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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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लकुलीश

लकुलीश को ऐतिहासिक पाशुपत मत का संस्थापक माना जाता है और चन्द्रगुप्‍त द्‍वितीय के मथुरा शिलालेख के आधार पर इतिहासवेत्‍ताओं ने लकुलीश को द्‍वितीय शती में रखा है। वायुपुराण के तेइसवें अध्याय तथा लिंगपुराण के चौबीसवें अध्याय में उल्लेख आया है कि जब वासुदेव कृष्ण जन्मे तभी महेश्‍वर ने ब्रह्‍मचारी के रूप में लकुलिन नाम से कायावतार या कायावरोहण नामक स्थान के एक श्मशान में पड़े एक शव में प्रवेश करके अवतार लिया। यह कायावतरण या कायावरोहण वर्तमान काल का कारवन है जो बड़ौदा मण्डल के दुनाई तालुक में है। पाशुपत सूत्र के भाष्यकार कौडिन्य ने भी पञ्‍चार्थीभाष्य में इसका उल्लेख किया है। (पा. सू.कौ.भा.पृ. 3)। इसका विशेष वृतांत कारवणमाहात्म्य में आया है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

लक्षणपरिणाम

द्रव्य अथवा धर्मों के जो तीन प्रकार के परिणाम होते हैं, उनमें लक्षणपरिणाम एक है। धर्मी का जो धर्म नामक परिणाम होता है, उस धर्म का ही यह ‘लक्षण’ नामक परिणाम होता है। इस परिणाम का संबंध काल-भेद के साथ है। जब हम किसी वस्तु को लक्ष्य कर यह कहते हैं कि ‘यह पहले अभिव्यक्त नहीं हुई थी, अब अभिव्यक्त हुई है’ या ‘यह उत्पन्न वस्तु अब नष्ट हो गई है’, तब वस्तु-संबंधी जिस परिणाम का बोध होता है, वह ‘लक्षण’ नामक परिणाम है। अभिभव-प्रादुर्भाव-रूप जो लक्षण परिणाम है उसका एक उदाहरण 3/9 योगसूत्र में है, जहाँ दो संस्कारों के अभिभव-प्रादुर्भाव का उल्लेख किया गया है। यह ज्ञातव्य है कि अभिभव-प्रादुर्भाव या आविर्भाव-तिरोभाव होने पर भी धर्म का धर्मत्व नष्ट नहीं होता अर्थात् अभिभव आदि किसी धर्म पर व्यपदिष्ट होते हैं। अभिभव और प्रादुर्भाव परस्पर भिन्न हैं, पर इनसे धर्म की भिन्नता नहीं होती अर्थात् जो धर्म अनागत था, वही उदित होता है और बाद में अतीत हो जाता है। इस लक्षण परिणाम का पुनः अवगत-परिणाम होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

लगुड़ीश

लगुड़ीश पाशुपत मत के संस्थापक लकुलीश का ही नामांतर है। लकुलीश को नकुलीश, लकुलिन्, लगुडीश, लकुटपाणि, लगुडपाणि तथा लकुलीश्‍वर नामों से भी अभिहित किया गया है। काश्मीर आगमों में इसे लाकुल भी कह गया है। ये सभी नाम लकुल, लकुट या लगुड शब्द से बने हैं, जिनका अर्थ ‘दण्ड’ है, क्योंकि अभिलेखों में महेश्‍वर के अवतार लकुलीश के हाथ में दण्ड लिए हुए उसे चित्रित किया गया है। उदयपुर के निकट नाथमंदिर में एकलिंगजी शिलालेख में (1000 शती) उल्लेख किया गया है कि भृगु के द्‍वारा महेश्‍वर के मानव अवतार को (जो हाथ में लगुड लिए हुए है) भृगुकच्छ में प्रसन्‍न किया जाता है। ‘कारवणमाहात्म्य’ में भी लकुलीश को लकुटपाणि कहा गया है। (कारवणमाहात्म्यम् पृ. 37 गणकारिका के परिशिष्‍ट में छपा हुआ है)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

लघिमा

अणिमा आदि अष्टसिद्धियों में लघिमा एक है (द्र. योगसू. 3/45)। भारवान् शरीर को संकल्पबल से तूल (रूई) की तरह लघु बनाना इस सिद्धि का मुख्य स्वरूप है; बाह्य पदार्थों को अल्पभारवान् बनाना भी इस सिद्धि के अन्तर्गत है। रश्मि में चलना, आकाशगमन आदि इस सिद्धि के बल पर सिद्ध होते हैं। इस सिद्धि के कारण ही अत्यन्त भारवान् पदार्थों को योगी अनायास उठा सकते हैं (मानसोल्लास 10/11)।
भूतों का ‘स्थूल’ नामक जो भेद है, उस पर संयम करने से लघिमा सिद्धि का प्रादुर्भाव होता है। लघिमा कायसिद्धि के अन्तर्गत है (तत्त्ववैशारदी 2/43)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

लय

सांख्ययोग-शास्त्र में लय का अर्थ है – कारण के साथ कार्य का एकीभाव या अविभाग की प्राप्ति। इस प्रकार ‘लय प्राप्त होना’ कार्य की ही एक अवस्था होती है, इसमें कार्यद्रव्य का अभाव नहीं हो जाता। कारण सूक्ष्म होता है (कार्य की अपेक्षा) और सूक्ष्म की जो स्थूलभाव-प्राप्ति है वही कार्य का स्वरूप माना जाता है। लय के लिए इस शास्त्र में ‘नाश’ शब्द का भी प्रयोग होता है। इस शास्त्र की मान्यता है कि जिससे जिसका जन्म होता है, उसमें ही उसका लय होता है, जैसे भौतिक का लय भूतों में, भूतों का तन्मात्रों में इत्यादि। लीन होने के इस क्रम को ‘प्रतिलोमक्रम’ कहा जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

लययोग

महायोग के अन्तर्गत या स्वतन्त्र रूप से भी लययोग नामक योगमार्ग-विशेष का उल्लेख कई अनतिप्राचीन ग्रन्थों में (विशेषकर नाथयोगियों के ग्रन्थों में) मिलता है। योगशिखोपनिषद् (1/134 -135) तथा योगबीज (146 इत्यादि) में इस योग के विवरण में कहा गया है कि चित्त के ब्रह्म में लीन होने पर वायु का जो स्थैर्य होता है, वही लययोग है। चित्तलय से स्वात्मानन्द-रूप परमपद की प्राप्ति होती है। चित्त का लय करना ही लययोग है जो ध्यान-साध्य है – यह योगतत्त्वोपनिषद् (23) में कहा गया है। यह लय मन्त्र की सहायता से हो सकता है, यह वराह उपनिषद् में कहा गया है (लय-मन्त्र-हठ रूप तीन योग इस उपनिषद् में स्वीकृत हुए हैं)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

लययोग

हठयोगप्रदीपिका के चतुर्थ उपदेश में लय योग का वर्णन मिलता है। वहाँ इस प्रकरण के प्रारंभ में ही बताया गया है कि राजयोग, समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमनस्क, लय, तत्त्व, शून्याशून्य, परमपद, अमरत्व, अद्वैत, निरालम्ब, निरंजन, जीवन्मुक्ति, सहजा, तुर्या – ये समस्त शब्द एक ही अर्थ के वाचक हैं। लययोग के प्रसंग में वहाँ बताया गया है कि इन्द्रियों का स्वामी मन है, मन का स्वामी प्राण वायु, प्राण वायु का स्वामी लय है और यह लय नाद पर आश्रित है। इस नाद के अनुसन्धान से ही वह लयावस्था प्राप्त होती है, जिसमें कि मन और प्राण का लय हो जाता है। नादानुसन्धान के माध्यम से मन और प्राण के लय का विधान करने वाली विधि ही लययोग के नाम से जानी जाती है। इससे प्राप्त होने वाली स्थिति को कोई मोक्ष कहे या न कहे, इसमें एक अपूर्व आनन्द की अनुभूति होती है। लययोग का मुख्य लक्षण यह है कि एक बार मन और प्राण के लीन हो जाने पर उसके बाद योगी के चित्त में वासनाओं की पुनः उत्पत्ति नहीं होती और इस प्रकार उसका सभी बाह्य विषयों से सम्पर्क छूट जाता है। वह आत्माराम, जीवन्मुक्त हो जाता है। शाम्भवी मुद्रा में वह प्रतिष्ठित हो जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

लाभ

पाशुपत साधना से प्राप्‍त होने वाली विशेष उपलब्धियाँ।

पाशुपत साधक पाशुपत योग साधना के अभ्यास से जिन योग फलों को अथवा उपलब्धियों को प्राप्‍त करता है, उन्हें लाभ कहा जाता है। लाभ पंचविध माने गए हैं। वे हैं – ज्ञान, तप, नित्यत्व, स्थिति और सिद्‍धि। (ग.का.टी.पृ.4)। गणकारिका में जिन नौ गणों का नामोल्लेख किया गया है उनमें से एक गण लाभों का भी है। इस तरह से लाभ पाशुपत दर्शन के प्रतिपाद्‍य विषयों में गिनाए गए हैं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

लाभभूमि

अपनी परिपूर्ण शक्तिमत्ता को प्राप्त करने की दशा। इसे परानंद को प्रकट करने वाली भूमिका भी कहा जाता है। (शि.सू.वा.पृ. 21)। देखिए परानंद।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

लिंग

चिह्न।

पाशुपत मत में भस्म पाशुपत साधक का लिंङ्ग अर्थात् पाशुपत योगी का चिह्न है जैसे – गृहस्थ, ब्रह्‍मचारी, वानप्रस्थ भिक्षु आदि के अपनी – अपनी अवस्था को व्यक्‍त करने वाले चिह्न होते हैं; उसी तरह से पाशुपत योगी के चिह्न भस्म स्‍नान, भस्मशयन, रूद्राक्ष, मालाधारण, एकवासा आदि हैं जो उसके पाशुपत योगी होने का संकेत देते हैं। इन चिह्नों को धारण करने से साधक ईश्‍वर में लीन होता है तथा औरों से अलग पहचाना जा सकता है। अतः ये लिंग कहलाते हैं। (लीयनाल्लिङ्ग नाच्‍च लिंगनम् पा.सू.कौ.भा.पृ. 12)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

लिंग

लिंग शब्द सांख्ययोग में पदार्थविशेष के नाम के रूप में तथा वस्तुधर्म विशेष के वाचक के रूप में प्रयुक्त होता है। ‘जिसका लय होता है वह लिंग है’। इस दृष्टि से महदादि सभी व्यक्त पदार्थों को लिंग कहा गया है (सांख्याका. 10 की टीकायें)। इसी प्रकार जो ज्ञापन करता है (लिंगयति ज्ञापयति) वह लिंग है। इस दृष्टि से भी बुद्धि आदि को लिंग कहा गया है, क्योंकि वे अपने-अपने कारण के ज्ञापक होते हैं (बुद्धि आदि अपने स्वभाव के द्वारा अपने उपादान के स्वरूप को ज्ञापित करते हैं)। कभी-कभी लिंग शब्द केवल बुद्धि के लिए और कभी-कभी बुद्धि-अहंकार-मन रूप अन्तःकरण-त्रय के लिए प्रयुक्त होता है।
लिंग सम्बन्धी एक विशेष कथन सांख्यकारिका 20 में मिलता है। वाचस्पति आदि व्याख्याकार कहते हैं कि महदादि-तन्मात्र-पर्यन्त समुदाय लिंग है जो चेतन पुरुष के सान्निध्य से चेतन की तरह होता है। ज्ञातृत्व और कर्तृत्व इस लिंग में आश्रित रहते हैं। वस्तुतः ज्ञातृत्व पुरुष का है और त्रैगुणिक लिंग का वास्तव कर्तृत्व उदासीन पुरुष में उपचरित होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

लिंग

लीन, अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के अगोचर चिद्रूप अर्थ का बोध कराने वाला तत्त्व लिंग कहा जाता है। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त के प्रतिरूप कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्याण पीठ इसलिये कहलाते हैं कि ये चिति के स्फुरण के आधार स्तम्भ हैं। चतुर्विध अन्तःकरण में उनकी वृत्तियों के समान उक्त चतुर्विध पीठों में स्वयंभू, बाण, इतर और पर नामक लिंगों की स्थिति मानी गई है (योगिनीहृदय, 1/44)। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के षट्चक्र प्रकरण में भी इन लिंगों की विभिन्न चक्रों में स्थिति प्रतिपादित है।
(क) इतर लिंग
बुद्धयात्मक पूर्णगिरि पीठ में बुद्धि की वृत्ति के प्रतिरूप इतर लिंग की स्थिति मानी गई है। यह शरत् पूर्णिमा के चन्द्र के समान कान्ति वाला है। कदम्ब के फल के समान इसकी गोल आकृति है। थकार से लेकर सकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से यह आवृत है। श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोण के वाम भाग में इसकी स्थिति मानी जाती है (योगिनीहृदय, 1/44-46)। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के षट्चक्र प्रकरण में इतर लिंग की स्थिति आज्ञा चक्र में मानी गई है।
(ख) पर लिंग
चित्तमय ओड्याण पीठ में चित्त की वृत्ति के प्रतिरूप पर लिंग की स्थिति मानी गई है। परतेजोमय इस लिंग का कोई वर्ण नहीं है। यह सूक्ष्म, अतीन्द्रिय और बिन्दुमय है। अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त समस्त अक्षरों से यह आवृत है। इसमें परमानन्द पद की नित्य स्थिति रहती है। श्रीचक्र के मध्य में स्थित ज्योतिर्बिन्दु में इसका निवास है (योगिनीहृदय, 1/47)। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के षट्चक्र प्रकरण में स्वाधिष्ठान चक्र में पर लिंग की स्थिति मानी गई है। वस्तुतः योगिनीहृदय के अनुसार सहस्त्रार चक्र में इसकी स्थिति मानी जानी चाहिये। सम्प्रदाय भेद से इस विरोध का परिहार करना चाहिये।
(ग) बाण लिंग
अहंकारात्मक जालन्धर पीठ में अहंकार की वृत्ति के प्रतिरूप बाण लिंग की स्थिति मानी गई है। यह बन्धूक पुष्प के समान रक्त वर्ण का है। इसकी आकृति त्रिकोणात्मक है। ककार से लेकर तकार पर्यन्त सोलह व्यजंनों से यह आवृत है। श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोण के दक्षिण भाग में इसकी स्थिति मानी गई है (योगिनीहृदय, 1/44-46)। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के षट्चक्र प्रकरण (6 प्रकाश) में अनाहत चक्र में बाण लिंग की स्थिति मानी गई है।
(घ) स्वयंभू लिंग
मनोमय कामरूप पीठ में मन की वृत्ति के प्रतिरूप स्वयंभू लिंग की स्थिति मानी गई है। यह सुवर्ण के समान पीत वर्ण है। यह तीन शिखर वाला है, अथवा तीन बिन्दुओं के कूट से इसका आकार बनता है। अकार आदि सोलह स्वरों से यह आवृत है। श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोण के अग्र भाग में इसका निवास है (योगिनीहृदय, 1/44-46)। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के षट्चक्र प्रकरण (6 प्रकाश) में मूलाधार चक्र में पश्चिमाभिमुख स्वयंभू लिंग की स्थिति बताई गई है।
Darshana : शाक्त दर्शन

लिंग

वह मूलभूत संवित्तत्त्व, जिसमें समस्त विश्व का लय हो जाता है और जिससे उसका उदय (आगमन) होता है (लयादागयनाच्च)। मिट्टी, पत्थर, स्वर्ण आदि धातुओं से बना हुआ बहिर्लिग तभी फलदायक होता है, जब उस पर उपरोक्त आध्यात्मिक लिंग की भावना की जाए। बाह्य लिंग उस आध्यात्मिक लिंग का प्रतीक मात्र है। (स्व.तं.उ., पटल 3, पृ. 168)।
योगधारणा में हृदय में सतत गति से चलने वाले प्राण स्पंदन परचित्त को एकाग्र करने से वहाँ हृदय से ब्रह्मरंध्र तक फैली हुई लिंगमूर्ति के दर्शन होते हैं। उसके ध्यान के अभ्यास से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो जाते हैं। उस लिंग का प्रतीक भी बाह्य लिंग है। (मा.वि.तं. 18-श्तः 11)।
सृष्टि संसार में लिंग और योनि के परस्पर संगम से हुआ करती है। परमेश्वर शिवरूपतया जगत् पिता है और शक्तिरूपतया जगन्माता है। उन दोनों के परस्पर अभिमुखतया ठहरे हुए एक संघट्टात्मक पर तत्त्व का प्रतीक ही प्रणाली के बीच में खड़ा ठहरा हुआ शिवलिंग है। अतः इस पर शिवशक्ति संघट्ट की भावना की जाती है। तब ही इसकी उपासना भोग और मोक्षरूपी जीवन फलों को देती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

लिंग

देखिए ‘अष्‍टावरण’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंग त्रय

उच्चार योग में भावना के द्वारा स्फुटतया आभासमान तीन उपास्य तत्त्व। उनमें से अव्यक्तलिंग (देखिए) नर, शक्ति और शिव के स्वरूपों वाला होता है। देहादि के विषय में अभिमान के रहते हुए भी जब परतत्त्व का समावेश चित्त में हो जाता है तो नर-शक्ति-स्वरूप व्यक्ताव्यक्त लिंग (देखिए) का उद्बोध हो जाता है। पराद्वैतरूपिणी संवित् शक्ति के गुणीभूत हो जाने पर प्रमेयरूपता ही के प्रधानतया प्रकाशित हो चुकने पर जिस (जगत की सृष्टि और लय के धाम बने हुए) लिंग का उद्बोध होता है, उसे व्यक्तलिंग (देखिए) कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

लिंग धारण

देखिए ‘गर्भ-लिंग-धारण’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंग-स्थल

वीरशैव दर्शन में परमतत्व को ‘स्थल’ कहा जाता है। वह सृष्‍टि-लीला के समय अपनी विभिन्‍न शक्‍तियों या कलाओं से संयुक्‍त होकर महालिंग, ‘प्रसादलिंग’, ‘जंगमलिंग’ (चरलिंग), ‘शिवलिंग’, और ‘आचारलिंग’ नामक छः प्रकार के लीला-विग्रहों को धारण कर लेता है। इस तरह वह ‘स्थल’ तत्व ही लिंगस्वरूप हो जाने से ‘लिंग-स्थल’, अर्थात् लिंगरूपी स्थल-तत्व कहा जाता है। वीरशैव दर्शन के साधक को इन लिंगों की उपासना के माध्यम से ही मूल स्थल तत्व की प्राप्‍ति होती है। इन लिंगों के स्वरूप इस प्रकार हैं (अनु. सू. 3/21-23)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंग-स्थल

क. महालिंग
सूक्ष्म-कार्य और कारण रूप प्रपंच की उपादान-कारणीभूत शक्‍ति को ‘चिच्छक्‍ति’ कहते हैं। इस शक्‍ति का पर्याय नाम है ‘शांत्यतीतोत्‍तरा-कला’। इस ‘शांत्यतीतोत्‍तराकला’ से संयुक्‍त वह स्थलरूप परशिव ही ‘महालिंग’ कहलाता है। यह अखंड, गोलाकार, तेजोमय ऊंकार-स्वरूप है। सृष्‍टि के समय इसी महालिंग से ‘पंचशक्‍ति’, ‘पंचकला’ और ‘पंचसादाख्य’ आदि का उदय होता है। अतः इस महालिंग को भावी सृष्‍टि की हेतुभूत एक पूर्ण गर्भावस्था कह सकते हैं। यह अणु से भी अणु और महत् से भी महान् है। यही सृष्‍टि, संहार आदि पंच कृत्यों का नियामक है। इस ‘महालिंग’ के उपासक अंग (जीव) को ‘ऐक्य’ कहते हैं। यह ऐक्य-अंग इसी महालिंग में समरस होकर मुक्‍त हो जाता है (अनु. सू. 3/28,35,36; वी.आ.चं. पृष्‍ठ 39; च.ज्ञा.आ. क्रियापाद 3/30)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंग-स्थल

ख. प्रसाद-लिंग
चिच्छक्‍ति से संयुक्‍त महालिंग के सहस्रांश से आनंदस्वरूपिणी ‘पराशक्‍ति’ का प्रादुर्भाव होता है। पराशक्‍ति का पर्याय नाम है ‘शांत्यतीत-कला’। इस शांत्यतीत कला से संयुक्‍त वह स्थल-रूप परशिव ही ‘प्रसाद-लिंग’ कहलाता है। यह सत-चित्-आनंदैकरस-स्वरूप है। इस प्रसाद लिंग में ही ‘शिवसादाख्य’ आश्रित रहता है। शिव के ईशानमुख से इस प्रसाद-लिंग की अभिव्यक्‍ति होती है। प्रसाद-लिंग के उपासक अंग (जीव) को ‘शरण’ कहते हैं। इस ‘शरण’ नामक उपासक को इस प्रसाद-लिंग में रहने वाली ‘शांत्यतीत कला’ की कृपा से शिव के सत्-चित्-आनंदस्वरूप का अनुभव होता है (अनु. सू. 3/29, 36,37; वी.आ.चं. पृष्‍ठ 40; च.ज्ञा.आ. क्रियापाद 3/30)।)
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंग-स्थल

ग. जंगम-लिंग
पराशक्‍ति के सहस्रांश से उत्पन्‍न शक्‍ति को ‘आदिशक्‍ति’ कहते हैं। आदिशक्‍ति का पर्याय नाम ‘शांति कला’ है। इस शांति-कला से संयुक्‍त स्थल-रूप परशिव को ‘जंगम-लिंग’ कहते हैं। इस जंगम-लिंग को ‘चरलिंग’ भी कहा जाता है। यही ‘अमूर्त सादाख्य’ का आश्रय है। शिव के तत्पुरुष मुख से इस जंगम-लिंग की अभिव्यक्‍ति मानी जाती है। इस लिंग का उपासक अंग (जीव) ‘प्राणलिंगी’ कहलाता है। जंगम-लिंग में रहने वाली शांति-कला की कृपा से इस लिंग के उपासक जीव के मलरूपी नाश क्षीण हो जाते हैं और उसमें आत्मानुभव की अभिव्यक्‍ति होती है तथा साधक का मन निरंतर शांति से ओत-प्रोत रहता है (अनु.सू. 3/30,38,39; वी.आ.चं. पृष्‍ठ 40; च. ज्ञा.आ. क्रियापाद 3/29)।
Darshana : वीरशैव दर्शन
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