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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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दग्धबीजवद्भाव

अस्मिता, रोग, द्वेष और अभिनिवेश नामक क्लेशों की चार प्रसिद्ध अवस्थाएँ हैं – प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार (योगसूत्र 2/4)। इन चारों के अतिरिक्त एक पाँचवी अवस्था भी है, जो प्रसुप्त अवस्था (क्लेशों का शक्ति रूप में रहना, जिससे उचित अवलम्बन मिलने पर वे सक्रिय होकर कर्म को प्रभावित करते हैं) से भी सूक्ष्म तथा उससे विलक्षण स्वभाव की है। यह पाँचवीं अवस्था दग्धबीजावस्था कहलाती है। इस अवस्था में आलम्बन के साथ संयोग होने पर भी क्लेश सर्वथा निष्क्रिय ही रहता है। दग्धबीज की उपमा से यह भी ध्वनित होता है कि जिस प्रकार जले बीज का बाह्य आकार मात्र रह जाता है, इसी प्रकार इस अवस्था में भी बाह्यदृष्टि से ऐसा प्रतीत होता है कि योगी का कर्म क्लेशपूर्वक हो रहा है – पर वस्तुतः ऐसा नहीं होता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

दर्शनशक्‍ति

दूर देखने की शक्‍ति।

पाशुपत साधक को योग के बल से कई दिव्य शक्‍तियों की प्राप्‍ति होती हैं। दर्शनशक्‍ति भी उन्हीं शक्‍तियों में से एक है। इस शक्‍ति को प्राप्‍त कर लेने के उपरांत सिद्‍ध साधक अथवा द्रष्‍टा को दृश्य (समस्त जगत) का दर्शन हो जाता है। उसे जगत् के एक कोने में बैठे बैठे ही समस्त जगत् के अणु अणु का दर्शन हो जाता है। उसक दृष्‍टि के सामने किसी भी प्रकार का प्रतीघात नहीं रहता। प्रतीघातकारी पदार्थ अकिंचितकर हो जाते हैं। (पा.सू.कौ.भा.पृ.42)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

दशात्मक भगवान्

भगवान् दश दिशात्मक, दश देवात्मक, दश इन्द्रियात्मक, दश लीलात्मक या दश अवतारात्मक हैं। इससे भगवान् की सर्वात्मकता विदित होती है (त.दी.नि.पृ. 130)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

दासोടहं भावना

वीरशैव धर्म का यह नियम है कि अपने तन, मन, धन को यथाशक्‍ति क्रमशः गुरु, लिंग एवं जंगम की सेवा में समर्पित करना चाहिये। समर्पण करते समय ‘मैं करता हूँ’ इस प्रकार के अहंकार को त्यागकर मैं गुरु, लिंग एवं जंगम का दास हूँ, इस भाव से युक्‍त होना ही ‘दासोടहं भावना’ है। वीरशैव संतों ने ‘शिवोടहं’ तथा ‘सोടहं’ इन दोनों भावनाओं से इस ‘दासोടहं भावना’ को अधिक महत्व दिया है। उनका कहना है- ‘शिवोടहं’ तथा ‘सोടहं’ इन दोनों भावनाओं से साधक के मन में सूक्ष्म रूप से अहंकार प्रवेश कर सकता है। अतः उस ज्ञानजन्य अहंकार से भी दूर रहने के लिये इस ‘दासोടहं’ भावना’ की आवश्यकता है।

शिवोടहं-भावना के अनंतर उत्पन्‍न यह दास-भावना वीरशैव दर्शन में एक हेय या निकृष्‍ट भावना न होकर एक ऐसी उत्कृष्‍ट भावना मानी जाती है, जिससे आत्मज्ञानी अपने में ही सेव्य-सेवक भाव के आनंद का अनुभव करता है। इसी को ज्ञानोत्‍तरा भक्‍ति कहते हैं (अनु.सू. 7/61; सि.रा.व. 306; व.वी.ध. पृष्‍ठ 184-185)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

दिक्चरी

वामेश्वरी शक्ति के अधीन कार्य करने वाली वे शक्तियाँ, जो दिक् अर्थात् दिशाओं में या बाह्येन्द्रियों में विचरण करती रहती हैं। ये शक्तियाँ शक्तिपात से अनुगृहीत साधकों को अभेद भाव का ज्ञान करवाती हैं और स्वरूप साक्षात्कार करने में उनकी सहायक बनती हैं तथा अंततोगत्वा उन को अभेदी भाव का पूरा ज्ञान करवाती हैं और स्वरूप साक्षात्कार करने में उनकी सहायक बनती हैं परंतु शक्तिपात से विहीन प्राणियों को लोक व्यवहार रूपी भेद भाव में ही टिकाए रखती हैं। (स्पंदकारिकासं., पृ. 20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

दिव्य संबंध

भगवान अनंतनाथ (देखिए) के अनुग्रह से शास्त्र तत्त्व का विमर्शन भगवान श्रीकंठनाथ (देखिए) और भगवान नंदी को हो जाता है। यह शास्त्र के अवतरण का तीसरा सोपान है। इस गुरु शिष्य संबंध को दिव्य संबंध कहते हैं। श्रीकंठनाथ और नंदी को शंकाएँ मध्यमा वाणी से होती हैं और भगवान अनंतनाथ उनके समाधान का उद्बोधन उनमें पश्यंती वाणी के स्तर से करा देते हैं। उत्कृष्ट शिवयोगी को भी मध्यमा वाणी के माध्यम से स्वप्नतुल्य चिंतन की दशा में जो शंकाएँ उभरती हैं उनका समाधान उसे तुर्यादशा में आरूढ़ हो जाने पर पश्यंती के माध्यम से मिल जाता है। भगवान श्रीकंठनाथ की दशा पर आरूढ़ होकर वे अपने से ही प्रश्न करते हैं और भगवान अनंतनाथ की दशा के समावेश से उन्हें समाधान मिल जाता है। शास्त्र के ऐसे गुरु शिष्यात्मक अवतरण क्रम को दिव्य संबंध कहते हैं। (पटलत्री.वि., टि., पृ. 12)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

दिव्यश्रोत्र

योगसूत्र (3/41) में कहा गया है कि श्रोत्र (=कर्ण इन्द्रिय) और आकाश (=शब्दगुणक द्रव्य; पंचभूतों में से एक) में संयम (यह योगशास्त्रीय प्रक्रिया विशेष है) करने पर दिव्यश्रोत्र की अभिव्यक्ति होती है। यह श्रोत दिव्य शब्द श्रवण का द्वार है। दिव्य शब्द सत्त्वप्रधान (अत्यन्त सुखकर) है, जो साधारण इन्द्रिय द्वारा श्रोतव्य नहीं है। योगियों का कहना है कि दिव्य शब्द शब्दतन्मात्र नहीं है, क्योंकि शब्दतन्मात्र अविशेष है और सुखकर नहीं है (सुख-दुःख-मोहकर नहीं है)। दिव्यश्रोत्र देवजाति के प्राणी में स्वाभाविक रूप से होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

दिव्यादिव्य संबंध

भगवान् श्रीकंठनाथ अनुग्रहपूर्वक ऋषियों को मध्यमा वाणी द्वारा जिस उपदेश को करते हैं उसमें जो गुरु शिष्य संबंध बनता है उसे दिव्यादिव्य संबंध कहते हैं। इस गुरु शिष्य संबंध से शास्त्रतत्व ऋषियों तक पहुँच जाता है। ऋषि लोग जिस तत्त्व का दर्शन मध्यमा वाणी के माध्यम से करते हैं उसी को आगे वैखरी द्वारा दूसरों को सुना देते हैं और लिपिबद्ध भी कर लेते हैं। शैवदर्शन के ऋषि प्रायः शिवयोगी ही होते हैं। उन्हें या तो भगवान् श्रीकंठनाथ के दर्शन होते हैं और उनके उपदेशों को वे सुन लेते हैं, नहीं तो भगवान् श्रीकंठनाथ के अनुग्रह से उन्हें उस दशा के समावेश से स्वयं शास्त्र तत्त्वों का उद्बोध हो जाता है। इस सीढ़ी पर पहुँचे हुए शास्त्रोपदेश के गुरु शिष्य क्रम को दिव्यादिव्य संबंध कहते हैं। इस संबंध द्वारा शास्त्र तत्त्व श्रीकंठनाथ से भी नंदिरुद्र, स्कंद आदि उच्चतर देवगणों को प्राप्त हो सकता है। उसका माध्यम मध्यमा वाणी ही होती है, जिसका प्रयोग इन देवगणों के स्वप्न संसार में होता है। (पटलत्री.वि.,टि.पृ.12)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

दीक्षा

वेदाध्ययन और द्विजत्व संपादन के लिये जैसे उपनयन संस्कार आवश्यक है, उसी तरह से तान्त्रिक उपासना में अधिकार की प्राप्ति के लिये दीक्षा की आवश्यकता मानी गई है। पूर्णाभिषिक्त गुरु ही दीक्षा देने का अधिकारी होता है। दीक्षा से दिव्य भाव और दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार की पाप वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। यह शिव से, इष्ट से तादात्म्य स्थापित करने का प्रधान साधन है और इससे मायीय, कार्म और आणव तीनों प्रकार के मल तथा मनसा, वाचा, कर्मणा किये गये पाप दूर हो जाते हैं। दीक्षा के विषय में बताया गया है कि यह विज्ञानफलदा, लयकारिका और मुक्तिदा है। बिना दीक्षा के कोई सिद्धि नहीं मिल सकती। उसके जप, पूजा आदि सब निष्फल जाते हैं। अतः मनुष्य को चाहिये कि वह योग्य गुरु से दीक्षा अवश्य ग्रहण करे। कुलार्णव तन्त्र (14/89-98) में बताया गया है कि पारद से विद्ध लोहा जैसे सुवर्ण बन जाता है, उसी तरह से दीक्षा से संस्कृत जीव, स्त्री, शूद्र, श्वपच प्रभृति भी संस्कृत होकर शिवभाव को प्राप्त कर लेते हैं। दीक्षा वस्तुतः आत्मसंस्कार का ही नाम है। इससे पूर्णता प्राप्त होती है। दीक्षा प्राप्ति से पूर्णत्वलाभ पर्यन्त अवस्थाओं का क्रम इस प्रकार है – दीक्षा, पौरुष अज्ञान का ध्वंस, शास्त्र श्रवण में अभिरुचि, बौद्ध ज्ञान का उदय, बौद्ध अज्ञान की निवृत्ति, जीवन्मुक्ति, भोग आदि के द्वारा प्रारब्ध कर्म का नाश, देहत्याग के अनन्तर पौरुष ज्ञान का उदय, मोक्ष अथवा परमेश्वरत्व की प्राप्ति।
उपनयन संस्कार के समान दीक्षा से भी मनुष्य को द्विजत्व की प्राप्ति होती है, वागीशी गर्भ से उसका नया जन्म होता है। दीक्षा की विशेषता यह है कि इसके बाद उसकी पूर्व जाति नहीं रह जाती। दीक्षित होने के उपरान्त पूर्व जाति का स्मरण प्रायश्चित का हेतु माना गया है। किससे दीक्षा ली जाए और किसको दी जाए, इसके लिये शास्त्रों में गुरु और शिष्य दोनों की योग्यताएँ निर्धारित हैं। स्त्री को दीक्षा देने और उससे दीक्षा लेने के भी विशेष नियम हैं। पति-पत्नी को दीक्षा दे या न दे, इस विषय पर भी शास्त्रों में विचार किया गया है।
तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, पक्ष, मास, ऋतु, अयन आदि का दीक्षा देते समय पूरा विचार किया जाता है। काल के साथ ही देश का भी विचार किया जाता है कि किस स्थान पर दीक्षा दी जाए। शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर, गाणपत्य, कौल, बौद्ध प्रभृति सम्प्रदायों में दीक्षा की अपनी स्वतंत्र विधियाँ हैं।
दीक्षा सामान्य तथा विशेष के भेद से दो प्रकार की होती है। सामान्य दीक्षा साधारणतः समय दीक्षा कही जाती है। इसमें दीक्षित हो जाने पर शिष्य को समयी धर्मों का पालन करना पड़ता है। इसको समयी कहा जाता है। विशेष दीक्षा के अनेक प्रकार हैं। मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों को चाहता है। रुचि के अनुसार वह भोग के लिये अथवा मोक्ष के लिये दीक्षा लेता है। इन्हीं विभागों के अन्तर्गत दीक्षा के शताधिक प्रकार शास्त्रों में वर्णित हैं। शैव शास्त्रों में आणवी, शाक्ती और शाम्भवी दीक्षाएँ वर्णित हैं। इनका निरूपण उपायों के अन्तर्गत किया गया है। आणवी दीक्षा को ही मान्त्री दीक्षा भी कहा जाता है। इसी का क्रिया अथवा क्रियावती के नाम से भी शास्त्रों में वर्णन है। शारदा-तिलक (4/2-3) में चार प्रकार की दीक्षा वर्णित है – क्रियावती, वर्णमयी, कलावती और वेधमयी। तन्त्रालोकविवेक (भास्करी 8, पृ. 182) में बताया गया है कि सिद्धान्त शास्त्र में होत्री, तन्त्रशास्त्र में योजन्तिका, त्रिकाशास्त्र में समावेशमयी, कुलशास्त्र में स्तोभात्मिका और कौल शास्त्र में सामरस्यमयी दीक्षा का विधान है। कुलार्णवतन्त्र (14/39-41) में दीक्षा के सप्तविध भेद तथा पुनः क्रिया दीक्षा के अष्टविध भेद वर्णित हैं। इनमें से कुछ मुख्य दीक्षाओं का यहाँ अलग से संक्षिप्त वर्णन किया जायेगा।
दीक्षित व्यक्ति को भी शास्त्रों में चार कोटियों में बाँटा गया है – समयी, पुत्रक, साधक और आचार्य। दीक्षित होने के उपरान्त साधक एक के बाद दूसरी कोटि में प्रविष्ट होता है। इनके कर्तव्यों का शास्त्रों में विस्तार से वर्णन मिलता है। आचार्य पद पर अभिषिक्त व्यक्ति ही प्रतिष्ठित हो सकता है। अभिषिक्त आचार्य को ही दूसरे को दीक्षा देने का अधिकार है।
(क) कला दीक्षा
शारदातिलक (4/2-3), तन्त्रसार (शब्दकल्पद्रुम, भास्करी 2, पृ. 59-60) प्रभृति के अनुसार इस दीक्षा में आवाहन पूर्वक सकल कलाओं की पूजा की जाती है। प्रथमतः प्राणप्रतिष्ठापूर्वक अग्नि की धूम्रार्चि प्रभृति दस कलाएँ पूजी जाती हैं। इसके बाद सूर्य की तपिनी आदि द्वादश और चन्द्र की अमृता आदि षोडश कलाओं का आवाहन कर उनका विधिवत् पूजन किया जाता है। अन्त में पचास कलाओं का पूजन अकार आदि वर्ण मातृका में निवृत्ति प्रभृति पाँच कलाओं के अन्तर्गत किया जाता है।
स्वच्छन्दतन्त्र चतुर्थ पटल में कला दीक्षा का प्रकारान्तर से वर्णन मिलता है। वहाँ षडध्व दीक्षा में कला दीक्षा को प्रधान मानकर वाच्यवाचक भाव के क्रम से अन्य अध्वों का इसी में समावेश माना गया है। वागीश्वरी के गर्भ से जन्म लेने के कारण जिसके संसार का उपशम हो गया है, उसको तान्त्रिक भाषा में ‘पुत्रक’ कहा जाता है। पृथ्वी से कला तत्त्व पर्यन्त माया का अधिकार है। इसी का नाम संसारमण्डल है। इसके बाद शुद्ध विद्या का राज्य है। शुद्ध विद्या ही वागीश्वरी है। इसके गर्भ से जन्म लेने पर विशुद्ध भुवनों में अवस्थान और संचार का अधिकार प्राप्त होता है। यह जन्म वस्तुतः बैन्दवदेह अथवा मन्त्रदेह प्राप्ति का ही नामान्तर है। इक्कीस अवान्तर संस्कारों के द्वारा यह जन्म-व्यापार निष्पन्न होता है। इससे द्विजत्व का आपादन (प्राप्ति) होती है। इसके पश्चात् अधिकार, भोग, लय, निष्कृति तथा विश्लेष ये पाँच संस्कार और भी किये जाते हैं। इन छः संस्कारों से पशु के पाशों का विनाश किया जाता है। पाश-क्षषण के अतिरिक्त दीक्षा के द्वितीय अंग का नाम शिवत्वयोजन है। इसके लिये तेरह पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है। सद्गुरु से दीक्षा प्राप्त होने पर पाशक्षपण और शिवत्वाभिव्यक्ति दोनों ही पूर्णतया निष्पन्न होते हैं। जिन तेरह विषयों का ज्ञान आवश्यक है, उनके नाम ये हैं – चार-प्रमाण, प्राणसंचार, षडघ्व विभाग, हंसोच्चार, वर्णोच्चार, कारणत्याग, शून्य, सामरस्य, त्याग संयोग तथा उद्भव, पदार्थभेदन, आत्मव्याप्ति, विद्याव्याप्ति और शिवव्याप्ति। इनका विशेष विवरण स्वच्छन्दतन्त्र के चतुर्थ पटल में देना चाहिये।
(ख) क्रिया दीक्षा
आणवी अथवा मान्त्री दीक्षा को ही क्रिया दीक्षा कहा जाता है, जो कि कुण्ड, मण्डल आदि के निर्माण के माध्यम से सम्पन्न होती है। दीक्षा क्रिया और ज्ञान के भेद से दो प्रकार की है। क्रिया दीक्षा छः अध्वाओं के भेद से भिन्न प्रकार ही है; जैसे, कला दीक्षा, तत्त्व दीक्षा, पद, मन्त्र, वर्ण और भुवन दीक्षा। तत्त्व दीक्षा साधारणतः चार प्रकार की है – षट्त्रिंशत्तत्त्व दीक्षा, नवतत्त्व दीक्षा, पंचतत्त्व दीक्षा और चितत्त्व दीक्षा। इनके सिवा एकतत्त्व दीक्षा का भी वर्णन मिलता है। छतीस तत्त्वों को नौ तत्त्वों में परिणत करने से नवतत्त्व दीक्षा, उन्हीं को पाँच अथवा तीन तत्त्वों में परिणत कर लेने पर पंचतत्त्व अथवा त्रितत्त्व दीक्षा की प्रक्रिया निष्पन्न होती है। एकतत्त्व दीक्षा में छत्तीस तत्त्वों को समष्टि रूप से एकतत्त्व रूप में ग्रहण किया जाता है। स्वच्छन्दतन्त्र तथा अन्य शैव-शाक्त तन्त्र ग्रन्थों में ‘सर्व सर्वात्मकम्’ इस सिद्धांत के आधार पर एकतत्त्व के शोधन से सभी तत्त्व शुद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार अध्वा के वैचित्र्य से क्रिया दीक्षा के ग्यारह प्रकार बनते हैं। ज्ञान दीक्षा में वैचित्र्य नहीं है। इस पद्धति से मूलतः दीक्षा के 12 भेद होते हैं। तन्त्रालोक प्रभृति ग्रन्थों में सकल, निष्कल और अधोरेश्वरी प्रभृति अनुष्ठानों के भेद, लोकधर्मी और शिवधर्मी साधकों के अवान्तर वैचित्र्य तथा भौतिक, नैष्ठिक आदि आचार्यों के भेद के आधार पर दीक्षा के प्रायः असंख्य प्रकार निरूपित हुए हैं। इनमें से अधिकांश प्रकारों का अन्तर्भाव क्रिया दीक्षा में ही होता है।
(ग) पञ्चतत्त्व दीक्षा
पञ्चतत्त्व के नाम से पंचमहाभूत तो शास्त्रों में प्रसिद्ध हैं ही, इसके अतिरिक्त शाक्त, विशेषकर कौल सम्प्रदाय में मत्स्य, मांस, मुद्रा, मद्य और मैथुन इन पाँच पदार्थों को पंचतत्त्व कहा जाता है तथा वैष्णव सम्प्रदाय में गुरु, मन्त्र, मन, देव और ध्यान को पंचतत्त्व के नाम से अभिहित किया जाता है।
कुलकुण्ड में कुल द्रव्यों से कुलचक्र की पूजा करने से कौलिकी दीक्षा सम्पन्न होती है। इस दीक्षा में दीक्षित व्यक्ति को कुलाचार का पालन करना पड़ता है। कुलद्रव्य अर्थात् उक्त पाँच तत्त्वों का उपयोग शोधनविधि के अनुसार ही किया जाता है। कुलार्णवतन्त्र (5/108-112) में इनकी आध्यात्मिक व्याख्या मिलती है। अवधूत सिद्ध ही इस दीक्षा का अधिकारी माना जाता है।
पंचमहाभूतात्मक पंचतत्त्व की उपासना की भी तन्त्रशास्त्र में विधि मिलती है। वहाँ बताया गया है कि पंचतत्त्व का उदय स्थिर करके शांति प्रभृति षट्कर्म करने चाहिये। शान्ति कार्य में जल तत्त्व, वशीकरण में वह्नि तत्त्व, स्तंभन में पृथ्वी तत्त्व, विद्वेषण में आकाश तत्त्व, उच्चाटन में वायु तत्त्व और मारण कर्म में वह्नि तत्त्व का उदय सिद्धिकर माना गया है। भूमि तत्त्व का उदय होने पर दोनों नासापुटों से दण्डाकार में श्वास निकलता है। जल तत्त्व और अग्नि तत्त्व के उदय काल में नासिका के ऊर्ध्व भाग से होकर श्वास प्रवाहित होता है। वायु तत्त्व के उदय के समय वक्रभाव से तथा आकाश तत्त्व के उदय होने पर नासिका के अग्रभाग से होकर श्वास निकला करता है। इन सब श्वास-निर्गमन की प्रणालियों के सूक्ष्म निरीक्षण से ही किस समय किस तत्त्व का उदय होता है, इसका निश्चय करना पड़ता है।
अन्यत्र बताया गया है कि पृथ्वी तत्त्व के उदय में स्तंभन और वशीकरण, जल तत्त्व के उदय में शान्ति और पुष्टि कर्म, वायु तत्त्व के उदय में मारण प्रभृति क्रूर कर्म तथा आकाश तत्त्व के उदय के समय विष प्रभृति नाशकारी द्रव्यों का उपयोग प्रशस्त है। जिस तत्त्व के उदय के समय जिस कार्य को सम्पन्न किया जाता है, तब उस तत्त्व के मण्डल का निर्माण भी आवश्यक माना गया है। आकाश तत्त्व में छः बिन्दुयुक्त मण्डल, वायु तत्त्व में स्वस्तिक के साथ त्रिकोणाकार मण्डल, अग्नि तत्त्व में अर्धचन्द्र के आकार का, जल तत्त्व में पद्माकार और पृथ्वी तत्त्व में चतुरस्त्र मण्डल बना कर कार्य सिद्धि किया जाता है।
निर्वाण तन्त्र के बारहवें पटल में वैष्णवों के लिये गुरुतत्त्व, मन्त्रतत्त्व, मनस्तत्त्व, देवतत्त्व और ध्यानतत्त्व नामक पंचतत्त्वों का विधान मिलता है। तदनुसार पहले गुरुतत्त्व शिष्य को मन्त्रतत्त्व का साक्षात्कार कराता है। इससे देव स्थित ब्रह्मतेज उद्दीप्त होता है। बाद में मन्त्र के प्रभाव से इष्ट देवता का शरीर उत्पन्न होता है। इष्ट देवता के सभी मन्त्र वर्णमय है। इन वर्णों में ईश्वर का अक्षय वीर्य निहित है। उक्त मन्त्र से मन ही मन मैं स्वयं देवता स्वरूप हूँ, इस तरह की चिन्ता की जाती है। तब उस मन्त्र का ध्यान किया जाता है। मन्त्र का ध्यान करते-करते सब प्रकार की सिद्धियाँ प्रकट होने लगती हैं। इनसे विमुख व्यक्ति विष्णु रूप हो जाता है। उसको फिर कभी यमराज के मंदिर में नहीं जाना पड़ता।
घ) वेध दीक्षा
वेध का अर्थ है बींधना, सूक्ष्म निरीक्षण करना। शक्तिसंगम तन्त्र (1/6/101, 2/34/11) में इसके पाँच प्रकार बताये गये हैं – वाग् वेध, श्रुतिवेध, दृष्टिवेध, स्पर्शवेध और क्रिया वेध। कुलार्णवतन्त्र (14/78) में बाह्य और आभ्यन्तर के भेद से दीक्षा के दो प्रकार बताये हैं। इनमें क्रिया दीक्षा को बाह्य और वेध दीक्षा को आभ्यन्तर कहा गया है। बाह्य और आभ्यन्तर शुद्धि इनके प्रयोजन हैं। स्पर्श दीक्षा, वाग्-दीक्षा, दृग्दीक्षा, मनोदीक्षा, तीव्र और तीव्रतर दीक्षा के भेद से वहाँ (14/53-66) इस वेध दीक्षा के विभिन्न प्रकार वर्णित हैं। इनकी शक्तिसंगमतन्त्र में प्रदर्शित वेधों से तुलना की जा सकती है। तीव्रतर वेध दीक्षा में शिष्य साक्षात शिवमय हो जाता है। वेध दीक्षा को देने वाला गुरु और प्राप्त करने वाला शिष्य दोनों दुर्लभ माने गये हैं। आनन्द, कम्प, उद्भव घूर्णि, निद्रा और मूर्छा – ये छः वेध की अवस्थाएँ हैं। अभिनवगुप्त ने तन्त्रवटधानिका (2/13) में आनन्द, उद्भव, कम्प, निद्रा और घूर्णि – इन पाँच अवस्थाओं को ही स्वीकार किया है। मालिनीविजयतन्त्र (11/35) में भी इन्हीं का उल्लेख मिलता है। कुलार्णव वर्णित मूर्छा की यहाँ गणना नहीं है। वेध दीक्षा का अभिप्राय यह है कि सद्गुरु द्वारा दृष्टि, स्पर्श अथवा शब्द आदि से विद्ध शिष्य के सभी पाश क्षीण हो जाते हैं और वह आनन्द से लेकर घूर्णि पर्यन्त दशाओं से आविष्ट हो जाता है, निर्मल स्वच्छ स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

दीक्षा

अपने शुद्ध संवित् स्वरूप का ज्ञान करवाने वाला तथा पशुभाव अर्थात् भेदमय प्रपंच को ही वास्तविक रूप मानकर उसी से लिप्त रहने के भाव को नाश करने वाला गुरु कृत उपदेश संस्कार आदि की क्रिया तथा इस प्रकार से ज्ञान का दान। ज्ञान प्राप्ति के उपाय का गुरु द्वारा दिया गया उपदेश। काश्मीर शैव दर्शन में दीक्षा के बहुत से ऐसे प्रकारों का वर्णन मिलता है जिनकी सहायता से गुरु शिष्य के अंतस्तल में जमे हुए मलों को धो डालता है और उसे यथार्थ ज्ञान का उपदेश कराता है। दीक्षा के कुछ प्रकार ये हैं – समयदीक्षा, पुत्रकदीक्षा, निर्वाणदीक्षा, प्राणोत्क्रमणदीक्षा, जालप्रयोगदीक्षा आदि।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

दीक्षा

जिस संस्कार विशेष से शिवज्ञान की प्राप्‍ति और पाश (बंधन) का नाश हो जाता है, उसे दीक्षा कहते हैं (सि.शि. 6/11 पृष्‍ठ 85)। वीरशैव धर्म में सभी व्यक्‍तियों को दीक्षा लेना अनिवार्य हे। इस दीक्षा में पट्‍टाभिषिक्‍त आचार्य अपने गोत्र के शिष्यों को ‘इष्‍टलिंग’ प्रदान करके पंचाक्षरी मंत्र का उपदेश करते हैं। इस दीक्षा का पुरुष तथा स्‍त्रियों के समान अधिकार है।

जन्म के आठवें वर्ष में दी जाने वाली दीक्षा उत्‍तम मानी जाती है। सोलहवें वर्ष में दी जाने वाली दीक्षा मध्यम और उसके बाद दी जाने वाली को अधम कहा गया है (वी.स.सं. 11/2)।

दीक्षा के बिना कोई भी वीर-शैव लिंगांग सामरस्यात्मक मोक्ष के लिये अधिकारी नहीं बन सकता है। अतः ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ इस व्यास-सूत्र की व्याख्या में वीरशैव आचार्यो ने ‘अथ’ शब्द का ‘दीक्षा द्‍वारा इष्‍टलिंग धारण आदि अष्‍टावरण प्राप्‍ति के अनंतर’ इस प्रकार अर्थ किया है (श्रीकर.भा. 1-1-1) (क्रि.सा.1/66,84; ब्र.सू.वृ. पृष्‍ठ 17-34)।)

जैसे स्वाति नक्षत्र में शुक्‍ति (सीप) में गिरा हुआ जल मोती बन जाता है, पुन: पानी नहीं बनता, उसी प्रकार दीक्षित जीव पुन: भवचक्र में नहीं आता। उसका यही जन्म अंतिम है (वी.स.सं. 11/3-7)। यह दीक्षा ‘वेध’, ‘मंत्र’ और ‘क्रिया’ इस तरह से तीन प्रकार की होती है (सि.शि. 6/12 पृष्‍ठ 85)।)

Darshana : वीरशैव दर्शन

दीक्षा

क. वेध दीक्षा-
गुरु प्रथमत: शिष्य को अपनी शिवावह दृष्‍टि से देखता है और अपने हस्त से शिष्य के मस्तक का स्पर्श करता है। इस स्पर्श का मूल उद्‍देश्य शिष्य में शिवत्व समावेश करना रहता है। इस हस्त-मस्तक-संयोग-रूप क्रिया से उस समय शिष्य को क्षणभर के लिये शिव स्वरूप का आभास मिलता है, अर्थात् उसको ‘मैं शिव हूँ’ यह अनुभव होता है। वस्तुत: यह ‘शिवोടहं’ भावना ही भावलिंग है। गुरु-कृपा से प्राप्‍त इस भावलिंगानुभव को शिष्य पुन: अपनी साधना के द्‍वारा दृढ़ कर लेता है। इससे उसके आणव-मल की निवृत्‍ति हो जाती है। गुरु द्‍वारा किया जाने वाला आणव मल निवारक चिन्मय शिवस्वरूप का उपदेश ही ‘वेध दीक्षा’ है (सि.शि. 6/13 पृष्‍ठ 86; अनु.सू. 5/40, 57; वी.स.सं. 11/10)।)
Darshana : वीरशैव दर्शन

दीक्षा

ख. मंत्र दीक्षा
शिष्य के दाहिने कर्ण में अत्यंत गोपनीयता से शिवमय पंचाक्षर मंत्र का उपदेश देना ही मंत्र दीक्षा कहलाती है। यह लक्ष्य में रखना है कि जिसको वेध दीक्षा दी जाती है, उसी को मंत्रोपदेश दिया जाता है। यहाँ उपासना या मनन करने के लिये शिव के मंत्रमय स्वरूप का उपदेश होता है। ‘शिव’ पंचाक्षरी मंत्र स्वरूप ही है। अतः उस मंत्र की आवृत्‍ति से तथा तदाकार मनन करने से मन के माया-मल की निवृत्‍ति हो जाती है। मंत्रोपदेश के अनंतर गुरु शिष्य के हृदय में प्रकाश रूप प्राणलिंग का बोध कराता है। इस तरह माया-मल की निवृत्‍ति तथा ‘प्राणलिंग’ का बोध ही इस दीक्षा का फल है (सि.शि. 6/14 पृष्‍ठ 86) (अनु.स. 5/41,58) (वी.स.सं. 11/11)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

दीक्षा

ग. क्रिया दीक्षा
शुभ मुहूर्त में मठ या मंदिर आदि पवित्र स्थानों में मंडप तैयार करके उसमें कलश-स्थापन-पूर्वक मंडल-रचना, मूर्तिपूजा आदि की जाती है। वीरशैव मत में पंच कलश स्थापन करने का विधान है। गुरु अपने आम्‍नाय के अनुसार प्रथमत: उन पाँच कलशों में वीरशैवों के पंच-सूत्र तथा गोत्र के मूल प्रवर्तक रेणुक, दारुक, घंटाकर्ण, धेनुकर्ण तथा विश्‍वकर्ण इन पाँच आचार्यो का आह्वान करके उनकी साक्षी में शिष्य को अपने सम्मुख बिठाकर पंचगव्य प्राशन, अभिषेक आदि से उसके शरीर को शुद्‍ध करता है (सि.शि. 6/15-19 पृष्‍ठ 86,87)। इस शुद्‍ध शरीर को मंत्रपिंड कहते हैं। इस प्रकार अंग-शुद्‍धि के अनंतर शिलामय पंचसूत्र समन्वित शिवलिंग में से शिलात्व की निवृत्‍ति के लिये जलाधिवास, धान्याधिवास आदि अधिवास् क्रियायें संपन्‍न की जाती हैं। इसके बाद उस लिंग में शिवकला-नियोजन द्‍वारा प्राणप्रतिष्‍ठा करते हैं (वी.स.सं. 10/47-68)। तब उस सुसंस्कृत शिवलिंग को शिष्य के हाथ में देकर गुरु यह शिक्षा देता है कि इसको अपने प्राण की तरह सदा गले में धारण करना चाहिये (सि.शि. 6/5 पृष्‍ठ 90)। अनंतर गुरु पंचाक्षरी मंत्र का उपदेश करते हैं तथा उस मंत्र के छंद, ऋषि और देवता का ज्ञान कराकर न्यास-पद्‍धति को भी सिखाते हैं (सि.शि. 6/20,21 पृष्‍ठ 87, 88)। इस तरह इष्‍ट लिंग-धारण के लिये किया जाने वाला संस्कार ही ‘क्रियादीक्षा’ है। इस दीक्षा से जीव के कार्मिक-मल (संचित कर्म) नष्‍ट हो जाते हैं (अनु.सू. 5/41, 58, 59)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

दीक्षाकारि

दीक्षा के अंग।

पाशुपत साधक की दीक्षा के भिन्‍न भिन्‍न अंग दीक्षाकारि कहलाते हैं। दीक्षाकारि पंचविध हैं – द्रव्य, काल, क्रिया, मूर्ति तथा गुरु। (ग.का.5)। इन सभी अंगों का विधिवत् पालन किया जाए तो साधक को दी हुई दीक्षा प्राय: सफल हो जाती है और उसके लिए रुद्र सायुज्य की प्राप्‍ति का उपाय बन जाती है। इन अंगों में विकलता आए तो दीक्षा की सफलता भी संशयग्रस्त बनी रहती है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

दीक्षागुरु

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत ‘गुरु’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

दुःख

क्लेश।

पाशुपत दर्शन में जीवन का परम उद्‍देश्य दुःखों की निवृत्‍ति है। पाशुपत शास्‍त्र में कई तरह के दुःखों की व्याख्या की गई है। पहले तीन तरह के दुःखों को लेते हैं, जो काफी प्रसिद्‍ध हैं – आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक। आध्यात्मिक दुःख दो तरह का कहा गया है – शारीरिक व मानसिक। मानसिक दुःख, जो मन में उत्पन्‍न हों जैसे क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद, ईर्ष्या, असूया, द्‍वेष, मद, मान, मात्सर्य, रति आदि के कारण। शारीरिक दुःख जैसे शिरोरोग, दंतरोग, अक्षिरोग, ज्वर, कास (खांसी), उदरपीड़ा आदि के कारण से होने वाले।

इनके अतिरिक्‍त पाँच प्रकार के अन्य दुःख गिनाए गए हैं। वे हैं – गर्भ दुःख, जन्म दुःख, अज्ञान दुःख, जरा दुःख तथा मरण दुःख। गर्भ दुःख में जब जीव का शरीर माता के गर्भ में बंद होता है। वहाँ आकुंचन या प्रसारण के लिए बहुत कम अवकाश होने के कारण जीव की सभी क्रियाएं अवरुद्‍ध रहती हैं और वह मूढ़वत् पीड़ा का अनुभव करता रहता है।

जन्म दुःख में जीवन जब जन्म लेता है तो जन्म लेने की प्रक्रिया में अत्यधिक पीड़ा का अनुभव करता है और जब बाह्य वातावरण में आता है तो और भी दुःखी होकर जन्म लेते ही रोता है। जन्म लेने की इस समस्त दुःखदायी प्रक्रिया से वह पूर्व संस्कारों को भूल जाता है और जन्म दुःख का भागी बनता है।

अज्ञान दुःख में जीव मिथ्या अहंकार के कारण वास्तविकता को जान नहीं पाता है कि ‘मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, किसका हूँ, किस बंधन से बंधा हूँ, क्या कारण है, क्या कारण नहीं है, क्या भक्ष्य है, क्या अभक्ष्य है, क्या पेय है, क्या अपेय है, क्या सत्य है, क्या असत्य है, क्या ज्ञान है, क्या अज्ञान है’ आदि इस तरह के अज्ञान में फंसकर अज्ञान दुःख को भोगता है।

जरा दुःख में पुरुष की वृद्‍धावस्था होने के कारण शरीर कृश हो जाता है। उसके शरीर के समस्त अंग शिथिल तथा असमर्थ हो जाते हैं। कटे पंखों वाले पक्षी की तरह शिथिल अंगों के कारण वह दौड़ नहीं सकता, भाग नहीं सकता और पूर्व अनुभूत स्वास्थ्य व सुखों की याद करते करते दुःखी होता रहता है। अंततोगत्वा उसकी स्मृति भी क्षीण हो जाती है। इस तरह से पुरुष जरा दुःख का भोक्‍ता बनता है।

मरण दुःख में मृत्यु के समय पुरुष की सभी इंद्रियाँ शिथिल हो जाती है। श्‍वास रुकने लगता है और अपनी समस्त अर्जित वस्तुओं के बारे में सोचने लगता है तथा उत्कट दुःख का अनुभव करते हुए मृत्युजन्य क्लेश को भोगता है।

कौडिन्य ने इन दुःखों के अतिरिक्‍त और पाँच तरह के दुःखों को गिनाया है। वे हैं ‘इहलोक भय, परलोक भय, अहितकारी विषयों के साथ संपृक्‍तता, हितकारी विषयों से विप्रयोग और इच्छापूर्ति में व्याघात। पाशुपत साधक का चरम उद्‍देश्य इन समस्त प्रकार के दुःखों से मुक्‍ति पाना होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 141, 142, 143)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

दुःख

दुःख वह है जिससे आक्रांत होकर प्राणी उसका प्रतिकार करने के लिए उद्यत हो जाते हैं (व्यासभाष्य 1.31)। सांख्ययोग में दुःख को तीन भागों में बाँटा गया है – आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक। आत्मा अर्थात् शरीर और मन के कारण उत्पन्न दुःख आध्यात्मिक है, जैसे व्याधि (शारीरिक दुःख) और क्रोधादि (मानसिक दुःख)। वृष्टि, भूकम्प आदि प्राकृतिक कारणों से जात दुःख आधिदैविक है (प्राकृतिक वस्तु अभिमानी देव के अधीन है; उनके कारण यह नाम पड़ा है) भूतों अर्थात् प्राणियों के द्वारा जो पीड़ा दी जाती है, वह आधिभौतिक है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

दुःखांत

क्लेशों की समाप्‍ति।

(सर्वदुःखा पोहो दुःखांत – ग.का.टी.पृ.12) अर्थात् समस्त दुःखों का अपोह दुःखांत है और पाशुपत दर्शन के अनुसार मुक्ति का स्वरूप दुःखांत है, परंतु यह दुःखांत केवल क्लेशों का नाश ही नहीं है, अपितु इस दुःखांत में परमैश्‍वर्य की प्राप्‍ति ही मुख्य फल है। पाशुपत दर्शन के अनुसार सांसारिक दुःखों की निवृत्ति तथा ईश्‍वर के जैसे ऐश्‍वर्य की प्राप्‍ति ही मुक्‍ति है। (तथाहि शास्‍त्रांतरे दुःख निवृत्‍तिरेव दुःखांत: इह तु परमैश्‍वर्य प्राप्‍तिश्‍च – ज.का.टी.पृ. 14,15)।

इसी कारण पाशुपत मत में दुःखांत को दो प्रकार का माना गया है – अनात्मक तथा सात्मक। अनात्मक दुःखांत में क्लेशों की पूर्ण निवृत्‍ति होती है, अर्थात् समस्त दुःखों का अत्यंत उच्छेद होता है। परंतु सात्मक दुःखांत में समस्त क्लेशों के अत्यंत उच्छेद के साथ साथ ही साधक में ज्ञान और क्रियाशक्‍ति जागृत हो जाती है। ज्ञानशक्‍ति पाँच प्रकार की कही गई है – दर्शन, श्रवण, मनन, विज्ञान और सर्वज्ञत्व तथा क्रियाशक्‍ति तीन प्रकार की कही गई है – मनोजीवत्व, कामरुपित्व तथा विकरणधर्मित्व। (ग.का.टी.पृ. 9,10)। इनकी व्याख्या अन्यत्र की गई है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

दुर्वासा

वर्तमान कलियुग में अद्वैत शैव दर्शन के शिक्षण क्रम को पुनः प्रचलित करने वाले महामुनीश्वर भगवान् श्रीकंठनाथ के एक साक्षात् शिष्य। सोमानंद के अनुसार अति प्राचीन काल से चली आ रही शैवदर्शन की रहस्य विद्या के कलियुग में लुप्तप्राय हो जाने के कारण श्रीकंठनाथ की आज्ञा से दुर्वासा ने अपने त्र्यंबकादित्य नामक शिष्य के द्वारा इस दर्शन की सिद्धांत विद्या और साधनाक्रम को पुनः प्रवर्तित करवाया। (शि.दृ. 7-107 से 111)। देखिए त्र्यंबकादित्य।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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