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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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स्फुट क्रियाशक्ति। अ या आ अर्थात् अनुत्तरशक्ति या आनंदशक्ति के समक्ष ओ या औ के आ जाने पर उनके संयोग से अभिव्यक्त होने वाली, स्फुट क्रियाशक्ति को द्योतित करने वाला वर्ण। (तं.आ., 3-96, वही पृ. 106)।
ओकार से अभिव्यक्त होने वाली परमेश्वरता को जब परमशिव या शिव पुनःस्वाभिमुखता में ठहराकर विमर्शन करते हैं तो उनकी क्रियाशक्ति रूपिणी परमेश्वरता के परिपूर्ण स्वरूप के चमत्कार की अभिव्यक्ति हो जाती है। साधक को भी औकार की उपासना के द्वारा अपने भीतर परमेश्वरता के उसी परिपूर्ण चमत्कार की या साक्षात् अनुभूति हो जाती है। लिपि के आकार को दृष्टि में रखते हुए इस वर्ण को श्रृंगाटक अर्थात् सिंघाडा नाम दिया गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

औन्मनस धाम

1. प्रलयलीला में पृथ्वी तत्त्व से लेकर सदाशिव तत्त्व तक समस्त निचले निचले तत्त्व वर्ग ऊपरी ऊपर के तत्त्वों में विलीन हो जाते हैं। समस्त तत्त्वों, प्राणियों और तत्त्वेश्वरों समेत सदाशिव आपके जीवन के अंत में शक्ति तत्त्व में विलीन होता है। शक्ति व्यापिनी में और व्यापिनी अनाश्रित शिव में। अनाश्रित भी अपने समय पर समना नामक परतरशक्ति में विलीन होता है। उस पद को सामनस्य पद कहते हैं। यहाँ तक कालगणना की जा सकती है। समना भी जिस पद में विलीन हो जाती है और जिस पद में किसी भी प्रकार की कालगणना हो ही नहीं सकती, जहाँ सूक्ष्मतर अकल्प काल का स्पर्श भी शेष नहीं रहता, उस पद को औन्मनस धाम कहते हैं। (तं.आ.वि. ख 5, पृ. 257-260)।
2. प्रणव की उपासना में सूक्ष्मतर अवधान शक्ति के प्रयोग से मात्राकाल के भी सूक्ष्म सूक्ष्मतर अंशों को अनुभव में लाते हुए एकमात्र ऊँकार की ध्वनि के बारह अंशों का साक्षात्कार किया जाता है। बिंदु (अनुस्वार) उनमें चौथा अंश होता है। उससे आगे आठ अंश और होते हैं। बिंदु का उच्चारण काल आधी मात्रा का होता है। उत्तर उत्तर अंश का उच्चारण काल पूर्व पूर्व अंश के उच्चारण काल का आधा आधा भाग होता है। इस तरह से समना अंश का उच्चारण काल मात्रा का 256वाँ भाग होता है उससे ऊपर वाले उन्मना नामक अंश काल स्पर्श से रहित है। ऐसी सूक्षमतर अवस्थाओं का दर्शन तीव्रतर अवधानशक्ति से संपन्न महायोगी ही कर सकते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

औन्मुख्य शक्ति

शुद्ध एवं परिपूर्ण संवित्-रूपता में विश्वरचना के प्रति जो तनिक सी सूक्ष्मातिसूक्ष्म तरंग या उमंग अभी उठने को ही होती है तो उसी अतिसूक्ष्म स्पंदन की अवस्था को औन्मुख्य कहते हैं। यही परमेश्वर की औन्मुख्य शक्ति कहलाती है। उदाहरणार्थ शांत रूप से स्थित जल में जब एकाएक तीव्र तरंग उभरने को ही होती है तो उसकी तीव्रता के उदय से पहले ही जल के भीतर जो एक अदृश्य सी अतिसूक्ष्म हलचल होती है उसे औन्मुख्य कहा जा सकता है। परमेश्वर में रहने वाली परमेश्वरता की गतिशीलता के वैसे ही प्रथम स्पंदन को औन्मुख्य कहते हैं। इसी को उच्छूनता, तरंग, ऊर्मि आदि शब्दों से अभिव्यक्त किया गया है। (शि.दृ.वृ.पृ. 116)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

औपपादिक देह

माता-पिता से उत्पन्न न होकर जो शरीर स्वतः प्रकट होता है, वह औपपादिक देह कहलाता है (व्यासभाष्य 3/26)। यह दिव्य शरीर है। पालिबौद्धशास्त्र में ‘औपपातिक’ शब्द इन महासत्त्वशाली जीवों के लिए प्रयुक्त होता है। कुछ विद्धान समझते हैं कि पालि शब्द का मूल संस्कृत शब्द उपपादुक या औपपादुक है। ‘औपपादुक’ शब्द चरकसंहिता (शारीर 3/33; 3/19) में मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

औपसद कर्म

उपसद् नामक कर्म से सम्बद्ध तानूनप्त्र घृत का स्पर्श नामक कर्म औपसद कर्म है। यह औपसद कर्म उपसद् दीक्षा नामक यज्ञांग से सम्बद्ध है। आतिथ्या इष्टि में ध्रौव पात्र से सुक् या चमस में रखा हुआ घृत तानूनप्त्र है। उस घृत का स्पर्श यजमान के साथ सोलह ऋत्विक् करते हैं। उन ऋत्विजों में यजमान जिसे चाहेगा, वही पहले उस घृत का स्पर्श करेगा। यह यजमान की इच्छा पर निर्भर है। इसी प्रकार अक्षर ब्रह्म के उपासकों में भगवान् जिसे चाहेगा, उसे उस अक्षर ब्रह्म में ही लय कर देगा और जिसे चाहेगा, उसे परप्राप्ति का साधन भूत भक्ति का लाभ करा देगा। यह भगवान् की इच्छा के अधीन है (अ.भा. 3/3/33)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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