भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

अवतार (अवतरण)

प्रकारांतर से अवतार के भी दो भेद हैं – अंशावतार और पूर्णावतार। जिसमें भगवान् की अल्प शक्ति प्रकट हो, वह अंशावतार है। जैसे, मत्स्यादि अवतार। ऐसा अवतार जिसमें भगवान् की अनेक शक्ति आविष्कृत हो, पूर्णावतार है। जैसे, राम-कृष्ण आदि अवतार (शा.भ.सू.वृ.पृ. 151 तथा भा.सु.वे.प्रे.पृ. 6)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अवधान – भक्‍ति-

भक्‍ति’ के अंतर्गत देखिए (अनु.यू. 4/26; शि.श.को.पृष्‍ठ 51)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अवधूत

अवधूतोपनिषद् में अवधूत के लक्षण आदि का वर्णन किया गया है। अवधूत गीता प्रभृति ग्रन्थों में भी यह विषय चर्चित है। तदनुसार अवधूत के प्रत्येक वाक्य में वेद निवास करते हैं, पद-पद में तीर्थ बसते हैं, इसकी कृपा दृष्टि में कैवल्य विराजमान है। इसके एक हाथ में त्याग है और दूसरे में भोग। फिर भी यह त्याग और भोग दोनों से अलिप्त रहता है। वह वर्णाश्रम से परे है, समस्त गुरुओं का गुरु है। न उससे कोई बड़ा है और न बराबर। पक्षपात विनिर्मुक्त मुनीश्वर को ही अवधूत कहा जाता है। उसे ही नाथ पद प्राप्त हो सकता है। इस अवधूत का परम पुरुषार्थ मुक्ति है, जो द्वैत और अद्वैत के द्वंद्व से परे है। यह मत वेदान्त, सांख्य, मीमांसा, बौद्ध, जैन प्रभृति सभी दर्शनों से विलक्षण है। नाथ सम्प्रदाय को ही अवधूत मत या अवधूत सम्प्रदाय के नाम से भी जाना जाता है, किन्तु वस्तुतः यह उससे विलक्षण है। नाथ सम्प्रदाय में अनेक उपादान अवधूत मत के स्वीकार किये गये हैं। इसके प्रवर्तक अवधूताचार्य दत्तात्रेय है। ‘आदि गुरु दत्तात्रेय और अवधूत दर्शन’ (भारतीय संस्कृति और साधना, भास्करी 1, पृ. 191-209) में इस विषय पर विशद प्रकाश डाला गया है।
शक्तिसंगमतन्त्र (3/1/148-160) में अवधूतों के सात भेदों का वर्णन मिलता है। वीरावधूत, कोलावधूत, दिव्यावधूत आदि शब्दों का प्रयोग अन्यत्र भी मिलता है। महानिर्वाण तन्त्र में ब्रह्मावधूत, शैवावधूत, वीरावधूत और कुलावधूत का वर्णन उपलब्ध होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को ब्रह्मोपासक होने से यति या ब्रह्मावधूत कहते हैं। इस अवस्था में वे लोग गृहस्थाश्रम में रह सकते हैं अथवा संसार धर्म का त्याग कर संन्यासी हो सकते हैं। विधिपूर्वक पूर्णाभिषिक्त होने पर संन्यासी शौवावधूत कहा जाता है। वीरावधूतों के सिर पर लम्बे और अटपटे केश रहते हैं। ये रुद्राक्ष या महाशंख की माला पहनते हैं। इनके अंगों में भस्म या रक्त चन्दन लिप्त रहता है। कोई-कोई गेरुआ वस्त्र भी पहनते हैं। कुलाचार के अनुसार अभिषिक्त होकर जो साधक गृहस्थाश्रम में रहता है, उसे कुलावधूत कहते हैं।
तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती एवं पुरी नामक दशनामी सम्प्रदाय के संन्यासियों का उल्लेख शक्तिसंगमतंत्र (4/8/104-108) प्रभृति ग्रन्थों में भी मिलता है। इन शब्दों के अर्थ भी वहाँ प्रदर्शित हैं। रामानन्द के शिष्यों में भी कुछ अवधूत हुए हैं। वंग देश में तथा अन्यत्र भी इनका निवास है। ये जाति-भेद को नहीं मानते और पान, भोजन आदि का भी इनका कोई नियम नहीं है। सिर पर बड़े-बड़े बाल, गले में स्फाटिक आदि की माला, कमर में कौपीन लपेटे ये लोग अत्यन्त अपरिष्कृत भाव से रहते हैं। लोग इन्हें बावला भी कहते हैं। इनका आचरण अत्यन्त उद्धत होता है। बागाल में स्थान-स्थान पर इनके अखाड़े हैं।
अवधूत वर्ण और आश्रम की व्यवस्था से परे रहते हैं। अष्टविध पाशों से ये मुक्त रहते हैं। अघोरी भी एक प्रकार का अवधूत ही है। नाथ सम्प्रदाय के ग्रन्थों में भी इनका विवरण मिलता है। गोरक्षसिद्धांत संग्रह (पृ. 15-16) में अवधूत मत को सर्वश्रेष्ठ माना है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अवधूती मार्ग

बौद्ध वज्रयान और सहजयान में इडा, पिंगला और सुषुम्णा को क्रमशः ललना, रसना और अवधूती कहा जाता है। यहाँ ललना को चन्द्र या प्रज्ञा का तथा रसना को सूर्य या उपाय का प्रतीक माना गया है। इन दोनों के बीच में जिस शक्ति की क्रिया होती है, एवं जो साधारण अवस्था में अवरुद्ध (सुप्त) रहती है, उसका पारिभाषिक नाम ‘अवधूती’ है। चन्द्र और सूर्य के मिलन अथवा प्रज्ञा और उपाय के आलिंगन से मध्य मार्ग का उन्मीलन होता है। क्लेश प्रभृति का यह अनायास नाश कर देती है, इसलिये इसे ‘अवधूती’ कहते हैं। अवधूती मार्ग ही अद्वय मार्ग, शून्य पथ और आनन्द स्थान है। यहाँ ग्राह्य और ग्राहक का भेद नहीं रहता, दोनों ही समरस होकर शून्याकार में विराजमान रहते हैं। यहीं उपशम रूप शान्तावस्था का उदय होता है, जो कि निर्वाण पदवी के नाम से प्रसिद्ध है (भारतीय संस्कृति और साधना, भास्करी 2, पृ. 258-259)।
Darshana : शाक्त दर्शन

अवध्यत्व

पाशुपत सिद्‍धि का एक लक्षण।

पाशुपत साधक योग साधना में प्रौढ़ता प्राप्‍त करने पर भूतों का संहार कर सकता है परंतु उसका संहार कोई नहीं कर सकता, अर्थात् पाशुपत साधक में संहार सामर्थ्य आ जाती है। यमराज भी उसका अंत नहीं कर सकता है अपितु वह स्वयं अपनी सामर्थ्य से जीवित रहता है। प्राण के अधिष्‍ठातृदेवों की सहायता उसे नहीं पड़ती है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 48, 49)।

गणकारिका टीका में कहा गया है कि युक्‍त साधक का प्राण संबंध किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता है, अर्थात् उसका जीवन और मृत्यु उसके अपने वश में होते हैं। (सत्त्वांतराधीन जीवित रहित्वअवध्यत्वम् – ग. का. टी. पृ. 10)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अवभास

देखिए आभास।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अवमत

अपमानित।

पाशुपत मत के अनुसार साधक निंदनीय कृत्यों का अभिनय करते करते अपमानित होता रहता है। लोग उसकी निंदा करते रहते हैं। इससे उसमें संसार के प्रति विरक्‍ति और त्यागवृत्‍ति उत्पन्‍न होती है। परिणामत: वह योग के पथ पर अग्रसर होता रहता है। पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार द्‍विज, श्रेष्‍ठ ब्राह्‍मण तथा साधक को प्रशंसा की इच्छा कभी भी नहीं करनी चाहिए; अपितु प्रशंसा को विष की तरह हानिकारक मानकर उससे घृणा करनी चाहिए। इसीलिए साधक को विडंबनीय कृत्यों का अभिनय करने के लिए कहा गया है ताकि वह प्रतिदिन अवमत (अपमानित) होता हुआ सभी सांसारिक संसर्गो से विरत होकर केवल योगवृत्‍ति का पालन करता रहे। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 79)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अवयक्त लिंग

नर, शक्ति और शिव के स्वरूपों वाला लिंग (देखिए)। देह आदि के विषय में जब आत्मता का अभिमान गल जाता है तो इस अव्यक्त लिंग का उद्बोध हो जाता है। यह लिंग परिपूर्ण अहं परामर्शमय होता है। वही नर-शिव-शक्तिमयतया चमकता है। इसके अन्य नाम ‘योगिनीहृदय’ आदि हैं। यह मुक्तिप्रद लिंग होता है। (मा.वि.वि.,2-61)। इसमें वेद्य जगत् सर्वथा विलीन होकर रहता है। (तन्त्र सार , पृ. 40)। इस लिंग का साक्षात् अनुभव साधक को उच्चार योग के अभ्यास में होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अवरोह

फल भोग के अनन्तर पुनः इस लोक में नीचे उतरना अवरोह है। इष्टादि कर्म से अतिरिक्त अनिष्ट कर्म करने वाले प्राणी का चन्द्रलोक में गमन नहीं होता है, किन्तु अपने अनिष्ट कर्मों का फल भोगने के लिए उसका यमलोक में आरोहण होता है और फल भोग के अनन्तर पुनः इस लोक में अवरोहण होता है। अर्थात् कर्मानुसार फलानुभव के लिए ऊपर आरोहण होता है और फल का भोग कर चुकने पर पुनः नीचे अवरोहण (उपरना) होता है, यही अवरोह है (अ.भा.पृ. 851)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अवरोहण लीला

शिव का अकल से सकल तक सात प्रमातृ वर्गो की सीढ़ी से जीव भाव पर उतरने की क्रीड़ा का अभिनय। इस लीला में तीन भूमिकाओं की प्रधानता है। पहली भूमिका को शक्ति भूमिका (देखिए) कहते हैं। यह सर्वथा अभेद की भूमिका है। बीच वाली विद्या भूमिका (देखिए) है। यह भेदाभेद की भूमिका है। तीसरी माया भूमिका (देखिए) है। यह एक ओर से स्फुट भेद की भूमिका है और दूसरी ओर से इस भूमिका में ठहरने वाले प्रमातृगण शरीर आदि जड़ पदार्थों को ही अपना आप समझते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अवश्यत्व

पाशुपत सिद्‍धि का एक लक्षण।

पाशुपत योग के अनुसार पाशुपत साधक को अनेकों सिद्‍धियों की प्राप्‍ति हो जाती है। युक्‍त साधक स्वतंत्र हो जाता है, अर्थात् उसमें ऐसे ऐश्‍वर्य का समावेश हो जाता है जिससे वह आगे किसी पर निर्भर नहीं रहता है; न ही किसी के अधीन रहता है; अपितु समस्त भूत उसके पराधीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि वह सबसे उत्कृष्‍ट तथा उच्‍चतम स्थान को प्राप्‍त करता है। साधक की ऐसी स्वातन्त्र्य शक्‍ति उसकी अवश्यत्व नामक सिद्‍धि कहलाती है (पा. सू. कौ. मा. पृ. 46, 47; ग. का. टी. पृ. 10)।)

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अवस्था

दशाएँ।

पाशुपत साधक के तत्वप्राप्‍ति कर लेने पर उसकी भिन्‍न भिन्‍न उच्‍च दशाएँ अवस्थाएँ कहलाती हैं। पाशुपत साधना की प्रक्रिया में योगी जब आगे आगे बढ़ता है तो साधना अधिक अधिक तीव्र होती जाती है। उस साधना के पाँच सोपान माने गए हैं। उन्हें ही गणकारिका में ‘पंच अवस्था’ कहा गया है। अवस्थाएँ पंचविध हैं व्यक्‍ताव्यक्‍तं जयच्छेदो निष्‍टा चैवेह पंचमी।। 5।। (ग. का. 5)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अवस्था-परिणाम

त्रिगुणजात धर्मी द्रव्य में तीन प्रकार का परिणाम होता है – धर्म, लक्षण और अवस्था। धर्मी के किसी धर्म-विशेष की अवस्थाओं से सम्बन्धित जो परिणाम होता है, वह अवस्था परिणाम कहलाता है। उदाहरणार्थ शान्त चित्त से क्रोधरूप धर्म का उदय धर्मपरिणाम है; इस क्रोधरूप धर्म के जो उत्कट, अत्युत्कट रूप होते हैं उनको अवस्थापरिणाम कहा जाता है। धर्म-परिणाम का ही अवस्था-परिणाम होता है। इसी प्रकार चित्त के संस्कारों का प्रबल-दुर्बल होना या घट आदि का नूतन-पुरातन होना अवस्था-परिणाम के उदाहरण हैं। इन्द्रियशक्ति का स्फुट-अस्फुट होना भी अवस्था-परिणाम में ही आता है। व्याख्याकारों का मुख्य मत यह है कि उदित (वर्तमान) धर्मों का ही अवस्था-परिणाम होता है। अनागत धर्मों का भी अवस्थापरिणाम होता है, जो अत्यन्त अस्फुट है। इस अस्फुटता के कारण ही उदित धर्म का ही अवस्था परिणाम होता है – ऐसा कहा जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अवस्थापंचक

योगिनीहृदय (3/176-177) में बताया गया है कि मन्त्र के जप के समय शून्यषट्क, अवस्थापंचक और विषुवसप्तक की भावना करनी चाहिये। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या (तुरीया) और तुर्यातीत (तुरीयातीत) ये पाँच अवस्थाएँ हैं। मालिनी विजय (2/36-38) तथा तन्त्रालोक (10/227-287) में इन अवस्थाओं का निरूपण पिण्ड, पद, रूप, रूपातीत तथा महाप्रचय अथवा सततोदित अवस्था के रूप में किया गया है। जिस अवस्था में दस इन्द्रियों (पाँच कर्मेन्द्रिय और पाँच ज्ञानेन्द्रिय) के द्वारा जागतिक व्यवहार सम्पन्न होते हैं, उसे जाग्रत् अवस्था कहते हैं। जिसमें आन्तर चतुर्विध करण द्वारा व्यवहार की निष्पत्ति होती है, उसे स्वप्नावस्था कहते हैं। स्वप्न में विद्यमान अन्तःकरण वृत्ति का लय होने पर सब इन्द्रियों का उपरम जिस अवस्था में होता है, उसका नाम सुषुप्ति है। सुषुप्ति की भावना का स्थान भ्रूमध्य स्थित बिन्दु है। इस बिन्दु को हृल्लेखा या ऊर्ध्व बिन्दु कहते हैं। स्वात्मचैतन्य की अभिव्यक्ति के हेतु नाद का आविर्भाव ही तुरीय का स्वरूप है। अर्धचन्द्र, रोधिनी और नाद में इसकी भावना करनी चाहिये। तुरीयातीत अवस्था परमानन्द स्वरूप है। यह मन और वाणी से अतीत है, तथापि मन और वाणी का आभास देह में किसी न किसी तरह रह ही जाता है। नादान्त से शक्ति, व्यापिनी और समना के बाद उन्मना पर्यन्त तुरीयातीत अवस्था व्याप्त रहती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अवांतर संबंध (अंतराल संबंध)

सदशिव भट्टारक के अनुग्रह से शास्त्र तत्त्व का विमर्शन भगवान् अनंतनाथ को हुआ। भगवान अनंतनाथ को पश्यंती वाणी के एक मध्यम स्तर के माध्यम से शंका हुई और उसी वाणी के उत्कृष्ट स्तर के विमर्शन से उन्हें भगवान सदाशिव के अनुग्रह से समाधान हो गया। उत्कृष्टतर शिवयोगी को भी पश्यंती के मध्यम स्तर में जो शंका उठती है उसका समाधान उसे सदाशिव दशा पर आरूढ़ हो जाने पर पश्यंती के उत्कृष्ट स्तर के माध्यम से हो जाता है। इस तरह से प्रश्नकर्ता भगवान् अनंतनाथ बनते हैं और उत्तर देने वाले भगवान् सदाशिव। इस द्वितीय सोपान के गुरु-शिष्य संबंध को अंतराल या अवांतर संबंध कहते हैं। (च. त्री. वि., टि., पृ. 12)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अवासा

वस्‍त्ररहित।

पाशुपत संन्यासी को संन्यास की उत्कृष्‍ट दशा में अवासा होना होता है, अर्थात् जब साधक ज्ञानदशा पर पूर्णरूपेण स्थित हो जाए, उसका कालुष्य क्षीण हो जाए तथा उसे हृदय में विद्‍यमान लज्‍जा का भाव पूर्णरूपेण समाप्‍त हो जाए, तब उसे वस्‍त्ररहित होकर रहना होता है। वह जिस रूप में इस संसार में आया है उसी वास्तविक रूप में उसे रहना होता है ताकि उसके पास कुछ भी न रहे जो उसको मोहबन्धन में डालकर कलुषित करे। वह पूर्णतया निष्परिग्रही होकर अपने शुद्‍ध स्वाभाविक रूप में ही रहे। (पा.सू.कौ.भा. पृ. 35)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अविकल्पोपाय

देखिए शाम्भव-उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अविकृत परिणामवाद

वीरशैव दर्शन में जगत् को सत्य माना गया है। परशिव के शक्‍ति-संकोच और विकास में ही यहाँ प्रलय और सृष्‍टि का व्यवहार होता है। तात्पर्य यह है कि यह जगत् प्रलय के समय परशिव की विमर्श-शक्‍ति में सूक्ष्म रूप से रहता है और सृष्‍टि के समय विकसित होकर बाहर आ जाता है। अतः शक्‍ति-विकास ही सृष्‍टि और शक्‍ति-संकोच ही प्रलय है। जैसे कछुवा एक समय में अपने पैरों को बाहर निकालकर पानी में चलता रहता है और दूसरे समय उन पैरों को अपने में छिपाकर चुपचाप बैठा रहता है, वैसे ही परशिव की सृष्‍टिलीला के समय विमर्श शक्‍ति अपने में नित्यसंबंध से रहने वाले जगत् का विकास करती है।

जैसे पट (वस्‍त्र) के गोलाकार में विकसित होकर तंबू बनने से, अथवा वृक्ष के काल की महिमा से पत्र, पुष्प और शाखा आदि रूपों से विकसित होने पर भी पट और वृक्ष में कोई विकार नहीं होता, वैसे ही परशिव के भी स्वात्म-शक्‍ति की महिमा से भूमि, जल, आकाश आदि रूपों से विकसित होने पर शिव या शक्‍ति में कोई विकार नहीं होता है। शिव-शक्ति के अविकार रूप इस विकासवाद को ही ‘अविकृत-परिणाम-वाद’ कहा जाता है। (सि.शि. 10/2-9 इन श्‍लोकों की तत्व-प्रदीपिका टीका भी देखें – पृष्‍ठ 187-190)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

अविकृति

विकृति (या विकार) जिसकी नहीं है, वह अविकृति (या अविकार) है – यह इस शब्द का साधारण अर्थ है। इस अर्थ में पुरुषतत्त्व (निर्गुण आत्मा) अविकृति है। इसी दृष्टि से सांख्ययोगशास्त्र में पुरुष को ‘अपरिणामी’ कहा गया है। जो स्वयं किसी की विकृति या विकार नहीं है – इस अर्थ में मूल प्रकृति (या साम्यावस्था त्रिगुण) भी अविकृति कहलाती है, जैसा कि सांख्यकारिका में कहा गया है – मूलप्रकृतिरविकृतिः (का. 3)। प्रकृति अविकृति है, पर वह सभी विकारों की उपादान है – यह भी ज्ञातव्य है। चूंकि गुणसाम्य -रूप अवस्था का कोई उपादान नहीं हो सकता, इसलिए मूल प्रकृति को अविकृति कहना संगत ही है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अविच्छिन्न प्रकाश

प्रकाश से यहाँ तात्पर्य चेतना का स्वयमेव प्रकट होते रहने से है। जीवचेतना भी स्वयमेव प्रकट होती रहती है, परंतु वह विच्छिन्न रूप में चमकती है, क्योंकि किसी सीमित शरीर प्राण आदि जड़ वस्तु को ही अपना आप समझती है। पारमेस्वरी चेतना में किसी भी प्रकार की कोई भी सीमितता प्रकट नहीं होती है। विच्छिन्न का अर्थ होता है कटा हुआ अर्थात् किसी सीमा के बीतर बँधा हुआ। अतः असीम चेतना को अविच्छिन्न चेतना कहते हैं। देखिए प्रकाश।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

Search Dictionaries

Loading Results

Follow Us :   
  Download Bharatavani App
  Bharatavani Windows App