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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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ईशना। इ अर्थात् सूक्ष्मतम इच्छाशक्ति पर ही पूर्ण विश्रांति से अभिव्यक्त होने वाली स्फुट इच्छा का द्योतक वर्ण। (तन्त्र सार , पृ. 12)। यह वर्ण, इच्छाशक्ति में ही क्षोभ के उत्पन्न हो जाने पर विश्वसृष्टि के प्रति स्फुट परंतु सूक्ष्मतम इच्छा को द्योतित करता है। ईशना ईश्वरता का सूक्ष्मतर रूप होता है। इच्छा एक प्रकार की आध्यात्मिक उमंग है और ईशना ईश्वरता के स्फुट उपभोग के प्रति उन्मुख बनी हुई उमंग है। इ उमंग मात्र है और ई उमंग विशेष है। (तन्त्रालोक, 3-72,73)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ईश

ईश्‍वर का नामांतर।

ईश्‍वर समस्त जगत् का प्रभु होने के कारण ईश कहलाता है। कार्य रूप जगत् की सृष्‍टि, स्थिति, संहार आदि और जीवों के बंधन और मोक्ष सभी ईश्‍वर के ही हाथ में होते हैं। सभी उसकी इच्छा के अनुसार हुआ करते हैं। सभी का मूल संचालक वही हे। अतः सभी पर ईशन (प्रशासन) करता हुआ वह ईश कहलाता है। (श. का. टी. पृ. 92)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

ईश प्रसाद

लाभों के उपायों में एक अत्युत्‍तम उपाय।

भासर्वज्ञ के अनुसार ईश प्रसाद साधना के उपायों का एक प्रकार है। पाशुपत दर्शन में मुक्‍ति के कई साधन बताए गए हैं। परंतु पाशुपत सूत्र भाष्य में कौडिन्य ने अंत में ईश प्रसाद को ही मुक्‍ति का अंतिम व चरम साधन माना है। युक्‍त साधक का व्यक्‍तिगत प्रयत्‍न तो होना ही चाहिए, लेकिन ईश प्रसाद अधिक आवश्यक है। ईश्‍वर का शक्‍तिपात न होगा तो व्यक्‍तिगत प्रयत्‍न निष्फल होगा। यह ईश्‍वर की स्वतंत्र इच्छा मानी गई है कि वह किस जीव पर कब शक्‍तिपात करे। अंतत: ईश प्रसाद से ही दुःखों का का पूरी तरह से अंत हो जाता है और रुद्रसायुज्य की प्राप्‍ति होती है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 143)। ईश्‍वर साधक को भी अपने सर्वज्ञत्व आदि शक्‍तियों को देना चाहता है। ईश्‍वर की इस इच्छा को ही ईश प्रसाद कहते हैं। (कारणस्य स्वगुण दित्सा प्रसाद इत्युच्यते – ग. का. टी. पृ. 22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

ईशान

ईश्‍वर का नामांतर।

समस्त विधाओं का ईश्‍वर होने के कारण ईश्‍वर ईशान कहलाता है। (पा. सू. 5-42; ग. का. टी. पृ. 12)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

ईशान

स्वच्छंदनाथ (देखिए) के मंत्रात्मक पाँच स्वरूपों में से सर्वोच्च तथा प्रथम स्वरूप। इसे परमेश्वर की चित्शक्ति का सशरीर रूप माना गया है। साधनाक्रम में शिव तत्त्व को ही प्रथम तत्त्व मान लेने पर यह माना गया है कि शिव ही ईशान के स्वरूप में आकर अभेदात्मक शैवशास्त्रों के उपदेशक के रूप में अवतरित होता है। (तं.आ.वि., 1, पृ. 36-39)। स्वच्छंदनाथ के पाँच मुखों में से ऊर्ध्वाभिमुख चेहरे का नाम भी ईशान है। ईशान मुख का वर्ण मिश्रित माना गया है। इसे उम्मेष शक्ति प्रधान सदाशिवी दशा माना गया है। इसी कारण इसे तुर्यदशा प्रधान भी माना है। (मा.वि.वा., 1-171 से 173, 212 से 213, 252)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ईशित्व

अणिमादि अष्टसिद्धियों में ईशित्व या ईशिता षष्ठ सिद्धि है (द्र. व्यासभाष्य 3/45)। ‘ईशितृत्व’ शब्द का भी प्रयोग होता है। भूत और भौतिक (भूतनिर्मित पाँच भौतिक द्रव्य) के उत्पत्ति-नाश-अवयवसंस्थान को संकल्पानुसार नियंत्रित करने की शक्ति ईशित्व है – यह व्यासभाष्य से जाना जाता है। शरीर एवं अन्तःकरण को अपने वश में रखना भी ईशित्व के अन्तर्गत है – ऐसा व्याख्याकारों ने कहा है। भूत -भौतिक पदार्थों की शक्ति का यथेच्छ उपयोग करने की शक्ति ही ईशित्व है – ऐसा भी कहा जाता है। कोई-कोई भूत-स्रष्टत्व-मात्र को ईशित्व कहते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ईश्‍वर

भगवान पशुपति का नामांतर।

वह समस्त भूतों के कार्यों का अधिष्‍ठाता होने के कारण ईश्‍वर कहलाता है। समस्त चराचर जगत् का स्वामी होने के कारण तथा उन पर उसका ईशत्व होने के कारण वह ईश्‍वर कहलाता है। इस संसार के समस्त व्यवहारों पर उसे छोड़कर और किसी का भी पूरा अधिकार नहीं है। वही कर्तुम्, अकर्तुम्, अन्यथाकर्तुम् समर्थ होने के कारण एकमात्र ईश्‍वर है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 145, ग. का. टी. पृ. 12)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

ईश्वर

सांख्ययोग का मूल दृष्टिकोण यह है कि ईश्वरादि सभी पदार्थ प्रकृति-पुरुष के मिलन के फल है। इस शास्त्र के अनुसार ईश्वर का स्वरूप है – ईश्वरता-विशिष्ट अन्तःकरण या बुद्धितत्त्व या चित्त तथा उसके द्रष्टा-रूप निर्गुण पुरुष तत्त्व – इन दोनों का समष्टिभूत पदार्थ। ईश्वरता (जो ऐश्वर्य भी कहलाता है) अन्तःकरण का धर्म है, जिसके कई अवान्तर भेद हो सकते हैं, अतः ऐश (ऐश्वर्य-युक्त) चित्त भी कई प्रकार के होते हैं और इस प्रकार सांख्ययोगीय दृष्टि में ईश्वर कई प्रकार के हो सकते हैं।
ऐश चित्त प्रधानतः तीन प्रकार का हो सकता है – (1) अनादि-मुक्त चित्त, (2) अणिमादिसिद्धियुक्त चित्त जो ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने में समर्थ है, तथा (3) विभिन्न प्रकार के अभिमानों से युक्त चित्त, जिनके उदाहरण हैं भूताभिमानी, तन्मात्राभिमानी देव आदि। इनमें तृतीय प्रकार को ईश्वर के रूप में प्रायः नहीं माना जाता; ये ब्रह्माण्डसृष्टिकारी प्रजापति हिरण्यगर्भ से निम्न कोटि में आते हैं और ब्रह्माण्ड के स्थूल विकास में इनके अभिमान का सहयोग रहने के कारण इनको भी ईश्वरकल्प माना जाता है।
प्रथम प्रकार के सोपाधिक पुरुष का चित्त अनादिकाल से ही क्लेशादि-शून्य है, अतः उनमें सृष्टि करने का संस्कार नहीं रहता। यही कारण है कि योगसूत्रोक्त अनादिमुक्त ईश्वर (1/24 -26) सृष्टिकर्त्ता नहीं है। वह अनादिकाल से प्रचलित मोक्षविद्या का अंतिम आधार है। यही कारण है कि यह ईश्वर गुरुओं का भी गुरु माना जाता है। इस ईश्वर के द्वारा प्रकृति-पुरुष का संयोग कराए जाने की बात सर्वथा भ्रान्त है। इच्छा स्वयं संयोगज है, अतः वह संयोग का हेतु नहीं हो सकती। प्रकृति-पुरुष-संयोग किसी के द्वारा कराया नहीं जाता – वह अनादि है। अनादिमुक्त ऐश चित्तों की संख्या बताई नहीं जा सकती। उन चित्तों की मुक्तता चूंकि अनादि है अतः उनमें भेद करने का उपाय भी नहीं है। ये चित्त यद्यपि अव्यक्तिभूत नहीं हैं तथापि क्लेशादिशून्य होने के कारण मुक्त हैं, इनकी सर्वज्ञता की कोई सीमा न होने से ये ‘निरतिशय सर्वज्ञ’ हैं।
सृष्टिकर्त्ता ईश्वर (प्रजापति हिरण्यगर्भ) सृष्टि करने के संस्कार से युक्त है, अतः उसमें विवेकख्याति अपनी पराकाष्ठा में नहीं होती, यद्यपि अणिमादि ऐश्वर्य (धर्म, ज्ञान, वैराग्य के साथ) का असीम -प्राय विकास उसमें है। सांख्यकारिका में इसको ‘ब्रह्मा’ कहा गया है (54)। सांख्यसूत्र (3/56 -57) में इस ईश्वर का शब्दतः उल्लेख है तथा शान्तिपर्वस्थ सांख्यप्रकरणों में इस ईश्वर के गुणकर्मों का प्रतिपादन किया गया है।
सांख्य चूंकि अन्तःकरण के चार धर्मों में ऐश्वर्य (या ईश्वरता) की गणना करता है, तथा यह कहता है कि किसी सोपाधिक पुरुष के भूतादि अहंकार से तन्मात्र सृष्ट होता है जो ब्रह्माण्ड का उपादान है, अतः सांख्य सदैव ईश्वरवादी है; यह सर्वथा संभव है कि ईश्वरविषयक सांख्यीय दृष्टि अन्य ईश्वर -वादियों की दृष्टि के अनुरूप न हो। यह सत्य है कि सांख्य ईश्वर को अन्तिम तत्त्व नहीं मानता, क्योंकि ईश्वर भी प्रकृति -पुरुष में विश्लिष्ट हो जाता है। ईश्वर साम्यावस्था त्रिगुण का आश्रय भी नहीं है और न उससे त्रिगुण की सृष्टि होती है। ईश्वर का ऐशचित त्रैगुणिक है – त्रिगुणातीत नहीं है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ईश्वर

ज्ञान और क्रिया में परिपूर्ण स्वातंत्र्य से युक्त भगवान। काश्मीर शैवदर्शन के अनुसार परम शिव ही जब अपने स्वातंत्र्य के विलास द्वारा अपनी पारमेश्वरी लीला के बहिर्मुखी विकास के कार्य को संपन्न करने के लिए स्वयमेव स्पष्ट भेद से युक्त अभेद दशा पर अवतरित होता है तब उसी को ईश्वर कहते हैं। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा, 3-1-2)। इस दर्शन के अनुसार ईश्वर ही सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान एवं अनुग्रह – इन पाँचों कृत्यों को स्वयमेव करता है या अपने भिन्न-भिन्न अवतारों से संपन्न करवाता है। परिपूर्ण अभेद दशा में परमेश्वर की परमेश्वरता की बहिर्मुख अभिव्यक्ति हो ही नहीं सकती है। इस कारण परमेश्वर भेदाभेद की दशा में उतर कर ही अपनी परमेश्वरता को स्फुटतया निभाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ईश्वर तत्त्व

अभेदात्मक शुद्ध और असीम चित् प्रकाश के भीतर भेद के स्फुट अवभास वाली भेदाभेद-दशा। वह दशा जिसमें प्रमातृ अंश अर्थात् ‘अहं’ अंश की अपेक्षा प्रमेयता का अर्थात् ‘इदंता’ का अंश अधिक स्फुट रूप में चमकने लगता है। वह दशा जिसमें शुद्ध चैतन्य रूपी प्रमाता के भीतर प्रमेयता या ज्ञेयता का स्फुट या ज्ञेयता का स्फुट आभास होने पर ‘इदम् अहम्’ अर्थात् ‘यह मैं हूँ’ ऐसा विमर्श होता है। (ई.प्र.वि., खं. 2, पृ. 196-197)। इसी दशा को ईश्वर तत्त्व कहा जाता है। इस तत्त्व में परमेश्वर की क्रियाशक्ति की स्फुट अभिव्यक्ति मानी गई है। (शि.दृ.वृ., पृ. 37)। योगराज ने परमार्थसार की टीका में ईश्वर तत्त्व में ज्ञानशक्ति की ही अभिव्यक्ति को माना है। (पटलसा.वि., पृ. 41-43)। उसकी ऐसी दृष्टि त्रिक साधना की प्रक्रिया का अनुसरण करती है और उपरोक्त व्याख्या शिवदृष्टि, ईश्वर प्रत्यभिज्ञा आदि सिद्धांत ग्रंथों के अनुसार की गई है। ईश्वर तत्त्व में भेदाभेद दृष्टिकोण वाले मंत्रेश्वर प्राणी ठहरते हैं। (ई. पटल वि., खं. 2, पृ. 193)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ईश्वर भट्टारक

ईश्वर तत्त्व (देखिए) पर शासन करने वाले तत्त्वेश्वर। प्रमेय अंश को ‘इदम् अहम्’ अर्थात् ‘यह मैं हूँ’ इस प्रकार की भेदाभेद की ही दृष्टि से देखने वाले मंत्रेश्वर प्राणियों के उपास्य देवता। (तन्त्र सार , पृ. 74, 75, 94)। पारमेश्वरी अवरोहण-लीला में सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्यों को करने के लिए भिन्न-भिन्न तत्त्वों में ईश्वर भट्टारक ही अनंतनाथ (देखिए), श्रीकंठनाथ (देखिए), उमापति नाथ (देखिए) आदि अपने भिन्न भिन्न रूपों में अवतार रूप में प्रकट होते हैं। ऐसा करते हुए अपनी ईश्वरता की लीला को परिपूर्णतया और सुस्फुटतया अभिव्यक्त करते रहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ईश्वरप्रणिधान

समाधिलाभ के वैकल्पिक उपाय के रूप में ईश्वर प्रणिधान का उल्लेख योगसूत्र (1/23) में किया गया है। ये प्रणिधान उपाय मात्र है, अंतिम लक्ष्य नहीं है। योगसूत्रकार की दृष्टि में ईश्वर प्रणिधान का स्थान बहुत ही उच्च है। ईश्वरप्रणिधान को क्रियायोग के अन्तर्गत माना गया है, जिसका साक्षात् फल है समाधि की प्राप्ति तथा क्लेशों का क्षय (योगस. 2/1 -2)। ईश्वरप्रणिधान पाँच प्रकार के नियमों में से एक है और कहा गया है कि इससे समाधिसिद्धि सरलता से होती है (योगसू. 2/45)। यह प्रणिधान भक्ति का एक रूप है (द्र. व्यासभाष्य 1/23)। ईश्वर को परम गुरु के रूप में समझकर उनमें सब कर्मों का अर्पण करना तथा कर्मफल का त्याग करना ही ईश्वर-प्रणिधान है (द्र. व्यासभाष्य 2/1, 2/32)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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