भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

परमेश्वर अपने अनुत्तर और आनंदमय स्वरूप के अभिमुख अपनी इच्छा के एक और विशेष चमत्कार की अभिव्यक्ति होती है जिसे मातृका का ‘ए’ नामक वर्ण अभिव्यक्त करता है। मातृका के उपासक साधक को भी ऐकार की उपासना के द्वारा अपने ही भीतर परमेश्वरता के उसी भाव का साक्षात् दर्शन होता है जिसके फलस्वरूप उसे सद्यः शिवभाव का शाम्भव समावेश हो जाता है। (तन्त्र सार पृ. 12, तन्त्रालोकविवेकखं. 2, पृ. 103)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ऐक्य

देखिए ‘अंग-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

ऐक्य भक्‍त

ऐक्य अर्थात् जीवन्मुक्‍त अवस्था को प्राप्‍त होकर जो व्यक्‍ति भक्‍तस्थल के साधक के द्‍वारा किये जाने वाले इष्‍टलिंग की पूजा, पंचाक्षरमंत्र का जप, पंचाचारों का पालन आदि नित्य-कर्मों को करता रहता है, उसे ‘ऐक्य-भक्‍त’ कहते हैं। शिव-स्वरूप का ज्ञान होने पर भी वह भक्‍त की क्रियाओं को इसलिये करता रहता है कि लोक में बड़े व्यक्‍तियों के आचरण को देखकर छोटे लोग उसका अनुकरण करते हैं। ज्ञानी स्वयं कृतकृत्य होने से इष्‍टलिंग की पूजा आदि को यदि छोड़ देता है, तो अज्ञानी लोग भी उसे देखकर पूजा आदि के अनुष्‍ठान का परित्याग कर सकते हैं। अतः अज्ञानियों के मार्गदर्शन के लिये ज्ञानी को भी धर्माचरण करना आवश्यक है और वीरशैव दर्शन में उसके लिये धर्माचरण करने का विधान भी है (सि.शि. 16/7-8 पृष्‍ठ 92)।

जीवन्मुक्‍त होकर भी कर्म करने से ज्ञानी को कोई हानि नहीं है। जैसे जल में खींची गयी रेखा जल में अंकित नहीं होती, अथवा जैसे दग्धबीज पुन: अंकुरित नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी के द्‍वारा किये गये कर्म उसके जन्मातंर के कारण नहीं बन पाते (अ.वी.सा.सं. 27/19-23)। इस प्रकार लोक संग्रहार्थ नित्यकर्म आदि का अनुष्‍ठान करने वाले इस जीवन्मुक्‍त को ‘ऐक्य भक्‍त’ कहते हैं।

Darshana : वीरशैव दर्शन

ऐक्य-स्थल

देखिए ‘अंग-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

ऐश्वर्य

बुद्धि के चार सात्त्विक रूपों में से एक (सांख्यकारिका, 23) ऐश्वर्य (ईश्वरता) का स्वरूप है – इच्छा का बाधाहीन होना। अतः सभी सिद्धियों का अन्तर्भाव ऐश्वर्य में हो जाता है।
यह ऐश्वर्य आवश्यक भी है, अनावश्यक भी। इन ऐश्वर्यों (=सिद्धियों) से यह ज्ञात होता है कि योग का अभ्यास यथोचित्त रूप से किया जा रहा है क्योंकि योगांग-अभ्यास के फलस्वरूप सिद्धियों का आविर्भाव होना स्वाभाविक है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

Search Dictionaries

Loading Results

Follow Us :   
  Download Bharatavani App
  Bharatavani Windows App