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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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आनंद शक्ति (देखिए) को द्योतित करने वाला वर्ण। अ अर्थात् अनुत्तर शक्ति पर ही पूर्ण विश्रांति की स्थिति को अभिव्यक्त करने वाला आनंदशक्ति स्वरूप वर्ण। (तन्त्र सार , पृ. 12; तन्त्रालोक, 3-67,68)। अ अनुत्तर परम शिव है। आनंद उसका नैसर्गिक स्वभाव है। इसी स्वभाव के प्रभाव से परमशिव में जगत् सृष्टि के प्रति इच्छा होती है। अनुत्तर और इच्छा के बीच में आनंद की स्थिति है। इसी कारण अ और इ के बीच में आ ठहरता है। इस आ को पर विसर्ग भी कहते हैं क्योंकि सृष्टि का कारण बनने वाला पारमेश्वर विसर्ग का प्रारंभ यहीं से होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

आकाशगमन

एक सिद्धि जिसे प्राप्त करके योगी आलंबनहीन होकर विचरण कर सकता है (योगसूत्र 3/42)। इसके दो उपाय हैं – (1) शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करना तथा (2) लघुतूलसमापत्ति (अल्पभारयुक्त तूला आदि पर प्रक्रिया विशेष के अनुसार समाहित हो जाना)। ‘भारहीनता की भावना’ से शरीर -उपादान अपने गुरुत्व नामक धर्म से हीन हो जाता है, अतः शरीर लघु होता है, जिससे आकाश में चलना संभव होता है। इस सिद्धि में शरीर के अवयव यथावत् रहते हैं, उसका भार मात्र अत्यल्प हो जाता है या भार नहीं रहता – यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

आकूति

कर्मेन्द्रियों का एक धर्म आकूति है। इसी के कारण वागिन्द्रिय द्वारा वचन क्रिया, हाथ द्वारा आदान (ग्रहण) क्रिया, पैर द्वारा गमन क्रिया, गुदेन्द्रिय द्वारा मल विसर्ग क्रिया तथा जननेन्द्रिय द्वारा आनंद क्रिया की उत्पत्ति होती है (कर्मेन्द्रिय से संबद्ध होने के कारण आकूति बाह्य प्रयत्न रूप है (अ.भा.पृ. 500, 782)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

आगति

परलोक से जीव का इस लोक में आना आगति है तथा इस लोक से जीव का परलोक में गमन शास्त्रों में गति शब्द से कहा गया है (अ.भा.पृ. 710)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

आगम

1. दिव्य ज्ञान। आ = चारों ओर से, गम = वस्तु तत्त्व का बोध कराने वाला ज्ञान। पराशक्ति के स्फार रूप ज्ञान या शास्त्र को आगम कहते हैं। (स्वच्छन्दतंत्र उद्योत, खं. 2, पृ0. 214)।
2. साक्षात्कारी सिद्ध की अपनी उत्कृष्टतर योगज अनुभूति को आगम कहते हैं। उसी से उन तत्त्वों का प्रकाशन होता है जिन्हें प्राणी लौकिक प्रमाणों के द्वारा जान नहीं सकते। (वही)।
3. साक्षात्कारी सिद्ध अपनी योगज अनुभूति को उसके अनुकूल शब्दों के माध्यम से जब प्रकट करता है तो उसकी वह शब्दावली भी आगम ही कहलाती है। इस तरह से सारे आर्ष ग्रंथ और देवताओं द्वारा उपदिष्ट शास्त्र भी आगम कहलाते हैं। ये शब्दात्मक आगम द्वितीय कोटि के आगम होते हैं। मुख्य आगम तो योगियों की स्वानुभूति ही है।
4. शिव और पार्वती के संवाद।

आगम (त्रिक) –
1. नामक तंत्र, सिद्ध तंत्र और मालिनी तंत्र।
2. स्वच्छंद तंत्र, विज्ञान भैरव, चरात्रीशिका, शिवसूत्र आदि।

आगम (शैव)
ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव और अघोर – इन पाँच मंत्रों के द्वारा उपदिष्ट आगम। भैरवों, रुद्रों आदि के द्वारा उपदिष्ट आगम। दस भेदप्रधान शिवआगम, अठारह भेदाभेद प्रधान रुद्र आगम और चौसठ अभेदप्रधान भैरव आगम। (भास्करीवि.वा., 1-391, 392)। इस समय उपलब्ध आगमों में से मालिनी विजयोत्तर तंत्र, स्वच्छंद तंत्र, शिव सूत्र, विज्ञान भैरव और परात्रीशिका अद्वैत प्रधान शैवागम हैं।

Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

आगम-प्रमाण (=आप्तवचन)

सांख्य-योग में स्वीकृत तीन प्रमाणों में से यह एक है। ‘आगम’ शब्द योगसूत्र (1/7) में है; सांख्यकारिका में ‘आप्तवचन’ शब्द का इस अर्थ में प्रयोग हुआ है। यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि इस शास्त्र में आगम या आप्तवचन प्रमाणरूप बुद्धिवृत्ति (चित्तवृति) का एक भेद है – यह शब्द विशेष-रूप नहीं है, यद्यपि गौण दृष्टि से शब्दविशेष को भी आगम प्रमाण या आप्तवचन कहा जाता है। माठरवृत्ति (सां. का. 4 -5) वाक्यविशेष को ही आप्तवचन समझती है – ऐसा प्रतीत होता है।
आप्तवचन की परिभाषा में सांख्यकारिका में ‘आप्तश्रुति’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। वाचस्पति के अनुसार (श्रुति = वाक्यार्थज्ञान तथा आप्त = युक्त = सर्वदोषहीन)। इसका अर्थ दोषहीन वाक्यार्थज्ञान है जो तभी संभव होता है जब वह अपौरुषेय वेदवाक्य से उत्पन्न हो। अन्यान्य शास्त्रों से होने वाला ज्ञान तभी प्रमाण होगा, जब वे वेदमूलक हों। कपिलादि आचार्यों का ज्ञान भी वस्तुतः वेदमूलक है। जो शास्त्र वेदमूलक नहीं हैं, वह प्रमाण नहीं हैं। युक्तिदीपिका भी आप्तश्रुति से वेदवाक्यजनित ज्ञान तथा वेदमूलक शास्त्रवाक्यजनित ज्ञान – यह द्विविध ज्ञान समझती है।
कोई आप्त-श्रुति का अर्थ आप्त (सनत्कुमारादि व्यक्ति) तथा श्रुति (वेद) करते हैं अर्थात् प्रमाणभूत व्यक्ति के वाक्य को सुनने पर अथवा वेदवाक्य (जो पुरुषवाक्यविशेष नहीं है), को सुनने पर जो निश्चय-ज्ञान होता है, वह आप्तवचन है। ब्रह्मा के आप्त होने के कारण उनका वेदरूप वचन तथा मन्वादि के आप्त होने के कारण उनके स्मृति रूप वचन=आप्तवचन है यह भी कोई कहते हैं। सांख्य सूत्र (1/101) में ‘आप्तोपदेशः शब्द’ कहा गया है। भिक्षु ने आप्तोपदेश का अर्थ – ‘निर्दोष शब्दजन्य ज्ञान’ किया है।
इस प्रमाण का मुख्य विषय वह है जो अत्यन्त परोक्ष है अर्थात् जो प्रत्यक्ष और अनुमान से सिद्ध नहीं होता (जैसे स्वर्ग आदि की सत्ता)। अन्य प्रमाण से ज्ञेय विषय भी आगमप्रमाण से ज्ञात हो सकते हैं।
इस संदर्भ में योगसूत्र (1/7) और उसके भाष्य की व्याख्या में कुछ और विशेष बातें इस प्रकार बताई गई हैं – आगम का संबंध वस्तु के सामान्य धर्मों से है, विशेष धर्म से नहीं, क्योंकि विशेष धर्मों के साथ शब्दों का संकेत नहीं है। आगम प्रमाण में वक्ता और श्रोता की विद्यमानता अपरिहार्य है – ग्रंथपाठ गौण आगमप्रमाण है। वक्ता यदि आप्त अर्थात् यथार्थज्ञाता न हो तो उनके उपदेश को सुनकर जो ज्ञान होगा वह सदोष आगम होगा। निर्दोष वक्ता ईश्वर है अथवा अपौरुषेय वेदवाक्य सर्वथा निर्दोष है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

आचार

शास्‍त्रविहित कर्मों के आचरण से शिवभक्‍ति की उत्पत्‍ति होती है। इन कर्मों का अनुष्‍ठान ही ‘आचार’ कहलाता है। यह आचार जिज्ञासु तथा ज्ञानी दोनों के लिये अलंकार बन जाता है। अतः वीरशैव दर्शन में ज्ञान के साथ शास्‍त्रविहित कर्मों के अनुष्‍ठान रूप ‘आचार’ को अधिक महत्व दिया गया है। (चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद. 9/16-18)। (वीरशैव दर्शन में ‘पंचाचार’ और ‘सप्‍ताचार’ प्रसिद्‍ध हैं। इनकी परिभाषा यथास्थान देखिए।
Darshana : वीरशैव दर्शन

आचार

तान्त्रिक संम्प्रदाय सात प्रकार के आचारों में विभक्त हैं। कुलार्णव तन्त्र (2/7-8) में बताया गया है कि वेदाचार सबसे श्रेष्ठ है। वेदाचार से वैष्णवाचार महान् है। वैष्णवाचार से शैवाचार उत्कृष्ट है। शैवाचार से दक्षिणाचार उत्तम है। दक्षिणाचार से वामाचार श्रेष्ठ है। वामाचार से सिद्धान्ताचार उत्तम है और सिद्धान्ताचार की अपेक्षा कौलाचार श्रेष्ठ है। इस संसार में कौलाचार से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। प्राणतोषिणी (पृ. 965-966) में उद्धृत नित्यातन्त्र प्रभृति ग्रन्थों में इन सातों आचारों का वर्णन मिलता है। इनका विवरण नीचे अकारादि क्रम से स्थापित इन शब्दों की व्याख्या में देखना चाहिये।
(क) कौलाचार
कौलाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 1027) में उद्धृत नित्यातन्त्र के वचनों में बताया गया है कि इस कौलाचार का आचारण करने वाले के लिये दिशा अथवा काल का भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। तिथि आदि के नियमों को मानना भी जरूरी नहीं है। महामन्त्र के साधन की भी कोई आवश्यकता नहीं है। कभी शिष्ट कभी भ्रष्ट और कभी भूत, पिशाच आदि के समान वह नाना प्रकार के वेष धारण कर इस पृथ्वी पर निःशंक विचरण करता है। जो साधक कर्दम और चन्दन में, मित्र और शत्रु में, श्मशान और गृह में, स्वर्ण और तृण में कोई भेद नहीं देखता, उसको कौल कहते हैं। उसका आचारण ही वास्तविक कौलाचार है। कुलाचार या कौलाचार के नाम से इस विषय का शास्त्रों में विस्तार से वर्णन मिलता है। अर्थरत्नावली टीका (पृ. 134-135) में विद्यानन्द ने कुलाचार का लक्षण बताते हुए लिखा है कि पर, सहज, कुलज और अन्त्यज क्रम से सोलह, आठ, चार और एक योगिनियों को आमंत्रित करना, उनके उपवास आदि का अनुष्ठान कर पवित्र हो जाने पर सुवर्ण, वस्त्र, माला, चन्दन, धूप, दीप, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य, चर्वण द्रव्य, पात्रासादन तथा दक्षिणा दान आदि से उनको संतुष्ट करना। यही वास्तविक कुलाचार है।
(ख) दक्षिणाचार
दक्षिणाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत एक वचन में बताया गया है कि दक्षिणाचार का पालन करने वालों को चाहिये कि वे वेदाचार के अनुसार आद्या शक्ति की पूजा करें और रात को संवित् (विजया) का ग्रहण करके एकाग्र चित्त से जप करें।
यद्यपि नित्यातन्त्र और कुलार्णव में सात प्रकार के आचारों का उल्लेख है, तथापि प्रधानतः दक्षिणाचार और वामाचार ये दो प्रकार के आचार ही देखने में आते हैं। दक्षिणाचार तन्त्र में लिखा है कि इस तन्त्र में जिस प्रकार की कर्मपद्धति वर्णित है, वह शुद्ध वैदिक है। वास्तव में दक्षिणाचारी लोग वेदोक्त विधि के अनुसार ही भगवती की अर्चना करते हैं। वे वामाचारियों की तरह मद्य, मांस का सेवन तथा शक्ति साधन आदि नहीं करते। दक्षिणाचार तन्त्र में रक्त, मांस आदि से रहित सात्त्विक बलि ही ब्राह्मण के लिये विहित है। दक्षिणामूर्ति द्वारा प्रवृत्त होने से इसको दक्षिणाचार कहा जाता है।
(ग) वामाचार
वामाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत आचार भेद तन्त्र के अनुसार वामाचार की परिभाषा यह दी गई है कि पंचतत्त्व अर्थात् पंचमकार, खपुष्प अर्थात् रजस्वला का रज और कुलस्त्री का पूजन प्रभृति के माध्यम से आद्या शक्ति की उपासना करने वाली विधि को वामाचार कहते हैं। इसमें साधक अपने में वामा भाव को जगाता है और इसी रूप में वह परा शक्ति की उपासना करता है। बंगाल में तान्त्रिक शब्द से प्रधानतः वामाचारियों का ही बोध होता है। किसी के मत से ये वेदविरुद्ध आचरण करने से वामाचारी के नाम से प्रसिद्ध है। बंगाल के तान्त्रिकों में वामाचार और दक्षिणाचार दोनों ही मिश्रित हैं। उनके मत से मनुष्य जन्ममात्र से दक्षिणाचारी तथा दीक्षा और अभिषेक के बाद वामाचारी कहलाता है।
(घ) वेदाचार
वेदाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 280-283) में उद्धृत नित्यातन्त्र में बताया गया है कि साधक को चाहिये कि वह ब्रह्म मुहूर्त में उठे और गुरु के नाम के अंत में आनंदनाथ बोल कर उनको प्रणाम करे। फिर सहस्त्र दल पद्म में ध्यान करके पंचोपचार पूजा करे और वाग्भव बीज का जप करके परम शक्ति का ध्यान करे। संक्षेप में यही विधि वेदाचार के नाम से प्रसिद्ध है। उक्त ग्रन्थ में रुद्रयामल, विश्वसार तन्त्र प्रभृति के आधार पर इस विषय को विस्तार से समझाया गया है। उस सारे प्रकरण का सार यह है कि सौन्दर्यलहरी के टीकाकार लक्ष्मीधर ने आन्तर वरिवस्था के माध्यम से जिस समयाचार का प्रतिपादन किया है, उसी का नामान्तर वेदाचार है।
(च) वैष्णवाचार
वैष्णवाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत नित्यातन्त्र में बताया गया है कि वैष्णवाचार का पालन करने वाले को वेदाचार की विधि के अनुसार सर्वदा नियम तत्पर होना चाहिये। मैथुन या उसका कथा प्रसंग भी कभी नहीं करना चाहिये। मांस भोजन का परित्याग करना चाहिये। रात्रि में कभी भी माला या यन्त्र को नहीं छूना चाहिये। भगवान् विष्णु की ही सदा पूजा करे तथा उन्हीं को सब कुछ निवेदित कर दे। वैष्णवाचार का पालन करने वाला इस सारे जगत् को विष्णुमय ही मानता है।
(छ) शैवाचार
शैवाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत नित्यातन्त्र के एक वचन में कहा गया है कि शैवाचार और शाक्ताचार का पालन करने वालों के लिये भी वही व्यवस्था है, जो कि वेदाचार का पालन करने वालों के लिए विहित है। शैवाचार में विशेषता यह है कि यहाँ पशु बलि का भी विधान है। इस आचार में पशु बलि को निषिद्ध घोषित नहीं किया गया है। शैवागम और शैवतन्त्र प्रतिपादित आचार विधि का पालन करना ही वस्तुतः शैवाचार पद का अभिप्राय है।
(ज) सिद्धान्ताचार
सिद्धान्ताचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत एक वचन में बताया गया है कि सिद्धान्ताचार में शुद्ध या अशुद्ध सभी प्रकार की वस्तुएँ शास्त्रोक्त विधि से शुद्ध कर ली जाती हैं। प्राणतोषिणी (पृ. 965) में ही उद्धृत समयाचारतंत्र में सिद्धान्ताचारियों के विषय में बताया गया है कि वे सर्वदा देव पूजा में निरत रहते हैं। दिन में तो ये वैष्णवाचार विधि से जीवन-यापन करते हैं, किन्तु रास्त्रि में मिल जाने पर ये भक्ति-भाव से मद्य आदि का भी सेवन कर अपने को कृतकृत्य, आप्तकाम मानते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

आचार

तन्त्र शास्त्र में ऋ ऋृ लृ लृृ ये चार स्वर षण्ढ (नपुंसक) कहे गये हैं। अतः ध्यान आदि में इनका उपयोग नहीं किया जाता। सोलह स्वरों में से इन चार षण्ढ स्वरों को निकाल देने पर उनकी संख्या बारह रह जाती है। इन बारह स्वरों की जन्माग्र, मूल, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र शक्ति और व्यापिती – इन बारह चक्रों या आधारों में भावना का विधान विज्ञान भैरव (श्लो. 30) प्रभृति ग्रन्थों में मिलता है। कहीं कहीं नामों में कुछ अंतर मिल जाता है। शास्त्रों में मतभेद से हृदय या जन्माधार के द्वादशान्त पर्यन्त, कन्द से ब्रह्मरन्ध्र तक, जन्माग्र से द्वादशान्त तक अथवा आचार से द्वादशान्त तक प्राण शक्ति की गति मानी गई है। इनमें जन्माग्र और जन्म तथा मूल और गुदाधार शब्द पर्यायवाची है। नेत्रतन्त्र (7/1-5) की व्याख्या में क्षेमराज ने अंगुष्ठ, गुल्फ, जंतु, मैढ्, पायु, कन्द, नाडि (नाभि), जठर, हृदय, कूर्मनाडी, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त- ये सोलह आधार गिनाये हैं। इसके अनुसार जन्माग्र या जन्म मेढ् का तथा मूल या गुदाधार पायु का पर्यायवाची है। योगिनीहृदय के टीकाकार अमृतानन्द (पृ. 59) और भास्कर राय ने कन्द को सुषुम्ना नाडी का मूल स्थान और उसमें रहने वाली कुण्डलिनी शक्ति का पर्यायवाची माना है। ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर यहाँ शक्ति और व्यापिनी का स्थान माना गया है। योगिनीहृदय (1/25-34) में अकुल, विष, वहृि, शक्ति, नाभि, अनाहत (हृदय) विशुद्धि, लम्बिकाग्र, भुमध्य (आज्ञा) के ऊपर ललाट में क्रमशः एक दूसरे के ऊपर बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना की स्थिति मानी गई है। विज्ञान भैरव के टीकाकार शिवोपाध्याय ने 42वें श्लोक की व्याख्या में सोलह भूमियों का उल्लेख किया है। ऊपर गिनाये गये सोलह आधारों से इनकी कोई संगति नहीं बैठती। कुलागमसंमत सोलह आधारों का वर्णन नेत्रतन्त्र (7/1-5) की क्षेमराज कृत व्याख्या में मिलता है। नामों में भिन्नता होते हुए भी इनका क्रम योगिनीहृदय से मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

आचारलिंग

देखिए ‘लिंग-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

आचार्य

उत्कृष्‍ट गुरु।

गुरु दो प्रकार का होता है – साधक और आचार्य। उत्कृष्‍ट गुरु को आचार्य कहते हैं। पाशुपत दर्शन के नौ गणों के तत्व को सामान्यतया जानने वाला और शिष्य का संस्कार करने वाला गुरु होता है। साधक गुरु अपने गुरु से पाशुपत शास्‍त्र के तत्वों के सामान्य ज्ञान को प्राप्‍त करके पाशुपत योग का अभ्यास पूरी दिलचस्पी से करता है और उसके फलस्वरूप अपवर्ग को प्राप्‍त कर लेता है। परंतु आचार्य वह गुरू होता है जो पाशुपत दर्शन के सभी तत्वों अर्थात् लाभ, मल, उपाय आदि को ठीक तरह से और विशेष ढंग से जानने वाला हो और शिष्य को उनके तत्वों का रहस्य समझा सके। इस तरह से वह परिपूर्ण शास्‍त्र ज्ञान को अच्छी तरह जानकर पाशुपत साधना के द्‍वारा अपवर्ग को प्राप्‍त करता है। आचार्य को पर गुरु भी कहा गया है। (ग. का. टी. पृ. 3)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

आचार्याभास

वस्तुत: गुरु न होने पर गुरु का आभास मात्र।

पाशुपत मत के अनुसार जो गुरु आगमों में से तत्वज्ञान को जानकार ही तृप्‍त होकर, आगे उस तत्वज्ञान का लाभ किसी को करा नहीं सकता है, उसे आचार्य नहीं, आचार्याभास कहते हैं। उसे अपर गुरु भी कहा गया है। आचार्याभास को तो शास्‍त्र का केवल पद – पदार्थ ज्ञानमात्र ही होता है, उस पर श्रद्‍धा नहीं होती है। नहीं तो यदि श्रद्‍धा हो भी तो फिर भी उसे योग साधना के द्‍वारा लाभ आदि तत्वों का साक्षात् अनुभव नहीं होता है। संक्षेप में केवल पढ़ने पढ़ाने वाला अध्यापक आचार्याभास कहलाता है। (ग. का. टी. पृ. 4)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

आज्ञाचक्र

विशुद्धि चक्र के ऊपर भ्रूमध्य में हिम के सदृश श्वेत वर्ण का आज्ञाचक्र अवस्थित है। यह द्विदल पद्म है। इसको आज्ञाचक्र इसलिये कहते हैं कि यहाँ गुरु की आज्ञा शिष्य में पूर्ण रूप से संक्रांत हो जाती है। इस द्विदल पद्म के दलों पर अर्धचन्द्र और बिन्दु से अलंकृत हकार और सकार वर्ण अंकित हैं। इनका भी वर्ण श्वेत ही है। इस पद्म की कर्णिका में चन्द्रिका के समान धवल वर्ण की छः मुँह वाली हाकिनी शक्ति विराजमान है। यह अपने छः हाथों में विद्या, वरमुद्रा, अभय मुद्रा, कपाल, डमरु और जपमाला को धारण किये हुए हैं। इस कमल की कर्णिका में मन का निवास है और यहीं त्रिकोण स्थान में इतर लिंग की भी स्थिति है। यहीं प्रणव का ध्यान किया जाता है। अकार, उकार, मकार, नाद और बिंदुमय- यह प्रणव अन्तरात्मा का प्रतिबिम्ब माना गया है। इसका वर्ण दीपशिखा के समान भास्वर है। इसमें चित्त के लीन हो जाने पर योगी बाह्य विषयों से संबंध का विच्छेद करा देने वाली योनिमुद्रा अथवा खेचरी मुद्रा में प्रतिष्ठित हो जाता है और वह प्रणव की अन्य कलाओं के साक्षात्कार में भी समर्थ हो जाता है। सहस्रार स्थित, चन्द्र और सूर्य मंडल में जैसे परम शिव का निवास है, उसी तरह इस भ्रूमध्य स्थित चक्र में भी भगवान् शिव अपने तृतीय ज्ञाननेत्र का उन्मीलन कर पूर्ण वैभव के साथ निवास करते हैं। इस आज्ञाचक्र में प्राणों को समारोपित कर योगी वेदान्तवैद्य परम पद में प्रवेश पा सकता है। इसके ऊपर महानाद की स्थिति है। गुरु चरणों की कृपा होने पर ही योगी इसका साक्षात्कार कर सकता है। इस महानाद में आकार वायु लीन हो जाती है। यह महानाद शिव शक्तिमय है। (श्री तत्त्वचिन्तामणि, षट्चक्रनिरुपण, 6)।
Darshana : शाक्त दर्शन

आणव (वी) साधना

देखिए आणव उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

आणव उपाय

उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण और स्थान कल्पना का अभ्यास आणव उपाय है। इनमें से किसी भी एक उपाय के अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता को आणव समावेश दशा कहते हैं। अणु अर्थात् परिमित प्रमाता परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश प्रभृति को उपाय के रूप में स्वीकार करता है, इसलिये इसको आणव उपाय कहा जाता है।
इनमें से ध्यान बुद्धि का व्यापार है। प्राण स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार का होता है। स्थूल प्राण का व्यापार उच्चार है। यह प्राण आदि की वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है। सूक्ष्म प्राण को वर्ण शब्द से कहा जाता है। शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखने का नाम करण है। घट-स्थापन, मण्डल-निर्माण, मंदिर, मूर्ति, चित्र आदि की रचना जैसी विधियों का समावेश स्थान-कल्पना में होता है। अपि च, सगुण स्वरूप में चित्त की एकाग्रता को ध्यान कहते हैं। प्राण, अपान आदि वायु की श्वास-प्रश्वास, क्षुत् (छींक) प्रभृति वृत्तियाँ उच्चार कहलाती हैं। स्वच्छन्द तन्त्र की टीका (पृ. 7, पृ. 306) में क्षेमराज ने किसी मुद्रा (करण) या बन्ध में बैठकर मन्त्र के जप करने को उच्चार बताया है। प्राण के उच्चार के साथ स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने वाले सकार और हकार वर्ण कहे जाते हैं। इस स्थिति को शास्त्रों में अजपा जप कहा गया है। ये सभी वर्णों और मंत्रों का बोध कराते हैं। अथवा वर्ण शब्द काले-पीले आदि रंगों का भी बोधक है। विज्ञानभैरव की धारणा संख्या 63 में कृष्ण वर्ण की भावना वर्णित है। तिमिर भावना (60-62 धारणाएँ) का भी इसी में समावेश किया जा सकता है। बौद्ध योगशास्त्र में कसिण भावना के अन्तर्गत नील, पीत प्रभृति कसिणों का उल्लेख मिलता है (द्रष्टव्य – बौद्ध धर्म दर्शन, पृ. 76)।
त्रिशिरोभैरव के आधार पर तन्त्रालोक (भास्करी 3, आ. 5, पृ. 438-443) में करण के सात भेद बताये गये हैं। इनके नाम हैं – ग्राह्य, ग्राहक, संवित्ति, संनिवेश, व्याप्ति, आक्षेप और त्याग। तन्त्रालोक के 16वें आह्निक में ग्राह्य और ग्राहक का, 11वें आह्निक में संवित्ति का, 15वें आह्निक में व्याप्ति का, 29वें आह्निक में त्याग और आक्षेप का और 32 वें आह्निक में संनिवेश (मुद्रा) का विस्तार से वर्णन किया गया है। जिज्ञासु जनों को इनका वहीं अवलोकन करना चाहिये।
प्राण शक्ति, अर्थात् हृदय के स्पन्दनात्मक सामान्य व्यापार में, शरीर में विद्यमान नाडियों तथा चक्रों में तथा बाहर लिंग, चत्वर, प्रतिमा प्रभृति में स्थान कल्पना की विधि सम्पन्न की जाती है। सामान्य स्पन्द तत्त्व के उन्मेष के बाद ही उसमें षडध्व का स्फुरण होता है। कार्यकारण स्थल में क्रम से और कुहन प्रयोग (इन्द्रजाल से निर्मित पदार्थ) आदि में अक्रम से सभी पदार्थों की कलना करने वाला परमेश्वर का काल नामक स्वरूप सबसे पहले भासित होता है। भगवान् का यह स्वरूप अभेदावस्था में काली शक्ति और भेदावस्था में प्राण शक्ति के नाम से जाना जाता है। संवित्स्वरूपा काली शक्ति में अपनी इच्छा से क्रम और अक्रम रूप से नाना रूपों में भासित होने के लिए क्रिया शक्ति का उन्मेष होता है। इस क्रिया शक्ति का प्रथम उन्मेष प्राण व्यापार है। ‘प्राक् संवित् प्राणे परिणता’ कल्लट के इस वचन में यही बात प्रतिपादित है। यह प्राण शक्ति अपने प्राण, अपान आदि पाँच रूपों में जीव को आप्यायित किये रहती है। इसी के रहने पर यह चेतन कहलाता है। इस क्रिया शक्ति के पूर्व भाग में कालाध्वा और उत्तर भाग में देशाध्वा की स्थिति है। कालाध्वा में पर, शूक्ष्म और स्थूल रूप वर्ण, मन्त्र और पद की तथा देशाध्वा में कला, तत्त्व और भुवन की स्थिति है। शब्द और अर्थ स्वरूप शिव और शक्ति में व्याप्य व्यापक भाव से पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप से विद्यमान वर्ण, पद, मन्त्र और कला, तत्तव, भुवन-षडध्व के नाम से अभिहित होते हैं। यह सारा जगत् षडध्वमय है। इसका उन्मेष क्रिया शक्ति से होता है। सारे षडध्वात्मक जगत् में बाहर-भीतर सब जगह प्राण शक्ति का स्पन्दन सतत प्रवृत है, तो भी हृदय प्रभृति स्थानों में ही इसके स्फुरण की अनुभूति होती है। प्राण शक्ति के स्फुरण में ईश्वर की शक्ति, जीव की शक्ति और उसका प्रयत्न इन तीनों की उपयोगिता है। हृदय प्रभृति स्थानों में स्पन्दमान इस प्राण शक्ति में चित्त को विलीन कर देना भी स्थान-कल्पना नामक आणव उपाय का अंग है। इसी तरह से शरीर के भीतर विद्यमान नाडी, चक्र प्रभृति स्थानों में और बाहर लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में चित्त को नियोजित करना भी स्थान-कल्पना के अंतर्गत है। वस्तुतः बुद्धि, प्राण, देह, देश प्रभृति की कोई पारमार्थिक सत्ता नहीं है। ये सब विकल्पात्मक हैं। तो भी इनके सहारे परमार्थ स्वरूप तक पहुँचा जा सकता है (तन्त्रालोक 5/7 विवेक 5/10)। इन विकल्पात्मक स्थूल उपायों को ही आणव उपाय कहा जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

आणव उपाय

आणव योग। शैवी साधना के त्रिक आचार का वह उपाय जिसमें साधक अपने चित्त को प्रमेय पदार्थो पर स्थिर करके भावना के द्वारा उन सभी पदार्थो को परिपूर्ण शिवरूप में ही देखने का सतत अभ्यास करता है। (भास्करी वि. तं., 2-21)। इस उपाय में ज्ञान की अपेक्षा कल्पनात्मक क्रिया की प्रधानता होने के कारण इसे क्रियायोग या क्रियोपाय भी कहा जाता है तथा साधन में अपने से भिन्न प्रमेय पदार्थों को आलंबन बनाने के कारण इसे भेदोपाय भी कहा जाता है। जब साधक को अपने शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संविद्रूपता पर स्थिति नहीं हो पाती है तथा शुद्ध विकल्पों द्वारा चित्त का निर्मलीकरण भी नहीं हो पाता है तब उसे अपने शिवभाव को पहचानने के लिए आणव योग की दीक्षा दी जाती है। (तन्त्र सार , पृ. 35)।
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आणव मल

स्वरूप संकोचक अज्ञान। अपने शुद्ध संवित्स्वरूपता के परिपूर्ण प्रकाशात्मक स्वरूप को एवं उसके विमर्शात्मक स्वातंत्र्य को संकुचित रूप में प्रकट करने वाले अल्प ज्ञान को आणव मल कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है –
1. प्रथम प्रकार का आणव मल शुद्ध प्रमाता के परिपूर्ण प्रकाशात्मक स्वरूप को संकुचित कर देता है। इस संकोच से प्रमाता अपनी असीम प्रकाशात्मकता को भूलकर संकुचित् संवित् को अर्थात् शून्य को, प्राण को या बुद्धि को ही अपने आप समझने लगता है। ये सभी पदार्थ जड़ होते हैं तो प्रमाता जड़ात्मा जैसा बन जाता है। आणव मल का यह प्रकार प्रलयाकलों में तथा सकलों में हुआ करता है।
2. दूसरे प्रकार के आणव मल के कारण शुद्ध प्रमाता के विमर्शात्मक स्वातंत्र्य में संकोच आ जाता है जिससे वह अपने आपको क्रिया के ऐश्वर्य से विहीन प्रकाशमात्र ही समझने लगता है। इस मल से प्रमाता का क्रिया स्वातंत्र्य संकोच को प्राप्त कर जाता है। आणव मल का यह प्रकार विज्ञानाकलों में हुआ करता है। (ई, प्र., 3-2-4,5)। (आणव मल के ये दोनों प्रकार जब अधिक स्थूलता को प्राप्त कर जाते हैं तो इन्हें ही क्रम से माया मल तथा कार्ममल कहा जा सकता है। (देखिए माया मल तथा कार्मकल)।
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आणव योग

देखिए आणव उपाय।
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आणव समावेश

शैवी साधना के आणव उपाय के सतत अभ्यास से होने वाला अपने भीतर शिवभाव का समावेश। आणव उपाय में अपने साधक स्वरूप से भिन्न आभ्यंतर या बाह्य प्रमेय पदार्थो को साधना का आलम्बन बनाया जाता है। इसमें उच्चार, करण आदि भिन्न-भिन्न धारणाओं द्वारा प्रत्येक प्रमेय पदार्थ को इन धारणाओं में ठहराकर भावना के द्वारा उन्हें अपनी स्वभावभूत शिवता से अभिन्न रूप में देखना है। इसी प्रकार प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय को भी संघट्टात्मक रूप में ही देखना होता है। इस प्रकार के सतत अभ्यास से जब भिन्न भिन्न पदार्थो में, परिपूर्ण परमेश्वर में तथा अपनी साधक स्वरूपता में कोई भी भेद शेष नहीं रहता है तो उस अवस्था में जिस प्रकार का समावेश होता है उसे आणव समावेश कहते हैं। (मा.वि.तं., 2-21)। इस स्थिति के दृढ़तर अभ्यास से साधक शाक्त उपाय के योग्य बन जाता है। देखिए शाक्त उपाय, शाक्त समावेश।
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आणवमल

देखिए ‘मल’।
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