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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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यत्रकामावसायित्व

अणिमादि सिद्धियों में यह आठवीं सिद्धि है। भ्रमवश कुछ आधुनिक विद्वान् एवं अप्राचीन संस्कृत टीकाकार ‘कामावसायित्व’ नाम का प्रयोग करते हैं। ‘यत्रकामावसायित्व’ का अर्थ है – ‘जिस विषय पर जैसी इच्छा हो, उसकी पूर्ति होना’, पर योगशास्त्र में यह सत्यसंकल्प का वाचक है अर्थात् संकल्पानुसार भूतप्रकृतियों का होना। यह सिद्धि ब्रह्माण्डसृष्टिकर्ता प्रजापति हिरण्यगर्भ में रहती है। इस सिद्धि के बल पर ही उनके अहंकार के तामस भाग से (सृष्टिसंकल्प के कारण) तन्मात्र अभिव्यक्त होते हैं जो ब्रह्माण्ड का उपादान है (द्र. व्यासभाष्य 3/45)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

यथालब्ध

वृत्‍ति का भेद।

पाशुपत योग विधि के अनुसार साधक की जीविका की तृतीय प्रकार की वृत्‍ति यथालब्ध होती है। जब साधक को श्मशान में निवास करते हुए एक दिन में या कई एक दिनों में जो भी अन्‍न बिना मांगे अपने आपही मिले, उसी यथालब्ध अन्‍न से उसे जीविका का निर्वाह करना होता है। इस वृत्‍ति का पालन साधना के ऊँचे स्तर पर किया जाता है। अन्‍न कई दिन न मिलने पर उसे जलपान पर निर्वाह करना होता है, परंतु श्मशान से बाहर जाकर भिक्षा नहीं करनी होती है। (ग.का.टी.पृ.5)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

यम

योग के आठ अंगों में यम प्रथम है। इसके पाँच भेद हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह (योगसूत्र 2/30)। धर्मशास्त्र का अनुशासन है कि इन यमों का आचरण सतत करना चाहिए (नियमों के लिए ऐसा दृढ़ अनुशासन नहीं है)। अहिंसादि का आचरण जाति (जाति-विशेष), देश (देश, जैसे तीर्थादि), काल (कालविशेष) और समय (जीवन में स्वीकृत नियम) के द्वारा यदि सीमित न हो तो वह आचरण सार्वभौम कहलाता है (योगसूत्र 2/31)। यम की विरोधी भावना (हिंसा आदि) द्वारा यदि यम का आचरण बाधाप्राप्त न हो तो ‘यम सुप्रतिष्ठ हुआ’ यह माना जाता है। इस प्रकार सुप्रतिष्ठ अहिंसा आदि की कुछ सिद्धियाँ भी होती हैं, जो योगसूत्र में कही गई हैं। द्र. अहिंसा, सत्य आदि शब्द।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

याग (ज्ञानयोग)

शैवी साधना के त्रिक आचार में ज्ञानयोग का वह प्रकार जिसमें साधक को तीव्र भावना के दावारा समस्त भाव प्रपंच को परमेश्वर को ही अर्पित करना होता है। उससे इस निश्चय पर पहुँचना होता है कि वस्तुतः परमेश्वर से भिन्न और कुछ भी नहीं है और जो कुछ है वह सारा प्रपंच उसी संविद्रूप में ही स्थित है। इस प्रकार के शुद्ध विकल्प के बार बार के अभ्यास से भावना द्वारा परमेश्वर को ही सभी कुछ अर्पण करने को याग कहते हैं। (तं.सा.पृ. 25)। इस याग से साधक को शिवभाव का शाक्त समावेश हो जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

यामल

शिव शक्ति का संघट्ट रूप या परिपूर्ण सामरस्यात्मक रूप। उनका वह संघट्ट स्वात्मोच्छलता अर्थात् स्पंदरूपता है जिसे आनंदशक्ति भी कहते हैं। यह आनंदशक्ति ही विश्वसृष्टि का मूल कारण बनती है। शिव और शक्ति वस्तुतः सदैव यामल रूप में ही स्थित रहते हैं। उनका यह सतत संघट्ट या यामल रूप विश्व सृष्टि की प्रत्येक भूमिका में कार्य करता है। (तं.आ. 3-68)। केवल समझाने ही के लिए शिव और शक्ति का पृथक् पृथक् निरूपण किया जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

यामलावस्था (युगनद्ध)

तन्त्रशास्त्र में रुद्रयामल प्रभृति आठ यामल प्रसिद्ध हैं। वाराही तन्त्र में बताया गया है कि इन यामल ग्रन्थों में सृष्टि प्रभृति आठ विषयों का प्रतिपादन किया जाता है। यामल ग्रन्थों का आविर्भाव यामल भाव से होता है। अर्थात् परमशिव विश्व का कल्याण करने की दृष्टि से स्वयं ही विमर्श रूप में बदल कर अनुग्राह्य की योग्यता के अनुसार पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के माध्यम से प्रश्न करते हैं और प्रकाश रूप में अवस्थित होकर उसी पद्धति से वे प्रश्नों का उत्तर भी देते हैं। इस प्रकार भैरव और भैरवी के यामल भाव से प्रश्न-प्रतिवचन शैली में इन यामलों का आविर्भाव होता है। यमल और यामल शब्द का अर्थ है – युगल भाव। तान्त्रिक साधना प्रधानतः युगलभाव की ही उपासना है। शिव-शक्ति, भैरव-भैरवी, राधा-कृष्ण, सीता-राम, शिव-पार्वती की उपासना युगलभाव की ही उपासना है।
शाक्त सम्प्रदाय, विशेष कर कौल सम्प्रदाय के योगीगण यामलावस्था में स्थित होकर कुण्डलिनी शक्ति को जगाकर सहस्त्रार चक्र स्थित शिव के साथ उसकी समरसता संपादित करते हैं। इसी को शिव और शक्ति की यामलावस्था कहा जाता है। यही यामली सिद्धि है। बौद्ध तन्त्रों में इस अवस्था को युगनद्ध शब्द से अभिहित किया गया है।
महायोग के फलस्वरूप जिस षट्कोण की चर्चा शास्त्रों में आती है, वही शैव और शाक्त तन्त्रों में शिव और शक्ति का सामरस्य, वैष्णवों में युगल स्वरूप और बौद्ध तन्त्रों में युगनद्ध के रूप में कल्पित है। युगनद्ध स्वरूप भी मिथुनाकार है। यहाँ प्रज्ञा और उपाय का, शून्यता और करुणा का, कमल और कुलिश का सामरस्य सम्पन्न होता है। अनंगबज्र ने अपने प्रज्ञोपायविनिश्चंय सिद्धि नामक ग्रन्थ में कहा है कि प्रज्ञा का लक्षण निःस्वभाव है तथा उपाय का लक्षण सस्वभाव है। केवल प्रज्ञा के द्वारा अथवा केवल उपाय के द्वारा बुद्धत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती। बुद्धत्व की प्राप्ति के लिये प्रज्ञा और उपाय दोनों के साम्य या अभिन्नता का सम्पादन करना चाहिये। यह समरसता शिव और शक्ति की समरसता के ही तुल्य है। बौद्ध तन्त्रों में यह समरसता युगनद्ध दशा, युगनद्ध काय प्रभृति शब्दों से अभिहित है। अद्वयवज्र के युगनद्धप्रकाश (पृ. 49) में तथा नडपाद की सेकोद्देशटीका (पृ. 56-57) में इसका विवरण मिलता है। पूरे प्रकरण पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि युगलभाव, यामलभाव अथवा युगनद्धभाव एक ही स्थिति के सूचक शब्द हैं। इस अवस्था में भोग और मोक्ष की समरसता सम्पन्न हो जाती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

योग

जीव और ईश्‍वर का संयोग।

पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार आत्मा का परमात्मा से संयोग ही योग होता है। (अत्रात्मेश्वर संयोगो योग : पा.सू.कौ.भा.पृ.6)। यह संयोग दो प्रकार का कहा गया है। एक तो श्येन का स्थाणु से जैसे संयोग होता है, वहाँ श्येन ही संयोग के लिए चेतनोचित कार्य करता है। स्थाणु तो जड़ होता है। उसी प्रकार से श्‍येन की तरह जीवात्मा अध्ययन, मनन, साधना आदि करके परमात्मा के साथ संयोग प्राप्‍त कर लेता है अर्थात् परमात्मा की ओर से कोई प्रयत्‍न नहीं होता है। समस्त प्रयत्‍न केवल जीवात्मा का ही होता है।

दूसरे प्रकार का संयोग दोनों परमात्मा व जीवात्मा के प्रयत्‍न से होता है। जैसे दो भेड़ों का संयोग उन दोनों के प्रयत्‍नों से होता है, उसी तरह जीवात्मा के पक्ष में उसका अध्ययन, मनन आदि प्रयत्‍न रहता है तथा परमात्मा का प्रयत्‍न जीवात्मा को शक्‍तिपात के रूप में मुक्‍ति के प्रति प्रेरित करना होता है अर्थात् जीवात्मा तभी अध्ययन, मनन रूप यत्‍न करता है जब परमात्मा का प्रयत्‍न (शक्‍तिपात्) कार्य कर चुका हो। इस प्रकार से संयोग जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों के प्रयत्‍न का फल होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.6)।

गणकारिका टीका में भी योग का लक्षण दिया गया है। उसके अनुसार पुरुष के चित्त द्‍वारा ईश्‍वर के साथ संयोग ही योग होता है। (चित्‍तद्‍वारेणेश्‍वर संबंधः पुरुषस्य योगः ग.का.टी.पृ. 14)। वह योग दो प्रकार का होता है- क्रियालक्षण योग तथा क्रियोपरमलक्षण योग। क्रियालक्षणयोग में जप, धारण, ध्यान, स्मरण आदि क्रियाएँ होती हैं तथा क्रियोपरमलक्षण योग में समस्त साधना रूपी क्रियाओं का उपरम हो जाता है तथा समाधि आदि सभी योग साधनों के शांत हो जाने पर साधक अतिगति अर्थात् शिवसायुज्य को प्राप्‍त करता है। (ग.का.टी.पृ. 15)। पाशुपत दर्शन के अनुसार योग अकलुषमति तथा प्रत्याहारी साधक को ही सिद्‍ध होता है। (ग.का.टी.पृ. 15)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

योग

योग के अधिकांश लक्षणों (परिभाषाओं) में योग को ‘संयोगविशेष’ कहा गया है। जीवात्मा या क्षेत्रज्ञ का परमात्मा या ईश्वर के साथ संयोग योग है। प्राण-अपान का संयोग योग है। इस प्रकार के लक्षणों में उपर्युक्त दृष्टि झलकती है। इन लक्षणों में योग अन्तिम लक्ष्य है और योगाङ्ग उस लक्ष्य के साधनभूत हैं।
विक्षेपनाश, अर्थात् एकाग्रता या मानसिक धैर्य के आधार पर भी योग का लक्षण किया गया है। कठोपनिषद् में ‘स्थिर इन्द्रियधारणा’ को योग कहा गया है। ऐसा स्थैर्य किसी आलम्बन का आश्रय लेकर ही होता होगा, यद्यपि मुख्य विक्षेपनाश ही है। विक्षेपनाश को प्रधान मानकर योग का लक्षण पतंजलिकृत योगसूत्र के ‘योगः चित्तवृत्तिनिरोधः’ (1/2) सूत्र में मिलता है। योगशास्त्रीय उपायों से जो वृत्तिरोध होता है – उस रोध को योग का लक्षण कहा गया है। यह वृत्तिरोध यदि चित्त की एकाग्रभूमि में हो तो वह संप्रज्ञातयोग कहलाता है और यदि निरोधभूमि में हो तो असंप्रज्ञातयोग कहलाता है। संप्रज्ञातयोग आलंबन-सापेक्ष है। अतः उसके अवान्तर भेद होते हैं। असंप्रज्ञातयोग आलम्बन-हीन है – इसमें सभी चित्तवृतियों का अत्यन्त निरोध होता है और यही मुख्य योग है।
इस योग के साधन अभ्यास और वैराग्य हैं। आठ योगाङ्गों के आचरण की सहायता से अभ्यास-वैराग्य का अनुष्ठान किया जाता है। योगांगों द्वारा अशुद्धि का क्षय होता है जिससे चित्त में अलौकिक ज्ञान एवं शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। वृत्ति निरोध रूप योग के साथ सिद्धियों का निकटतम संबंध है, यद्यपि कैवल्य-रूप सर्वोच्च पद की प्राप्ति में सिद्धियों की उपयोगिता नहीं है। विवेक से अविद्या का नाश होना ही कैवल्य अर्थात् मोक्ष है। षडङ्ग-योग की भी प्राचीन परम्परा है; द्र. षडङ्गशब्द।
‘योग’ शब्द का गौण प्रयोग भी है, अर्थात् निःश्रेयस की प्राप्ति के लिए उपायमात्र के अर्थ में भी ‘योग’ का प्रयोग होता है।
इसी अर्थ में ‘कर्मयोग’, ‘ज्ञानयोग’, ‘भक्तियोग’ आदि का व्यवहार होता है। कई पूर्वाचार्यों के मतानुसार ‘क्रियायोग’ या ‘कर्मयोग’ भी ‘क्रिया या कर्मविशेष के माध्यम से वृत्तिरोध करना’ के अर्थ में योग का साधनभूत है।
योगाङ्गों का अनुष्ठान किसी न किसी रूप में सभी धार्मिक एवं दार्शनिक संप्रदाय करते हैं। कुछ ऐसे भी संप्रदाय हैं जो योगविशेष के नाम से प्रसिद्ध हैं – जैसे हठयोग, राजयोग, नाथयोग, शिवयोग, स्वरोदययोग आदि।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

योग

शैवदर्शन में जीव के अपनी शुद्ध एवं परिपूर्ण संविद्रूपता के साथ समरस हो जाने को योग कहते हैं। जीव के परमशिव के साथ एकत्व हो जाने की प्रक्रिया को तथा उसके साधक बनने वाले अभ्यासों को भी योग कहते हैं। (मा.वि.तं. 4-4) शैव दर्शन में योग शब्द की व्युत्पत्ति युजिर योगे धातु से मानी गई है युज् समाधौ से नहीं। चित्तवृत्ति निरोध मुख्य योग का उपाय मात्र है और वास्तविक एकत्वरूपी योग उसका फल है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

योगनिद्रा

योगनिद्रा के स्थान पर कभी-कभी ‘अजाड्यनिद्रा’ शब्द भी प्रयुक्त होता है, जिससे इस निद्रा का स्वरूप ज्ञात होता है। साधारण जीव निद्राकाल में आत्मविस्मृत हो जाता है, अर्थात् ‘में अपनी निद्रावृत्ति का ज्ञाता हूँ’, ऐसा ज्ञान सुषुप्ति अवस्था में नहीं रहता। अभ्यासविशेष (जिसको कहीं-कहीं ज्ञानाभ्यास कहा गया है) से चित्त की जड़ता नष्ट होने पर ज्ञानशक्ति इतनी दृढ़ हो जाती है कि सदैव (निद्राकाल में भी) आत्मस्मृति की धारा अटूट चलती रहती है। योगनिद्रा की अवस्था बाह्य निद्रा के सदृश है। योगियों का कहना है कि बैठी हुई अवस्था में भी योगनिद्रा हो सकती है; प्रायः पद्मासनादि में बैठकर ही योगी योगनिद्रा में लीन होते हैं। पांतजलयोगशास्त्र में जो अक्लिष्टनिद्रावृत्ति है, उसकी ही उन्नततर अवस्था योगनिद्रा है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

योगांग

देखिए ‘अंग’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

योगांग

चित्तवृत्तिनिरोध रूप योग के आठ अंग कहे गए हैं, जिनके नाम हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। योगांग दो प्रकार के उपकारक हैं – ये अशुद्धियों (शरीर, इन्द्रिय, अन्तःकरण स्थित दोषों) के क्षयकारक हैं तथा विवेकख्याति के प्राप्ति कारक हैं। योगांगों में एक के बाद ही दूसरे योगांग का अनुष्ठान करना चाहिए – इस प्रकार का कोई क्रम योगशास्त्र में सर्वथा नहीं माना जाता। इस विषय में इतना ज्ञातव्य है कि आसन में स्थिर होकर बैठने की शक्ति होने पर ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए (आसन-सिद्धि के बाद ही प्राणायाम करणीय है – ऐसा नियम नहीं है)। प्राणायाम धारणा के अभ्यास में अत्यन्त सहायक है, यद्यपि प्राणायामक्रिया के बिना ही धारणा (ज्ञानमयधारणा-विशेष, तत्त्व-ज्ञानमय धारणा) हो सकती है। प्रत्याहार के लिए भी यही बात है। धारणा, ध्यान, समाधि अवश्य ही क्रमिक रूप से अनुष्ठेय हैं। यम-नियम में कोई क्रम नहीं है – दोनों ही एक साथ अनुष्ठेय हैं, एवं समाधिसिद्धिपर्यन्त यम-नियमों का अनुष्ठान अपरिहार्य है। जीवन्मुक्त भी यमनियमविरोधी कर्म नहीं करते हैं। विभिन्न योगविषयक ग्रन्थों में अष्टांगों का विवरण सर्वथा एकरूप नहीं है, यद्यपि सारतः वह विवरण योगसूत्रोक्त विवरण का विरोधी नहीं है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

योगित्व

योगी की स्थिति।

रुद्रतत्व अर्थात् परमात्मतत्व पर ही चित्‍त की स्थिति योगित्व होती है। योगित्व युक्‍त साधक का लक्षण होता है जिस दशा पर पहुँचकर साधक बाह्य क्रिया-कलाप से असंपृक्‍त रहता है। (ग.का.टी.पु. 16; पा.सू.कौ.भा.पृ.110)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

योगिनी

तन्त्रशास्त्र में योगिनी शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। स्थूल रूप से तन्त्रशास्त्र में, विशेषकर कौल मत में, पुरुष साधक को ‘वीर’ तथा स्त्री साधिका को ‘योगिनी’ कहा जाता है। इस शास्त्र में योगिनी मुख से प्राप्त मन्त्रदीक्षा का विशेष महत्व बताया गया है। 64 योगिनियाँ प्रसिद्ध हैं। अष्टाष्टक पूजा में 64 भैरव और 64 योगिनियों की यामलभाव में उपासना की जाती है। नित्याषोडशिकार्णव प्रभृति ग्रन्थों में भगवती त्रिपुरसुन्दरी की वन्दना योगिनी के रूप में भी की गई है। टीकाकारों का कथन है कि मातृका के अष्ट वर्गों की अधिष्ठात्री ब्राह्मी प्रभृति देवियाँ यहाँ योगिनी पद से अभिप्रेत हैं। अन्य टीकाकार वशिनी प्रभृति आठ देवियों का यहाँ उल्लेख मानते हैं। त्वक्, असृक्, मांस, मेदा, मज्जा और शुक्र नामक धातुओं की स्वामिनी डाकिनी, राकिणी, लाकिनी, काकिनी, साकिनी और हाकिनी नामक देवियाँ कुछ आचार्यों के मत से योगिनी पद से अभिप्रेत हैं। ये षट्चक्र, षडूर्मि और षट्कोशों की अधिष्ठात्री देवियाँ मानी गई हैं। अन्य आचार्य याकिनी का भी इसमें समावेश कर इनकी संख्या सात मानते हैं।
अर्थरत्नावलीकार (पृ. 74) डाकिनी से लेकर हाकिनी पर्यन्त योगिनियों की संख्या 64 लक्षकोटि, 32 लक्षकोटि, 16 लक्षकोटि, 8 लक्षकोटि, 4 लक्षकोटि और 1 लक्षकोटि मानते हैं। अन्यत्र (पृ, 134) पर, सहज, कुलज और अन्त्यज के भेद से चार प्रकार की योगिनियों का उल्लेख करते हैं। ऋजुविमर्शिनीकार (पृ. 252) का कहना है कि 64 करोड़ योगिनियाँ ब्राह्मी प्रभृति आठ शक्तियों का ही विस्तार है। नव चक्रों में पूजनीय प्रकटा प्रभृति नवविध योगिनियों का भी उल्लेख त्रिपुरा सम्प्रदाय में ही मिलता है। इनको चक्रेश्वरी भी कहा जाता है। यह सारा विस्तार भगवती त्रिपुरा का ही है। इसीलिये उसकी योगिनी के रूप में स्तुति की गई है।
नाडी शब्द की परिभाषा में बताया गया है कि सहजयान सम्प्रदाय में नाडियों के लिये योगिनी शब्द प्रयुक्त हुआ है। क्रम दर्शन में द्वादश स्वरों की अधिष्ठात्री द्वादश शक्तियों का वर्णन मिलता है। इनको कालिका अथवा योगिनी शब्द से भी अभिहित किया जाता है (भारतीय संस्कृति और साधना, भास्करी 1, पृ. 43)।
Darshana : शाक्त दर्शन

योगिनी गण

दिव्य शरीर धारिणी पारमेश्वरी शक्तियों के एक विशेष वर्ग को योगिनी वर्ग कहते हैं। इन योगिनियों के कई एक स्तर होते हैं। प्रत्येक योगिनी के साथ एक एक भैरव होता है। दोनों मिलकर ही काम करते हैं और संसार के एक एक प्राणी को बंधन के प्रति, मोक्ष के प्रति और भोग के प्रति प्रेरणा देते रहते हैं। संसार के समस्त व्यवहारों को ये योगिनियाँ और ये भैवर ही वस्तुतः चलाते हैं, सांसारिक प्राणी केवल निमित्त मात्र बनते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

योगी

जिस साधक की आत्मा का संयोग परमात्मा से हुआ हो वह योगी कहलाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.110)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

योगी

मालिनीविजयतन्त्र (4/32-40) में चार प्रकार के योगी बताये गये हैं। इनके नाम हैं – संप्राप्त, घटमान, सिद्ध और सुसिद्ध (सिद्धतम)। जिसे योग का केवल उपदेश प्राप्त हुआ है, उसे संप्राप्त योगी कहते हैं। तत्त्व से चलित चित्त को जो बार-बार उसी में लगाने का प्रयत्न करता रहता है, वह घटमान योगी कहा जाता है। संप्राप्त और घटमान योगी की न तो ज्ञान में और न योग में ही स्थिर रूढ़ि रहती है। इनके द्वारा अन्य लोगों की परामार्थिक सहायता नहीं हो सकती। तृतीय प्रकार सिद्ध योगी का है। इसका योग सिद्ध हो जाता है। इसमें स्वाभ्यस्त ज्ञान की भी स्थिति रहती है। इस ज्ञान के द्वारा वह दूसरे को भी मुक्त कर सकता है। चतुर्थ प्रकार का सुसिद्ध योगी साक्षात् सदाशिव सदृश हो जाता है, जो कभी अपने स्वरूप से स्खलित नहीं होता। वह किसी भी स्थान में रहे, कैसा ही भोग करे, सदा निर्विकार रहता है। ऐसा योगी सभी स्थितियों में जीवमात्र का उद्धार कर सकता है। युक्त और युंजान के भेद से भी योगी का स्वरूप प्रतिपादित है। इनमें से युक्त योगी योगज धर्म की सहायता से परमाणु प्रभृति सूक्ष्मतम पदार्थों की भी सदा जानकारी रखता है। इसके विपरीत युंजान योगी प्रयत्न करने पर ही उक्त पदार्थों को जान सकता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

योगी (गिन्)

शैव साधकों के दो वर्ग होते हैं – ज्ञानी और योगी। उनमें योगी योग के अभ्यास के द्वारा सिद्धियों को प्राप्त करके सामर्थ्यवान् बनते हैं। वे भोगोत्सुक शिष्यों को विविध ऐश्वर्यों के भोग का मार्ग बता सकते हैं और उस मार्ग पर चलाकर उन्हें उन भोगों का अनुभव करा सकते हैं। अतः भोग को चाहने वाले साधक ज्ञानी की अपेक्षा योगी को ही अपना गुरु बनाते हैं। श्रेष्ठ गुरु उसे कहा गया है जो पूर्ण ज्ञानी भी हो और योगसिद्ध भी हो।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

योगेशी शक्ति

वामा शक्ति। (देखिए वामा)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

योनि

पारमेश्वरी शक्ति। बीज रूप स्वरों से उत्पन्न होने वाले सभी व्यंजक वर्णों का समूह। क से लेकर क्ष पर्यंत सभी योनि वर्गों को भैरवी भी कहते हैं। समस्त विश्व परमेश्वर के शुद्ध चित् प्रकाश में उसकी अनंत शक्तियों के रूप में सदा विद्यमान रहता है। उसकी उन शक्तियों को योनिरूपी व्यंजन वर्ण अभिव्यक्त करते हैं। यह योनि रूप शक्तियाँ ही जब बहिर्मुखतया प्रतिबिंबित हो जाती हैं तो सदाशिव तत्व से लेकर पृथ्वी तत्व तक के सारे प्रपंच की सृष्टि हो जाती है। (मा.वि.तं. 3-11, 12; स्वच्छन्द तंत्र 1-32, 33; वही, उ. 1, पृ. 27, 28)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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