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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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वरणभेद

एक जाति की वस्तु को जब योगी संकल्पबल से अन्य जाति में रूपान्तरित करते हैं तब जिस प्रक्रिया के आधार पर वह वस्तु अन्य जाति में परिणत होती है उस प्रक्रिया का परिचय ‘वरणभेद’ शब्द से योगसूत्रकार ने दिया है (4/3)। वरणभेद का अर्थ है वरण (= प्रतिबन्ध) का नाश। सूत्रकार का कहना है कि किसी वस्तु में जिस जाति की अभिव्यक्ति करानी है उस जाति की प्रकृति वस्तु में पहले से ही रहती है, पर विरुद्ध प्रकृति उसकी अभिव्यक्ति को रोके रहती है। इस आवरण (वरण) को भंग कर देने मात्र से सूक्ष्म रूप से अवस्थित अभीष्ट प्रकृति स्वतः अभिव्यक्त हो जाती है – इस अभिव्यक्ति के लिए अन्य कोई व्यापार पृथक् रूप से नहीं करना पड़ता। उदाहरणार्थ, धर्माचरण से तामस आवरण नष्ट होता है और सत्त्वप्रधान प्रकृतियाँ व्यक्त होती हैं। उसी प्रकार अधर्म से सात्त्विक आवरण नष्ट होता है और तमःप्रधान प्रकृतियाँ व्यक्त होती हैं। ये धर्म-अधर्म प्रकृतियों को प्रवर्तित नहीं करते, केवल उनके आवरणों का नाश करते हैं – यह वरणभेद है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

वर्ण-अध्वन

आणवोपाय की कालाध्वा नामक धारणा में आलंबन बनने वाला सूक्ष्मतर मार्ग। पद के पर रूप को वर्ण कहते हैं। मंत्राध्वा के अभ्यास से क्षुब्ध प्रमाणस्वरूपता के शांत हो जाने पर साधक पूर्ण प्रमातृता में विश्रांति प्राप्त करने के लए वर्णाध्वा का अभ्यास करता है। इस अभ्यास में वह समस्त वर्ण प्रपंच को अपने शुद्ध स्वरूप से दृढ़तर भावना द्वारा व्याप्त करता हुआ अपने शिवभाव के समावेश को प्राप्त कर सकता है। (तं.सा.पृ. 47, 59-61, 112)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

वशित्व

अणिमादि आठ सिद्धियों में वशित्व (‘वशिता’ शब्द भी प्रयुक्त होता है) एक है (व्यासभाष्य 3/45)। इस सिद्धि के दो पक्ष हैं – भूत (पंचभूत) एवं भौतिक (पंचभूत-निर्मित-घटादि) को अपने वश में रखना तथा अन्यों के वश में न रहना। भूत-भौतिक के कारण-पदार्थ पर आधिपत्य करने पर ही यह सिद्धि उत्पन्न होती है। इस सिद्धि के कारण सभी भूत योगी के नियंत्रण में रहते हैं और वे उसकी इच्छा के अनुसार विपरिणाम को प्राप्त करते हैं। भूतभौतिक की प्राकृतिक शक्तियों का प्रतिबन्ध करने की शक्ति भी इस सिद्धि से होती है। भूतों का सूक्ष्मनामक जो रूप है, उस पर संयम करने से यह सिद्धि प्राप्त होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

वशीकार

वशीकार=वशीकरण, जो वश में नहीं था, उसको वश में लाना। ‘वशीकार’ का जो प्रयोग है उससे वशीकार का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। योगसूत्र 1/40 के अनुसार योगशास्त्रीय उपायों से स्थिति प्राप्त होने पर योगी का चित्त परमाणुपर्यन्त सूक्ष्मविषय में तथा स्थूल-भूत-पर्यन्त परममहत् विषय में स्वेच्छ्या बाधाहीन होकर विचर सकता है। चित्त को अभीष्ट किसी भी विषय में निविष्ट करना जब सहजसाध्य हो जाता है, किसी से भी चित्त के संचार से बाधा नहीं होती, तब यह स्थिति वशीकार कहलाती है। यह वशीकार की सर्वोच्च अवस्था है, जो ‘परवशीकार’ कहलाती है। इससे निम्नकोटि का वशीकार भी है, जो ‘अपरवशीकार’ कहलाता है। वैराग्य को ‘वशीकारसंज्ञा’ कहा जाता है। वहाँ ‘वशीकार’ से ‘विषयकृत मनोविकारशून्यता’ का बोध होता है; विषय में हेय-एवं-उपादेय-बुद्धि न होकर जो उपेक्षा-बुद्धि होती है वहीं वशीकारसंज्ञा है (योगसूत्र 1/15 का भाष्य)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

वश्यता

‘वश्यता’ का अर्थ ‘वश्य का भाव’; वश्य = वश में रहने वाला। योगशास्त्र में ‘वश्यता’ का अभिप्राय ‘इन्द्रियवश्यता’ से है, अर्थात् अपने-अपने विषयों की ओर इन्द्रिय की जो प्रवृत्ति है उस प्रवृत्ति पर इन्द्रियाधीश मन का पूर्ण आधिपत्य होना – अनभीष्ट विषय की ओर इन्द्रियों की प्रवृत्ति न होना ही वश्यता है। इस वश्यता के भी कई भेद हैं (द्र. व्यासभाष्य 2/55) और इसका सर्वोच्च उत्कर्ष तब होता है कि जब चित्त की एकाग्रता से ही (अन्य किसी उपाय से नहीं) इन्द्रियों की (विषय की ओर) अप्रवृत्ति होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

वह्नि

विज्ञानभैरव के 67वें श्लोक में वह्नि और विष शब्दों की चर्चा आई है। यहाँ वह्नि का अधःकुण्डलिनी से संबन्ध है और विष का ऊर्ध्व कुण्डलिनी से। अधःकुण्डलिनी में प्रवेश (आवेश) संकोच अथवा वह्नि कहलाता है और ऊर्ध्व कुण्डलिनी में प्रवेश विकास अथवा विष कहलाता है। वह्नि का प्राण से संबंध है और विष का अपान से। जब प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है और अधःकुण्डलिनी अथवा मूलाधार तक जाता है, तब इस दशा को वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मूल और आधे मध्य तक में प्रवेश वह्नि अथवा संकोच कहलाता है। वह्नि शब्द वह् धातु से निष्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है – उठाकर ले जाना। अग्नि को वह्नि इसलिये कहा जाता है कि यह जो कुछ उसमें हवन किया जाता है, उसे देवों तक उठाकर ले जाता है। प्रस्तुत प्रसंग में वह प्राण को मूलाधार तक उठाकर ले जाता है। इससे जीव का स्वरूप संकुचित हो जाता है। वह्नि शब्द इसी दशा का बोधक है।
योगशास्त्र में मानव शरीर स्थित आधारों की चर्चा आई है। इनमें से लिंग के ऊपर नाभि से चार अंगुल नीचे वह्नि नामक आधार की स्थिति मानी गई है। नित्याषोडशिकार्णव (5/1) और तन्त्रालोक (3/165-170) में काम तत्त्व के रूप में इसका वर्णन किया गया है। गोरक्षनाथ कृत अमरौघशासन (पृ. 8-9) में भी यह विषय चर्चित है।
Darshana : शाक्त दर्शन

वह्नि

शुद्ध एवं परिपूर्ण संविद्रूप पर-प्रकाश ही जब प्रमाण एवं प्रमेय के समरस रूप परिमित प्रमाता के रूप में प्रकट हो जाता है तो उस अवस्ता में पहुँचने पर ही परतत्त्व या पर प्रकाश वह्नि कहलाता है। (तं.आ. 3-122, 123) वह्नि को प्रमाण एवं प्रमेय के भेद का दहन करने के कारण ज्वलन प्रधान चिद्रपू माना गया है और इसी रूप के कारण इसे परिमित प्रमातृ रूप भी माना गया है। (वि पृ. 127)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

वाग्विशुद्‍ध

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत के अनुसार ईश्‍वर के परस्वरूप का वर्णन वाणी से नहीं हो सकता है, वहाँ वाणी पूर्णरूपेण निवर्तित होती है। अतः वह वाग्विशुद्‍ध कहलाता है। तात्पर्य यह है कि वाणी का विषय बनने से जो प्रमेयतारूपिणी अशुद्‍धि सांसारिक भावों में आती है, परमेश्‍वर उस अशुद्‍धि से सर्वथा हीन है, अतः वाग्विशुद्‍ध कहलाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 127, ग.का.टी.पृ.11)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

वाम

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत में ईश्‍वर को श्रेष्‍ठ शक्‍ति संपन्‍न होने के कारण वाम कहा गया है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 56)। वाम शब्द का अर्थ सुंदर भी होता है। जैसे ‘वामोरू’ शब्द का अर्थ होता है सुंदर ऊरुओं वाली ललना। परमेश्‍वर परम आनन्दमय होने के कारण अतीव सुंदर अर्थात् हृद्‍य तथा स्पृहणीय है। अतः उसे वाम कहते हैं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

वामदेव

स्वच्छंद नाथ (देखिए) के पाँच मंत्रात्मक स्वरूपों में से चौथा रूप। शिव इस रूप में अवतरित होकर भेदात्मक शैवशास्त्र का उपदेश करता है। प्रक्रिया मार्ग की दृष्टि से साधना के क्रम में ईश्वर तत्त्व को ज्ञान शक्ति की अभिव्यक्ति माना गया है। उस दृष्टि से वामदेव को ईश्वर भट्टारक का तथा ज्ञान शक्ति की अभिव्यक्ति का स्फुट रूप माना गया है। (तं.आ.वि. 1-18)। स्वच्छंदनाथ के पाँचमुखों में से उत्तराभिमुख चेहरे का नाम भी वामदेव है। वामदेव मुख का वर्ण पीत माना गया है। इसकी अवस्था अविकसित क्रियाशक्ति प्रधान मानी गई है। यह विष्णुस्थानीय स्वप्न अवस्था है। (मा.वि.वा., 1-252, 271 से 276)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

वामा

शान्ता शक्ति जब अम्बिका शक्ति में बीजभाव से अवस्थित जगत् को स्पष्ट भासित करने को उद्यत होती है, तो वह वामा कहलाती है। विश्व का वमन करने से और इसकी गति कुटिल होने से भी इसको वामा कहा जाता है। इसकी कुटिल गति के कारण ही श्रृंगाट (त्रिकोण) की वाम रेखा बनती है। यही वामा शक्ति इच्छा शक्ति से संवलित होकर पश्यन्ती के रूप में अभिव्यक्त होती है (योगिनीहृदय, 1/37-38)।
Darshana : शाक्त दर्शन

वामा

परमेश्वर की अंबा नामक पराशक्ति का वह रूप, जो निग्रह लीला को चलाता है। वामा शक्ति अपने अनंत शक्ति समूहों के समेत जीवों के बंधन की लीला को चलाती रहती है। जीवों को संसृति के चक्कर में ही लगाए रखने के कार्य को यही शक्ति करती है। वामादेवी के अनंत शक्ति समूहों को घोरतरी शक्तियाँ कहा जाता है। (तं.आ. 6-47; मा.वि.वा. 3-31)। संसार का अर्थात् संसृति का वमन करते रहने ही के कारण इसे वामा कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

वामेश्वरी चक्र

खेचरी, गोचरी, दिक्चरी तथा भूचरी नामक अंतः एवं बाह्य शक्ति चक्रों की वामेश्वरी नामक अधिष्ठातृ देवी के इन सभी शक्तियों के समूह को वामेश्वरी चक्र कहते हैं। भेदाभेदमय तथा पूर्ण भेदमय प्रपंच को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली तथा भेदमय एवं भेदाभेदमय प्रपंच को पुनः अभेद रूप प्रदान करने वाली वामा शक्तियों की स्वामिनी देवी को वामेश्वरी कहते हैं। इसके इस सारे शक्ति समूह को वामेश्वरी चक्र कहते हैं। (स्व.सं.पृ. 20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

वार्ता

स्वार्थ-संयम’ से पुरुष-ज्ञान उत्पन्न होने से पहले जो सिद्धियाँ प्रयास के बिना प्रकट होती हैं, वार्ता उनमें से एक है (योगसूत्र 3/36)। इस सिद्धि से दिव्यगन्धसंविद् होती है। ह्लादयुक्त अलौकिक गन्ध का ज्ञान इसका स्वरूप है। वर्तमान लेखक की दृष्टि में सिद्धि का नाम वार्ता न होकर वार्त (अकारान्त) है; अर्वाचीन काल के आचार्यों ने भ्रमवश ‘वार्ता’ नाम कल्पित किया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

वास

उपाय का एक भेद।

पाशुपत दर्शन में वास के कई अर्थ दिए गए हैं। भासर्वज्ञ के अनुसार इसका पहला अर्थ है – ग्रहण – अर्थात् शास्‍त्रवाक्यों के सम्यक् अर्थ को अच्छी तरह से समझना ग्रहण नामक वास होता है। उन शास्‍त्र सिद्‍धांतों को बड़ी देर तक अच्छी तरह से याद रखना धारण नामक वास होता है। उस समझे हुए ज्ञान का बाहर विविध स्थानों में अर्जित ज्ञान के साथ ठीक तरह से तालमेल बिठाना ऊह नाम वास होता है। अपने मत की दृढ़ प्रतिपत्‍ति के लिए दूसरे मत के दार्शनिक सिद्‍धांतों का खंडन करने की शक्‍ति अपोह को भी वास कहते हैं। जिस श्रुति की अनेकार्थक व्याख्या हुई हो, उसको वास्तविक रूप में समझने की शक्‍ति तथा अपने सिद्‍धांतों को दूसरे लोगों में प्रचार करने की क्षमता विज्ञान नामक वास होता है। पुनरुक्‍तिदोष से मुक्‍त तथा परस्पर व्याघातरहित भाषणशक्‍ति वचन नामक वास होता है। दोष रहित उच्‍चारण से गुरु को प्रसन्‍न रखना तथा उसकी परिचर्या करना क्रिया नामक वास होता है। शास्‍त्रीय सिद्‍धांतों के पूर्वपक्ष तथा उत्‍तरपक्ष दोनों के परस्पर शास्‍त्रार्थ का उचित पर्यालोचन करके फिर उचित अर्थ का अनुष्‍ठान करने का प्रयत्‍न यथान्यायामि निवेश नामक वास होता है। इस तरह से भासर्वज्ञ ने गणकारिका टीका में वास के कई अर्थ दिए हैं और सभी अर्थ प्राय: ज्ञान व शास्‍त्र को समुचित रूप से समझने के अर्थ में ही दिए गए हैं (ग.का.टी.पृ.17)। अतः वास को यहाँ पर निवास के अर्थ में कदापि नहीं लिया जाना चाहिए। यह एक तान्त्रिकी संज्ञा है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

वासना

वासना को आशय भी कहा जाता है (चित्तभूमि में शयन करने के कारण)। जो संस्कार केवल स्मृति को उत्पन्न करते हैं, वे वासना कहलाते हैं (द्र. व्यासभाष्य 2/13); कर्माशय रूप वासना जन्म, आयु एवं सुखदुःखभोग की नियामक है। अनुभवमात्र की वासना होती है; यही कारण है कि मरण-भयरूप स्मृति से पूर्वजन्म का (पूर्वजन्म में संचित वासना का) अनुमान पूर्वाचार्यों ने किया है। वासना अपने अनुरूप कर्मों द्वारा अभिव्यक्त होती है। चित्त की वृत्तियों पर वासना का प्रभाव अत्यन्त प्रबल है।
वासना अनादि है और चित्त अनेक प्रकार की वासनाओं द्वारा सदैव अनुरंजित रहता है। जिस प्रकार के कर्म का जैसा फल होता है, उस फल के भोग के अनुरूप वासना होती है। कैवल्य में चित्त एवं चित्तगत वासना का अभाव (अव्यक्त भाव) हो जाता है। यह जिन उपायों से संभव होता है, उनका विवरण योगसूत्र 4/11 में द्रष्टव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

विकरण धर्मित्व

सिद्‍ध योगी की एकशक्‍ति।

करणरहित होने पर भी ऐश्वर्यरूप ज्ञानशक्‍ति तथा क्रियाशक्‍ति की उपस्थिति विकरणधर्मित्व नामक शक्‍ति होती है। पाशुपात दर्शन के अनुसार सिद्‍ध साधक में ऐसी शक्‍ति उद्‍बुद्‍ध हो जाती है कि वह विकरण होने पर भी अर्थात् इन्द्रिय रहित होने पर भी अपार ऐश्‍वर्य का भोक्‍ता बनता है, उसे ऐश्‍वर्ययुक्‍त कैवल्य की प्राप्‍ति हो जाती है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 45 ग.का.टी.पृ.10)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

विकरणभाव

इन्द्रिय जप से जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उनमें से यह एक है (योगसू. 3.48)। देह-संबन्धहीन इन्द्रियों का किसी भी अभीष्ट देश, काल और विषय में वृत्तिलाभ अर्थात् उस देशादि से संबन्धित हो जाना – व्याप्त हो जाना – ही विकरणभाव है। इन्द्रियों की इस ‘विकीर्णता’ के कारण ही ‘विकरण’ नाम दिया गया है – ऐसा प्रतीत होता है। किसी-किसी के अनुसार भवप्रत्यय-समाधि से युक्त विदेहों का ही यह विकरणभाव होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

विकल्प

पाँच प्रकार की वृत्तियों में विकल्प एक है। भाषाज्ञान पर आश्रित जो वास्तव में विषयशून्य बोध होता है, वह विकल्प है (योगसूत्र 1/9)। विपर्यस्त ज्ञान होने पर भी यह मिथ्याज्ञान-रूप विपर्यय से पृथक् है, क्योंकि मिथ्याज्ञान को जानने वाला उस मिथ्याज्ञान का व्यवहार नहीं करता। विपर्यय के लिए भाषा का आश्रय अनावश्यक है – विषय और इन्द्रिय ही अपेक्षित हैं। विकल्प-रूप भ्रान्ति ज्ञान का व्यवहार सदैव चलता रहता है, जब तक निर्विचारा समापत्ति अधिगत न हो। (इस समाधि से जात ऋतम्भरा प्रज्ञा में विकल्प की गन्ध भी नहीं है)। भाषाव्यवहार में ही विकल्पवृत्ति रहती है।
यह विकल्प वस्तु, क्रिया और अभाव के भेद से तीन प्रकार का होता है। वस्तुविकल्प का उदाहरण है – ‘राहु का शिर’; जो राहु है, वही शिर है, अतः यहाँ अभिन्न पदार्थ में जो भाषाश्रित भेदज्ञान होता है, वह विकल्प है। ‘राहु का शिर’ ऐसा शब्दज्ञानजनित व्यवहार सिद्धवत् चलता ही रहता है। क्रियाविकल्प का उदाहरण यह है – ‘बाण चल नहीं रहा है’ इस वाक्य में वस्तुतः बाण न चलने की कोई क्रिया नहीं कर रहा है; वह अवस्थित ही है और उस अवस्थित भाव को ‘न चलना’ रूप क्रिया कहा जाता है। अभाव-विकल्प का उदाहरण है – पुरुष (तत्त्व) अनुत्पत्तिधर्मा है; यहाँ पुरुष में अनुत्पत्तिरूप धर्म की सत्ता कही गई है, यद्यपि वैसा कोई धर्म पुरुष में नहीं है – उनमें उत्पत्ति-धर्म का अभाव मात्र है। पुरुष ही चैतन्य है; पर ‘पुरुष का चैतन्य’ ऐसा जब कहा जाता है, तब वह वस्तुविकल्प का पारमार्थिक उदाहरण होता है। ‘पुरुष निष्क्रिय (क्रिया का अतिक्रमणकारी) है’ – यह वाक्य (अर्थात् वाक्यजनित ज्ञान) क्रियाविकल्प का उदाहरण है, क्योंकि पुरुष (तत्त्व), वस्तुतः अतिक्रमण क्रिया करते नहीं हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

विकल्प

तान्त्रिक दर्शन में बाह्य नील-पीत (घट-पट) आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ विकल्प स्वरूप माने गये हैं। अहं परामर्श दो प्रकार का होता है – शुद्ध और मायीय। इनमें से शुद्ध परामर्श विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संवित्त्मात्र में अथवा विश्व की छाया से असंस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में होता है। मायीय अथवा अशुद्ध परामर्श वैद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता है, अर्थात् इन्हीं को अपना स्वरूप मान लेता है। इनमें से शुद्ध परामर्श में किसी प्रतियोगी (विरोधी) पदार्थ की सत्ता न रहने से कोई भी अपोहनीय (त्याज्य) नहीं है। घट प्रभृति बाह्य पदार्थ भी इस प्रकाशस्वरूप परमतत्त्व से ही अपना अस्तित्व बनाते हैं, अतः वे उससे अभिन्न ही है, उसके विरोधी नहीं। इस अवस्था में जब कोई स्थिति अपोहनीय नहीं है, तो वह विकल्प कैसे हो सकती है? इसके विपरीत अशुद्ध (मायीय) परामर्श से वैद्यरूप शरीर प्रभृति में उससे भिन्न देह आदि का और घट प्रभृति का भी व्यपोहन (व्यवच्छेद = भेद) विद्यमान है। इसी भेद दशा की प्रतीति को विकल्प के नाम से जाना जाता है। बौद्ध विज्ञानवाद और शून्यवाद में भी विज्ञान अथवा शून्य के अतिरिक्त सभी जागतिक पदार्थ विकल्प स्वरूप ही माने गये हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन
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