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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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स्वय जंगम

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत ‘जंगम’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

स्वयं प्रकाश

देखिए स्वप्रकाश।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वरसवाहिता

स्वरसवाही का भाव स्वरसवाहिता। आगन्तुक हेतु के बिना जो प्रवाहित हो सके – अन्य किसी के बिना ही जो सक्रिय रह सके – वह स्वरसवाही कहलाता है। योगसूत्र (2/1) में अभिनिवेश नामक कोश को स्वरसवाही कहा गया है (द्र. अभिनिवेश शब्द)। चूंकि अभिनिवेश स्वभावतः प्रवहणशील रहकर प्राणी को क्लिष्ट करता रहता है, अतः वह स्वरसवाही है। पूर्व-पूर्व जन्मों के मरणदुःखों के अनुभवजन्य संस्कारसमूह स्वरस हैं; स्वरसरूप से प्रवहणशील है। इस अर्थ में अभिनिवेश अर्थात् मरणत्रास स्वरसवाही है। ऐसा टीकाकारों का कहना है। अभिनिवेश जातमात्र प्राणी में, जिसने जीवन में किसी प्रमाण के आधार पर मरणदुःख का अनुभव नहीं किया है, वर्तमान रहता है, अतः उसको स्वरसवाही कहना उचित ही है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्वरूप संयम

भूत एवं इन्द्रिय के जिन पाँच रूपों में संयम करने पर भूतजय तथा इन्द्रियजय होती हैं, ‘स्वरूप’ उनमें एक है (योगसूत्र 3/44)। इस स्वरूप में जो संयम किया जाता है, वह स्वरूप-संयम कहलाता है। भूत का यह जो स्वरूप नामक रूप है, वह भूतों के इन पाँच धर्मों से सम्बन्धित है – मूर्ति = काठिन्य (पृथ्वी), स्नेह (जल), उष्णता (वह्रि), वहनशीलता = सदा गति (वायु) तथा सर्वतोगति (आकाश)। इन पाँच धर्मों को सामान्यधर्म भी कहा जाता है। धर्म एवं धर्मी में अभेद है – यह सांख्य-योग का मत है। स्वरूप संयम से प्राकाम्य रूप सिद्धि होती है। इन्द्रिय का जो स्वरूप नामक रूप है (योगसूत्र 3/47) उसमें जो संयम किया जाता है, वह भी स्वरूपसंयम कहलाता है। प्रकाशात्मा बुद्धिसत्त्व का एक विशिष्ट समूह ही इन्द्रिय का स्वरूप नामक रूप है। इन्द्रिय का यह रूप सामान्य-विशेषात्मक है, यह टीकाकारों ने दिखाया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्वरूपप्रतिष्ठ

निर्गुणपुरुष के विशेषण के रूप में यह शब्द प्रयुक्त होता है। इसका अर्थ है – ‘स्वरूप में प्रतिष्ठा है जिसकी वह’। (चित्ति या चित्ति शक्ति विशेष्य होने पर स्वरूप प्रतिष्ठा शब्द होगा)। कूटस्थ एवं अपरिणामी होने के कारण पुरुष (चित्तिशक्ति) वस्तुतः स्वरूप में ही प्रतिष्ठित रहता है, पर वृत्तिसारूप्य (योगसूत्र 1/3) के कारण वैसा प्रतीत नहीं होता। गुणविकारभूत बुद्धि आदि के लय हो जाने पर चित्तिशक्ति की अ-स्वरूपप्रतिष्ठा की जो प्रतीति हो रही थी, वह प्रतीति नहीं रहती, अतः गौणदृष्टि से कहा जाता है कि चित्तिशक्ति स्वरूप में प्रतिष्ठित हुई। ‘स्वरूप में प्रतिष्ठा’ इस अर्थ में स्वरूप-प्रतिष्ठा शब्द होता है, अतः यह भी कहा जा सकता है कि बुद्धि आदि के लय होने पर पुरुष की स्वरूप-प्रतिष्ठा होती है (वस्तुतः पुरुष की सदैव स्वरूप प्रतिष्ठा = स्वरूप में अवस्थान ही है)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्वलक्षण

वस्तु का अपना वह वैयक्तिक स्वरूप जिसका कोई भी संबंध सामान्य (जाति) आदि के द्वारा किसी के भी साथ नहीं होता, तथा जिसे किसी विशेष वाचक शब्द के द्वारा कहा या जाना नहीं जा सकता। निर्विकल्प अवस्था में अवभासित हो रही वस्तु का नाम एवं रूप की कल्पना से रहित अपना नियमित रूप। नियत देश एवं नियत काल से आविर्भूत होने के कारण संकुचित बनी हुई वस्तु का अपने ही स्वरूप में सीमित एवं अननुयायी स्वरूप अर्थात् वह स्वरूप जो अपने से इतर सभी वस्तुओं से विलक्षण एवं भिन्न हो। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 1-4-2)। वस्तु का अपनी जाति, गुण, क्रिया, नाम एवं द्रव्य इन पाँचों विशेषताओं को अपने भीतर रखता हुआ परंतु फिर भी उनके विशेष आभास से रहित एक साथ आभासित होने वाला वैयक्तिक रूप। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी खं. 2 पृ. 71-2)। ऐसा रूप जिसमें इन पाँचों भेदों के विद्यमान होने पर भी इनमें से किसी एक भेद का भी स्फुट आभास नहीं होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वसंवेदन

स्वानुभव। स्वप्रकाश। स्वरूपभूत संवेदन। अपने वास्तविक स्वरूप का आभास। स्वानुभव सिद्ध स्वप्रकाश संवित्ति। बिना किसी बाह्य एवं अंतःकरणों की सहायता के स्वात्म अनुभव से ही होने वाला अपने अविच्छिन्न एवं शुद्ध प्रकाशरूप स्वरूप का आभास। स्वसंवित्तिरूप प्रमातृ तत्त्व। (भास्करी 2, पृ. 367) अपनी शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण परमेश्वरता के नैसर्गिक सामरस्यात्मक मूलभूत स्वभाव का साक्षात् अपरेक्ष अनुभव। (भास्करी 2 पृ. 367)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वातंत्र्य शक्ति

अन्य किसी की भी अपेक्षा न रखने वाली परमशिव की मूलभूत शक्ति। विमर्शशक्ति। परमशिव की परमेश्वरता को द्योतित करने वाली उसकी सारभूत शक्ति। सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान एवं अनुग्रह – इन पाँचों कृत्यों को स्वेच्छा से स्वतंत्रतापूर्वक सतत गति से करते रहने में सहायक बनने वाली परमशिव की स्वभावभूत पराशक्ति। एकत्व में अनेकत्व तथा अनेकत्व में एकत्व को अवभासित करने जेसे अतिदुर्घट कार्यों का संपादन करने वाली शक्ति। पूर्ण अहं परामर्श रूपा शक्ति। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 177)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वातंत्र्य सिद्धांत

काश्मीर शैव दर्शन का वह मूलभूत सिद्धांत जिसके अनुसार केवल परमशिव ही एकमात्र परम सत्य तत्व है और शेष सब कुछ उसी की स्वतंत्र लीला का विलास है। वह दार्शनिक सिद्धांत जिसके अनुसार विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय दोनों ही रूप परमशिव की ही स्वातंत्र्य लीला के विलास हैं। अभेद में भेद को तथा भेद में अभेद को नित्यप्रति अवभासित करते रहने वाली परमशिव की स्वभावभूत स्वातंत्र्य शक्ति की स्वच्छंद लीला के विलास का सिद्धांत। परमशिव शुद्ध प्रकाश स्वरूप है। विमर्श प्रकाश का मूलभूत स्वभाव है, क्योंकि विमर्श वस्तुतः प्रकाश से भिन्न और कोई वस्तु है ही नहीं। ये दोनों भाव एक दूसरे से सर्वथा अभिन्न हैं। परमशिव इन दोनों भावों का परिपूर्ण सामरस्यात्मक अनुत्तर संवित् तत्व है। उसके भीतर उसी के विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वात्मक दोनों ही रूप समरस होकर शुद्ध संवित् के रूप में ही चमकते हैं। वह अपने ही स्वातंत्र्य से समस्त विश्व को अवभासित करता हुआ भी स्वयं सदैव परिपूर्ण संवित् रूप में ही प्रकाशमान होता रहता है। समस्त बाह्य प्रपंच को अवभासित करते हुए भी परमशिव में किसी भी अंश में किसी भी प्रकार का कोई भी परिणाम या विकार नहीं आता है क्योंकि समस्त अभिव्यक्ति केवल प्रतिबिंबन्याय से होती हुई उसी के स्वातंत्र्य का विलास है तथा उसी की नैसर्गिक परमेश्वरता का विश्वात्मक रूप है। वस्तुतः परमशिव अपने ही भीतर अपने द्वारा ही अपने ही स्वातंत्र्य से अपने आनंद के लिए विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वात्मक दोनों रूपों में अवभासित होता रहता है और ऐसा होने पर भी वह सर्वदा और सर्वथा परिपूर्ण संविद्रूप ही बना रहता है। इस प्रकार सभी कुछ उसी के भीतर उसी के स्वातंत्र्य का विलास होने के कारण उससे इतर कुछ भी नहीं है। इसी सिद्धांत को दृष्टि में रखते हुए क्षेमराज ने काश्मीर शैव दर्शन को ‘स्वतंत्र् शिवाद्वय दर्शन’ भी कहा है। (स्व. सं. पृ. 10)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वाधिष्ठात चक्र

लिंग के मूल में सुषुम्ना नाडी स्थित है। इसके मध्य भाग में सिन्दुर के समान अरुण वर्ण के षड्दल कमल की स्थिति मानी गई है। इसी को स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं। इसको स्वाधिष्ठान इसलिये कहते हैं कि यह स्व शब्द से अभिप्रेत पर लिंग का अधिष्ठान है, घर है, अर्थात् इसमें परलिंग का निवास माना जाता है। इस षड्दल कमल में बँ भँ मँ यँ रँ लँ इन छः बीजाक्षरों की स्थिति मानी गई है। इस स्वधिष्ठान चक्र के मध्य में अर्धचन्द्राकार शुक्ल वर्ण का वरुण देवता का मण्डल अवस्थित है। इसके बीच में बंकार बीज आलोकित है। इसका वाहन मकर है। सारे विश्व के पालक भगवान् विष्णु इसके अधिकारी हैं और राकिणी नामक योगिनी इस चक्र की अधिष्ठात्री शक्ति है (श्रीतत्त्वचिन्तामणि, षट्चक्र प्रकरण, पृ. 6)।
Darshana : शाक्त दर्शन

स्वार्थसंयम

पुरुषज्ञान जिस संयम से प्रकट होता है, वह स्वार्थसंयम कहलाता है (योगसूत्र 3/35)। इस स्वार्थसंयम का साक्षात् विषय अपरिणामी कूटस्थ पुरुष (तत्त्व) नहीं होता, बल्कि पौरुषेय प्रत्यय ही इस संयम का विषय होता है। बुद्धिवृत्ति पुरुष को प्रकाशित नहीं कर सकती। बुद्धिवृत्ति में पुरुष का जो प्रतिबिम्ब है, उस प्रतिबिम्ब में संयम (ध्यान) करना ही स्वार्थसंयम है – यह संयम ही पुरुषज्ञान (= आत्मसाक्षात्मकार) का हेतु है। इस स्वार्थसंयम के कुछ बाह्य फल भी हैं (पुरुषज्ञान प्रकट होने से पहले ये फल प्रकट होते हैं)। वे हैं – प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता नामक सिद्धियों का आविर्भाव (योगसूत्र 3/36)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मातृका क्रम में अंतिम ऊष्म वर्ण। यह वर्ण शक्ति तत्त्व को अभिव्यक्त करता है। अ अनुत्तर परमशिव है और ह उसकी शक्ति है। शक्ति और शिव के भीतर ही सारा प्रपंच विद्यमान है। सारे ही प्रपंच का एक शब्द से विमर्श करना हो तो अ के साथ ह को जोड़कर ऊपर अंतःसारता को अभिव्यक्त करने वाले अनुस्वार को लगाकर ‘अहं’ यह महामंत्र बनता है जो परिपूर्ण परमेश्वरता को अभिव्यक्त करता है। क से लेकर ह तक के वर्ण पृथ्वी से लेकर शक्ति तक के तत्त्वों को अभिव्यक्त करते हैं। यह अभिव्यक्ति प्रतिबिंब न्याय से होती है। प्रतिबिंब का आभासन बिंब के आभास से उल्टा होता है। दाँया बाँया हो जाता है और बाँया दाँया, पूर्व पश्चिम हो जाता है और पश्चिम पूर्व। अतः शक्ति रूप प्रथम तत्त्व अंतिम वर्ण ‘ह’ के रूप में और अंतिम तत्त्व पृथ्वी प्रथम वर्ण ‘क’ के रूप में प्रकट हो जाते हैं। शेष सभी तत्त्व भी विपरीत क्रम से ही अभिव्यक्त होते हैं। इस तरह से इन्हें अपने ही संवित् स्वरूप में प्रतिबिंबवत् चमकते हुए देखने के अभ्यास को मातृका योग कहते हैं, जिसमें ह वर्ण का एक प्रमुख स्थान है। (स्वच्छन्द तंत्र, पृ. 4-257; स्व. त. उ. खं. 2 पृ. 161)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

हठयोग

हठयोग योगविद्या की एक विशिष्ट धारा का नाम है। यह विद्या बहुत ही प्राचीन है, पर इसके सभी उपलब्ध ग्रन्थ अप्राचीन हैं, यद्यपि इन ग्रन्थों में कुछ प्राचीन आचार्यों के वाक्य उद्धृत मिलते हैं। ‘हठ’ शब्द की प्रचलित व्याख्या हैः ‘ह’ (अर्थात् सूर्य) तथा ‘ठ’ (अर्थात् चन्द्र) का संयोग (सूर्य-चन्द्र के भी प्राण-अपान आदि कई तात्पर्य हैं)। यह व्याख्या काल्पनिक प्रतीत होती है, यद्यपि प्राण-अपान के एकीकरण का हठयोगाभ्यास में प्रमुख स्थान है। हम समझते हैं कि हठपूर्वक (= बलपूर्वक) अर्थात् प्रधानतः बाह्य उपाय-विशेष का प्रयोग करते हुए योग (=वृत्तिरोध) करना हठयोग है।
हठयोगी प्रायः योगांगों की गणना आसन से शुरू करते हैं। इससे यह न समझना चाहिए कि हठयोग में यम-नियम का अभ्यास वर्जित है। योगांग न होने पर भी हठयोगी इनका अभ्यास करते ही हैं, क्योंकि हठयोग में जिन भावना आदि का उपदेश दिया जाता है, वे यमनियम के बिना साध्य नहीं हैं। हठयोग के साधनों में प्राणायाम केन्द्रभूत है, यद्यपि प्रत्याहारादि का विधान भी इस शास्त्र में किया गया है। हठयोगीय प्रत्याहारादि तत्त्वतः योगसूत्रोक्त-प्रत्याहार से स्थूल हैं। हठयोग में विवेकाभ्यास प्रधान नहीं है, अतः अविद्या का अत्यन्त नाश हठयोगीय पद्धति द्वारा संभव नहीं। हठयोग से तपोजात सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
हठयोगीय प्रक्रिया के अनुशीलन से यह ज्ञात होता है कि मुद्रादि का अभ्यास सकोचन-प्रयत्न को बढ़ाता है, जिससे तंत्रिका-तंत्र निरोधाभिमुख होता है (कृत्रिम रूप से)। इससे रुद्धप्राण होकर रहना संभव होता है। इससे चित्तरोध यद्यपि नहीं होता, तथापि रोध में सहायता होती है। हठप्रक्रिया से शरीर को मृतवत् करने पर चिन्ता करने वाला मस्तिष्क रुद्ध हो जाता है, अतः एक प्रकार का दुःखनाश भी होता है। यह नाश दुःख का आत्यंतिक नाश नहीं है जो योगविद्या का अन्तिम लक्ष्य है।
हठप्रक्रिया का मुख्य फल नाडीशुद्धि, बिन्दुजय (ऊर्ध्वरेता होना), नादश्रवण, शरीररोधयोग्यता एवं अंशतः कृत्रिम वृत्तिरोध है। हठयोगीय प्रक्रिया की सहायता लेकर यदि कोई ज्ञानाभ्यास द्वारा संस्कारक्षय-पूर्वक चित्तरोध करने की चेष्टा करेगा तो वह प्रकृत कैवल्यमार्ग में जा सकेगा। केवल हठप्रक्रिया से संस्कारक्षय नहीं होता। उच्चकोटि का दार्शनिक ज्ञान हठयोगशास्त्र का विषय नहीं है। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि हठयोगीय इडादि नाडियाँ आयुर्वेदशास्त्र-सम्मत नहीं हैं।
हठयोग के ग्रन्थों में शिव को इस विद्या का मूल प्रवर्तक कहा गया है। मत्स्येन्द्र, गोरक्ष आदि इस योग के प्रधान आचार्यों में माने गए हैं। हठयोगसिद्धों के नामों की एक सूची हठयोगप्रदीपिका (1/5 -8) में मिलती है। घेरण्डसंहिता, हठयोगप्रदीपिका, योगचिन्तामणि आदि कई हठयोगीय ग्रन्थ इस समय सुप्रचलित हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हरित्रय

हरि के तीन रूप हैं – पूर्वमीमांसा में कहा गया यज्ञरूप, वेदान्त में कथित साकार ब्रह्म रूप तथा श्रीमद्धागवत में प्रतिपादित अवतारी श्री कृष्ण रूप (त.दी.नि.पृ. 38)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

हंस मन्त्र

हकार, बिन्दु सकार और विसर्ग के योग से हंस मन्त्र की निष्पत्ति होती है। अनुत्तर, अकुल स्वरूप चिद्धाम में स्वयं उन्मिषित होने वाले हकार की स्थिति ऊपर और नीचे विसर्जनीय अनुप्राणित विसर्ग स्वरूप जीव की सकार की स्थिति रहती है। हान और समादान, त्याग और ग्रहण की प्रक्रिया के आधार पर इस हंस मन्त्र का उच्चारण पराशक्ति स्वयं ही करती है। इसीलिए “मैं वह शिव हूँ” इस तरह से अपने स्वरूप का परिचय वहाँ प्राप्त होता है। प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और अपान जब शरीर में पुनः प्रविष्ट होता है, तो वह हकार का उच्चारण करता है। इस तरह से प्राण और अपान की गति जब तक चलती रहती है, तब तक जीव प्रतिदिन निरन्तर ‘हंस-हंस’ इस मन्त्र का उच्चारण करता रहता है।
शक्ति संगम तन्त्र (1/3/77-87) में प्रणव के प्रसंग में हंस स्वरूपिणी कामकला का विवरण बताते हुए कहा गया है कि ‘सोSहम्’ इस हंस मन्त्र में प्रणव और कामकला दोनों की स्थिति है। उक्त ग्रन्थ के चतुर्थ खण्ड के उपोद्धात में इस विषय पर प्रकाश डाला गया है। विज्ञानभैरव के 42वें श्लोक में भी अजपा गर्भित प्रणव की उपासना वर्णिंत है।
हंस मन्त्र में विद्यमान सकार प्राण और प्रकाश (सूर्य अथवा दिन) का प्रतिनिधित्व करता है तथा हकार जीव (अपान) तथा क्षपा (रात्रि) का। सभी प्राणियों के अनुभव के आधार पर यह बात सिद्ध है कि प्राण (सकार) की गति स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर तथा अपान (हकार) की गति निरन्तर भीतर की ओर चलती रहती है। प्राण जब हृदय से ऊपर की तरफ चढ़ता है, तब ‘हं’ वर्ण की उत्पत्ति होती है और जब वह द्वादशान्त से उतरता है, तो उसकी अपान दशा में ‘सः’ वर्ण उत्पन्न होता है। इन दो वर्णों का स्पष्ट उच्चारण करते रहने से ही जीव ‘जीव’ कहलाता है। यह त्याज्य है, यह उपादेय है, यह मेरा है, यह मेरा नहीं है – इस तरह से छोड़ने और लेने के प्राण और अपान के धर्मों से समानता के कारण ही जीव हंस कहलाता है। हान (त्याग) और उपादान (परिग्रह), छोड़ना और लेना- इन दो व्यापारों में हंस और जीव की समानता है। हंस पक्षी जैसे दूध पी जाता है और पानी छोड़ देता है, उसी तरह से जीव भी प्राण और अपान के हान और उपादान का व्यापार निरन्तर करता रहता है। इसी समानता के आधार पर जीव को और जीव के इस निरंतर चल रहे श्वास-प्रश्वास प्रवाह को क्रमशः हंस और हंसमन्त्र के नाम से अभिहित किया गया है।
दिन-रात प्राण और अपान की इस निरंतर गतिशीलता के कारण इस हंस मन्त्र का हंस जीव एक अहोरात्र में 21600 बार उच्चारण करता है। इनमें से मूलाधार चक्र में गणपति को 6 सहस्र, स्वाधिष्ठान चक्र में ब्रह्मा को 6 सहस्र, मणिपुर चक्र में विष्णु को 6 सहस्र, अनाहत चक्र में शिव को 6 सहस्र, विशुद्धि चक्र में जीवात्मा को एक सहस्त्र, आज्ञाचक्र में गुरु को एक सहस्त्र जप निवेदित किये जाते हैं। इस तरह से स्वाभाविक रूप से निरन्तर चल रहे जप को निवेदित करने के उपरान्त साधक इस हंस मन्त्र का 108 बार जप करता है। निरुत्तर तन्त्र में अजपा गायत्री के दो भेद बताये हैं – व्यक्त और गुप्त। हंस तन्त्र का जप व्यक्त और प्राण और अपान के व्यापार के रूप में निरन्तर चल रहा जप गुप्त कहा जाता है।
माणिक्य के मैल को साफ कर देने पर जैसे उसमें चमक पैदा हो जाती है, उसी तरह से मध्य क्षण का उद्धार करने पर ‘हंसः’ इस मंत्र का विमर्श भी जाग उठता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

हसित

पाशुपत धर्म की विधि का एक अंग।

पाशुपत योगी को महेश्‍वर के मंदिर में भगवान महेश्‍वर की मूर्त्‍ति के समक्ष उच्‍च स्वर में हँसना होता है। अर्थात् मुँह व गला पूरा खोलकर अत्यधिक उच्‍च स्वर में अट्‍टहास करना होता है। यह उच्‍च अट्‍टहास हसित कहलाता है। हसित पाशुपत साधक की शिवपूजा का एक विशिष्‍ट अंग है। इसे छः उपहारों के बीच एक उपहार के रूप में गिना गया है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 13)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

हस्त

सुचित्‍त, सुबुद्‍धि, निरहंकार, सुमन, सुज्ञान और सद्‍भाव इन छः प्रकार के शुद्‍ध अंतःकरणों को वीरशैव दर्शन में ‘हस्त’ कहा गया है। जैसे बाह्य वस्तुओं के स्पर्श के लिए तथा किसी कार्य को करने के लिए हाथ एक प्रधान माध्यम होता है। उसी प्रकार साधक अपने अंतरंग आत्मतत्व के स्पर्श, अर्थात् ज्ञान के लिए सुचित्त, सुबुद्‍धि आदि इन छः शुद्‍ध अंतःकरणों को माध्यम (साधन) बनाता है। अतः इन अंतःकरणों को ‘हस्त’ शब्द से संबोधित किया गया है। ये क्रमशः भक्‍त, महेश्‍वर आदि षट्‍स्थल के साधकों के हस्त माने जाते हैं। चित्‍त जब विषय का चिंतन छोड़कर शिव का चिंतन करने लगता है, तो उसे ‘सुचित्त’ कहते हैं। इसे भक्‍त-स्थल के साधक का हस्त माना जाता है, अर्थात् सुचित्त साधक ही भक्‍त कहलाता है। शिव के अस्तित्व को निश्‍चय करने वाली बुद्‍धि को ‘सुबुद्‍धि’ कहते हैं। इसे महेश्‍वर का हस्त माना गया है। इस सुबुद्‍धि के माध्यम से महेश्‍वर को शिव के अस्तित्व के संबंध में होने वाले संशय का निरसन हो जाता है। सर्वत्र ‘अहं-अहं’ इस भावना को त्यागकर ‘सर्व शिवमयं’ इस प्रकार की भावना को ‘निरहंकार’ कहते हैं। इसे प्रसादी का हस्त माना गया है। इस निरहंकार-हस्त के माध्यम से यह प्रसादि-स्थल का साधक सुख, दुःख आदि सभी अवस्थाओं में शिव के अनुग्रह का ही दर्शन करता है। चान्चल्यरहति मन को ‘सुमन’ कहा जाता है। यह प्राणलिंगी का हस्त है। इसी के माध्यम से यह साधक हृदय में ज्योतिस्वरूप से विराजमान ‘प्राणलिंग’ की अर्चना, अर्थात् ध्यान करता है। शिव-स्वरूप के ज्ञान को ‘सुज्ञान’ कहते हैं। यह शरण का हस्त माना गया है। इस सुज्ञान के माध्यम से साधक को शिव का साक्षात्कार होता है। ‘मैं शिवस्वरूप हूँ’ इस प्रकार की भावना को ‘सद्‍भाव’ कहते हैं। यह ऐक्यस्थल के के साधक का हस्त है, अर्थात् यह साधक ‘शिवोടहं भावना’ के माध्यम से निदिध्यासन करता हुआ स्वयं शिवस्वरूप हो जाता है। इस प्रकार ये शुद्‍ध अंतःकरण शिव की उपासना में साधन बनकर साधक को शिवस्वरूप बनाने में सहायक होते हैं, अतः इन्हें हस्त कहा गया है (अनु.सू. 7/45-50)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

हान

व्यासभाष्य में योगशास्त्र को चिकित्साशास्त्र के समान ‘चतुर्व्यूह’ अर्थात् चार अंगों वाला शास्त्र कहा गया है (व्यासभाष्य 2/15), जिसमें हेय, हेयहेतु, हान एवं हानोपाय – ये चार विचार के विषय बताए गए हैं। हान का अर्थ है – त्याग। योगशास्त्र में हान का विशेष अर्थ है – बुद्धि और पुरुष के संयोग का अभाव। यह संयोगाभाव ही द्रष्टा का कैवल्य (= केवलीभाव) है, क्योंकि इस अवस्था में गुण के साथ द्रष्टा पुरुष का अमिश्रीभाव (= असंयोग) होता है और फलतः दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति हो जाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हानोपाय

अविद्यामूलक जो द्रष्टा-दृश्य संयोग है, उसका अभाव ‘हान’ कहलाता है। यह हान ही द्रष्टा का कैवल्य है – यह योगशास्त्रीय मान्यता है। अविप्लवा (= सर्वथा मिथ्याज्ञानहीन) विवेकख्याति ही इस हान का उपाय है (द्र. योगसू. 2/26)। इस विवेकख्याति के द्वारा सभी क्लेश सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, अतः द्रष्टा का स्वरूप में अवस्थान होता है (यही कैवल्य है)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हार्दानुगृहीत

हृदयाकाश में वर्तमान परमात्मा द्वारा अनुग्रह प्राप्त भक्त हार्दानुगृहीत पद से अभिहित है। “गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे”। इस श्रुति के अनुसार हृदयाकाशगत परमात्मा हार्द कहे जाते हैं (अ.भा.पृ. 1328)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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