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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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धर्म

बल का एक प्रकार।

पाशुपत शास्‍त्र में पाशुपत धर्म की निर्धारित विधि का सदैव पालन करना धर्म कहलाता है। धर्म बल का चतुर्थ भेद है। क्योंकि धर्म पर स्थित होने से बल आता है (ग.का.टी.पृ.7)। धर्म से पूजापाठ आदि प्रसिद्‍ध लोकप्रिय धर्म तथा यम नियम आदि विशेष साधक धर्म यहाँ अभिप्रेत हैं। इन धार्मिक कृत्यों के अनुष्‍ठान से चित्‍त शोधन होता है और उससे साधना सफल होती है। इस तरह से धर्म रूपी बल साधना में सफलता प्राप्‍त करने में सहायक बनता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

धर्म

बुद्धि के चार सात्विक रूपों में यह एक है। अन्य तीन हैं – ज्ञान, विराग (वैराग्य) और ऐश्वर्य (सिद्धि)। (द्र. सांख्यका. 23)। यह धर्म यम-नियम ही है – ऐसा माठर आदि वृत्तिकार कहते हैं। अन्य व्याख्याकार कहते हैं कि विवेकज्ञान के साक्षात् साधनभूत कर्म (जो भोग की निवृत्ति करते हैं) तथा यज्ञादिकर्म – ये दो धर्म के भेद हैं। यज्ञादिकर्मों में यमादि का जो पालन किया जाता है, वह यज्ञादि के अनुष्ठान की तुलना में अधिकतर सात्त्विक हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

धर्मपरिणाम

धर्मी द्रव्य के जो तीन प्रकार के परिणाम होते हैं – धर्म -परिणाम उनमें से एक है (लक्षण और अवस्था अन्य दो परिणाम हैं)। धर्मपरिणाम का अर्थ है – धर्मी द्रव्य में एक धर्म का उदय। उसके बाद वह धर्म लीन होता है एवं अन्य धर्म उदित होता है (जो उदित होता है, वही इन्द्रिय द्वारा साक्षात् विज्ञेय होता है)। यथा – सुवर्ण रूप धर्मी का पिंडाकार एक धर्म है; पिंडाकार परिवर्तित होकर जब कोई अलंकार-विशेष बनता है तब धर्मान्तर का उदय होता है (पिंडाकार का नाश होने के अनन्तर)। यह ज्ञातव्य है कि धर्मपरिणाम किसी एक धर्मी का ही होता है, धर्मी से सर्वथा निरपेक्ष कोई परिणाम नहीं होता। विभिन्न अलंकार सुवर्णपिंडा के ही धर्म हैं, क्योंकि उन धर्मरूप अलंकारों में सुवर्णरूप धर्मी का अन्वय देखा जाता है। धर्मपरिणाम में धर्मी अपने स्वरूप में ही रहता है – यह माना जाता है।
धर्मी का जो धर्म है, वह अन्य धर्म की तुलना में धर्मी भी होता है। जब एक धर्म का पुनः परिणाम होता है तो वहाँ वह धर्म उदित परिणाम की दृष्टि में धर्मी होगा। धर्मों का परिणाम लक्षण (कालभेद) की अन्यता से होता है – यह पूर्वाचार्यों ने कहा है (द्र. लक्षण-परिणाम)। सांख्ययोग की मान्यता है कि धर्मी और धर्म यद्यपि परमार्थतः अभिन्न हैं (धर्मसमष्टि ही धर्मी है) तथापि व्यवहारतः भिन्न ही माने जाते हैं। प्रसंगतः यह जानना चाहिए कि धर्म शब्द कभी-कभी लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम का भी वाचक होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

धर्ममेघसमाधि

जिस समाधि के द्वारा क्लेशों एवं कर्मों की निवृत्ति होती है, वह धर्ममेघसमाधि है। सर्वज्ञता -रूप प्रसंख्यान पर भी जब योगी का वैराग्य होता है, तभी यह समाधि आविर्भूत होती है (योगसू. 4/29)। इस अवस्था में विवेकख्याति की पूर्णता हो जाती है और योगी इस ख्याति को भी निरुद्ध करने के लिए उद्यत हो जाता है। धर्ममेघ रूप ध्यान को ‘पर प्रसंख्यान’ कहा जाता है। आत्मज्ञान रूप धर्म का ही मेहन (= वर्षण) करने के कारण ही इस समाधि का ‘धर्ममेघ’ नाम है। योगियों का कहना है कि इस समाधि का लाभ होने पर अनायास कैवल्य की प्राप्ति होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

धर्मशक्‍ति

तप का चतुर्थ लक्षण।

पाशुपत दर्शन के अनुसार जिस शक्‍ति के बल से साधक का योगनिष्ठ चित्‍त किसी भी बाह्य स्थूल विषय की ओर आकृष्‍ट न हो, अर्थात् किसी भी प्रकार के मोह से मोहित न हो, वह सामर्थ्य धर्मशक्‍ति कहलाती है। (ग.का.टी.पृ.15)। इसी शक्‍ति से योगी काम, क्रोध, लोभ आदि से अस्पृष्‍ट रहता हुआ स्थिरता से अपने अभ्यास में ही लगा रहता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

धर्माचार

देखिए ‘सप्‍ताचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

धर्मात्मा

युक्‍त साधक का लक्षण।

पाशुपत मत के अनुसार साधक समस्त द्‍वंद्‍वों पर विजय पाकर ‘धर्मात्मा’ बन जाता है। यमों व नियमों के अभ्यास से श्रेष्‍ठ कर्मों की प्राप्‍ति करता है जिससे इस लोक में उसे अभ्युदय की प्राप्‍ति होती है तथा परलोक में मोक्ष को पा लेता है। तात्पर्य यह है कि योगी उत्कृष्‍ट अवस्था में पहुँच कर भी यम नियम आदि धर्मों को तथा भस्म-स्‍नान आदि क्रियाओं को छोड़ता नहीं और उससे उसका माहात्म्य बढ़ता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.131)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

धर्मिग्राहक मान

धर्मिस्वरूप का ग्रहण कराने वाला प्रमाण धर्मिग्राहक मान है एवं जो प्रमाण धर्मिस्वरूप का ग्रहण कराने वाला होता है, उसी से धर्मिगत अनेक धर्मों की भी सिद्धि हो जाती है। जैसे – जिस प्रमाण से जगत् के कर्त्ता ईश्वर की सिद्धि होती है, उसी प्रमाण से ईश्वर में सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता आदि धर्मों की भी सिद्धि हो जाती है। क्योंकि बिना सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्त्व के ईश्वर में जगत्कर्तृत्व बन ही नहीं सकता है। यही धर्मिग्राहक मान की विशेषता है (अ.भा.पृ. 989)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

धर्मी

सांख्ययोग शास्त्र के अनुसार धर्मों के समाहारभूत पदार्थ धर्मी हैं – धर्मों का आश्रयभूत पदार्थ नहीं, जैसा कि वैशेषिक शास्त्र में माना जाता है। एक धर्मी के धर्म बहुसंख्यक होते हैं, जो कालभेद की दृष्टि से त्रिधा विभक्त हैं – शान्त (जो धर्म नष्ट हो गया), उदित (जो धर्म वर्तमान है – इन्द्रियवेद्यरूप में अवस्थित है) तथा अव्यपदेश्य (अर्थात् जो विशेष रूप से ज्ञातव्य नहीं है; यह अनागत है)। धर्मी के जो शान्त एवं अव्यपदेश्य धर्म हैं, वे सामान्य धर्म कहलाते हैं और जो उदित धर्म हैं, वे विशेष धर्म कहलाते है। यही कारण है कि धर्मी को सामान्य -विशेषात्मा कहा जाता है (धर्मी के लिए कभी-कभी ‘द्रव्य’ अथवा ‘अर्थ’ शब्द प्रयुक्त होता है)। प्रत्येक धर्म में धर्मी का अनुगम रहता है – रुचक, स्वस्तिक आदि अलंकारों में सुवर्ण रूप धर्मी के अनुगम की तरह धर्मों की भिन्नता होने पर भी उनमें धर्मी अभिन्न रूप से रहता है – यही धर्मी का अनुगम या अन्वय है (भिन्नेषु अभिन्नात्मा धर्मी, विवरणटीका 3/13)।
धर्म -धर्मी में भेद व्यावहारिक है; पारमार्थिक नहीं; परमार्थतः धर्म -धर्मी में अभेद है। यही कारण है कि धर्म -धर्मी के सम्बन्ध में सांख्य एकान्तवादी (भेदवादी या अभेदवादी) नहीं है (द्र. व्यासभाष्य 3/13 का वाक्य एकान्तानम्भुपगमात्)। इसी दृष्टि के कारण व्याख्याकारगण सदैव कहते हैं कि धर्म -धर्मी में कथंचित् भेद और कथंचित् अभेद है। प्रत्येक धर्म की अपनी योग्यता होती है, जो धर्मी में नहीं देखा जाता। मृत्पिंड से उत्पन्न घट में जल-आहरण की योग्यता है, जो मृत्पिंड में नहीं है। इस योग्यता के कारण ही धर्म-धर्मी में भेद मानना पड़ता है। धर्मी में धर्म की योग्यता सूक्ष्म रूप से रहती है, पर उस सूक्ष्म भाव से व्यक्त धर्म द्वारा निष्पन्न होने वाला कार्य निष्पन्न नहीं होता। यह सूक्ष्म रूप या अनभिव्यक्त रूप से रहना शक्ति कहलाता है। धर्मी में जो एसी शक्तियाँ रहती हैं, यह विभिन्न प्रकार के व्यक्त फलों को देखकर अनुमित होता है – ऐसा माना जाता है। यदि धर्म -धर्मी -भाव न माना जाए (अर्थात् प्रत्येक धर्म स्वप्रतिष्ठ है, परस्पर असंबद्ध है – ऐसा माना जाए, तो दार्शनिक दृष्टि से कई दोष होते हैं, द्र. व्यासभाष्य 3/14)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

धातु

शरीर के उपादानभूत (शरीर के मुख्य घटक) धातुओं की चर्चा योगग्रन्थों में मिलती है। यह विषय आयुर्वेदशास्त्र में मुख्यतया प्रतिपादित हुआ है। धातु सात हैं – (1) रस (आहार का प्रथम परिणाम), (2) लोहित या रक्त, (3) मांस, (4) स्नायु, (5) अस्थि, (6) मज्जा तथा (7) शुक्र। कहीं-कहीं रस के स्थान पर त्वक् शब्द का प्रयोग मिलता है; ऐसे स्थलों में त्वक् का लक्ष्यार्थ रस ही समझना चाहिए; त्वक् या चमड़ा कोई धातु नहीं है। ये सात उत्तरोत्तर अधिक आभ्यंतर हैं – रस सर्वाधिक बाह्य है और शुक्र सर्वाधिक अन्तस्तल में अवस्थित है (द्र. व्यासभाष्य 3/21)। धातु का शब्दार्थ है – धारण करने वाला। योगग्रन्थों में कदाचित् उपधातुओं की चर्चा मिलती है; स्तनदुग्ध, आर्तव आदि सात उपधातु हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

धारणा

मन को दृढ़रूपेण ध्यान में स्थापित करना।

पाशुपत योग के अनुसार हृदय में ओंकार की धारणा करनी होती है। धारणा वह उत्कृष्‍ट योग है जहाँ आत्म तत्व में लगाए हुए ध्यान को स्थिरता दी जाती है। ध्यान जब दीर्घ काल के लिए साधक के मन में स्थिर रहता है तो वह धारणा कहलाती है। इसको पर ध्यान भी कहा गया है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.126)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

धारणा

धारणा योग का छठा अंग है। किसी बाह्य देश या आध्यात्मिक देश (द्र. ‘देशबंध’) में चित्त को बाँधना धारणा है (योगसू. 3/1)। जिस चित्तबन्धन में उस देश से अतिरिक्त अन्य किसी देश में चित्त का संचरण नहीं होता है (यह प्रत्याहार के द्वारा ही संभव होता है) वही धारण योगशास्त्रीय धारणा है (‘धारणा’ शब्द का प्रयोग भावना के अर्थ में भी होता है)। प्रकृत विभूति का आरंभ भी धारणा-क्षेत्र से ही होता है। विभिन्न योगग्रन्थों में नाना प्रकार की धारणा एवं उनके फलों का विशद विवरण मिलता है, जैसे ‘आग्नेयी धारणा’ के द्वारा शरीर को भस्मीभूत करना (बाह्य अग्नि के बिना)। स्थूल-सूक्ष्म रूपों में या सगुण-निर्गुण-रूपों में नाना प्रकार के धारणाभेदों का विवरण योगग्रन्थों में मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

धारणापूर्वक ध्यान

ध्यान की पर अवस्था।

पाशुपत मत के अनुसार जहाँ साधक चित्‍त को पूर्णरूपेण निरालंबन बनाकर अर्थात् चित्‍त के ध्यान का विषय किसी भी स्थूल या सूक्ष्म वस्तु को न रखते हुए तथा निर्मल बनाकर केवल रुद्र तत्व में ही अपने आपको स्थापित करता है। साधक की यह अवस्था पाशुपत योग की पर (उत्कृष्‍टतर) दशा होती है। (ग.का.टी.पृ.20)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

धी तत्त्व

देखिए बुद्धि तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ध्यान

परस्वरूप महेश्‍वर का चिंतन। (ध्यानं चिंतनमित्यर्थ:)

ध्यै चिंतालक्षणं ध्यानं ब्रह्म चोंकार लक्षणम्।
धीयते लीयते वापि तस्मांद् ध्यानमिति स्मृतम्।।
(पा.सू.कौ.भा.पृ. 115)।

ध्येय ब्रह्म है तथा ओंकार है क्योंकि पाशुपत ध्यान में परब्रह्म के ओंकार स्वरूप का ध्यान (चिंतन) किया जाता है तथा उसी ध्यान में लीन होना होता है।

(रुद्रतत्वे सदृश चिंता प्रवाहो ध्यानम् – ग.का.टी.पृ. 20)।

भासर्वज्ञ के अनुसार ध्यान दो तरह का होता है – जपपूर्वक ध्यान तथा धारणापूर्वक ध्यान। (ग.का.टी.पृ.20)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

ध्यान

यह सातवाँ योगांग है। धारणा का ही उन्नततर रूप ध्यान है। धारणा देश में ध्येय विषयक प्रत्यय (=ज्ञानवृत्ति) की जो एकतानता (=अविच्छिन्न रूप से प्रवाह) है, वह ध्यान है (योगसू. 3/2)। धारणा में एकविषयिणी वृत्ति रहती है, पर उसकी धारा अविच्छिन्न रूप से नहीं चलती। धारणा में देश का ज्ञान रहता है, ध्यान में देशज्ञान नहीं रहता। धारणा में देश-विशेष में चित्तबन्धन होने पर भी प्रत्ययों का प्रवाह सर्वथा सदृश नहीं होता। ध्यान में वृत्तियों की सदृशता तथा अविच्छिन्नता आवश्यक है। ध्यान के नाना प्रकार के भेदों का उल्लेख योगियाज्ञवल्क्य आदि ग्रन्थों में मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ध्यान (ज्ञानयोग)

शैवी साधना के ज्ञानयोग के उस उपाय को भी ध्यान कहते हैं जिसमें साधक भावना या इंद्रियों द्वारा देखे गए सभी भावों तथा अभावों को सभी के रूप में अभेद भाव की दृष्टि से देखता है। जिस किसी भी भाव या पदार्थ को जो कोई भी इंद्रिय देखती है इस देखने या भाव ग्रहण करने की प्रक्रिया में शिवता ही लक्षित होती है। इसी प्रकार से प्रत्येक प्रकार की भावना में तथा सभी आभासों में शिवता का ही पुनः पुनः अंतःविमर्शन करना ही ज्ञानयोग वाला ध्यान है। (शि.दृ. 7-78 से 80)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ध्यानयोग (आणव योग)

शैवी साधना के आणव-उपाय में बुद्धि को आलंबन बनाकर जिस धारणा का अभ्यास किया जाता है उसे ध्यानयोग कहते हैं। यह आणव उपाय का सर्वोच्च योग है। इस धारणा में साधक को प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय को अपने अनुत्तर संवित् स्वरूप में भावना द्वारा एक रूप करके सारे प्रपंच को उसी परिपूर्ण संवित् के द्वारा सृष्ट, स्थित, संहृत आदि रूपों में देखना होता है (तं.सा.पृ.36)। इस योग के अभ्यास से अपने पंचकृत्यात्मक ऐश्वर्य पर साधक को पक्का विश्वास भी हो जाता है और शिव भाव का आणव समावेश भी हो जाता है। वह परिपूर्ण संवित् द्वादश (बारह) काली नामक शक्ति चक्र की स्वामिनी होती है और जलती हुई आग की तरह प्रत्येक प्रमेय विषय को अपने साथ एक कर देती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ध्यामल

अस्फुट। ईश्वर दशा और सदाशिव दशा, दोनों में ही प्रमाता को अपने अहं स्वरूप चित् प्रकाश के भीतर ही इदं अंश रूप प्रमेय का भी आभास हो जाता है और वह ‘अहमिदम्’ या ‘इदमहम्’ ऐसा विमर्श करता है। अंतर इतना होता है कि ईश्वर दशा में इदं अंश अतीव स्फुटतया प्रकट हो जाता है जबकि सदाशिव दशा में अहं अंश के प्रकाश के भीतर उसकी एक अस्फुट छाया जैसी झलकती है। प्रमेय तत्त्व के इस अस्फुट आभास को ध्यामल आभास कहते हैं। (इ.प्र.वि. 31-3; ई.प्र.वि. 2, पृ. 196)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

ध्वनियोग

आणवोपाय में करणयोग के नीचे ध्वनि योग का स्थान है। इसे वर्ण योग भी कहते हैं , क्योंकि इस योग में संपूर्ण वर्णो की सामरस्यात्मक ध्वनि को आलंबन बनाकर साधक शिवभाव का समावेश प्राप्त करता है। इस सामरस्यात्मक ध्वनि को नाद कहते हैं। इस नादात्मक ध्वनि में वर्णो की स्वतंत्र सत्ता पूर्णतया शांत हो जाती है। क से म पर्यंत सभी वर्ण एवं उनसे संबंधित आभासों को समरस रूप में भावना द्वारा देखने के अभ्यास से जब इन्हें अपनी शुद्ध संवित् रूपता में विलीन कर दिया जाता है तो साधक अनुत्तर संवित्स्पर्श का अनुभव करता हुआ शिवभाव के आणव समावेश को प्राप्त करता है। (तं.सा.पृ. 42)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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