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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

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शंकर

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत में ईश्‍वर को शंकर भी कहा गया है क्योंकि वह सभी कल्याणों को करने वाला होता है तथा निर्वाण या मुक्‍ति को देने वाला होता है अतः शंकर कहलाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.71)।

(शमसुखनिर्वाणकरत्वम् शंकरत्वम् ग.का.टी.पृ.11) शं पद का अर्थ कल्याण होता है। भगवान शिव ही अनुग्रहशक्‍ति के द्‍वारा पशुओं का कल्याण करते हैं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

शक्ति

1. सामर्थ्य। परमेश्वर का परिपूर्ण स्वातंत्र्य। परमेश्वर की परमेश्वरता। पराशक्ति। परमेश्वर की वह सामर्थ्य जिसके बूते पर वह अपनी अनुत्तर संविद्रूपता में ठहरता हुआ ही सृष्टि, स्थिति इत्यादि पंच कृत्यों को सतत रूप से अपनी स्वतंत्र इच्छा के अनुसार चलाता ही रहता है।
2. शिव का स्वस्वरूप-परामर्श। शिव की स्पंदमानता, अचल शिव की चलनशीलता या चलता। परमशिव की विमर्शरूपता। यह विमर्शात्मकता ही उसकी शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण क्रियास्वरूपता है और ऐसी क्रियात्मकता ही उसकी परमेश्वरता है। परमशिव की विश्वमयता उसके इसी स्वरूप परामर्श का फल है और वही उसकी शक्तिस्वरूपता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्‍ति

वीरशैव दर्शन में ‘शक्‍ति’ परशिव का एक अविभाज्य स्वरूप है। जैसे चंद्रमा में वस्तुओं की प्रकाशिका चांदनी अविनाभाव संबंध से रहती है, उसी प्रकार समस्त विश्‍व को प्रकाशित करनेवाली यह शक्‍ति परशिव के साथ अविनाभाव-संबंध से रहती है (सि.शि. 20/4 पृष्‍ठ 202)। सृष्‍टि की रचना में यह शक्‍ति परशिव की सहायक बनती है, अतः इसे सर्वलोकों की प्रकृति तथा परशिव की सहधर्मचारिणी कहा गया है (सि.शि. 1/8 पृष्‍ठ)।

यह शक्‍ति वस्तुत: एक होने पर भी सृष्‍टि के समय स्व-स्वातंत्र्य बल से चिच्छक्‍ति, पराशक्‍ति, आदिशक्‍ति, इच्छाशक्‍ति, ज्ञानशक्‍ति तथा क्रियाशक्‍ति के नाम से छः प्रकार की हो जाती है। (अनु.सू. 3/26, 2/7)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्‍ति

क. चिच्छक्‍ति
सूक्ष्म कार्य-कारण रूप प्रपंच की उपादानकारणीभूत शक्‍ति ही ‘चिच्छक्‍ति’ कहलाती है (शि.मं. पृष्‍ठ 27)। इसी को विमर्शशक्‍ति और परामर्श-शक्‍ति भी कहा जाता है। यह शक्‍ति बोधरूप है, अर्थात् इस चिच्छक्‍ति या विमर्श शक्‍ति से संयुक्‍त होने पर ही परशिव को ‘अस्मि’ (मैं हूँ), ‘प्रकाशे’ (मैं प्रकाशमान हूँ), ‘नंदामि’ (मैं आनंदरूप हूँ) इत्याकारक, सत-चित्-आनंदस्वरूप का बोध होता है। अपने प्रकाशमय स्वरूप का बोध न होने पर स्फटिक आदि की तरह परशिव को भी जड़ मानना पड़ेगा, जो कि अभीष्‍ट नहीं है (सि.शि. 2/12,13 पृष्‍ठ 14)।

इस विमर्श-शक्‍ति के कारण ही परशिव सर्वकर्ता, सर्वव्यापक और सर्व कर्मों का साक्षी बन जाता है (सि.शि. 20/4, पृष्‍ठ 199)। यह विमर्श-शक्‍ति ही ‘शिवतत्व’ से ‘पृथ्वीतत्व’ स्थिति एवं लय का भी कारण है (शि. मं. पृष्‍ठ 33-34; सि.श. 20/1 :5 पृष्‍ठ 198-199)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्‍ति

ख. पराशक्‍ति
योगियों के ध्यान-योग्य अपने को बनाने के लिए चिच्छक्‍ति-युक्‍त परशिव जब चिंतन करने लगता है, तब परशिव के सहस्रांश से ‘पराशक्‍ति’ का प्रादुर्भाव होता है (वा.शु. तंत्र 1/24)। यह आनंद-स्वरूप है, इसे ही परशिव की अनुग्रह-शक्‍ति कहा जाता है। इसी शक्‍ति से युक्‍त होकर वह योगियों के ऊपर अनुग्रह करता है (शि. मं. पृष्‍ठ 27)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्‍ति

ग. आदि-शक्‍ति
पराशक्‍ति के सहस्रांश से आदि-शक्‍ति का उदय होता है (वा.शु.तं. 1/25)। प्रपंच की कारणीभूत इच्छा, ज्ञान और क्रियाशक्‍ति के पहले इसकी स्थिति है, अर्थात् आदि-शक्‍ति से ही इनकी उत्पत्‍ति होती है। अतएव इसे आदिशक्‍ति कहा जाता है (शि.मं. पृष्‍ठ 27)। इस आदिशक्‍ति से संयुक्‍त होकर ही परशिव प्राणियों का निग्रह करते हैं, अर्थात् प्राणियों के निगृहीत करने की सामर्थ्य इस आदिशक्‍ति से यही प्राप्‍त है।
Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्‍ति

घ. इच्छा-शक्‍ति
आदि शक्‍ति के सहस्रांश से इच्छाशक्‍ति का उदय होता है (वा.शु.तं. 1/25)। ज्ञानशक्‍ति और क्रिया-शक्‍ति इन दोनों शक्‍तियों की साम्यावस्था को ही इच्छा-शक्‍ति कहते हैं। यह इच्छा-शक्‍ति ही अपने में विद्‍यमान ज्ञान और क्रियाशक्‍तियों के माध्यम से इस विश्‍व को उत्पन्‍न करती है। यही विश्‍व की बीज रूप है। संहार के समय यह विश्‍व पुन: इच्छाशक्‍ति में ही विलीन होकर रहता है, अतः इस इच्छाशक्‍ति को संहार-शक्‍ति भी कहा जाता है। इसी से युक्‍त होकर ही परशिव प्रपंच का संहार करता है (शि.मं. पृष्‍ठ 27,34)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्‍ति

ड. ज्ञानशक्‍ति
इच्छा-शक्‍ति के सहस्रांश से ज्ञानशक्‍ति की उत्पत्‍ति होती है। (वा. शु. तं. 1/26)। इस ज्ञानशक्‍ति के कारण ही शिव सर्वज्ञ कहलाता है और उसको अपने में विद्‍यमान प्रपंच का ‘इदं’ (यह) इत्याकारक बोध होता है। अतएव इस ज्ञान-शक्‍ति को बहिर्मुख शक्‍ति भी कहते हैं। इस शक्‍ति से युक्‍त होकर शिव प्रपंच की उत्पत्‍ति में निमित्‍त कारण बनता है और उत्पत्‍ति के अनंतर उसका पालन भी करता है (शि.मं. पृ. 27, 34)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्‍ति

च. क्रियाशक्‍ति
ज्ञान-शक्‍ति के सहस्रांश से क्रियाशक्‍ति का प्रादुर्भाव होता है (वा.शु. तंत्र 1/26)। यह क्रियाशक्‍ति इस प्रपंच का उपादान-कारण होती है। इस शक्‍ति से युक्‍त होने से शिव सर्वकर्ता बन जाता है। यही शिव की कर्तृत्वशक्‍ति है। इस शक्‍ति को स्थूल प्रयत्‍नरूपा भी कहते हैं (शि.मं. पृष्‍ठ 27, 34)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्ति चक्र

1. संपूर्ण विश्व को समय समय पर अपने संवित् प्रकाश में ही लय और उदय करने में व्यस्त परमशिव की भिन्न भिन्न शक्तियों का समूह।
2. खेचरी, गोचरी, दिक्चरी, भूचरी इत्यादि शक्तियों का समूह।
3. चित्, निर्वृति (आनंद), इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया- इन पाँच अंतरंग शक्तियों का समूह।
4. समस्त प्रपंच के भीतर प्रमातृ व्यवहार को चलाने वाली परमेश्वर की द्वादश महाकालियों का समूह।
5. माहेशी, ब्राह्मणी इत्यादि आठ शक्तियों का समुदाय।
6. महामुद्रा, योगमुद्रा पद्ममुद्रा, आदि मुद्राओं का समुदाय भी शक्ति चक्र कहलाता है।
7. प्राणी की सभी इंद्रियों में काम करने वाली शिव की शक्तियाँ जिन्हें करणेश्वरी चक्र कहा जाता है, उन्हें शक्तिचक्र भी कहते हैं। (स्पंदकारिकासं.पृ. 15-23)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्ति तत्त्व

1. छत्तीस तत्त्वों की कल्पना में दूसरा तत्त्व। शुद्ध विमर्शात्मक विश्वमय तत्त्व। परमशिव का विमर्श प्रधान स्वरूप। परमशिव की इच्छाशक्ति की स्फुट अभिव्यक्ति वाला तत्त्व। (तं.सा.पृ. 6)। परंतु साधनाक्रम के अनुसार शिव तत्त्व को परतत्त्व मान लेने पर शक्ति तत्त्व को आनंदशक्ति का ही रूप माना जाता है। शिव तत्त्व की भाँति शक्ति तत्त्व में भी परिपूर्ण शुद्ध ‘अहं’ ही स्फुटतया चमकता है और ‘इदं’ अंश सर्वथा ‘अहं’ में ही विलीन होकर रहता है। पूर्ण अभेद की भूमिका पर ठहरने वाले अकल प्राणी (शाक्त प्राणी) इसी तत्त्व में ठहरने वाले प्राणी होते हैं। (वही पृ. 74-75)।
2. शिव तत्त्व तथा शक्ति तत्त्व के वर्ग को भी शक्ति तत्त्व कहते हैं। (तं.आ.वि; खं 1 पृ. 29)। परंतु प्रमुखतया इस तत्त्व वर्ग को शिव तत्त्व के ही रूप में अधिकतया जाना जाता है। (देखिए शिव तत्त्व 2 )।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्तित्रय

1. जगत् के संपूर्ण व्यवहार की आधार बनी हुई स्मृति, ज्ञान एवं अपोहन नामक परमेश्वर की मूलभूत तीन शक्तियों को शक्तित्रय कहते हैं। परमेश्वर अपनी इन्हीं तीन शक्तियों के द्वारा समस्त विश्व का सारे का सारा व्यवहार चलाता रहता है। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा 1-3-7)।
2. परमेश्वर की पाँच अंतरंग शक्तियों में से इच्छा, ज्ञान और क्रिया नामक तीन अंतरंग शक्तियाँ।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्तित्रितय

इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक, मातृ-मान-मैयात्मक अथवा वामा-ज्येष्ठा-रौद्रयात्मक शक्तित्रय का प्रतिपादन त्रिपुरा प्रभृति सम्प्रदायों के ग्रन्थों में मिलता है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन में प्रधानतया शक्ति के परा, परापरा और अपरा नामक तीन भेद माने जाते हैं। तन्त्रालोक, विज्ञानभैरव प्रभृति ग्रन्थों में इनका विस्तार से वर्णन मिलता है। तन्त्रालोक (1/5) में बताया गया है कि स्वातन्त्र्य शक्ति को ही परा कहा जाता है। वही जब क्रम की सृष्टि करना चाहती है तो परापरा और क्रम रूप होकर अपरा कहलाती है। इसका अभिप्राय यह है कि स्वातन्त्र्य शक्ति, क्रमसंसिसृक्षा और क्रमात्मता के रूप में विद्यमान शिव, शक्ति और नरात्मक भगवान की विभूतियाँ ही उक्त त्रिविध रूपों में भासित होती हैं। इनमें परा देवी का स्वरूप निष्कल, परापरा का निष्कल-सकल और अपरा का स्वरूप सकल माना जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

शक्तिपंचक

परमेश्वर की चित्, निर्वृति (आनंद), इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया नामक पाँच अंतरंग शक्तियाँ। ये पाँचों शक्तियाँ क्रमशः परमशिव तत्त्व, शिवतत्त्व, शक्तित्त्व, सदाशिवतत्त्व तथा ईश्वर तत्त्व में स्फुटतया अभिव्यक्त होती हैं। (शि.दृ. 1-29, 30)। इन पाँच शक्तियों के बहिर्मुख विकास ही के द्वारा परमेश्वर की परमेश्वरता अभिव्यक्त होती हैं। इन्हीं शक्तियों के लीलात्मक अभिनय से वह अपनी परमेश्वरता के चमत्कार का आस्वादन करता हुआ अपनी परमेश्वरता को निभाता है। यदि उसमें ये पाँच शक्तियाँ न होतीं या यदि होकर भी वह इनके बहिर्मुख विकास के प्रति उन्मुख ही नहीं होता तो फिर वह शून्यगगन की जैसी पदवी पर उतर कर जड़ता को प्राप्त हो जाता।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्तिपात

साधक या शिष्य पर ईश्वर या गुरु की कृपा को शक्तिपात कहा जाता है। शैव, शाक्त और वैष्णव आगमों का यह एक पारिभाषिक शब्द है। पंचकृत्यकारी (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह) प्रभु की अनुग्रह शक्ति का यह व्यापार है। ईश्वर या गुरु अपनी शक्ति का संचार साधक या शिष्य के हृदय में कर देता है, जिससे कि उसकी बुद्धि निर्मल होकर विवेकोन्मुख हो उठती है, स्वात्मस्वरूप की खोज में लग जाती है। अभिनवगुप्त ने शक्तिपात के लक्षण, भेद आदि के संबंध में मत-मतान्तरों की आलोचना करते हुए अपने विशाल ग्रन्थ तन्त्रालोक के तेरहवें आह्निक (भास्करी 8, पृ. 1-214) में विस्तार से विचार किया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

शक्तिपात

पारमेश्वरी लीला का वह अनुपम विलास जिसके प्रभाव से जीव के संशयों का उच्छेद होता है, उसे सत् और असत् का विवेक होता है, सद्गरु के पास जाने की अभिलाषा उत्पन्न होती है तथा मोक्षमार्ग के प्रति प्रवृत होने की अंतःप्रेरणा होती है (तं.सा.पृ. 122)। शक्तिपात के मुख्यतः तीन भेद माने गए हैं – तीव्र, मध्य और मंद। इनमें से प्रत्येक के तीव्र, मध्य एवं मंद नामक तीन तीन उपभेद भी होते हैं। जैसे तीव्रतीव्र, मध्यतीव्र, मंदतीव्र इत्यादि। इस प्रकार शक्तिपात के नौ भेद हो जाते हैं। (तं.आ.13-129, 130, 254; तन्त्र सार पृ. 119, 120)। इसी प्रकार इसके और भी भेद किए जा सकते हैं। शक्तिपात को निरपेक्ष एवं अनिमित्त माना गया है। वस्तुतः परमशिव इसके प्रयोग में पूर्णतया स्वतंत्र है और यही उसकी परमेश्वरता का रहस्य है। (तं.सा.पृ. 118, भास्करीवि.वा. 1-688)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्तिभूमिका

1. परमशिव की इच्छा शक्ति के स्फुट विकास की भूमिका। समस्त विश्व को अभिव्यक्त करने के प्रति परमशिव की उन्मुखता की भूमिका।
2. सृष्टि एवं संहार के क्रम में सर्वथा अभेदमयी प्रथम तथा चरम भूमिका।
3. शिव तत्त्व एवं शक्ति तत्त्व के अभेद की भूमिका। इस परिपूर्ण अभेद की भूमिका में शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संविद्रूप ‘अहं’ का ही सतत अवभास होता रहता है तथा ‘इदं’ पूर्णतया ‘अहं’ में ही विलीन होकर ‘अहं’ के ही रूप में चमकता है। शिवदशा तथा शक्तिदशा में इस शुद्ध ‘अहं’ में क्रमशः प्रकाशरूपता तथा विमर्शरूपता की प्रधानता रहती है। वस्तुतः ये दोनों ही एक दूसरे से सर्वथा अभिन्न हैं। केवल समझाने के लिए इनका पृथ्क् पृथक् निरूपण होता है। ये परमशिव के मानो दो पार्श्व हैं। परमशिव इस अभेद की भूमिका में समस्त प्रपंच को अपनी परादेवी द्वारा धारण करता है। (तं.सा.पृ. 28)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्तिमान्

परमशिव। महेश्वर। संपूर्ण विश्व को महेश्वर की शक्तियों का विलास एवं उन्हीं शक्तियों का स्फुट बहिर्मुख रूप कहा जाता है तथा स्वयं महेश्वर को इन भिन्न भिन्न प्रकार की अनंत शक्तियों का एकमात्र स्वामी कहा जाता है। वस्तुतः शक्ति एवं शक्तिमान् में किसी भी प्रकार का कोई भी अंतर नहीं है। (शि.दृ. 3-2, 3)। परमशिव का विश्वोत्तीर्ण कूटस्थ स्वरूप ही समस्त प्रपंच के सृष्टि संहार आदि का मूल कारण है। इस प्रपंच को प्रतिबिंब न्याय से आभासित करने की उसकी सामर्थ्य को शक्ति कहते हैं और उस शक्ति की अपेक्षा से उसे शक्तिमान् कहते हैं। ऐसा कहने की प्रथा ‘राहु का सिर’ इस प्रकार के कहने की प्रथा की तरह काल्पनिक भेद की कल्पना का आश्रय लेकर ही चल पड़ी है और केवल समझाने के लिए ही चल पड़ी है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

शक्‍तिविशिष्‍टाद्‍वैत

वीरशैवदर्शन को ‘शक्‍तिविशिष्‍टाद्‍वैत’ नाम से संबोधित किया जाता है। ‘शक्‍तिश्‍च शक्‍तिश्‍च शक्‍तीताभ्यां विशिष्‍टौ जीवेशौ तयोरद्‍वैतं = शक्‍तिविशिष्‍टाद्‍वैतम्’ इस व्युत्पत्‍ति के अनुसार शक्‍ति-विशिष्‍ट जीव और शक्‍तिविशिष्‍ट शिव इन दोनों का अद्‍वैत, अर्थात् अभेद ही शक्‍तिविशिष्‍टाद्‍वैत है। यहाँ पर ‘सूक्ष्मचिदचिद्रूपाशक्‍ति’ तथा स्थूल चिदचिद्रूपाशक्‍ति के नाम से शक्‍ति के दो भेद हैं। सूक्ष्मचिच्छक्‍ति का अर्थ है सर्वज्ञत्व और सूक्ष्म अचिच्छक्‍ति का अर्थ सर्वकर्तृत्व है। इस तरह सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृत्वरूप शक्‍ति को ‘सूक्ष्मचिदचिद्रूपाशक्‍ति’ कहते हैं। यह शक्‍ति परशिवब्रह्म की है (शि.द. पृष्‍ठ 6-8)। इसी प्रकार स्थूलचिच्छक्‍ति का अर्थ है किंचिज्ज्ञत्व और स्थूलअचिच्छक्‍ति का अर्थ किंचित्-कर्तृत्व है। इस तरह किंचिज्ज्ञत्व और किंचित्-कर्तृव्य रूप शक्‍ति को ‘स्थूलचिदचिद्रूपा शक्‍ति’ कहते हैं। यह शक्‍ति जीव की है (शि.द. पृष्‍ठ 22-23)। इस प्रकार परस्पर शक्‍ति-विशिष्‍ट जीव तथा ईश्‍वर के सामरस्य, अर्थात् अभेद के प्रतिपादक इस दर्शन को ‘शक्‍ति-विशिष्‍टाद्‍वैतदर्शन’ कहते हैं।

यहाँ पर सर्वज्ञत्व आदि शक्‍ति-विशिष्‍ट को शिव और किंचिज्ज्ञत्व आदि शक्‍ति-विशिष्‍ट को जीव कहने का तात्पर्य यह है कि परशिव की लीलावस्था में दोनों का भेद है और शक्‍ति-विशिष्‍टों के अद्‍वैत का प्रतिपादन मुक्‍तिकाल में दोनों के अभेद को बतलाने के लिये है। इस तरह इस दर्शन में द्‍वैत और अद्‍वैत प्रतिपादक दोनों श्रुतियों का समन्वय हो जाता है (श.वि.द. पृष्‍ठ 17-19; क्रि.सा. 1-93-95)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

शक्तिसंधान

काश्मीर शैव दर्शन के त्रिक-आचार के साधना क्रम में वह प्रक्रिया जिसके सफल हो जाने पर योगी अक्षय एवं अखंडित सर्वकर्तृता को प्राप्त करता है। वस्तुतः विश्वोत्तीर्ण तथा विश्वमय दोनों स्वरूप परमशिव के चिद्रूप प्रकाश के ही क्रमशः अंतर्मुख और बहिर्मुख स्वरूप हैं। इस प्रकार परमशिव अपने ही भीतर अपनी ही इच्छा से अपने ही आनंद के लिए समस्त प्रपंच को प्रकट करता रहता है। योगी जब अपने इसी सच्चिद्रूप प्रकाश के साथ पक्के विश्वास से तादात्म्य को प्राप्त कर लेता है तब वह स्वेच्छा से भिन्न भिन्न प्रकार के शरीरों एवं भावों को बिना किसी उपादान के रचने में समर्थ और स्वतंत्र हो जाता है। (शि.सू. 1-20; शिवसूत्रवार्तिक (भास्कर) य पृ. 22, 23)। इस प्रकार अपनी शुद्ध एवं परिपूर्ण स्वातंत्र्यशक्ति का तादात्म्य भाव से परामर्श करना ही शक्तिसंधान कहलाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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