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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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मातृका क्रम में अंतिम ऊष्म वर्ण। यह वर्ण शक्ति तत्त्व को अभिव्यक्त करता है। अ अनुत्तर परमशिव है और ह उसकी शक्ति है। शक्ति और शिव के भीतर ही सारा प्रपंच विद्यमान है। सारे ही प्रपंच का एक शब्द से विमर्श करना हो तो अ के साथ ह को जोड़कर ऊपर अंतःसारता को अभिव्यक्त करने वाले अनुस्वार को लगाकर ‘अहं’ यह महामंत्र बनता है जो परिपूर्ण परमेश्वरता को अभिव्यक्त करता है। क से लेकर ह तक के वर्ण पृथ्वी से लेकर शक्ति तक के तत्त्वों को अभिव्यक्त करते हैं। यह अभिव्यक्ति प्रतिबिंब न्याय से होती है। प्रतिबिंब का आभासन बिंब के आभास से उल्टा होता है। दाँया बाँया हो जाता है और बाँया दाँया, पूर्व पश्चिम हो जाता है और पश्चिम पूर्व। अतः शक्ति रूप प्रथम तत्त्व अंतिम वर्ण ‘ह’ के रूप में और अंतिम तत्त्व पृथ्वी प्रथम वर्ण ‘क’ के रूप में प्रकट हो जाते हैं। शेष सभी तत्त्व भी विपरीत क्रम से ही अभिव्यक्त होते हैं। इस तरह से इन्हें अपने ही संवित् स्वरूप में प्रतिबिंबवत् चमकते हुए देखने के अभ्यास को मातृका योग कहते हैं, जिसमें ह वर्ण का एक प्रमुख स्थान है। (स्वच्छन्द तंत्र, पृ. 4-257; स्व. त. उ. खं. 2 पृ. 161)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

हठयोग

हठयोग योगविद्या की एक विशिष्ट धारा का नाम है। यह विद्या बहुत ही प्राचीन है, पर इसके सभी उपलब्ध ग्रन्थ अप्राचीन हैं, यद्यपि इन ग्रन्थों में कुछ प्राचीन आचार्यों के वाक्य उद्धृत मिलते हैं। ‘हठ’ शब्द की प्रचलित व्याख्या हैः ‘ह’ (अर्थात् सूर्य) तथा ‘ठ’ (अर्थात् चन्द्र) का संयोग (सूर्य-चन्द्र के भी प्राण-अपान आदि कई तात्पर्य हैं)। यह व्याख्या काल्पनिक प्रतीत होती है, यद्यपि प्राण-अपान के एकीकरण का हठयोगाभ्यास में प्रमुख स्थान है। हम समझते हैं कि हठपूर्वक (= बलपूर्वक) अर्थात् प्रधानतः बाह्य उपाय-विशेष का प्रयोग करते हुए योग (=वृत्तिरोध) करना हठयोग है।
हठयोगी प्रायः योगांगों की गणना आसन से शुरू करते हैं। इससे यह न समझना चाहिए कि हठयोग में यम-नियम का अभ्यास वर्जित है। योगांग न होने पर भी हठयोगी इनका अभ्यास करते ही हैं, क्योंकि हठयोग में जिन भावना आदि का उपदेश दिया जाता है, वे यमनियम के बिना साध्य नहीं हैं। हठयोग के साधनों में प्राणायाम केन्द्रभूत है, यद्यपि प्रत्याहारादि का विधान भी इस शास्त्र में किया गया है। हठयोगीय प्रत्याहारादि तत्त्वतः योगसूत्रोक्त-प्रत्याहार से स्थूल हैं। हठयोग में विवेकाभ्यास प्रधान नहीं है, अतः अविद्या का अत्यन्त नाश हठयोगीय पद्धति द्वारा संभव नहीं। हठयोग से तपोजात सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
हठयोगीय प्रक्रिया के अनुशीलन से यह ज्ञात होता है कि मुद्रादि का अभ्यास सकोचन-प्रयत्न को बढ़ाता है, जिससे तंत्रिका-तंत्र निरोधाभिमुख होता है (कृत्रिम रूप से)। इससे रुद्धप्राण होकर रहना संभव होता है। इससे चित्तरोध यद्यपि नहीं होता, तथापि रोध में सहायता होती है। हठप्रक्रिया से शरीर को मृतवत् करने पर चिन्ता करने वाला मस्तिष्क रुद्ध हो जाता है, अतः एक प्रकार का दुःखनाश भी होता है। यह नाश दुःख का आत्यंतिक नाश नहीं है जो योगविद्या का अन्तिम लक्ष्य है।
हठप्रक्रिया का मुख्य फल नाडीशुद्धि, बिन्दुजय (ऊर्ध्वरेता होना), नादश्रवण, शरीररोधयोग्यता एवं अंशतः कृत्रिम वृत्तिरोध है। हठयोगीय प्रक्रिया की सहायता लेकर यदि कोई ज्ञानाभ्यास द्वारा संस्कारक्षय-पूर्वक चित्तरोध करने की चेष्टा करेगा तो वह प्रकृत कैवल्यमार्ग में जा सकेगा। केवल हठप्रक्रिया से संस्कारक्षय नहीं होता। उच्चकोटि का दार्शनिक ज्ञान हठयोगशास्त्र का विषय नहीं है। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि हठयोगीय इडादि नाडियाँ आयुर्वेदशास्त्र-सम्मत नहीं हैं।
हठयोग के ग्रन्थों में शिव को इस विद्या का मूल प्रवर्तक कहा गया है। मत्स्येन्द्र, गोरक्ष आदि इस योग के प्रधान आचार्यों में माने गए हैं। हठयोगसिद्धों के नामों की एक सूची हठयोगप्रदीपिका (1/5 -8) में मिलती है। घेरण्डसंहिता, हठयोगप्रदीपिका, योगचिन्तामणि आदि कई हठयोगीय ग्रन्थ इस समय सुप्रचलित हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हरित्रय

हरि के तीन रूप हैं – पूर्वमीमांसा में कहा गया यज्ञरूप, वेदान्त में कथित साकार ब्रह्म रूप तथा श्रीमद्धागवत में प्रतिपादित अवतारी श्री कृष्ण रूप (त.दी.नि.पृ. 38)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

हंस मन्त्र

हकार, बिन्दु सकार और विसर्ग के योग से हंस मन्त्र की निष्पत्ति होती है। अनुत्तर, अकुल स्वरूप चिद्धाम में स्वयं उन्मिषित होने वाले हकार की स्थिति ऊपर और नीचे विसर्जनीय अनुप्राणित विसर्ग स्वरूप जीव की सकार की स्थिति रहती है। हान और समादान, त्याग और ग्रहण की प्रक्रिया के आधार पर इस हंस मन्त्र का उच्चारण पराशक्ति स्वयं ही करती है। इसीलिए “मैं वह शिव हूँ” इस तरह से अपने स्वरूप का परिचय वहाँ प्राप्त होता है। प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और अपान जब शरीर में पुनः प्रविष्ट होता है, तो वह हकार का उच्चारण करता है। इस तरह से प्राण और अपान की गति जब तक चलती रहती है, तब तक जीव प्रतिदिन निरन्तर ‘हंस-हंस’ इस मन्त्र का उच्चारण करता रहता है।
शक्ति संगम तन्त्र (1/3/77-87) में प्रणव के प्रसंग में हंस स्वरूपिणी कामकला का विवरण बताते हुए कहा गया है कि ‘सोSहम्’ इस हंस मन्त्र में प्रणव और कामकला दोनों की स्थिति है। उक्त ग्रन्थ के चतुर्थ खण्ड के उपोद्धात में इस विषय पर प्रकाश डाला गया है। विज्ञानभैरव के 42वें श्लोक में भी अजपा गर्भित प्रणव की उपासना वर्णिंत है।
हंस मन्त्र में विद्यमान सकार प्राण और प्रकाश (सूर्य अथवा दिन) का प्रतिनिधित्व करता है तथा हकार जीव (अपान) तथा क्षपा (रात्रि) का। सभी प्राणियों के अनुभव के आधार पर यह बात सिद्ध है कि प्राण (सकार) की गति स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर तथा अपान (हकार) की गति निरन्तर भीतर की ओर चलती रहती है। प्राण जब हृदय से ऊपर की तरफ चढ़ता है, तब ‘हं’ वर्ण की उत्पत्ति होती है और जब वह द्वादशान्त से उतरता है, तो उसकी अपान दशा में ‘सः’ वर्ण उत्पन्न होता है। इन दो वर्णों का स्पष्ट उच्चारण करते रहने से ही जीव ‘जीव’ कहलाता है। यह त्याज्य है, यह उपादेय है, यह मेरा है, यह मेरा नहीं है – इस तरह से छोड़ने और लेने के प्राण और अपान के धर्मों से समानता के कारण ही जीव हंस कहलाता है। हान (त्याग) और उपादान (परिग्रह), छोड़ना और लेना- इन दो व्यापारों में हंस और जीव की समानता है। हंस पक्षी जैसे दूध पी जाता है और पानी छोड़ देता है, उसी तरह से जीव भी प्राण और अपान के हान और उपादान का व्यापार निरन्तर करता रहता है। इसी समानता के आधार पर जीव को और जीव के इस निरंतर चल रहे श्वास-प्रश्वास प्रवाह को क्रमशः हंस और हंसमन्त्र के नाम से अभिहित किया गया है।
दिन-रात प्राण और अपान की इस निरंतर गतिशीलता के कारण इस हंस मन्त्र का हंस जीव एक अहोरात्र में 21600 बार उच्चारण करता है। इनमें से मूलाधार चक्र में गणपति को 6 सहस्र, स्वाधिष्ठान चक्र में ब्रह्मा को 6 सहस्र, मणिपुर चक्र में विष्णु को 6 सहस्र, अनाहत चक्र में शिव को 6 सहस्र, विशुद्धि चक्र में जीवात्मा को एक सहस्त्र, आज्ञाचक्र में गुरु को एक सहस्त्र जप निवेदित किये जाते हैं। इस तरह से स्वाभाविक रूप से निरन्तर चल रहे जप को निवेदित करने के उपरान्त साधक इस हंस मन्त्र का 108 बार जप करता है। निरुत्तर तन्त्र में अजपा गायत्री के दो भेद बताये हैं – व्यक्त और गुप्त। हंस तन्त्र का जप व्यक्त और प्राण और अपान के व्यापार के रूप में निरन्तर चल रहा जप गुप्त कहा जाता है।
माणिक्य के मैल को साफ कर देने पर जैसे उसमें चमक पैदा हो जाती है, उसी तरह से मध्य क्षण का उद्धार करने पर ‘हंसः’ इस मंत्र का विमर्श भी जाग उठता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

हसित

पाशुपत धर्म की विधि का एक अंग।

पाशुपत योगी को महेश्‍वर के मंदिर में भगवान महेश्‍वर की मूर्त्‍ति के समक्ष उच्‍च स्वर में हँसना होता है। अर्थात् मुँह व गला पूरा खोलकर अत्यधिक उच्‍च स्वर में अट्‍टहास करना होता है। यह उच्‍च अट्‍टहास हसित कहलाता है। हसित पाशुपत साधक की शिवपूजा का एक विशिष्‍ट अंग है। इसे छः उपहारों के बीच एक उपहार के रूप में गिना गया है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 13)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

हस्त

सुचित्‍त, सुबुद्‍धि, निरहंकार, सुमन, सुज्ञान और सद्‍भाव इन छः प्रकार के शुद्‍ध अंतःकरणों को वीरशैव दर्शन में ‘हस्त’ कहा गया है। जैसे बाह्य वस्तुओं के स्पर्श के लिए तथा किसी कार्य को करने के लिए हाथ एक प्रधान माध्यम होता है। उसी प्रकार साधक अपने अंतरंग आत्मतत्व के स्पर्श, अर्थात् ज्ञान के लिए सुचित्त, सुबुद्‍धि आदि इन छः शुद्‍ध अंतःकरणों को माध्यम (साधन) बनाता है। अतः इन अंतःकरणों को ‘हस्त’ शब्द से संबोधित किया गया है। ये क्रमशः भक्‍त, महेश्‍वर आदि षट्‍स्थल के साधकों के हस्त माने जाते हैं। चित्‍त जब विषय का चिंतन छोड़कर शिव का चिंतन करने लगता है, तो उसे ‘सुचित्त’ कहते हैं। इसे भक्‍त-स्थल के साधक का हस्त माना जाता है, अर्थात् सुचित्त साधक ही भक्‍त कहलाता है। शिव के अस्तित्व को निश्‍चय करने वाली बुद्‍धि को ‘सुबुद्‍धि’ कहते हैं। इसे महेश्‍वर का हस्त माना गया है। इस सुबुद्‍धि के माध्यम से महेश्‍वर को शिव के अस्तित्व के संबंध में होने वाले संशय का निरसन हो जाता है। सर्वत्र ‘अहं-अहं’ इस भावना को त्यागकर ‘सर्व शिवमयं’ इस प्रकार की भावना को ‘निरहंकार’ कहते हैं। इसे प्रसादी का हस्त माना गया है। इस निरहंकार-हस्त के माध्यम से यह प्रसादि-स्थल का साधक सुख, दुःख आदि सभी अवस्थाओं में शिव के अनुग्रह का ही दर्शन करता है। चान्चल्यरहति मन को ‘सुमन’ कहा जाता है। यह प्राणलिंगी का हस्त है। इसी के माध्यम से यह साधक हृदय में ज्योतिस्वरूप से विराजमान ‘प्राणलिंग’ की अर्चना, अर्थात् ध्यान करता है। शिव-स्वरूप के ज्ञान को ‘सुज्ञान’ कहते हैं। यह शरण का हस्त माना गया है। इस सुज्ञान के माध्यम से साधक को शिव का साक्षात्कार होता है। ‘मैं शिवस्वरूप हूँ’ इस प्रकार की भावना को ‘सद्‍भाव’ कहते हैं। यह ऐक्यस्थल के के साधक का हस्त है, अर्थात् यह साधक ‘शिवोടहं भावना’ के माध्यम से निदिध्यासन करता हुआ स्वयं शिवस्वरूप हो जाता है। इस प्रकार ये शुद्‍ध अंतःकरण शिव की उपासना में साधन बनकर साधक को शिवस्वरूप बनाने में सहायक होते हैं, अतः इन्हें हस्त कहा गया है (अनु.सू. 7/45-50)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

हान

व्यासभाष्य में योगशास्त्र को चिकित्साशास्त्र के समान ‘चतुर्व्यूह’ अर्थात् चार अंगों वाला शास्त्र कहा गया है (व्यासभाष्य 2/15), जिसमें हेय, हेयहेतु, हान एवं हानोपाय – ये चार विचार के विषय बताए गए हैं। हान का अर्थ है – त्याग। योगशास्त्र में हान का विशेष अर्थ है – बुद्धि और पुरुष के संयोग का अभाव। यह संयोगाभाव ही द्रष्टा का कैवल्य (= केवलीभाव) है, क्योंकि इस अवस्था में गुण के साथ द्रष्टा पुरुष का अमिश्रीभाव (= असंयोग) होता है और फलतः दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति हो जाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हानोपाय

अविद्यामूलक जो द्रष्टा-दृश्य संयोग है, उसका अभाव ‘हान’ कहलाता है। यह हान ही द्रष्टा का कैवल्य है – यह योगशास्त्रीय मान्यता है। अविप्लवा (= सर्वथा मिथ्याज्ञानहीन) विवेकख्याति ही इस हान का उपाय है (द्र. योगसू. 2/26)। इस विवेकख्याति के द्वारा सभी क्लेश सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, अतः द्रष्टा का स्वरूप में अवस्थान होता है (यही कैवल्य है)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हार्दानुगृहीत

हृदयाकाश में वर्तमान परमात्मा द्वारा अनुग्रह प्राप्त भक्त हार्दानुगृहीत पद से अभिहित है। “गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे”। इस श्रुति के अनुसार हृदयाकाशगत परमात्मा हार्द कहे जाते हैं (अ.भा.पृ. 1328)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

हार्धकला

हकार की अर्धकला अथवा हार्धकला योनिरूप में कल्पित है। यह अतिरहस्यमय गुह्य तत्त्व है। शिव और शक्ति के मिलन से उत्पन्न अमृत की धारा के प्रवाहित होने पर उससे जिस लीलामय तरंग की उत्पत्ति होती है, वही तान्त्रिक परिभाषा में हार्धकला के नाम से विख्यात है (शाक्त दृष्टि, पृ. 78)।
हार्धकला का नित्याशोडषिकार्णव (1/186) में सपरार्ध कला के रूप में वर्णन है। सकार से आगे हकार की स्थिति है। उस हकार के अर्धभाग को सपरार्ध अथवा हार्ध कहा जाता है। तन्त्रशास्त्र में बीजाक्षर ईकार कामकला का प्रतीक है। ब्राह्मी लिपि में इसका आकार कामकला के तीन बिंदुओं को और अनच्क हकार के अर्धभाग को मिलाकर बनता है। इस हकार के अर्धभाग सदृश मात्रा की स्थिति बीजाक्षर में बिंदु के समीप उपर रहती है, किंतु कामकला का ध्यान करते समयइस अनच्क हकारार्ध की स्थिति बिन्दुद्वय के नीचे अधोमुख रहता है। इसका रहस्य गुरुमुख से ही जाना जा सकता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

हिरण्मय पुरुष

सूर्य मंडलस्थ परमात्मा हिरण्मय पुरुष हैं। इसे “योSयमादित्ये ज्योतिषि हिरण्मयः पुरुषः” इत्यादि श्रुति द्वारा प्रतिपादित किया गया है। यह हिरण्मय पुरुष परमात्मा का प्रतीक रूप है (अ.भा.पृ. 221)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

हिंसा

अन्य को पीडित करना अथवा पीड़ा देने की इच्छा होना हिंसा है। हिंसा-कर्म की अपेक्षा हिंसा का मानस रूप (इच्छा-रूप) अधिक दूषित है (अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि में)। केवल पीड़ा देना ही नहीं, अन्य को पीड़ित कर अपने को आनन्दित या सुखी करने का मनोभाव हिंसा के साथ युक्त रहता है। यह मनोभाव मूलतः द्वेषरूप क्लेश के कारण होता है। क्लेश चूकि अज्ञान है, इसलिए आत्मज्ञान के विकास के साथ-साथ हिंसावृत्ति क्रमशः नष्ट होती है। व्यवहारतः हिंसा लोभ, क्रोध और मोह पूर्वक होती है। यह हिंसा कृत होती है, कारित (दूसरों के द्वारा करवाई हुई) होती है तथा अनुमोदित (किसी के द्वारा प्रोत्साहित) भी होती है। संस्कारबल के अनुसार हिंसा मृदु, मध्य और तीव्र भी होती है। इस प्रकार हिंसा के 27 (= 3x3x3) भेद होते हैं। मृदु आदि के भी अवान्तर भेदों के अनुसार हिंसा के भेद बहुसंख्यक होते हैं – यह पूर्वाचार्यों ने दिखाया है। ऐसी मान्यता है कि हिंसाकारी व्यक्ति जीवित-अवस्था में नाना प्रकार के दुःख को भोगते रहते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हेतुवाद

योगसूत्र 2/15 के व्यासभाष्य में इस वाद की चर्चा है दुःखःहानकारी आत्मा (जो ‘हाता’ है) का स्वरूप हेय (= अपलाप करने योग्य) नहीं हो सकता और न उसका स्वरूप उपादेय (= उपादान के योग्य) ही होता है। उपादान अर्थात् कार्यकारणरूप में आने पर आत्मा में परिणाम स्वीकार करना होगा और इस प्रकार कभी भी परिणामहीन मोक्ष नहीं हो सकेगा, क्योंकि जो कार्य होता है, वह विनाशी होता है। यह दृष्टि ही हेतुवाद है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हेय

हेय = त्याज्य। योगशास्त्र में अनागत दुःख ही ‘हेय’ शब्द से लक्षित होता है (योगसू. 2/16)। अतीत दुःख चूंकि उपभुक्त हो चुका है, अतः वह ‘हेय’ नहीं हो सकता; वर्तमान काल (जो वस्तुतः क्षणमात्र है) में जो दुःख अनुभूत हो रहा है, उसका परिहार अशक्य है; अतः अनागत दुःख ही ऐसा है जिसका परिहार किया जा सकता है। ‘हेय’ कहने का अभिप्राय यह है कि उसका परिहार सम्यक् दर्शन के द्वारा किया जा सकता है। दूरदर्शी योगी में अनागत दुःख भी क्लेशदायक के रूप में प्रतिभात होता है। चूंकि दुःख का जन्म के साथ अविनाभाव संबंध है, अतः योगी की दृष्टि में भविष्यत् जन्म ही हेय है, जिसके निरोध के लिए तत्त्वज्ञान का अभ्यास योगी करते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

हेयहेतु

योगशास्त्र की दृष्टि में अनागत दुःख हेय है (योगसू. 2/16); अतः अनागत दुःख का जो हेतु है वह हेयहेतु है। द्रष्टा एवं दृश्य का जो संयोग है, वही अनागत दुःख रूप हेय का हेतु है – यह योगसूत्र 2/17 में कहा गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

होम

शैवी साधना में त्रिक आचार के ज्ञानयोग का वह प्रकार जिसमें साधक को भावना द्वारा यह विमर्श करना होता है कि संपूर्ण विश्व परमेश्वर में उसी के रूप में रहता है; वस्तुतः यह समस्त भावरूप जगत् परमेश्वर में उसकी संवित् के ही रूप में चमकता रहता है। परंतु इस प्रकार के शुद्ध विकल्प को अपने चित्त में रूढ़ करने के लिए सतत अभ्यास से संपूर्ण सूक्ष्म एवं स्थूल भावों तथा पदार्थ को भावना द्वारा परमेश्वर के संवित रूप तेज में अर्पित करते हुए सभी कुछ का केवल संवित् के ही रूप में विमर्श करना होता है। इसी को ज्ञानयोग का होम कहते हैं। (तन्त्र सार पृ. 260)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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