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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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घूर्णि

उच्चार योग की प्राण धारणा में छः में से किसी भी आनंद की भूमिका में पूर्ण विश्रांति पाने से पूर्व जिन पाँच बाह्य लक्षणों का उदय होता है उनमें से अंतिम लक्षण। घूर्ण किसी भी आनंद की भूमिका पर पूर्ण विश्रांति की ही स्थिति होती है। इस स्थिति में पहुँचने पर साधक सभी अनात्म पदार्थो को अपनी संवित् रूपता में विलीन करके अपने सर्वात्मक स्वभाव को देखकर तन्मय हो जाता है। इस अवस्था में जो लक्षण प्रकट होता है उसे घूर्णि अर्थात् झूमना कहते हैं। सर्वव्यापक स्वभाव वाला होने के कारण इसे महाव्याप्ति भी कहते हैं। (तं.सा.पृ. 40, तं.आ. 5-105)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

घोर

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार ईश्‍वर केवल अघोर रूप ही नहीं है अर्थात् वह केवल कल्याणमय रूपों को ही धारण नहीं करता है, अपितु अशिव तथा अशांत रूपों को भी वही शिव धारण करता है, जो कल्याणमय रूपों को धारण करता है। घोर रूपों पर अधिष्‍ठातृ रूप बनने की उसकी शक्‍ति को घोरत्व कहते हैं। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 89)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

घोर

भेदाभेद दृष्टिकोण प्रधान सदाशिव, ईश्वर तथा विद्या नाम के तीन तत्त्वों, तीन तत्त्वेश्वरों, उन तत्त्वों में क्रमशः रहने वाले मंत्र महेश्वरों, मंत्रेश्वरों तथा मंत्र नामक प्रमाताओं और यहाँ की समस्त विशुद्ध सृष्टि को अभिव्यक्त करने वाला परमशिव का परापर रूप। (स्व.तं.उ. 1 प1. 36)। उपनिषदों के मंत्रों में शिव के घोर, अघोर और घोरतर रूपों की स्तुति की गई है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

घोर शक्तियाँ

रौद्री नामक शक्ति के अनंत शक्ति समूह, जिन्हें परापरा शक्तियाँ भी कहा जाता है। संसार में जीवों की संख्या के अनुसार ही रौद्री अनंत रूपों में प्रकट हो जाती है। ये शक्तियाँ जीवों को इस संसार में ही टिकाए रखने के लिए विचित्र प्रकार के सांसारिक सुखों को उनके लिए सुलभ बनाती रहती हैं। ये उन्हें धार्मिक कर्मों में भी प्रवृत्त करती रहती हैं, परंतु वे कर्म सकाम और भोगप्रद और निष्काम नहीं होते हैं। इसी के साथ ये शक्तियाँ जीवों को मोक्ष मार्ग से हटाती ही रहती हैं। (मा.वि.तं., 3-32)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

घोरतर

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत के अनुसार ईश्‍वर भिन्‍न भिन्‍न प्राणियों को भिन्‍न भिन्‍न शरीरों से युक्‍त करता है। जो शरीर दुःखकारक बनते हैं वे घोरतर कहलाते हैं। (ग.का.टी.पृ. 11)। परमेश्‍वर ही उन घोरतर रूपों को धारण करता हुआ घोरतर कहलाता है। ऐसे शरीरों पर अधिष्ठातृ रूप बनने की उसकी शक्‍ति को घोरतरत्व कहते हैं। नारायणीय उपनिषद के एक मंत्र में भी पशुपति के अघोर, घोर और घोरतर रूपों का उल्लेख आता है –

अघोरेभ्योടथघोरेभ्यो घोरघोर तरेभ्यश्‍च।
सर्वेभ्य: सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेട स्तु रुद्ररुपेभ्य:।
(नारायणीय अपनिषद 19)

ईश्‍वर को अघोर, घोर तथा घोरतर रूपों का अधिष्‍ठाता बताने का तात्पर्य है कि भगवान् सर्वसामर्थ्यपूर्ण है। विश्‍व के कण कण का अधिष्‍ठाता एकमात्र शिव ही है। उसी की एकमात्र इच्छा के कारण अघोर, घोर, तथा घोरतर रूप प्रकट होते हैं। (वा. सू. कौ. भा. पृ. 89)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

घोरतरी शक्तियाँ

अंबा नामक पराशक्ति के एक रूप वामाशक्ति के अनंत शक्ति समूहों को घोरतरी शक्तियाँ कहा जाता है। इन्हें अपरा शक्ति भी कहा जाता है। ये शक्तियाँ जीवों को विषयभोग के प्रति ही प्रेरित करती रहती हैं और जब जीव उनमें अत्यधिक रूप से फँस जाते हैं तो उन्हें और नीचे गिराती रहती हैं। ये परमेश्वर की बंधक शक्तियाँ हैं। (मा.वि.तंत्र, 3-31)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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