तो हुआ करती है, परंतु सर्वतो मुक्ति नहीं होती है। क्योंकि ऐसी मुक्ति में प्राणी कुछ समय के लिए जन्म मरण के कष्टों से बचा तो रहता है, परंतु सर्वथा मुक्त नहीं हो सकता है। (तन्त्रालोक, खं 1, पृ. 54)। ये दशाएँ प्रायः सुबुद्धि अवस्था की अवांतर सीढ़ियाँ होती हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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