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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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संकरहानि

विशुद्‍धि का एक भेद।
पाशुपत योगी की समस्त वैषयिक आसक्‍ति का जब अत्यंत उच्छेद हो जाता है तो उसे सङ्करहानि नामक विशुद्‍धि की प्राप्‍ति होती है। सङ्करहानि विशुद्‍धि का तृतीय भेद है। (ग.का.टी.पृ.7)। सङ्कर से तात्पर्य है वैषयिक आसक्‍ति का मनोवृत्‍तियों में मिलकर रहना। सङ्कर एक विशेष प्रकार का मानस संसर्ग होता है। मुक्‍ति पाने के लिए इस संकर को सर्वथा धो डालने से योगी संकरहानि रूपिणी विशुद्‍धि का पात्र बन जाता है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सकल

पूर्ण भेद की भूमिका के प्राणी। इन प्राणियों में आणव, मायीय तथा कार्म नामक तीनों मल स्फुट रूप से पूर्ण विकास को प्राप्त करके रहते हैं। परिणामस्वरूप ये प्राणी संसृति के चक्कर में बँध जाते हैं। ये समस्त प्रपंच को भेद दृष्टि से देखते हैं। कर्मवासना से घिरे रहने के कारण ये जन्म-मरण के भंवरों में फँसे रहते हैं। देवताओं से लेकर सामान्य जंतुओं तक का सारा प्राण / वर्ग सकल कोटि में ही गिना जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 227-229; स्वच्छन्द तंत्र पटल 7-237)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सकल-निष्कल

स्वच्छन्दतन्त्र (7/238-239) में बताया गया है कि मन्त्र का जब तक उच्चारण किया जा सकता है और जब तक उसको लिखा जा सकता है या चित्रित किया जा सकता है, तभी तक वह सकल रहता है। निष्कल स्वरूप भेदातीत है। इसका अभिप्राय यह है कि सकल स्वरूप ही भेदातीत स्थिति में पहुँच कर निष्कल हो जाता है। मन्त्र के विषय में यहाँ जो बात कही गई है, वही देवता के विषय में भी सही है। इसी सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए योगिनीहृदय (1/27-28) में भगवती त्रिपुरसुन्दरी के श्रीचक्र की सकल, सकलनिष्कल और निष्कल स्थिति का वर्णन किया गया है। आज्ञाचक्र पर्यन्त सकल, उन्मनी पर्यन्त सकल-निष्कल और महाबिन्दु में निष्कल रूप में भगवती स्थित है। इसी प्रकार प्रत्यभिज्ञा दर्शन में प्रतिपादित पराशक्ति की स्थिति निष्कल, परापरा की सकल-निष्कल और अपरा की सकल मानी गई है। सेतुबन्धकार (पृ.46) भास्करराय का मत है कि सकल जीव सकल स्वरूप की, प्रलयाकल सकलनिष्कल की और विज्ञानाकल निष्कल स्वरूप की आराधना का अधिकारी है। सकल शब्द के अन्तर्गत कला पद का अर्थ उन्होंने अंश, अर्थात् अंशांशीभाव किया है। अंशांशीभाव जहाँ रहेगा, वहाँ भेद की स्थिति अवश्य रहेगी। अतः इस स्थूल अंशांशीभाव रूप मालिन्य से युक्त स्वरूप को सकल कहा जाता है। जो स्वरूप इस दोष से रहित होगा, वह निष्कल कहा जाएगा। इसके लिये सगुण और निर्गुण शब्द भी प्रयुक्त किये जा सकते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

सकलीकरण

विरूपाक्षपंचाशिका की विद्याचक्रवर्ती कृत विवृति (श्लो. 51) में आचार्य योगीश्वर का एक वचन उद्धृत किया गया है। उसमें बताया है कि प्रकाशात्मक शिव के साथ विमर्शात्मक शक्ति की कूटस्थ एकात्मकता की प्रत्यभिज्ञा के उदित होने से जो परमानन्द का आविर्भाव होता है, उसी का नाम सकलीकरण है। यह सकलीकरण की अद्वैतवादी व्याख्या है। तान्त्रिक वाङमय में दीक्षा के प्रसंग में इस शब्द का प्रयोग बार-बार हुआ है। विवृतिकार ने उक्त स्थल पर बताया है कि दाह और आप्यायन क्रिया के द्वारा सकलीकरण सम्पन्न होता है। प्राणायाम शब्द की व्याख्या के प्रसंग में शोष, दाह और आप्यायन विधियों की चर्चा की गई है। इन्हीं की सहायता से सकलीकरण प्रक्रिया सम्पन्न होती है। पाँच भौतिक देह स्थित मल का, पाप पुरुष का शोष और दाह हो जाने के उपरान्त दैवत्व भावना से देह को आप्यायित करना ही सकलीकरण है। मृगेन्द्रतन्त्र क्रियापाद (3/4-10) में बताया गया है कि इसमें ईशान की 5 कला, तत्पुरुष की 4, अघोर की 8, वामदेव की 13 और सद्योजात की 8, इस प्रकार शिव की कुल 38 कलाओं से साधक के देह को आप्यायित किया जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

सकाम गति

कामना के अनुरूप प्राप्त होने वाली गति सकाम गति है अथवा सकाम कर्म के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली गति सकाम गति है। यह गति कामना के अनन्त होने से अनन्त प्रकार की होती है (अ.भा.पृ. 852)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सक्‍तिहेतु

मल का एक विशेष प्रकार।

भासर्वज्ञ के अनुसार भौतिक विषयों के प्रति आसक्‍ति से मनुष्य को जो सुख मिलता है तथा उस सुख से उसे जो अभिमान होता है, “कि मैंन अमुक कार्य किया या करूँगा, उससे मुझे अमुक प्रकार का आनन्द मिला या मिलेगा” इस प्रकार का उसका यह सुखाभिमान ही सक्‍ति हेतु नामक मल होता है। यह मल का तीसरा प्रकार है तथा बन्धन का एक कारण बनता है। इसीलिए इसे मलों के भीतर गिना गया है। (ग.का.टी.पृ.22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

संगमादित्य

पंद्रहवीं पीढ़ी के त्र्यंबकादित्य के पुत्र। मानसपुत्र न होकर स्त्रीपुरुष संगम से उत्पन्न होने के कारण इन्हें संगमादित्य ऐसा नाम दिया गया था। सोमानंद के पांचवीं पीढ़ी के पूर्वज। संगमादित्य के पुत्र वर्षादित्य, वर्षादित्य के पुत्र अरूणादित्य, अरूणादित्य के पुत्र आनंद तथा आनंद के पुत्र सोमानंद हुए। (शिव दृष्टि 7/114-120)। संगमादित्य के कश्मीर में आने के अनंतर ही इस प्रदेश में अद्वैत शैव दर्शन की पर्याप्त प्रगति होने लगी। इस प्रकार संगमादित्य को ही कश्मीर में त्र्यंबकमठिका की स्थापना एवं अद्वैत शैवदर्शन के सर्वप्रथम प्रचार का श्रेय जाता है। बाद में सोमानंद आदि आचार्यों ने इस दर्शन को पूर्ण विकास में लाया। (देखिए ‘त्र्यंबकादित्य’ एवं त्र्यंबकमठिका)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संघात

देहेन्द्रिय (देह+इन्द्रिय), प्राण, अंतःकरण और जीव ये चारों संघात भगवद् विभूति रूप हैं। इनमें देहेन्द्रिय रूप प्रथम संघात स्थूल शरीर रूप है। द्वितीय संघात प्राणमय रूप है। तृतीय संघात मनोमयरूप है। मन सभी इन्द्रियों से सम्बद्ध है। यह स्वयं इन्द्रिय भी है और अंतःकरण भी है। चतुर्थ संघात जीव तत्त्व रूप है। ये परस्पर में संहन्यमान (संहत) होकर ही पुरुषार्थ के साधक होते हैं, इसलिए संघात कहे जाते हैं (अ.भा.पृ. 187)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सत्कार्यवाद

भारतीय दर्शनों में कार्य-कारण (= उपादानकारण) भाव की व्याख्या के लिए जो तीन प्रसिद्ध वाद हैं, उनमें सत्कार्यवाद एक है (अन्य दो हैं – आरम्भवाद तथा विवर्तवाद)। सत्कार्यवाद वह वाद (या दृष्टि) है जो यह मानता है कि कार्य (= उत्पन्न वस्तु) अपने उपादानकारण में विद्यमान रहता है। यह सांख्ययोगीय दृष्टि है। इस दृष्टि के अनुसार यह कहा जाता है कि उत्पन्न वस्तु अपने उपादान कारण (मूल उपादान त्रिगुण है) के संस्थानविशेष (= अवयवों के विभिन्न रूपों से रहने) के अतिरिक्त कुछ नहीं है – त्रिगुण की नाना प्रकार की विषम-अवस्थाएँ ही नानाविध वस्तुएँ हैं – त्रिगुण के अतिरिक्त अन्य कुछ उनमें नहीं है।
कारण का ही संस्थानविशेष कार्य है – इससे यह भी सिद्ध होता है कि कार्य कारण की स्थूल अवस्थाविशेष है – कारण कार्य की तुलना में सूक्ष्म है। सूक्ष्म होने के कारण कार्य में पूर्णतया व्याप्त रहता है, दूसरे शब्दों में, कार्य अपने कारण से अतिरिक्त कोई पृथक् सत्ता नहीं रखता।
सूक्ष्म कारण का स्थूल अवस्था रूप जो कार्य होता है, वह नित्य नहीं होता; किसी काल में वह अभिव्यक्त होता है (उत्पन्न होता है – ऐसा न कहकर अभिव्यक्त होता है – यही इस दृष्टि के अनुसार कहना चाहिए) और कुछ काल के बाद अपने कारण में ही लीन हो जाता है – नष्ट हो जाता है (नाश का अर्थ इस शास्त्र के अनुसार कारण के साथ अविभाग-प्राप्ति है)। यह अभिव्यक्ति और नाश हेतु-सापेक्ष हैं। यह हेतु ही ‘कारक-व्यापार’ कहलाता है अर्थात् उपयुक्त कारक-व्यापार से ही कोई कारण रूपान्तर को प्राप्त करता है – कारक व्यापार के बिना नहीं।
कार्य उपादानकारण के संस्थान विशेष के अतिरिक्त कुछ नहीं है – इस दृष्टि को ही ‘कारण और कार्य अभिन्न है’ ऐसा कहा जाता है। सर्वमूल कारण त्रिगुण है, जो अहेतुमान्, नित्य, सर्वव्यापी, अक्रिय, अनाश्रित, निरवयव तथा स्वतन्त्र है और त्रिगुणविकारभूत प्रत्येक कार्य (बुद्धि आदि) हेतुमान्, अनित्य, अव्यापी, सक्रिय, आश्रित, सावयव तथा परतन्त्र है (द्र. सांख्यकारिका 10), अतः यह कहना असंगत है कि सांख्य कार्य और उपादानकारण में ऐकान्तिक अभेद मानता है। यह ऐकान्तिक अभेद की अस्वीकृति स्पष्टतया व्यासभाष्य में की गई है (एकान्तानम्युपगमात्) 3/13 सूत्र पर)। पारमार्थिक दृष्टि में कार्य और कारण अभिन्न हैं, पर व्यवहारतः भिन्न हैं – यह इस भाष्यवाक्य का तात्पर्य है। सत्कार्यवाद की दृष्टि के अनुसार ही कहा जाता है कि न असत् (अविद्यमान) वस्तु की उत्पत्ति होती है और न सत् (विद्यमान) वस्तु का सर्वथा अभाव होता है; वस्तु के अतीत एवं अनागत धर्म सामान्य रूप से उसमें रहते हैं – धर्मरूप मृत्तिका में उसके अतीत-अनागत धर्म सूक्ष्मरूप से रहते हैं; द्र. योगसूत्र 4/12।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्कार्यवाद

काश्मीर शैवदर्शन का वह सिद्धांत, जिसके अनुसार जो कुछ भी है, वह परमशिव ही है, सत्य है और अनुत्तर संवित् है; कोई भी वस्तु, भाव या अवस्था सर्वथा असत्य नहीं है; समस्त विश्व परमशिव में अनुत्तर संवित् के रूप में ही विद्यमान रहता है तथा उसी के स्वातंत्र्य के विलास से उसी में ही व्यावहारिक जगत् के रूप में प्रतिबिंब के न्याय से प्रकट होता है। इस प्रकार जो कुछ भी जिस भी रूप में है वह है और सत्य है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सत्तर्क

1. शुद्ध विकल्प। अपने आपको समुचित युक्तियों के आधार पर शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संविद्रूप ही समझना सत्तर्क है।
2. परमशिव, प्रकाश एवं विमर्श का परिपूर्ण सामरस्य है, समस्त प्रपंच उसी के संविद्रूप में संवित् के ही रूप में स्थित है, विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय इन दोनों रूपों में वही चमक रहा है, उससे भिन्न और कुछ भी नहीं है – इस प्रकार का शुद्ध विकल्प ही सत्तर्क कहलाता है।
3. निश्चयपूर्वक यह विचार करना कि मैं वस्तुतः प्रकाश और विमर्श का परिपूर्ण सामरस्य हूँ, समस्त सूक्ष्म एवं स्थूल प्रपंच मेरा ही विस्तार है तथा मूलभूत रूप से यह सारा प्रपंच मेरी ही शुद्ध संवित् में संवित् ही के रूप में स्थित है, विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय इन दोनों रूपों में मैं ही स्थित हूँ, आदि भी सत्तर्क कहलाता है। (तन्त्र सार पृ. 21-23)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सत्त्वगुण

सांख्योक्त प्रसिद्ध त्रिगुण में से यह एक है। अन्य दो हैं – रजोगुण एवं तमोगुण। सत्त्वगुण के लक्षणादि के लिए गुणशब्द देखें।
शब्दादि पाँच गुणों में शब्द, पाँच भूतों में आकाश, पाँच तन्मात्रों में शब्दतन्मात्र, पाँच ज्ञानेन्द्रियों में कर्ण, पाँच कर्मेन्द्रियों में वाक् सात्त्विक (= सत्त्वप्रधान) है। चूंकि सत्त्वगुण सदैव रजस् -तमस् के साथ संयुक्त रहता है, अतः सत्त्वप्रधान विवेकख्याति की प्राप्ति भी सर्वोच्च लक्ष्य नहीं है – त्रिगुणातीत कैवल्य ही सर्वोच्च लक्ष्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्त्वगुण

परमेश्वर की ज्ञानशक्ति जब माया तत्त्व तथा इससे विकसित कला आदि पाँच कंचुकों से अत्यधिक संकोच को प्राप्त करके जीव में प्रकट हो जाती है तो उस अवस्था में वह जीव का सत्त्वगुण कहलाती है। इस प्रकार संकोच की अवस्था में पड़े हुए प्रमाता को जो प्रकाशात्मक सुख अपने स्वरूप की सत्ता के आनंद के आभास से प्राप्त होता है वह उसका सत्त्वगुण कहलाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 4-1-4, 6)। इस गुण के शेष स्वभाव सांख्य दर्शन के अनुसार ही माने गए हैं, परंतु इसके बीज को परमशिव में, इसके विकास को मूलतः पुरुष तत्त्व में और इसके प्रसार को प्रकृति तत्त्व में माना गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सत्त्वपुरुषान्याताख्याति

सत्त्व (= बुद्धितत्व) तथा पुरुष (= अपरिणामी द्रष्टा) दोनों स्वभावतः अत्यन्त भिन्न हैं, क्योंकि बुद्धि त्रिगुणजात, परार्थ, परप्रकाश्य, विषय, अचेतन एवं संहत है और पुरुष अत्रिगुण, स्वार्थ, स्वप्रकाश, विषयी, चेतन एवं असंहत है। अविद्या एवं अस्मिता के कारण बुद्धि पुरुषवत् प्रतीत होती है। समाधिनिर्मल प्रज्ञा में सत्त्व और पुरुष का भेद स्फुटरूप से ज्ञात होता है। यही ज्ञान सत्त्वपुरुषान्यताख्याति (= विवेकख्याति) है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्त्वशुद्धि

शौच रूप नियम (योगाङ्गाविशेष) का पालन करने से दो प्रकार की सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं – बाह्य एवं आभ्यन्तर। सत्त्वशुद्धि आभ्यन्तर सिद्धियों में एक है (द्र. योगसू. 2/41)। सत्त्व (= चित्तसत्त्व) की मलहीनता ही सत्त्वशुद्धि है। चित्त जितना मलहीन होगा, उतना ही उसमें सात्विक प्रवाह बढ़ेगा। यह सत्त्वशुद्धि सौमनस्य का हेतु है। छान्दोग्य उपनिषद् में जो ‘आहार शुद्धिजनित सत्त्वशुद्धि’ का उल्लेख है (7/26/2), वह भी यही सत्त्वशुद्धि है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्य

यमों का एक प्रकार।

पाशुपत योग में सत्य नामक यम दो प्रकार का कहा गया है – परिदृष्‍ट भूतार्थ तथा वाक् सत्य। समस्त दृष्‍ट अर्थों को जिस रूप में देखा हो, उन्हें ठीक उसी रूप में प्रस्तुत करना परिदृष्‍ट भूतार्थ सत्य होता है। वाणी में सत्य अर्थात् जिस सत्य को कहने से किसी का भला हो सकता है। यदि वह उस रूप में न भी देखा गया हो परंतु आपदा में पड़े जीव की रक्षा के लिए झूठ को भी सत्य बनाकर बोलना पड़े, वह वाक् सत्य होता है क्योंकि कहा भी गया है –
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्‍न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्म: सनातनः।।

अतः कभी-कभी भलाई के लिए बोला हुआ अनृत (झूठ) भी सत्य बन जाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.21,22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सत्य

पंचविध यमों में सत्य एक है (योगसूत्र 2/30)। जैसा जाना गया है या सुना गया है या अनुमित हुआ है, यदि वैसा ही कहा जाए तो यह सत्य है। अपने ज्ञान को अन्य को देने के लिए सत्य का कथन किया जाता है। स्वबोधसंक्रमणार्थ कहे गए वाक्य में यदि वंचना आदि करने की इच्छा हो तो वह सत्य नहीं होगा। सत्य वाक्य के द्वारा यदि हिंसा होती हो तो वहाँ वाक्य का उच्चारण करना निषिद्ध है। परपीड़ा का हेतुभूत सत्यवाक्य सत्याभास ही है। असत्य कह कर पर पीड़ा की निवृत्ति करने की अपेक्षा मौन रह कर पर-पीड़ा की निवृत्ति करना योगक्षेत्र का सत्यसाधन है। चित्त में सत्य की प्रतिष्ठा होने पर (मिथ्याकथन का संस्कार पूर्णतया नष्ट होने पर) वाणी अमोघ हो जाती है – यह योग शास्त्र की मान्यता है (योगसू. 2/36)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्याचार

देखिए ‘सप्‍ताचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सदसत्ख्याति

विपर्यय की सांख्यसम्मत व्याख्या। सांख्यसूत्र (5/56) के अनुसार शुक्ति (सीपी) में जो रजत का ज्ञान होता है, उसमें सत् और असत् दोनों का ज्ञान होता है। ‘यह रजत है’, ऐसा जो बोध होता है, उसमें ‘यह’ रूप अंश सत् ही रहता है – उसका बोध नहीं होता। ‘रजत है’, यह अंश असत् है, क्योंकि वह रहता नहीं है, उसका बोध होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सदाचार

देखिए ‘पंचाचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन
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